भरत चक्रवर्ती

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भरत चक्रवर्ती
Bharatha.jpg
श्रवणबेलगोला के चन्द्रगिरि नामक पहाड़ी पर भरत की प्रतिमा
Parents

भरत चक्रवर्ती, प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र थे। जैन और हिन्दू पुराणों के अनुसार वह चक्रवर्ती सम्राट थे और उन्ही के नाम पर भारत का नाम "भारतवर्ष" पड़ा।[1]

हिन्दू ग्रन्थ, स्कन्द पुराण (अध्याय ३७) के अनुसार: "ऋषभदेव नाभिराज के पुत्र थे, ऋषभ के पुत्र भरत थे, और इनके ही नाम पर इस देश का नाम "भारतवर्ष" पड़ा"|[2]

ऋषभो मरुदेव्याश्च ऋषभात भरतो भवेत्
भरताद भारतं वर्षं, भरतात सुमतिस्त्वभूत्
— विष्णु पुराण (2, 1, 31)
ऋषभ मरुदेवी को पैदा हुए थे, भरत ऋषभ को पैदा हुए थे,
भारतवर्ष भरत से उगा और सुमति भरत से उगी

ततश्च भारतं वर्षमेतल्लोकेषुगीयते
भरताय यत: पित्रा दत्तं प्रतिष्ठिता वनम
- विष्णु पुराण (2, 1, 32)
यह भूमि तब से भारतवर्ष के रूप में जानी जाती है
जब से पिता अपने पुत्र भरत को राज्य सौंप कर तपस्या के लिए जंगल में गए

आदिपुराण[संपादित करें]

भरत चक्रवर्ती द्वारा देखे गए १६ स्वप्न। यह वर्तमान (दुखमा) काल से जुड़े थे।

१० वी सदी में लिखे गए आदिपुराण में ऋषभदेव, भरत और बाहुबली के दस जन्मों के बारे में बताया गया है। [3][4]

जन्म और बचपन[संपादित करें]

भरत के जन्म से पूर्व उनकी माता ने ६ स्वप्न देखे। ऋषभदेव ने उन्हें इनका अर्थ समझाया और बताया कि बालक प्रथम चक्रवर्ती बनेगा।[5][6] भरत की बहन हुई ब्राह्मी।[7] भरत को मुख्य रूप से न्याय की शिक्षा मिली।[8]

चक्रवर्ती[संपादित करें]

जैन कालचक्र के अनुसार हर काल में ६३ सलाकापुरुष जन्म लेते है। इनमे से १२ चक्रवर्ती होते है, जो सम्पूर्ण विश्व पर राज करते है। चक्रवर्ती सबके आदर्श माने जाते है।[9] भरत अवसर्पिणी (वर्तमान काल) के प्रथम चक्रवर्ती थे।[10]

सप्त रत्न[संपादित करें]

जैन ग्रंथों के अनुसार चक्रवर्ती के पास सात रत्न होते है- 

  1. सुदर्शन चक्र
  2. रानी
  3. रथों की विशाल सेना
  4. आभूषण
  5. अपार सम्पदा
  6. घोड़ों की विशाल सेना
  7. हाथियों की विशाल सेना

राज[संपादित करें]

जब ऋषभदेव ने मुनि बनने का निश्य किया, तब उन्होंने अपना साम्राज्य अपने १०० पुत्रों में बाँट दिया |[11][12] इसके पश्चात् भरत ने विश्व विजेता बनने का निश्य किया। सम्पूर्ण विश्व पर विजय करने के पश्चात् चक्रवर्ती बनने के लिए उन्होंने अपने भाइयों से अधीनता स्वीकारने को कहा। ९८ भाइयों ने अपने पुत्रों को राज्य सौंप कर जैनेश्वरी दीक्षा ले ली, परंतु बाहुबली ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा।[13] झगड़ा सुलझाने के लिए तीन तरह के युद्ध हुए:

  1. दृष्टि युद्ध
  2. जल युद्ध
  3. मल युद्ध

बाहुबली युद्ध में जीत गए पर उन्हें संसार से वैराग्य हो गया और वह मुनि बन गए।[14][15]

भरत ने कर्म युग में नीति राज की शुरुआत की।[16] उन्होंने चार तरह के दंड निश्चित किए।[17] आदिपुराण के अनुसार उन्होंने ब्राह्मण वर्ण की शुरुआत की[18], पर यह ब्राह्मण जाती आज की ब्राह्मण जाती से बहुत भिन्न थी।[19] भरत के पास पास अवधि ज्ञान था|[20] सभी चक्रवर्तियों की तरह भरत भी संसार की आसारता जान मुनि बन गए और अंत में मोक्ष गए।

मंदिर[संपादित करें]

श्रवणबेलगोला में भरत का एक मंदिर है। इरिंजालकूदा (कूदलमणिचकाम) भरत मन्दिर असल में एक जैन मन्दिर था जिसके मूलनायक सिद्ध भरत थे।[21]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

सन्दर्भ सूची[संपादित करें]