भारतीय नाट्यशालाएँ

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भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र के द्वितीय अध्याय में तीन प्रकार के प्रेक्षागृहों का विधान किया है -

(1) विकृष्ट (लंबा आयताकार),

(2) चतुरस्त्र (वर्गाकार) और

(3) त्र्यस्त्र (तिकोना)।

ये तीनों भी परिणाम के अनुसार तीन प्रकार के होते हैं - (1) ज्येष्ठ, (2) मध्यम और (3) अवर (कनीयस या कनिष्ठ)। इनमें से ज्येष्ठ (विकृष्ठ, चतुरस्त्र तथा त्र्यस्त्र) 108 हाथ लंबा होता है और कनिष्ठ (विकृष्ट, चतुरस्त्र तथा त्र्यस्त्र) 32 हाथ लंबा होता है। इनमें से ज्येष्ठ देवताओं का, मध्यम राजाओं का और कनीयस या छोटा साधारण लोगों का होता है। भरत ने इन तीनों प्रकार के प्रेक्षागृहों में मध्यम (विकृष्ट, चतुरस्त्र तथा त्र्यस्त्र) को ही प्रशस्त माना है क्योंकि उसमें पाठ्य और गेय सब कुछ अत्यंत सुविधा के साथ स्पष्ट सुनाई पड़ता है। हाथ की नाप का क्रम यह है - 8 अणु का रज, 8 रज का बाल, 8 बल का लिक्षा, 8 लिक्षा का यूक, 8 यूक का यव, 8 यव का अंगुल, 24 अंगुल का हाथ (लगभग डेढ़ फुट) और चार हाथ का दंड होता है। इस नाप के अनुसार तीनों प्रकार के प्रेक्षागृह इस प्रकार होंगे :

विकृष्ट ज्येष्ठ प्रेक्षागृह 108व् 54 हाथ

विकृष्ट मध्यम प्रेक्षागृह 64व् 32 हाथ

विकृष्ट कनिष्ठ प्रेक्षागृह 32व् 16 हाथ

चतुरस्त्र ज्येष्ठ प्रेक्षागृह 108व् 108 हाथ

चतुरस्त्र मध्यम प्रेक्षागृह 64व् 64 हाथ

चतुरस्त्र कनिष्ठ प्रेक्षागृह 32व् 32 हाथ

त्र्यस्त्र ज्येष्ठ प्रेक्षागृह बीच से 108 हाथ लंबा

त्र्यस्त्र मध्यम प्रेक्षागृह बीच से 64 हाथ लंबा

त्र्यस्त्र कनिष्ठ प्रेक्षागृह बीच से 32 हाथ लंबा

भरत के अनुसार 64 हाथ (96 फुट) लंबा और 32 हाथ (48 फुट) चौड़ा विकृष्ट मध्यम प्रेक्षागृह ही बनाना चाहिए।

भूमि[संपादित करें]

जिस भूमि पर प्रेक्षागृह बनाना हो वह समतल, पक्की और कठिन हो। उस भूमि से झाड़ झंखाड़ निकालकर, हल चलवाकर उसमें से हड्डी, कील, खोपड़ी, घास, वृक्ष की ठूठें और जड़े निकाल देनी चाहिए। यह कार्य उत्तरा भाद्रपद, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, विशाखा, रेवती, हस्त, पुष्य और अनुराधा नक्षत्र में करना चाहिए। भूमि स्वच्छ कर लेने पर पुष्य नक्षत्र में वाल्वज, मूँज या वल्कल श्वेत साबित डोरी फैलाकर नापना चाहिए क्योंकि डोरी के बीच से टूटने पर स्वामी का मरण, तीसरे भाग पर टूटने से राजकोप, चौथे भाग के टूटने से प्रयोक्ता का नाश और नापते समय हाथ से डोरी छूट जाने से कुछ न कुछ उपद्रव होता है। इसलिए अनुकूल मूहूर्त, तिथि और करण देखकर, ब्राह्मणों को तृप्त करके, उनसे पुण्याहवाचन कराकर, शांतिजल लेकर, सावधानी से डोरी लगाकर भूमि नापनी चाहिए।

डोरी को 64 हाथ लंबा फैलाकर उसके दो भाग करके पीठ के भाग के भी दो किए जाएँ। उसके बाहर आधे भाग में रंगशीर्ष और पश्चिम भाग में नेपत्थ्यगृह बनाया जाए और शुभ नक्षत्र योग में शंख, दुंदुभि, मृदंग, पणव आदि बाजे बजाकर मंडप की स्थापना की जाए। इस अवसर पर पांखडी, संन्यासी, विकलांग आदि सब प्रकार के अनिष्ट पुरुषों को हटा देना चाहिए। रात को दसों दिशाओं में गंध, पुष्प, फल तथा अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों के साथ पूर्व में श्वेत अन्न की, दक्षिण में नील अन्न की, पश्चिम में पीले अन्न की तथा उत्तर में लाल अन्न की बलि दी जाए और प्रत्येक दिशा के अधिष्ठाता देवता के मंत्र से उसके लिए बलि दी जाए।

नींव डालने के समय ब्राह्मणों को घी और पायस (खीर), राजा को मधुपर्क (दही, घी और मधु) तथा मंडप बनानेवाले को गुडोदन (गुड़ और भात) खिलाकर मूल नक्षत्र में किसी विद्वान् से ही नाट्यमंडप की नींव डलवानी चाहिए और शुभ मूहूर्त, तिथि तथा करण के अनुसार भीत (दीवार) बनाना प्रारंभ करना चाहिए। भीतें बन चुकने पर शुभ नक्षत्र, योग और करण का विचार करके रोहिणी या श्रवण नक्षत्र में प्रात: काल सूर्योदय हो चुकने पर ऐसे श्रेष्ठ आचार्यों के हाथ स्तंभों की स्थापना करानी चाहिए जो पिछले तीन दिन रात तक निराहार व्रत रह चुके हों।

स्तंभ[संपादित करें]

रंग के अनुसार स्तंभ चार वर्णों के होते हैं - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र स्तंभ। इनमें से घी और सरसों से शुद्ध किए हुए पहले ब्राह्मण स्तंभ की श्वेत वस्तुओं से पूजा और सजावट करके खीर का दान किया जाए, क्षत्रिय स्तंभ पर लाल माला तथा लाल वस्तुआं से पूजा तथा सजावट करके द्विजों को लाल गुडोदन दिया जाए। पश्चिमोत्तर दिशा में वैश्य स्तंभ की स्थापना करके पीली वस्तुओं से पूजा और सजावट करके द्विजों को पीला घी और चावल दिया जाए, तथा पूर्वोत्तर दिशा में शूद्र स्तंभ की स्थापना करके नीली वस्तुओं से पूजा तथा सजावट करके द्विजों को मटर और चावल की मसालेदार खिचड़ी (कृसर) दी जाए। सबसे पहले ब्राह्मण स्तंभ पर श्वेत माला और श्वेत चंदन लगाकर कर्णफूल के बराबर सोना उसकी जड़ में डालना चाहिए। इसी प्रकार लाल माला से सजाकर क्षेत्रिय स्तंभ की जड़ में सोने के साथ ताँबा, वैश्य स्तंभ की जड़ में सोने के साथ चाँदी और शूद्र स्तंभ की जड़ में सोने के साथ लोहा डालना चाहिए। इतना हो चुकने पर स्वस्तिवाचन, पुण्याहवाचन और जयघोष के साथ पत्तों की माला से लिपटे हुए खंभे लाकर खड़े कर देने चाहिए और ब्राह्मणों को रत्न, गौ तथा वस्त्र आदि से संतुष्ट करके इस प्रकार एक एक खंभा सीधा और अडिग खड़ा करना चाहिए कि वह न लपलपाए, न डगमगाए न टेढ़ा बाँका हो क्योंकि डगमगाने से देश में सूखा पड़ता है, टेढ़े बाँके होने से मरण का भय होता है। और लपलपाने से शत्रु के आक्रमण का भय रहता है। ब्राह्मण स्तंभ की स्थापना करते समय पवित्रता से मंत्र के साथ दक्षिणा और गौ दान करनी चाहिए, निर्माता के संबंधियों को भोजन कराना चाहिए, पुरोहित और राजा को मधु और पायस (खीर) खिलाना चाहिए तथा सभी कारीगरों को नमकीन खिचड़ी देनी चाहिए। इसके पश्चात् उल्लास के साथ स्तंभ को अभिमंत्रित करते हुए कहा जाए "जिस प्रकार भारी मेरु पर्वत तथा विशाल हिमालय अचल है और जैसे राजा की जय अचल होती है वैसे ही तुम भी अचल बने रहो"। इसी प्रकार शास्त्रीय विधि से स्तंभ, द्वार, भीत और नेपथ्यगृह भी बनाना चाहिए।

मथवारी[संपादित करें]

रंगपीठ के पीछे रंगशीर्ष पर, रंगपीठ से लगभग डेढ़ हाथ ऊँचाई पर, चार खंभों की मथवारी या अंवारी बनानी चाहिए और रंगपीठ तथा पथवारी दोनों पर समान ऊँचाई का रंगमंडप बनाना चाहिए जिसे माला, वस्त्र, गंधपदार्थ और अनेक प्रकार के रंगों से सजाना चाहिए। स्तंभ बनानेवाले कारीगरों द्वारा भूतों को बलि और खीर दिलवाकर ब्राह्मणों को खिचड़ी खिलाकर मथवारी बनानी चाहिए अर्थात् सूँड़ उठाए हुए हाथी के आकार की अंवारी बनानी चाहिए। इसके पश्चात् शास्त्रविधि से रंगपीठ बनाया जाए।

रंगशीर्ष[संपादित करें]

भरत ने छह लकड़ियों से रंगशीर्ष बनाने का विधान लिखा है, किंतु लकड़ियाँ कैसे लगाई जाएँ यह स्पष्ट नहीं किया। इसके पश्चात् भरत ने लिखा है कि नेपथ्यगृह के दो द्वार बनाकर नेपथ्यगृह की भूमि काली मिट्टी से पाटकर अँडवे बैल से हल चलवा कर रोड़े, घास पात, कंकड़ पत्थर निकालकर सर्वांगपूर्ण श्रमिकों से नई टोकरियों में मिट्टी ढुलवाई जाए। यह रंगशीर्ष न कछुए की पीठ जैसा ऊँचा हो, न मछली की पीठ जैसा ढलुवाँ, शुद्ध दर्पण के समान चिकना और समतल हो जिसपर चतुर शिल्पियों द्वारा पूर्व में हीरा, दक्षिण में वैदूर्य, पश्चिम में स्फटिक उत्तर में मूँगा और मध्य में स्वर्ण जड़वा देना चाहिए। उसके पश्चात् लकड़ी का काम करना चाहिए जिसपर अनेक प्रकार की सजावटों के साथ सर्पों और कठपुतलियों की आकृतियाँ बनी हों, बीच बीच में छोटे-छोटे झरोखे, सजी हुई वेदियाँ तथा अनेक प्रकार के यंत्र और जाली आदि का काम हो। खंभों पर बने हुए पीठों और दरबों में कबूतर बसे हुए हों और अनेक रंगों से रँगी हुई वेदी पर सुसज्जित स्तंभोंवला लकड़ी का काम हो।

भित्तिकर्म[संपादित करें]

लकड़ी का काम पूर्ण करके भीत (दीवार) का कार्य प्रारंभ करना चाहिए। स्तंभ, खूँटी, झरोखे और कोने सभी द्वार के सामने या द्वार को बाधा देनेवाले न बनाए जाएँ। भीत पर पलस्तर करके उस पर चूना पोत दिया जाए और स्त्री, पुरुष, लता आदि के चित्र बना दिए जाएँ।

नाट्यमंडप[संपादित करें]

पर्वत की गुफा की आकृतिवाला तथा दो भूमितलवाला बनाना चाहिए जिसमें छोटी-छोटी खिड़कियाँ हों, वायु न आती हो तथा शब्द न गूँजता हो अर्थात् ऐसा निर्वात नाट्यमंडप हो जिसमें गाने बजानेवालों के स्वर की गंभीरता बनी रहे।

चतुरस्त्र प्रेक्षागृह[संपादित करें]

यह चारों ओर से 32-32 हाथ (48 फुट) का होना चाहिए जिसकी विधि, लक्षण आदि विकृष्ट के समान ही हों। चारों ओर से बराबर भूमि नापकर डोरी से उसके भाग बाँट जिए जाएँ और फिर बाहर चारों ओर पक्की ईंटों की जुड़ाई करके भीत बना ली जाए। फिर भीतर की और रंगपीठ के ऊपर मंडप के लिए 10 खंभे खड़े किए जाएँ। इन खंभों के बाहर प्रेक्षकों के बैठने के लिए ईंट और लकड़ी से सीढ़ीनुमा पीठासन बनाए जाएँ जो क्रमश: अगले आसन से एक एक हाथ उँचे उठे हुए हों जिससे रंगपीठ भली भाँति दिखाई दे सके। स्तंभों के विधान के अनुसार निर्दिष्ट दिशाओं में छह दृढ़ खंभे खड़े कर दिए जाएँ जिनपर आठ हाथ लंबा चौड़ा पीठ बनाया जाए। मंडप के आधार के लिए उचित खंभे खड़े किए जाएँ। इन खंभों को धरन के सहारे कस देना चाहिए और उनपर पुतलियाँ खड़ी कर देनी चाहिए। भरत ने ब्राह्मण और क्षत्रिय स्तंभ के संबंध में यह स्पष्ट नहीं किया कि इन्हें कहाँ खड़ा किया जाए।

नेपथ्यगृह[संपादित करें]

भरत ने लिखा है कि एक द्वार नेपथ्यगृह और रंगशीर्ष के बीच में हो जिसमें से होकर रंगपीठ पर अभिनेताओं का प्रवेश हो और दूसरा द्वार प्रेक्षागृह में जनता के प्रवेश के लिए रंगमंच के सामने की ओर हो।

आठ हाथ का रंगपीठ और पहले बताई हुई नाप के अनुसार चौकोर समतल वेदिका से सजी हुई मथवारी बनाई जाए जिसके साथ चार खंभोंवाला समतल रंगपीठ बनाया जाए।

त्र्यस्त्र नाट्यगृह[संपादित करें]

त्र्यस्त्र नाट्यगृह तिकोना बनाना चाहिए और इसी त्रिकोण के बीच के कोने में रंगपीठ बनाना चाहिए। उस कोण से एक द्वार रंगपीठ पर प्रवेश करने के लिए बनाना चाहिए और दूसरा रंगपीठ के पीछे से।

भरत ने प्रेक्षागृह के निर्माण की यह सब व्यवस्था इतनी अधूरी दी है कि इसके आधार पर भरत के विचारे हुए प्रेक्षागृह का पूरा निर्माण नहीं किया जा सकता, किंतु इतना स्पष्ट हो जाता है कि उनके प्रेक्षागृह का आधा भाग रंगमंच तथा नेपथ्यगृह के लिए होता था और आधा दर्शकों के लिए। कुछ विद्वानों ने विंध्यमेखला में अवस्थित सरगूजा प्रदेश की पहाड़ी में सीतावंगा और जोगीमारा गुफाओं के विहार शिलावेश्म का प्राचीन रंगमच मानने की भूल की है, किंतु उन्हें समरण रखना चाहिए कि भरत ने भूमि, नाप, इष्टिकाकर्म, दारुकर्म, स्तंभ तथा द्वार आदि का जो विस्तृत विधान दिया है वह इस प्रकार के शिलावेश्म में संभव ही नहीं है। ये वास्तव में उसी प्रकार के शिलावेश्म हैं जिनका उल्लेख मेघदूत (नीचैराख्यं - 1/27) कुमारसंभव (वनेचराणां - 1/10 तथा 1/14) के दरीगृह में किया गया है और जिसका उल्लेख सौंदरानंद (6/33) में भी मिलता है।

भारतीय रंगमंच पर नाट्यप्रदर्शन[संपादित करें]

उपर्युक्त भारतीय रंगमंच पर नेपथ्यगृह और रंगशीर्ष के बीच जवनिका या परदा पड़ा रहता था जिसे हटाकर पात्र प्रवेश करते थे। कभी-कभी विमान या चौकी पर बैठे हुए राजा भी प्रवेश करते थे (तत: प्रविशति आसनस्थो राजा विदूषकश्च)। उस समय अभिनय प्रतीकात्मक होता था इसलिए स्थान स्थान पर नाटकों में "रथावतरणं नाटयति" अथवा "घटसेचनं नाटयति" दिया हुआ है। उस समय न रथ होता था न घट, वरन् उसका नाट्य मात्र होता था जैसा अब भी चीनी नाटकों तथा यूरोप के प्रतीकात्मक नाटकों में होता है। भरत के नाट्यशास्त्र के चित्राभिनायक प्रकरण में इस प्रकार के अभिनय का विस्तृत विवरण दिया हुआ है।

कक्ष्या[संपादित करें]

भरत ने रंगमंच पर कक्ष्या का भी निर्देश किया है। ये कक्ष्याएँ तीन होती थीं - रंगपीठ से लगी हुई बाह्य कक्ष्या, 2 - नेपथ्यगृह से लगी हुई मध्य कक्ष्या। ये कक्ष्याएँ रंगमंच के दोनों ओर पाश्र्व की ओर से आने और जानेवाले अभिनेताओं के लिए काम में आती थीं। इन कक्ष्याओं का स्थान कितनी दूरी पर हो इसका निश्चय पात्रों के परिक्रमण (घूमने की संख्या) से होता था। दूर का स्थान निर्देश करने के लिए देर तक परिक्रमा करना पड़ता था और समीप के स्थान के लिए थोड़ा परिक्रमण।

प्रवेश और निर्गम[संपादित करें]

भरत ने बताया है कि प्रमुख पात्र सदा आभ्यंतर कक्ष्या में रहता था और गौण पात्र मध्यम कक्ष्या से आकर रंगशीर्ष के बीच में बैठता था। अपनी बात कहनेवाला पात्र उत्तर के द्वार से प्रवेश करके दक्षिण की ओर मुँह करके संदेश कहता था और जिस द्वार से आता था उसी द्वार से लौट जाता था। यदि वह पुन: लौटकर आता था तो फिर उसी द्वार से आता था जिससे गया रहता था।

बैठने की रीति[संपादित करें]

नाटक में कौन किस प्रकार बैठे इसका विवरण "अभिनयदर्पण" में इस प्रकार दिया है - "सभापति को पूर्व की ओर मुँह कर बैठना चाहिए। उसके दोनों ओर कवि, मंत्री और मित्रगण बैठे हों। उनके सामने रंगमंच पर नर्तकी के साथ कुशल नर्तक रहे और उसके बाई ओर दो तालधारी (मजीरेवाले), दोनों ओर दो मृदंगवाले और गायक के पास श्रुतिकार (स्वर देनेवाला) हों। भारतीय रंगशाला की विस्तृत विधानपद्धति से स्पष्ट है कि उस समय अत्यंत शिक्षित, कुशल नट ही रंगमंच पर आ सकते थे, अन्य लोग नहीं।

रामलीला का रंगमंच[संपादित करें]

महाराज हर्ष (8वीं शताब्दी) के पश्चात् भारतीय रंगमंच प्राय: समाप्त हो गया। सर्वप्रथम 16वीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास जी ने भारतीय ग्रामीण नाट्यप्रदर्शनों का संस्कार करके रामलीला के रूप में व्यवस्थित भारतीय रंगशाला की स्थापना की जिसकी चार विशेषताएँ थीं :

(1) लीला खुले मैदान में होती थी,

(2) प्रत्येक नाटकीय स्थान के लिए अलग अलग स्थान निश्चित थे; जैसे अयोध्या की लीला एक स्थान पर, लंका की लीला दूसरे स्थान पर, धनुषयज्ञ की तीसरे स्थान पर। आज भी रामनगर (वाराणसी) में उसी पद्धति पर रामलीला होती हैं।

(3) राम, लक्ष्मण आदि स्वरूपों का विधिवत् वरण और पूजन किया जाता है तथा हनुमान, सुग्रीव आदि भी अपने मुखौटों की पूजा करके अपनी भूमिका ग्रहण करते हैं।

(4) ये लीलाएँ निश्चित तिथियों को ही होती हैं और उनका आधार नाटक न होकर महाकाव्य (रामचरित्मानस) है।

इस श्रेणी में रामलीला और बंगाल की "यात्राएँ" प्रारंभ हुई जो प्राय: खुले मंच पर ही होती हैं, किंतु कभी-कभी मंदिरों या बंद स्थानों में भी होती हैं।

अँग्रेजों के आगमन के साथ बंबई और कलकत्ता में शेक्सपियर के नाटकों के उर्दू अनुवाद लेकर चमचमाती वेशभूषा और दृश्यों की तड़क-भड़क के साथ पारसी रंगशालाएँ खुल चलीं और उन्हीं की देखादेखी भारत के अनेक नगरों तथा बंगाल, गुजरात, महाराष्ट्र तथा तमिल में अव्यावसायिक, अर्धव्यावसायिक और व्यावसायिक नाट्यमंडलियाँ चल पड़ीं। इनमें भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाम पर स्थापित काशी की भारतेंदु नाट्य-मंडली तथा नागरी नाटक मंडली प्रसिद्ध हैं। इनमें अभी तक चित्रित पर्दों, पखवाइयों, झालरों, कसे हुए चौखटों और कटे हुए पर्दों (कट आउट) का प्रयोग होता है, जिसके आगे चौथी दीवार के रूप में आगे का पर्दा लगाया जाता है। इधर कुछ वर्षों से कलकत्ता में चक्रिल रंगमंच का प्रयोग भी हो चला है जिसका सर्वप्रथम प्रवत्र्तन सन् 1730 के लगभग जापान में शेवगाँव नामक नाट्यलेखक ने जापानी रंगशाला के लिए किया था। यह एक बीच के चूल (पिवट) पर कुम्हार के चाक के समान गोल पीठ के रूप में बनाया जाता है और हाथ से या शक्ति (बिजली या मोटर) से चलाया जाता है और जिसका प्रचार सन् 1806 में म्युनिख (जर्मनी) में कारलाउटेन श्लेगर ने किया था। बंबई में प्रसिद्ध भारतीय अभिनेता पृथ्वीराज ने अपने पृथ्वी थिएटर्स में त्रिपरिमाणीय (थ्री डाइमेन्शनल) रंगमंच का प्रयोग किया जिसमें द्विपरिमाणीय पर्दों का भी प्रयोग होता था।

सन् 1938 में महामना पं॰ मदनमोहन मालवीय जी की प्रेरणा से काशी में अभिनव रंगशाला की स्थापना हुई और उसका पेटिका रंगमंच (बॉक्स स्टेज्) बनाया गया जिसमें रंगपीठ (ऐÏक्टग स्पेस) के तीन ओर और ऊपर नीले रंग के तिपल्ली लकड़ी के पर्दें लगे हुए थे। दाएँ और बाएँ दो दो द्वार थे और पीछे की ओर कुछ ऊँचाई पर लकड़ी का पर्दा खड़ा करके उसमें तीन द्वार थे और शेष ऊपर का भाग खुला हुआ था। जिसपर आवश्यकतानुसार दो खंड का गृह भी बनाया जा सकता था। इसके पर्दे गोल लट्ठों पर ऊपर चर्खी से लपेटे जाते थे।

इसके पश्चात् अखिल भारतीय विक्रम परिषद् ने सन् 1947 में पृथ्वी थिएटर के सहयोग से बंबई के आपेरा हाउस में रूपबद्ध दृश्यपीठ मंच (फॉर्म कट सेटिंग स्टेज) पर "महाकवि कालिदास" नाटक खेला जिसमें भवन आदि के दृश्य उन उन आकारों में कटे हुए, दृश्यपीठों के द्वारा बनाए गए थे।

तीसरा प्रयोग भी सन् 1948 में बंबई में ही किया गया जहाँ मैरिन ड्राइव के मैदान में "देवता" नाटक के लिए त्रिपरिमाणीय खुला एकदृश्य बहुपीठात्मक दृष्टिबद्ध रंगमंच (मानोसीन मल्टीसेटिंग पस्र्पेक्टिव स्टेज) बनाया गया था जिसके एक दृश्य में दो भवन, सड़क और उपवन के पीछे बंबई का पूरा दृश्य मैरीन लाइन्स स्टेशन, दौड़ती हुई बिजली की रेलगाड़ियाँ, नगर के भव्य प्रासाद स्वाभाविक रूप से पृष्ठदृश्य बने हुए थे।

सन् 1949 में एक दृश्यात्मक रंगपीठ पर जो नाटक खेला गया उसमें त्रिपरिमाणीय दृश्य की भी अंशत: योजना थी जैसे "मीरा बाई" और "जय सोमनाथ" में।

सन् 1955 में बंबई के वल्लभभाई स्टेडियम में "जय सोमनाथ" नाटक के लिए मध्यस्थ केंद्रीय रंगमंच (सेंट्रल फोकल स्टेज) का प्रयोग किया गया जिसमें स्टेडियम की सीढ़ियों पर बैठे हुए तीस सहस्त्र दर्शकों के सामने 100 फुट की दूरी पर पाँच फुट ऊँचा और 80 फुट लंबा रंगमंच बनाया गया जिसपर 20 फुट पीछे 5 फुट ऊँचा सोमनाथ का त्रिपरिमाणीय मंदिर बनाया गया था तथा दो-दो सहस्र प्रकाशशक्ति की बत्तियों और ध्वनिविस्तारक यंत्रों के सहारे जय "सोमनाथ" नाटक खेला गया।

19,20,21 दिसम्बर सन् 1926 को लखनऊ में आकाश रेख संपृक्त रंगमंच (स्काइलाइन कंपोजिट-सेटिंग थियेटर) पर "विक्रमादित्य" नाटक खेला गया जिसमें आगे का पर्दा अवश्य था किंतु दाएँ बाएँ न पखवाइयाँ थीं और न पर्दें, वरन् दृश्य के अनुसार दृश्यपीठ मात्र थे जिनके मेल से सैकड़ों प्रकार के दृश्य बनाए जा सकते हैं और जो बत्ती बढ़ाकर लगाए और हटाए जा सकते हैं। ये रंगमंच तीन प्रकार के होते हैं - 1. सपाट या द्विपरिमाणीय दृश्यपीठ (टू डाइमेंशनल फ़्लैट सेटिंग) वाले, घनायतन दृश्यपीठ (ब्लॉक सेटिंग) वाले और स्थिर दृश्यपीठ (स्टेटिक सेटिंग) वाले जो पक्के बने बनाए भवन के आगे खेले जाते हैं। इसी तीसरी "श्रेणी" में आकाशरेखा स्वाभाविक स्थिर मंच (स्काइलाइन नेचुरल स्टैटिक स्टेज) भी आता है जिसका प्रयोग सन् 1948 में बलिया में "पारस" नाटक के लिए किया गया था जिसके दृश्य को पूर्णत: ग्रामीण बनाने के लिए घर की स्थिर पृष्ठभूमि के साथ मूंज और सरपत की झोपड़ी तथा बाड़े से युक्त वास्तविक वृक्ष, चरनी तथा कुएँ का दृश्यपीठ प्रस्तुत किया था।

रंगसज्जा[संपादित करें]

प्राचीन भारतीय रंगशाला में भरत के अनुसार पुस्त के प्रयोग का विधान था जो अनेक रूपों और प्रमाणों के अनुसार तीन प्रकार के होते थे - संधिम, व्याजिम और वेष्टिय। भोजपत्र, बाँस आदि के पत्ते तथा चर्म से जो सामग्री बनाई जाती थी उसे संघिम, यंत्र के द्वारा संचालित की जा सकनेवाली को व्याजिम और लपेटकर बनाई जानेवाली का वेष्टिम कहते हैं। इन तीनों प्रकार के पुस्तों से शय्या, यान, विमान, चर्म, वर्म, ध्वज और पर्वत आदि बनाए जाते थे क्योंकि उनके अनुसार लोहे या सारमय सामान का प्रयोग भारी और कष्टकर होने के कारण निषिद्ध था। इसलिए लकड़ी, चमड़ा, वस्त्र, लाख, बाँस और पत्तों से ही दृश्यपीठ बनाकर रंगीन कपड़ों से यथास्वरूप सजा लेना चाहिए। वस्त्र के अभाव में ताड़ या भोजपत्र का प्रयोग करना चाहिए। इन्हीं सब वस्तुओं से अस्त्र-शस्त्र तथा शरीर के अंग बनाए जा सकते हैं। भांड, वस्त्र, मोम, लाख, आम के पत्ते, तीसी, सन और मूँज से पर्वत, मार्ग, फूल, मणियाँ तथा अनेक प्रकार के मुकुट बनाए जाते थे क्योंकि स्वर्ण आदि से बने हुए मुकुट और आभूषण युद्ध, नृत्य और अभिनय में बाधक और घातक हो सकते थे। अत:, ताँबे या अबरक के पत्तरों और मोम से ही आवरण बना लिए जाते थे क्योंकि भरत के अनुसार रंगमंच पर शस्त्रों आदि से प्रहार न करके केवल उनका भाव मात्र दिखा देना चाहिए। भरत ने यह भी बताया है कि कौन सा अस्त्र कितने अंगुल का और किस प्रकार बनाना चाहिए। जर्जर के संबंध में भी विधान दिया गया है कि उसका आकार प्रकार कैसा हो, कितनी गाँठवाला हो, किस नक्षत्र में लाया जाए और कैसे बनाया जाए।

आजकल कागज की दफ्ती, कैनवेस (मोटा कपड़ा) तथा प्लाईउड आदि से यथारूप काटकर दृश्यपीठ बनाए जाते हैं। आभरण आदि भी इसी प्रकार बनाए जाते हैं, यद्यपि कभी-कभी वास्तविक आभरणों का भी प्रयोग कर लिया जाता है। अस्त्र-शस्त्र यथासंभव वास्तविक ही काम में लाए जाते हैं किंतु यह प्रयोग अवांछनीय और घातक है।

रंगदीपन[संपादित करें]

भरत के अनुसार रंगमंच पर अनेक दीप रखे रहते थे जिन्हें नाटक प्रारंभ होने पर कोई व्यक्ति जलता हुआ दीपक लेकर प्रज्वलित कर देता था। अँगरेजी ढंग पर भारत में जो रंगमंच चले उनमें पहले गैस की बत्ती का, फिर चूना-बत्ती (कैलशियम लाइट या लाइम लाइट) का और फिर बिजली की बत्तियों का प्रयोग हुआ। अब भारतीय रंगमंचों पर चकमक दीप (इनकैंडीसेंट लैंप) के अतिरिक्त अनेक प्रकार के बिजली के प्रकाशदीपों के द्वारा मंदक (डिमर) के सहारे कम या अधिक प्रकाश देकर विभिन्न रंगों के प्रकाश का भी प्रयोग किया जाने लगा है और रंगदीपन कला स्वत: एक कला हो गई है।

नवीन प्रयोग[संपादित करें]

इधर कुछ नवीन प्रयोग भी रंगमंच के संबंध में किए जा रहे हैं जैसे - दिल्ली में सन् 1957 में वृत्तरंगमंच (थियेटर इन दि राउंड) का प्रयोग किया गया जिसके बीच में गोल रंगमंच था और उसके चारों ओर दर्शक बैठे हुए थे। कलकत्ता की "अनामिका" नाट्य संस्था ने भी इसी प्रकार के अक्षवाट रंगमंच (एरिना थियेटर) पर अपना "छपते छपते" नाटक किया था। इसकी मंच विशेषता यही है कि दर्शकों के सामने ही पात्र आकर दृश्य लगाते और हटाते हैं और बत्ती बढ़ाकर दृश्यपरिवर्तन कर लिया जाता है।

यूरोप में "मास्को आर्टं थियेटर" या अमरीका के "रेडियो म्यूजिक हाल" में तथा यूरोप और अमरीका में जो अनेक प्रकार के रंगमंच संबंधी प्रयोग हो रहे हैं उस क्षमता और विस्तार के साथ हमारे देश में प्रयोग नहीं हुए। भारत सरकार तथा प्रादेशिक सरकारों की ओर से स्थान-स्थान पर अब खुले रंगमंच बन चले हैं जिनके पीछे गोल भीत (साइक्लोड्रामा) और दर्शकों के लिए सीढ़ीदार बैठकें बनी रहती हैं। धरती से लगभग डेढ़ फुट ऊँचे रंगपीठ पर दृश्य के अनुसार कुर्सी आदि लगा ली जाती है किंतु पीछे की पृष्ठपीठिका का प्रयोग नहीं होता। इस प्रकार के खुले रंगमंच पर अभिनय का अधिक महत्व बढ़ गया है, दृश्य का कम। दृश्यसज्जा के संबंध में भी निर्माणवादी (कन्स्ट्रक्टविस्ट), भाववादी (ऐब्स्ट्रेक्टिस), अतिवस्तुवादी (सर रियलिस्टिक) तथा प्रतीकवादी (सिंबॉलिस्टिक) आदि जो अनेक प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं उनमें से किसी का भी अनुगमन भारत में नहीं हुआ। दूसरी ओर रामलीला आदि जो खुले रंगमच के रूप में होती थीं वे बहुत स्थानों पर नाट्यशालाओं में नाटक के रूप में होने लगी हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]