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भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान

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भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान
शिमला

आदर्श वाक्य:ज्ञानमयं तपः (मुण्डकोपनिषद्)
(..जो ज्ञान के लिये तप करता है)
स्थापित1964
प्रकार:शोध संस्थान
निदेशक:प्रो॰ मकरन्द परांजपे
अवस्थिति:शिमला, हिमाचल प्रदेश,  भारत
संक्षिप्त शब्द:आईआईएएस / एडवांस स्टडी
जालपृष्ठ:http://www.iias.ac.in/

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य की राजधानी शिमला में स्थित है। इसकी स्थापना मानव संसाधन मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सन 1964 में कई गई थी और 20 अक्टूबर 1965 से इसने कार्य करना प्रारम्भ किया था। यह संस्‍थान जीवन तथा विचार संबंधी मौलिक विषयों एवं समस्‍याओं के बारे में निःशुल्‍क एवं सृजनात्‍मक अन्‍वेषण के लिए एक आवासीय केन्‍द्र है।[1]इसकी स्‍थापना वर्ष 1965 में सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 के तहत की गई थी और यह राष्‍ट्रपति निवास, शिमला में स्थित है।

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान का सामने से दृष्य

स्थापना

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सन् 1823 से लगभग छः दशकों तक, गर्वनर जनरल और फिर भारत के वाइसराय शिमला में अपने ग्रीष्मकालीन प्रवास के दौरान एक अनुपयुक्त आवास से दूसरे आवास में बदलते रहे। लार्ड लिटन ने (1876-80) नया आवास बनाने के लिए आब्जरवेटरी हिल को चुना। इस पहाड़ी का नाम आब्ज़रवेटरी हाउस की वजह से पड़ा जिसका निर्माण सन् 1840 में कैप्टन जे.टी. बालू ने कराया था। कालान्तर में आब्ज़रवेटरी हाउस वाइसराय के निजी सचिव का आवास बना।

नए वाइसराय निवास के प्रारंभिक नक्शे रायल इंजीनियर्स के कैप्टन एच.एच. कोल ने तैयार किए थे। ये नक्शे काम के सनकी वायइराय लार्ड लिटन को, सन् 1878 में शिमला ललित कला प्रदर्शनी के मौके पर प्रस्तुत किए गये थे। तथापि लार्ड डफरिन (1884-88) ने इस विषय में विशेष रूचि ली। उसने भारत के राज्य सचिव लॉर्ड रैंडाल्फ चर्चिल को अटठतीस लाख रूपए के खर्च की परियोजना अनुमति के लिए रखी। इस संपदा के रखरखाव पर डेढ़ लाख रूपए वार्षिक व्यय का अनुमान था।

वाइसराय का सपना साकार करने के लिए हेनरी इरविन को वास्तुकार और निर्माण कार्य का मुख्य अधीक्षक नियुक्त किया गया था। एफ.बी हैबर्ट और एल.एम. सेंट क्लेयर ने कार्यपालक अभियंता के रूप में सहयोग दिया था। उनके साथ तीन सहायक अभियंता थे- ए.स्काट, टी मैक्पर्सन और टी.एस. इंगलिश। मोटे तौर पर लॉज का खाका लॉर्ड डफरिन ने सुझाया था और वह नक्शे को बार-बार जांचता और संशोधित करता रहता। ब्रिटिश साम्राज्य की सबसे आलीशान इमारत के तौर पर इसका निर्माण होना था, इसलिए लोक निर्माण विभाग का तंत्र पूरी मुस्तैदी से इसमें लगा दिया गया और सन् 1886 में स्थल पर निर्माण कार्य शुरू हो गया था। एक विस्तृत समस्थल बनाने के लिए आब्जरवेटरी हिल के ऊपरी भाग को समतल किया गया था। ऊपरी पतली मिट्टी के नीचे कुचली हुई सलेटी चट्टान थी, जिसमें हर ओर दरारें थीं। इसे सही करने के लिए नींव को मजबूत बनाते हुए, कंक्रीट का भरपूर इस्तेमाल किया गया।

वाइसराय भवन का प्रमुख भाग अब तैयार था, जबकि कुछ निर्माण कार्य सितम्बर 1888 तक चलता रहा। वास्तव में लार्ड डफरिन के इस स्काटिश गढ़ में छोटे-मोटे काम तो लम्बे समय तक चलते ही रहने थे, क्योंकि जल्दी में पूरे किए गए काम में कई त्रुटियां रह गई थी। गढ़े गए पत्थरों की सजावट वाला मुख्य ब्लाक तीन मंजिला है जबकि रसोई विंग पांच मंजिला है। भवन पर मीनार ऊँची दिखाई देती है। लार्ड कर्ज़न के कार्यकाल (1899-1905) में इस मीनार की ऊँचाई और बढ़ाई गई। सन् 1927 में लार्ड इर्विन के समय (1926-31) जन-प्रवेश भवन भी जोड़ा गया। उस समय भवन का स्वरूप इसके सभी खण्डों सहित यथा-दृष्टि सुन्दर आकृति में, या विरूपित वास्तुशिल्पीय बनावट में, बन चुका था, जो आज भी मौजूद है।[2]

भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के भवन का निर्माण भारतीय गोथिक शैली में हुआ है।

उद्देश्य

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  • गहरे मानव महत्‍व वाले विषयों में सृजनात्‍मक सोच को बढ़ावा देना और शैक्षिक शोध हेतु उपयुक्‍त माहौल प्रदान करना और साथ ही मानविकी, समाज विज्ञान, विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा विकास, पद्धतियों एवं तकनीकों में उच्‍च अनुसंधान शुरू करना, इनका आयोजन करना, मार्ग दर्शन तथा प्रोत्‍साहन देना।[3]
  • उच्‍च परामर्श सहयोग हेतु सुविधाएं तथा व्‍यापक पुस्‍तकालय एवं प्रलेखन सुविधाएं प्रदान करना; जिनमें प्रत्‍येक मामले में निर्धारित की जाने वाली विशिष्‍ट अवधि के लिए शिक्षकों तथा अन्‍य अध्‍येताओं के लिए उच्‍च अध्‍ययन हेतु वित्‍तीय सहायता शामिल है।
  • राष्‍ट्रीय सेमिनार, लेक्‍चर, संगोष्ठियां, सम्‍मेलन आदि का आयोजन करना।[4]
  • व्‍याख्‍यान देने अथवा शोध संचालित करने के लिए भारत तथा विदेश से अतिथि प्रोफेसरों तथा अतिथि अध्‍येताओं को आमंत्रित करना।
  • कोई ऐसी पत्रिकाएं, आवधिक पत्रिकाएं, समाचारपत्र, पुस्‍तकें, पैम्‍फलेट, मोनोग्राफों या पोस्‍टरों जो इस उद्देश्‍य को बढ़ावा देने के लिए वांछनीय समझे जाएं, प्रारंभ करना, संचालन करना, मुद्रित करना, प्रकाशित करना तथा इन्‍हें प्रदर्शित करना।
  • शोध के परिणामों को एकत्र करने के लिए व्‍यवस्‍था करना और प्रकाशन हेतु उनकी सामाजिक प्रासंगिकता के अनुरूप उनका विश्‍लेषण करना तथा उन्‍हें अपनाना।[5]
  • ज्ञान के प्रचार-प्रसार में अन्‍य शैक्षिक अथवा सरकारी निकायों के साथ सहयोग करना।[6]
  • छात्रवृत्तियों तथा शोधकर्ताओं द्वारा स्‍वतंत्र रूप से शोध संचालित करने के लिए फेलोशिप प्रदान करना।[7]

प्रकाशन एवं पत्रिकायॆं

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पत्रिकाएँ

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'समरहिल' एक अकादमिक समीक्षा पत्रिका हैं जिसका प्रकाशन वर्ष मॆं दॊ बार किया जाता हैं (जून् और दिसम्बर) इस पत्रिका कॆ एक भाग मॆं मानविकी और सामाजिक विज्ञान पर नवीनतम प्रकाशनॊं पर समीक्षा करना मुख्य उदॆश्य है। प्रतिष्ठित विद्धानॊं कॆ लॆख और बुद्धिजीवियॊं कॆ साथ कियॆ गयॆ साक्षात्कार सामान्य पाठकॊं की रुचि कॆ स्त्रॊत हैं।

स्ट्डीज इन ह्यूमेनिटीज़ एण्ड सॊशल साइन्सेज़

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स्टडीज इन ह्युमेनीटीज़ एण्ड सॊशल सांईसेज़ (मानविकी व सामाजिक विज्ञानॊं कॆ लियॆ अन्तर विश्वविद्यालय की पत्रिका) वर्ष मॆं दॊ बार प्रकाशित की जाती हैं (जून और दिसम्बर) इसकॆ एक अंक मॆं एक विशॆष विषय पर लॆख प्रकाशित कियॆ जातॆ है। इसकॆ दूसरॆ अंक मॆं मानविकी और सामाजिक विज्ञान कॆ विद्धानॊं कॆ लॆख प्रकाशित कियॆ जातॆ है तथा इसमॆं विषयॊं पर कियॆ गयॆ शॊध की नवीनतम जानकारी समाहित हॊती हैं। संस्थान कॆ पास इस समय तक 300 सॆ अधिक प्रकाशनॊं मॆं अध्यॆताऒं द्धारा प्रस्तुत मोनोग्राफ, संस्थान मॆं आयॊजित संगॊष्ठियॊं की सम्पादित कार्यवाही तथा विशिष्ट अतिथियॊं कॆ भाषण, एवं आगुन्तुक तक विद्धानॊं तथा अध्यॆताऒं द्धारा प्रस्तुत लॆख इत्यादि हैं। संस्थान कॆ प्रकाशनॊं का दॆश‍ विदॆश कॆ शॊधजगत मॆं योगदान उल्लेखनीय है।

संस्थान वर्तमान में निम्नलिखित क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित:

  • मानविकी
    • कला और सौंदर्य
    • तुलनात्मक साहित्य का अध्ययन
    • धर्म और दर्शन का अध्ययन.
  • सामाजिक विज्ञान
    • विकास अध्ययन
    • तुलनात्मक राजनीतिक संस्थाओं का अध्ययन
    • सामाजिक, आर्थिक और सामाजिक, सांस्कृतिक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में संरचना.
  • प्राकृतिक और जीवन विज्ञान
    • विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर राज्य नीतियाँ
    • विज्ञान, प्रौद्योगिकी और विकास
    • तकनीक

छबि दीर्घा

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सन्दर्भ

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  1. "संग्रहीत प्रति". मूल से से 10 अगस्त 2014 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 20 जुलाई 2014.
  2. भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान का इतिहास
  3. "संग्रहीत प्रति". मूल से से 24 सितंबर 2015 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 20 जुलाई 2014.
  4. https://www.facebook.com/divyahimachal/posts/610224688989828
  5. https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=355027264575914&id=193913437353965
  6. https://www.facebook.com/permalink.phpstory_fbid=355027264575914&id=193913437353965
  7. "संग्रहीत प्रति". मूल से से 14 अगस्त 2014 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 20 जुलाई 2014.

बाहरी कड़ियाँ

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