ब्रिटेन की कृषि क्रांति

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ब्रिटेन में औद्योगिक क्रांति के पूर्व कृषि क्रांति हुई थी। ब्रिटेन की इस कृषि आधारित व्यवस्था ने उसे दुनिया का पहला देश बनाया था जहाँ अकाल से मौत नहीं हुआ करती थी और ना होने दी जाती थी। ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति को कृषि क्रांति के प्रभावों का ही परिणाम मानें तो कुछ भी गलत नहीं कहा जा सकता। शायद 16वीं सदी में कृषि के आधार पर विकास और औद्योगिक क्रांति के बाद व्यापार से ब्रिटेन ने अगली शताब्दियों में दुनिया के अधिकांश हिस्से में राज किया।

अनुसांधानों में यह बात सामने आई है कि वैश्विक स्तर पर विकास की शुरूआत कृषि के जरिए ही हुई थी। ब्रिटेन के 17वीं और 18वीं सदी के इतिहास पर हाल में हुए शोध से यह बात सामने आई है कि वहाँ पर आर्थिक विकास के बाद सामाजिक सुरक्षा वाली संस्थाओं का विकास नहीं हुआ था बल्कि ये व्यवस्थायें वहाँ औद्योगिक क्रांति के कई शताब्दी पहले से ही मौजूद थीं।

ब्रिटेन में कृषि क्रांति के शिल्पकार[संपादित करें]

राबर्ट वेस्टर्न[संपादित करें]

तीन खेत प्रणाली के घाटों से उबारने में राबर्ट वेस्टर्न ने अहम भूमिका निभाई। इसने (1645 ई.) अपनी पुस्तक ‘डिस्कोर्स ऑन हसबैण्ड्री’ में यह बतलाया कि 1/3 भूमि को परती छोड़े बिना भी जमीन की खोई हुई शक्ति प्राप्त की जा सकती है। इस हेतु उसने शलजम आदि जड़ों वाली फसलों को बोने पर विशेष जोर दिया। राबर्ट ने फ्लैडर्स में रहकर कृषि का ज्ञान प्राप्त किया था। इसके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों से अब पूरा का पूरा खेत हर वर्ष काम में लाया जाने लगा।

जेथरी टुल[संपादित करें]

यह बर्कशायर का एक किसान था जिसने कृषि उत्पादन में वृद्धि हेतु कई सिद्धांत प्रतिपादित किये। 1701 ई. में उसने बीज बोने के लिए ड्रिल यंत्र का आविष्कार कर प्रयोग किया। इस यंत्र से खेत में बीजों के बीच दूरी रखी गयी। इससे पौधों को फैलने में एवं गुड़ाई करने में मदद मिली। इसके द्वारा अच्छे बीज के प्रयोग, खाद की आवश्यकता एवं समुचित सिंचाई व्यवस्था पर विशेष बल दिया गया। टुल ने अपने कृषि में विकास संबंधी अनुभवों को 1733 ई. में ‘हार्स होइंग इण्डस्ट्री’ नामक पुस्तक द्वारा लोगों तक पहुँचाया। इसके अनुभवों से लाभ उठाकर कृषि के क्षेत्र में काफी लोग लाभांवित हुए।

लार्ड टाउनशैण्ड[संपादित करें]

इसके अनुसार कृषि क्रांति में सबसे प्रमुख तीन फसल पद्धति के स्थान पर चार फसल पद्धति अपनाना था। इसने क्रमशः गेहूँ, शलजम, जौ एवं अंत में लौंग बोने की परंपरा प्रारंभ की। इससे कम समय एवं कम स्थान में अत्यधिक उत्पादन प्राप्त हुआ।

इस दिशा में नारकोक के जमींदार कोक ऑफ होल्खाम ने हड्डी की खाद का प्रयोग कर उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि की। जार्ज तृतीय द्वारा कृषि कार्यां में अत्यधिक रूचि लेने के कारण उसे कृषक जार्ज भी कहा जाता है। सर आर्थर यंग ने कृषि सुधार हेतु 1784 ई. से ‘एनाल्स ऑफ एग्रीकल्चर’ शीर्षक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। राबर्ट बैकवेल ने पशुओं की दशा सुधारने में अभूतपूर्व योगदान दिया। इससे दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हुई।

इस प्रकार राबर्ट वेस्टन, टुल, टाउनशैण्ड एवं कोक आूफ होल्खाम द्वारा कृषि क्षेत्र में प्रतिपादित नवीनतम तकनीकों एवं विचारों ने कृषि क्रांति में उल्लेखनीय योगदान दिया। कृषि क्रांति यूरोप के इतिहास की एक दूरगामी प्रभाव वाली घटना सिद्ध हुई। इनकी पद्धतियों ने विकास को बढ़ाया।

आर्थर यंग[संपादित करें]

इंग्लैण्ड के एक धनवान कृषक आर्थर यंग (1742-1820 ई.) ने इंग्लैण्ड, आयरलैण्ड एवं फ्रांस आदि देशों में घूम-घूमकर तत्कालीन कृषि उत्पादन की पद्धतियों का सूक्ष्म अध्ययन किया। अपने अनुभवों के आधार पर उसने एक नवीन प्रकार से खेती की पद्धति का प्रचार किया। उसने बताया कि छोटे-छोटे क्षेत्रों पर खेती करने से अधिक लाभकारी बड़े कृषि फार्मां पर खेती करना है। अतः उसने छोटे-छोटे खेतों को मिलाकर बड़े-बड़े कृषि फार्मां के निर्माण पर बल दिया। चूँकि विभिन्न कृषि संबंधी उपकरणों का आविष्कार हो चुका था और ये यंत्र बड़े खेतों के लिए अत्यधिक उपयुक्त थे। उसने अपने विचारों को जन-जन तक पहुँचाने की दृष्टि से ‘एनल्स ऑफ एग्रीकल्चर’ नामक पत्रिका भी निकाली। आर्थर यंग के प्रयास अंततः फलीभूत हुए इंग्लैण्ड में धीरे-धीरे खेतों को मिलाकर एक बड़ा कृषि फार्म बनाने एवं उसके चारों ओर एक बाड़ लगाने का कार्य संपन्न किया जाने लगा। इंग्लैण्ड में 1792 ई. से 1815 ई. के मध्य 956 बाड़बंदी अधिनियम बनाये गये। इस प्रकार इंग्लैण्ड में कई लाख एकड़ भूमि की बाड़बंदी की गई। इस बाड़बंदी द्वारा कृषि उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई मगर छोटे-छोटे खेतों की समाप्ति से कई कृषकों को अपनी भूमि से बेदखल होना पड़ा और वे भूमिहीन मजदूर बन गये। अब ये कृषक से बने मजदूर विभिन्न कारखानों में मजदूर बने गये और उन कारखानों के उत्पादन में वृद्धि की। इस प्रकार एक ओर कृषि उत्पादन बढ़ा तो दूसरी ओर औद्योगिक उत्पादन भी बढ़ा और औद्योगिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त्र हुआ।