भाड़ा-पत्र

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जब किसान ऋणदाता का कर्ज चुकाने में असमर्थ हो जाता है तो उसके पास अपना सर्वस्व -जमीन ,गाड़ियाँ ,पशुधन देने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं था , लेकिन जीवनयापन हेतु खेती करना जरूरी था। इसलिए उसने ऋणदाता से जमीन , पशु या गाड़ी फिर किराए पर ले ली , इसके लिए उसे एक भाड़ा-पत्र लिखना पड़ता था।[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]