भज गोविन्दम्

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भज गोविन्दम् आदि शंकराचार्य द्वारा रचित प्रसिद्ध स्तोत्र है। यह मूल रूप से बारह पदों में सरल संस्कृत में लिखा गया एक सुंदर स्तोत्र है। इसलिए इसे 'द्वादश मञ्जरिका' भी कहते हैं। ‘भज गोविन्दम्’ में शंकराचार्य ने संसार के मोह में न पड़ कर भगवान् कृष्ण (गोविन्द) की भक्ति करने का उपदेश दिया है।

'भज गोविन्दम्' के अनुसार, संसार असार है और भगवान् का नाम शाश्वत है। शंकराचार्य ने मनुष्य को किताबी ज्ञान में समय ना गँवाकर और भौतिक वस्तुओं की लालसा, तृष्णा व मोह छोड़ कर भगवान् का भजन करने की शिक्षा दी है। इसलिए ‘भज गोविन्दम’ को ‘मोहमुद्गर’ यानि 'भ्रम-नाशक मुद्गर या मोंगरी' भी कहा जाता है। शंकराचार्य का कहना है कि अन्तकाल में मनुष्य की सारी अर्जित विद्याएँ और कलाएँ किसी काम नहीं आएँगी, काम आएगा तो बस हरि नाम।

कुछ प्रमुख श्लोक[संपादित करें]

नारीस्तनभरनाभीदेशं
दृष्ट्वा मा गा मोहावेशम् ।
एतन्मांसवसादिविकारं
मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥३॥
( नारी के स्तन और नाभी को देखकर मोह (भ्रम) में मत पड़ जाओ । (बल्कि) मन में बार-बार विचार करो कि ये सब मांस और वसा का विकार (बदला हुआ रूप) है।)
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः
का मे जननी को मे तातः ।
इति परिभावय सर्वमसारम्
विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम् ॥२३॥
(तुम कौन हो, मैं कौन हूँ, हम लोग कहाँ से आये हैं, मेरी जननी कौन है, तात (पिता) कौन हैं? सब कुछ सार-हीन मानो, संसार को 'स्वप्न' के समान समझकर इसका त्याग कर दो। )

सन्दर्भ[संपादित करें]

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