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भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता

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भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता
India–European Union Free Trade Agreement
पूरा नाम:
  • भारत गणराज्य और यूरोपीय संघ के मध्य मुक्त व्यापार समझौता
    Free Trade Agreement between the Republic of India and the European Union
अन्तोनियो कोस्ता, नरेन्द्र मोदी और उर्सुला फ़ॉन डेर लाइएन भारत–यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के समय।
प्रकारमुक्त व्यापार समझौता
हस्ताक्षरित२७ जनवरी २०२६
स्थानहैदराबाद हाउस, नई दिल्ली, भारत
शर्तेंयूरोपीय संघ की परिषद् [en] द्वारा अनुमोदन, यूरोपीय संसद् की सहमति, तथा भारत में घरेलू अनुमोदन‑प्रक्रियाओं की पूर्णता
वार्ताकार
भागीदार पक्ष
भाषाएँअंग्रेज़ी भाषा

भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (अंग्रेज़ी: India–European Union Free Trade Agreement, India–EU FTA) भारत गणराज्य और यूरोपीय संघ (ईयू) के मध्य २७ जनवरी २०२६ को सम्पन्न एक व्यापक मुक्त व्यापार समझौता है, जिसके लिये लगभग दो दशकों तक वार्ताएँ चलती रहीं।[1][2] यह समझौता नई दिल्ली में आयोजित भारत–यूरोपीय संघ शिखर‑सम्मेलन में घोषित किया गया तथा इसका उद्देश्य वस्तुओं, सेवाओं और विनियामक सहयोग से सम्बन्धित क्रमिक प्रतिबद्धताओं के माध्यम से दोनों अर्थव्यवस्थाओं के मध्य व्यापार एवं निवेश को उदार बनाना है।

समकालीन माध्यम वृत्तान्तों में, दोनों पक्षों के राजनैतिक नेतृत्व ने इस समझौते को “सभी समझौतों की जननी” कहा — यह अभिव्यक्ति सार्वजनिक वक्तव्यों में प्रयुक्त हुई, न कि औपचारिक सन्धि‑पाठ में।[3] घोषणा के समय यह समझौता विधिक परीक्षण तथा अनुवाद की प्रक्रिया के अधीन था। प्रभावी होने से पूर्व, इस समझौते को यूरोपीय संघ की परिषद् की स्वीकृति, यूरोपीय संसद् की सहमति तथा भारत में घरेलू अनुमोदन‑प्रक्रियाओं की पूर्णता आवश्यक है।[4][5][6]

पृष्ठभूमि

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भारत और यूरोपीय संघ के मध्य एक व्यापक व्यापार समझौते के लिये वार्ताएँ वर्ष २००७ में “व्यापक व्यापार एवं निवेश समझौता” रूपरेखा के अन्तर्गत प्रारम्भ हुई थीं। वर्ष २०१३ में शुल्कों, बाज़ार‑प्रवेश, बौद्धिक सम्पदा‑अधिकारों तथा विनियामक मानकों पर असहमति के कारण वार्ताएँ ठहर गयीं। जुलाई २०२२ में भारत और ईयू के मध्य नवोन्मेषी सामरिक एवं आर्थिक सहयोग के वातावरण में वार्ताएँ औपचारिक रूप से पुनः प्रारम्भ हुईं।[3]

इन वार्ताओं में अनेक अध्याय सम्मिलित थे, जैसे वस्तुओं एवं सेवाओं का व्यापार, निवेश‑सुरक्षा, सतत विकास, बौद्धिक सम्पदा‑अधिकार, अंकीय व्यापार तथा विवाद‑निपटान तन्त्र। फ़रवरी २०२५ में भारत और यूरोपीय संघ ने उस वर्ष के अन्त तक वार्ताएँ पूर्ण करने का लक्ष्य निर्धारित किया, जो भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी और यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फ़ॉन डेर लाइएन के मध्य हुई बातचीत के पश्चात् तय हुआ।[3] सितम्बर २०२५ में यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष काया कालास ने ईयू–भारत व्यापार एवं सुरक्षा सम्बन्धों को और सुदृढ़ करने का समर्थन व्यक्त किया, साथ ही रूस के साथ भारत के घनिष्ठ सहयोग, विशेषतः “ज़ापाद २०२५” सैन्य अभ्यास में सहभागिता, की आलोचना भी की।[3]

जनवरी २०२६ में, वार्ताओं के बीच, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फ़ॉन डेर लाइएन तथा भारत के वाणिज्य मन्त्री पीयूष गोयल, दोनों ने, इसे “सभी व्यापार समझौतों की जननी” कहा। इसके अतिरिक्त, फ़ॉन डेर लाइएन ने २०२६ के विश्व आर्थिक मंच में यह भी कहा कि यह व्यापार समझौता “दो अरब लोगों का मुक्त बाज़ार निर्मित करेगा, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के एक‑चतुर्थांश के लिये उत्तरदायी होगा।”[7] जनवरी २०२६ तक २४ में से लगभग २० वार्ता‑अध्यायों पर सहमति बन चुकी थी।[3]

वार्ताओं का निष्कर्ष

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२६ जनवरी २०२६ को नई दिल्ली में नरेन्द्र मोदी और उर्सुला फ़ॉन डेर लाइएन

भारत–यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में २७ जनवरी २०२६ को, नई दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस में, यह समझौता घोषित किया गया, जब कि इसके पूर्ववर्ती रात्रि में वार्ताएँ पूर्ण हो चुकी थीं। इस शिखर‑सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने किया तथा यूरोपीय संघ का प्रतिनिधित्व यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फ़ॉन डेर लाइएन और यूरोपीय परिषद् के अध्यक्ष अन्तोनियो कोस्ता ने किया।[1][3] फ़ॉन डेर लाइएन और कोस्ता, दोनों ने, इसके एक दिन पूर्व गणतन्त्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थिति दर्ज की थी।[8]

नरेन्द्र मोदी ने कहा कि भारत और ईयू के मध्य एक “बड़ा समझौता” सम्पन्न हुआ है और “विश्व‑भर के लोग” इसे “सभी समझौतों की जननी” कह रहे हैं। उनका कथन था कि यह समझौता “भारत के १.४ अरब नागरिकों तथा यूरोप के करोड़ों लोगों के लिये विशाल अवसर” लेकर आएगा।[9] उर्सुला फ़ॉन डेर लाइएन ने भी इस समझौते को “सभी समझौतों की जननी” कहा और यह भी कहा कि “हमने दो अरब लोगों का एक मुक्त व्यापार‑क्षेत्र निर्मित किया है, जिससे दोनों पक्षों को लाभ होगा।”[1]

मुक्त व्यापार समझौते के अतिरिक्त, शिखर‑सम्मेलन में भारत और ईयू के मध्य अनेक अन्य समझौते भी सम्पन्न हुए। “सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी” के अन्तर्गत भारत और ईयू समुद्री सुरक्षा, दहशतगर्दी‑रोधी सहयोग, साइबर‑रक्षा तथा रक्षा‑क्रय में अपने सहयोग को सुदृढ़ करेंगे।[3][3] भारत और ईयू के मध्य एक “गतिशीलता एवं प्रवासन समझौता” भी हस्ताक्षरित किया गया। यह समझौता, जो मुक्त व्यापार समझौते के साथ ही अन्तिम रूप से तय हुआ, भारतीय विद्यार्थियों और कुशल कर्मियों के लिये यूरोपीय संघ तक वैध एवं सुव्यवस्थित मार्गों को अत्यधिक विस्तृत करने वाला है।[3][3]

प्रमुख प्रावधान

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भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता वस्तुओं एवं सेवाओं के व्यापार के उदारीकरण, निवेश‑सुविधा, तथा विनियामक एवं सततता‑सहयोग को सुदृढ़ करने के लिये एक रूपरेखा स्थापित करता है। समझौते की विषयवस्तु सम्बन्धी सार्वजनिक जानकारी आधिकारिक विवरणों तथा अन्तरराष्ट्रीय समाचार‑संस्थाओं की प्रतिवेदनों पर आधारित थी, क्योंकि अन्तिम विधिक पाठ एवं परिशिष्टों का प्रकाशन अभी शेष था।[3][3] दोनों पक्षों ने व्यापार‑मूल्य के आधार पर अधिकांश वस्तुओं पर क्रमिक शुल्क‑कमी के लिये प्रतिबद्धता व्यक्त की, जिसमें घरेलू रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के लिये अपवाद एवं संक्रमण‑व्यवस्थाएँ सम्मिलित थीं। माध्यम‑वृत्तान्तों के अनुसार शुल्क‑उदारीकरण समझौते के प्रभावी होने के साथ ही तत्काल लागू न होकर कई वर्षों में क्रमिक रूप से लागू किया जाएगा।[3]

क्षेत्र प्रतिवेदन किए गए प्रावधान
वस्तुओं का व्यापार व्यापार‑मूल्य के आधार पर अधिकांश वस्तुओं पर शुल्कों का क्रमिक उन्मूलन अथवा कमी; संवेदनशील क्षेत्रों के लिये सुरक्षा‑उपाय एवं अपवाद।
औद्योगिक उत्पाद चयनित औद्योगिक वस्तुओं, जैसे गाड़ियाँ, मशीनरी, रसायन एवं औषधियाँ, पर उच्च शुल्कों में क्रमिक कमी।
कृषि कुछ कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य‑उत्पादों को वरीयतापूर्ण पहुँच; दुग्ध‑उत्पाद, अनाज एवं अन्य संवेदनशील वस्तुएँ अपवर्जित।
सेवाएँ एवं निवेश सेवा‑क्षेत्र में बाज़ार‑प्रवेश तथा निवेश‑सुविधा पर प्रतिबद्धताएँ; साथ ही विनियामक सहयोग।
श्रम गतिशीलता कुशल पेशेवरों, शोधकर्ताओं एवं विद्यार्थियों की गतिशीलता को सम्बोधित करने वाला समानान्तर ढाँचा।
सततता पर्यावरण‑मानकों एवं जलवायु‑सम्बन्धी विनियामक विषयों पर संवाद एवं सहयोग के प्रावधान।
व्यापार सुविधा सीमा‑शुल्क प्रक्रियाओं, मूल‑नियमों तथा विनियामक पारदर्शिता से सम्बन्धित उपाय।

प्रतिवेदनों के अनुसार शुल्क‑उदारीकरण व्यापार‑मूल्य के आधार पर ९० प्रतिशत से अधिक वस्तुओं को प्रभावित करेगा, यद्यपि विशिष्ट उत्पाद‑स्तरीय अनुसूचियाँ, समय‑सीमाएँ तथा विधिक रूप से बाध्यकारी प्रतिबद्धताएँ संधि‑पाठ एवं परिशिष्टों के प्रकाशन के पश्चात् स्पष्ट होंगी।[3][3]

अनुमोदन एवं क्रियान्वयन

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समझौता औपचारिक हस्ताक्षर से पूर्व विधिक परीक्षण एवं अनुवाद की प्रक्रिया के अधीन है। इसके प्रभावी होने के लिये यूरोपीय संघ की परिषद् द्वारा योग्य बहुमत से अनुमोदन, यूरोपीय संसद् की सहमति, तथा भारत में घरेलू अनुमोदन‑प्रक्रियाओं की पूर्णता आवश्यक है।[3] व्यापार‑उदारीकरण के उपाय कई वर्षों में क्रमिक रूप से लागू किये जाने की अपेक्षा है।[4][5][6] यह समझौता सम्भवतः वर्ष २०२७ के प्रारम्भ में प्रभावी हो सकता है।[3]

आर्थिक महत्व

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यूरोपीय आयोग ने कहा कि यह समझौता यूरोपीय निर्यातों पर लगने वाले लगभग ९७ प्रतिशत शुल्कों को कम या समाप्त कर देगा, जिससे प्रतिवर्ष लगभग €४ अरब तक शुल्क‑बचत सम्भव होगी। आयोग ने यह भी कहा कि इस समझौते के परिणामस्वरूप वर्ष २०३२ तक भारत को यूरोपीय निर्यात दोगुने हो सकते हैं।

प्रतिवेदनों के अनुसार भारत ने ईयू से आयातित गाड़ियों पर शुल्क को ११० प्रतिशत तक के स्तर से घटाकर ४० प्रतिशत करने की योजना बनाई। सरकार ने €१५,००० से अधिक मूल्य वाली सीमित संख्या में ईयू‑निर्मित कारों पर शुल्कों को तत्काल कम करने पर सहमति व्यक्त की, तथा समय के साथ शुल्कों को १० प्रतिशत तक घटाने का प्रावधान किया गया — जिससे वोल्क्सवैगन, मर्सिडीज़‑बेंज़ और बी॰एम॰डब्ल्यू जैसे यूरोपीय निर्माताओं के लिये बाज़ार‑प्रवेश सुधरेगा। ईयू और भारत दोनों ने कहा कि भारत ईयू से आयातित २,५०,००० गाड़ियों पर शुल्क कम करेगा, जिससे दबाव झेल रहे यूरोपीय ऑटोमोबाइल उद्योग को कुछ राहत मिलने की सम्भावना है।[3][3]

समझौता यूरोपीय संघ के अनेक निर्यात‑उत्पादों, जैसे फलों के रस, प्रसंस्कृत खाद्य‑पदार्थ, जैतून‑तेल एवं अन्य वनस्पति‑तेल, पर शुल्क समाप्त करता है तथा मदिरा पर शुल्क को ४० प्रतिशत तक घटाता है। यह भारत में यूरोपीय ऑप्टिकल, चिकित्सीय, शल्य‑चिकित्सीय, विमानन एवं अंतरिक्ष‑सम्बन्धी अधिकांश निर्यातों पर भी शुल्क समाप्त करता है। मशीनरी पर ४४ प्रतिशत, रसायनों पर २२ प्रतिशत तथा औषधियों पर ११ प्रतिशत तक के शुल्कों सहित अधिकांश शुल्क समाप्त किये जाएँगे।[3]

यह समझौता भारत के वस्त्र, परिधान, चमड़ा एवं जूता‑उद्योगों को अत्यधिक प्रोत्साहन देने की अपेक्षा है, क्योंकि ईयू के १२–१७ प्रतिशत तक के शुल्क समाप्त होने से भारतीय निर्यातक बांग्लादेश, वियतनाम, पाकिस्तान और तुर्किये जैसे प्रतिस्पर्धियों के समकक्ष पहुँच जाएँगे, जिन्हें पूर्व में शून्य‑शुल्क पहुँच प्राप्त थी। इससे अन्य निम्न‑लागत उत्पादकों के साथ प्रतिस्पर्धात्मक अन्तर भी कम होगा। वाणिज्य मन्त्री पीयूष गोयल ने यह भी कहा कि भारतीय वस्त्र‑निर्यात “बहुत शीघ्र” ७ अरब डॉलर से बढ़कर ३०–४० अरब डॉलर तक पहुँचने की क्षमता रखते हैं।[3][10][10]

विश्लेषण

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२७ जनवरी २०२६ को नई दिल्ली में काया कलास और एस॰ जयशंकर द्वारा सुरक्षा एवं रक्षा साझेदारी पर हस्ताक्षर

जेफ़रीज़ समूह के विश्लेषकों ने उल्लेख किया कि भारत ने ईयू की ९७ प्रतिशत शुल्क‑पंक्तियों पर वरीयतापूर्ण पहुँच प्राप्त की है, जो व्यापार‑मूल्य के लगभग ९९.५ प्रतिशत भाग को आच्छादित करती है। इसका अर्थ यह है कि समझौते के प्रभावी होते ही भारत के लगभग ९१ प्रतिशत निर्यातों पर कोई आयात‑शुल्क नहीं लगेगा।[10]

भारत और ईयू, दोनों, भू‑राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच विश्वसनीय व्यापार‑साझेदारों की खोज में थे। इकॉनॉमिस्ट इण्टेलिजेन्स यूनिट की सुमेधा दासगुप्ता के अनुसार भारत इस समझौते के माध्यम से अमेरिकी शुल्कों के प्रभाव को संतुलित करना चाहता था, जबकि ईयू चीन पर अपनी व्यापारिक निर्भरता कम करना चाहता था। उन्होंने कहा कि यह समझौता भारत की पारम्परिक संरक्षणवादी नीतियों से क्रमिक दूरी को भी प्रतिबिम्बित करता है।[7]

व्यापार‑वार्ताओं के बीच, भारत द्वारा २०२६ के गणतन्त्र दिवस समारोह में उर्सुला फ़ॉन डेर लाइएन और यूरोपीय परिषद् के अध्यक्ष अन्तोनियो कोस्ता को आमन्त्रित किया जाना भी एक राजनयिक संकेत था। यह भारत के उस प्रयास को रेखांकित करता था जिसके माध्यम से वह वैश्विक स्तर पर अपने सामरिक एवं व्यापारिक सम्बन्धों का विस्तार कर रहा था, विशेषतः तब, जब वर्ष २०२५ में अमेरिकी ५० प्रतिशत शुल्कों को लेकर उत्पन्न विवाद २०२६ तक जारी रहा। चैथम हाउस के चीतिज बाजपेयी ने कहा कि इस कदम ने यह संकेत दिया कि भारत अपनी विदेश‑नीति को विविधीकृत रखे हुए है और “ट्रम्प प्रशासन की मनमर्ज़ियों का मोहताज नहीं है।”[7]

सन्दर्भ

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  1. 1 2 3 Ellis-Petersen, Hannah; Rankin, Jennifer (27 January 2026). "'Mother of all deals': EU and India sign free trade agreement". The Guardian (ब्रिटिश अंग्रेज़ी भाषा में). आईएसएसएन 0261-3077. अभिगमन तिथि: 28 January 2026.
  2. "India, EU Seal Free Trade Deal after Nearly 20 Years". South Asia Newslog (अंग्रेज़ी भाषा में). 28 January 2026. DUPN: MO-00989. अभिगमन तिथि: 29 January 2026.
  3. 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 Costa, Ana Nicolaci da (27 January 2026). "India and Europe, both stung by Trump, turn to each other in a 'mother of all deals' on trade". CNN (अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 28 January 2026.
  4. 1 2 Pattanaik, Anwesha (27 January 2026). "EU-India free trade agreement set to remove most export tariffs". Yahoo Finance. अभिगमन तिथि: 31 January 2026.
  5. 1 2 Das, Puja (27 January 2026). ""Mother of all deals" India-EU Free Trade Agreement locks in market access, but climate compliance looms large". Down To Earth (अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 31 January 2026.
  6. 1 2 "Trade deal: India and EU announce FTA amid Trump tariff tensions". www.bbc.com (ब्रिटिश अंग्रेज़ी भाषा में). 27 January 2026. अभिगमन तिथि: 28 January 2026.
  7. 1 2 3 "FTA: India and EU set for 'mother of all deals' as Trump's tariffs bite". www.bbc.com (ब्रिटिश अंग्रेज़ी भाषा में). 24 January 2026. अभिगमन तिथि: 27 January 2026.
  8. "EU and India announce 'mother of all deals' representing 25% of global GDP". France 24. 26 January 2026. अभिगमन तिथि: 27 January 2026.
  9. Kurniawan, Trista (27 January 2026). "India and EU finalize 'mother of all deals' with landmark trade pact". CNN (अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 27 January 2026.
  10. 1 2 3 "EU trade deal to narrow India's textile gap with Bangladesh, Pakistan: Jefferies". The Economic Times. 28 January 2026. आईएसएसएन 0013-0389. अभिगमन तिथि: 28 January 2026.