ब्रिटिश भारत में लवण कर का इतिहास
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भारतवर्ष में लवण पर करारोपण प्राचीन काल से होता आया है। तथापि, जब ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने भारत के विविध प्रान्तों पर अपना शासन स्थापित करना आरम्भ किया, तब इस कर में अत्यधिक वृद्धि की गयी। सन् १८३५ में भारतीय लवण पर विशेष कर आरोपित किये गये ताकि उसके आयात को सुगम बनाया जा सके। इससे ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारियों को अत्यधिक लाभ प्राप्त हुआ। सन् १८५८ में जब भारत का शासन कम्पनी से ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन चला गया, तब भी ये कर निरस्त नहीं किये गये।
ब्रिटिश शासन द्वारा आरोपित कठोर लवण-करों की भारतीय जनसमुदाय ने तीव्र निन्दा की। सन् १८८५ में बम्बई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में प्रमुख काङ्ग्रेस नेता एस. ए. सामिनाथ अय्यर ने लवण-कर का विषय उठाया। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक वर्षों में इस विषय पर व्यापक विरोध हुआ, जिसका चरम रूप सन् १९३० में महात्मा गान्धी के लवण-सत्याग्रह के रूप में प्रकट हुआ। इस सत्याग्रह के पश्चात् देश के अन्य भागों में भी अनेक सत्याग्रह आयोजित किये गये।
गान्धीजी की गिरफ्तारी के उपरान्त सरोजिनी नायडू ने गुजरात के धारासण लवण-कारखाने की ओर सत्याग्रहियों का नेतृत्व किया और उन्हें भी पुलिस अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार किया गया। इसी वर्ष सी. राजगोपालाचारी ने मद्रास प्रान्त के वेदारण्यम में लवण-कानूनों का उल्लङ्घन किया। सहस्रों सत्याग्रही स्वेच्छया गिरफ्तार हुए और विशाल संख्या में कारागारों में निरुद्ध किये गये। अन्ततः प्रशासन ने कठोरता शिथिल की और महात्मा गान्धी को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने हेतु इङ्ग्लैण्ड आमन्त्रित किया। गान्धीजी का दाण्डी-यात्रा व्यापक रूप से समाचारों में प्रकाशित हुई और भारत के स्वाधीनता-आन्दोलन के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुई।
लवण-कर प्रभावी रूप में बना रहा और सन् १९४६ में अन्तरिम सरकार के प्रधानमन्त्री बनने पर जवाहरलाल नेहरू द्वारा ही इसे निरस्त किया गया। स्वाधीनता के पश्चात् सन् १९५३ में ‘लवण उपकर अधिनियम’ के माध्यम से पुनः लवण-कर लागू किया गया, किन्तु सन् २०१७ में वस्तु एवं सेवा कर लागू होने पर यह उपकर समाप्त कर दिया गया, क्योंकि जी.एस.टी. में लवण पर करारोपण नहीं है। पाकिस्तान में साधारण भोजन-लवण पर कर लगाया जाता है, किन्तु आयोडीनयुक्त लवण पर नहीं।