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ब्रह्म समाज

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(ब्राह्मसमाज से अनुप्रेषित)

ब्राह्म समाज भारत का एक सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन था जिसने बंगाल के पुनर्जागरण युग को प्रभावित किया। इसके प्रवर्तक, राजा राममोहन राय, अपने समय के विशिष्ट समाज सुधारक थे।[1] 20 अगस्त 1828 में ब्रह्म समाज को राजा राममोहन और द्वारकानाथ टैगोर ने स्थापित किया था। इसका एक उद्देश्य भिन्न भिन्न धार्मिक आस्थाओं में बँटी हुई जनता को एक जुट करना तथा समाज में फैली कुरीतियों को दूर करना था।

सन 1815 में राजाराम मोहन राय ने "आत्मीय सभा" की स्थापना की। वो 1828 में ब्राह्म समाज के नाम से जाना गया। देवेन्द्रनाथ ठाकुर ने उसे आगे बढ़ाया। बाद में केशव चंद्र सेन जुड़े। उन दोनों के बीच मतभेद के कारण केशव चंद्र सेन ने सन 1866 "भारतवर्षीय ब्रह्मसमाज" नाम की संस्था की स्थापना की।

केशव चन्द्र सेन श्रीरामकृष्ण की शिक्षाओं से बहुत प्रभावित थे और उन्होंने उन्हें अपने व्यक्तिगत जीवन और दर्शन में अपनाया।

स्वामी विवेकानन्द भी ब्रह्म समाज से प्रभावित थे।

परमहंस महर्षि नगेंद्रनाथ भादुड़ी, जिन्हें भादुड़ी महाशय के नाम से भी जाना जाता है, आदि ब्रह्म समाज से जुड़े थे। भादुड़ी महाशय ने आदि ब्रह्म समाज की बालुहाटी शाखा के आचार्य के रूप में कार्य किया।[2] हालाँकि, देवेन्द्रनाथ टैगोर के साथ मतभेद के कारण, नागेन्द्रनाथ भादुड़ी ने अंततः आदि ब्रह्म समाज से अपना संबंध तोड़ लिया।[3]

सिद्धान्त

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  1. ईश्वर एक है और वह संसार का निर्माणकर्ता है।
  2. आत्मा अमर है।
  3. मनुष्य को अहिंसा अपनाना चाहिए।
  4. सभी मानव समान है।

उद्देश्य

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  1. हिन्दू धर्म की कुरूतियों को दूर करते हुए, बौद्धिक एवम् तार्किक जीवन पर बल।
  2. एकेश्वरवाद पर बल।
  3. समाजिक कुरूतियों को समाप्त करना।
  1. उपनिषद और वेदों की महत्ता को सबके सामने लाया।
  2. समाज में व्याप्त सती प्रथा, पर्दा प्रथा, बाल विवाह के विरोध में जोरदार संघर्ष।
  3. किसानों, मजदूरों, श्रमिकों के हित में बोलना।
  4. पाश्चत्य दर्शन के बेहतरीन तत्वों को अपनाने की कोशिश करना।

उपलब्धि

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  • 1829 में विलियम बेंटिक ने कानून बनाकर सती प्रथा को अवैध घोषित किया।
  • समाज में काफी हद तक सुधार आया.
  • समाज में जाति, धर्म इत्यादि पर आधारित भेदभाव पर काफी हद तक कमी आई।

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. जे॰एन॰ फार्क़ुहर, Modern Religious Movements of India (1915), पृष्ठ 29.
  2. Nagendranath Bhaduri, Maharshi (1846 - 1926), COMPANIONS AND FOLLOWERS OF RAMAKRISHNA. Advaita Ashrama, 5 DEHI ENTALLY ROAD. KOLKATA 700 014: Swami Bodhasarananda. 2011. p. 381. ISBN 978-81-7505-360-1.{{cite book}}: CS1 maint: location (link)
  3. Nagendranath Bhaduri, Maharshi (1846 - 1926), COMPANIONS AND FOLLOWERS OF RAMAKRISHNA. Advaita Ashrama, 5 DEHI ENTALLY ROAD. KOLKATA 700 014: Swami Bodhasarananda. 2011. p. 381. ISBN 978-81-7505-360-1.{{cite book}}: CS1 maint: location (link)