ब्रह्मशिरा अस्त्र

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ब्रह्मशिर अस्त्र[संपादित करें]

ब्रह्माजी ने ब्रह्मास्त्र से भी अधिक शक्तिशाली ब्रह्मशिर अस्त्र बनाया था। जैसा कि नाम से पता चलता है, इसमें ब्रह्मास्त्र की तुलना में चार गुना अधिक शक्ति थी। इसके नोंक के स्थान पर ब्रह्मा जी के चारों शीश लगे हुए थे। इसके प्रयोग से ब्रह्मास्त्र को भी विलीन किया जा सकता था।


प्राप्ति[संपादित करें]

केवल अर्जुन और अश्वत्थामा ही इसके आहवान् करने का ज्ञान रखते थे।


द्रोणाचार्य ने अपने प्रसिद्ध और सबसे होनहार शिष्य, अर्जुन की अभ्यास और साधना से खुश हो कर उसे ब्रह्मशिरा अस्त्र के आहवान् करने और प्रयोग करने के मन्त्रो का ज्ञान प्रदान किया। अश्वत्थामा के लिये यह सहन करना सामर्थ्य से बाहर था। उसने अपने पिता से स्वयं के लिये भी ब्रह्मशिरा की विनती की। ना चाहते हुए भी द्रोणाचार्य को अपने इकलौते पुत्र की अभिलाषा पूरी करनी पड़ी। द्रोणाचार्य ने अश्वत्थामा को भी ब्रह्मशिरा अस्त्र का ज्ञान दिया। द्रोणाचार्य अपने पुत्र की बेचैनी जानते थे। इसलिये सभी कर्तव्यों से परिचित गुरू द्रोण ने अपने पुत्र को आदेश दिया कि तुम सबसे बड़ा खतरा सम्मुख होने पर अथवा युद्ध मे भी इस अस्त्र का प्रयोग नही करोगे, विशेष रूप से मनुष्य जाति के विरुद्ध।

प्रयोग[संपादित करें]

ब्रह्मशिरा अस्त्र के प्रयोग की स्थिति तब आई जब ऋषि वेदव्यासजी के आश्रम में अश्वत्थामा और अर्जुन ने अपने-अपने ब्रह्मशिरा अस्त्र चला दिए।


महाभारत के युद्ध के दौरान पांडवों के धोखे मे अश्वत्थामा ने द्रोपदी के पाँचों पुत्रों को मार डाला। सत्य का पता चलने पर अश्वत्थामा ग्लानि से भर गया और वह वेदव्यास के आश्रम में जा कर पश्चाताप करने लगा। अश्वत्थामा को पांडवों ने आखिरकार ढूँढ ही लिया। घबराए अश्वत्थामा ने बच निकलने का कोई रास्ता न सूझते देख हाथ में घास का एक तिनका लेकर मंत्र बुदबुदाना शुरू कर दिया। मंत्र पूरा होते ही तिनका ब्रह्मशिरा अस्त्र मे परिवर्तित हो गय और उस मे से जोर-जोर से अग्नि निकलने लगी। "सभी पांडवों का नाश हो।"ऐसा कहकर अश्वत्थामा ने उस अस्त्र को छोड़ दिया। जल्द ही चारों ओर अँधेरा छाने लगा, हवा की गति बढ़ गई, उस तिनके में से अनेक शस्त्र निकलकर छूटने लगे, जिनकी तेज ध्वनि से आकाश गूँजने लगा। यह देखकर कृष्ण बोले- अर्जुन! अश्वत्थामा ने ब्रह्मशिरा अस्त्र का प्रयोग किया है; इसे सिर्फ ब्रह्मशिरा द्वारा ही रोका जा सकता है। अतः आत्मरक्षा के लिए तुम भी इसका प्रयोग करो। इस पर अर्जुन ने 'अश्वत्थामा, मेरा व मेरे भाइयों का और संपूर्ण लोक का मंगल हो। इससे शत्रु का बह्मास्त्र शांत हो जाए,' ऐसा संकल्प कर उसे छोड़ दिया।


दोनो अस्त्रों के टकराने से चारों ओर आग निकलने लगी। दोनों संहारक अस्त्रों से निकले शस्त्र आपस में टकराकर भीषण गर्जना करने लगे। सृष्टि का नाश होता देखकर वेदव्यास तथा नारद उन अस्त्रों के बीच में आकर खड़े हो गए तथा दोनों से प्रार्थना की अपने-अपने अस्त्रों को वापस ले लें। अर्जुन ने उनका कहना मान लिया, पर अश्वत्थामा ने कहा कि मुझे अपना अस्त्र रोकना नहीं आता। तब इन दोनों ऋषियों ने कहा कि अश्वत्थामा के अस्त्र प्रभाव से अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा का गर्भ नष्ट होगा और अर्जुन के अस्त्र के बदले अश्वत्थामा को अपनी कोई बहुमूल्य वस्तु अर्जुन को देनी होगी। अश्वत्थामा को अपने मस्तक की मणि देनी पड़ी। मणि देते ही वह निस्तेज हो गया तथा व्यास के आश्रम में ही रहकर तपस्वी का जीवन बिताने लगा।