सामग्री पर जाएँ

ब्रह्मविहार

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
बौद्ध धर्म

की श्रेणी का भाग

बौद्ध धर्म का इतिहास
· बौद्ध धर्म का कालक्रम
· बौद्ध संस्कृति
बुनियादी मनोभाव
चार आर्य सत्य ·
आर्य अष्टांग मार्ग ·
निर्वाण · त्रिरत्न · पँचशील
अहम व्यक्ति
गौतम बुद्ध · बोधिसत्व
क्षेत्रानुसार बौद्ध धर्म
दक्षिण-पूर्वी बौद्ध धर्म
· चीनी बौद्ध धर्म
· तिब्बती बौद्ध धर्म ·
पश्चिमी बौद्ध धर्म
बौद्ध साम्प्रदाय
थेरावाद · महायान
· वज्रयान
बौद्ध साहित्य
त्रिपतक · पाळी ग्रंथ संग्रह
· विनय
· पाऴि सूत्र · महायान सूत्र
· अभिधर्म · बौद्ध तंत्र

ब्रह्मविहार (संस्कृत: ब्रह्मविहार, अर्थ “ब्रह्म के निवास” अथवा “दिव्य निवास”) बौद्ध धर्म के चार महत्त्वपूर्ण गुणों और उन्हें विकसित करने के ध्यानाभ्यासों की श्रृंखला है। इन्हें चार अपरिमेय (पाली: अप्पमाण, appamaññā)[1] या चार अनंत चित्त (चीनी: 四無量心) भी कहा जाता है। ब्रह्मविहार निम्नलिखित चार गुणों को समाहित करता है:

१. मैत्री (प्रेमपूर्ण सौहार्द)

२. करुणा (दया)

३. मुदिता (सहानुभूतिपूर्ण आनंद)

४. उपेक्षा (समत्व)

मेत्ता सूत्र के अनुसार इन चार अपरिमेय भावों की साधना से साधक का पुनर्जन्म ब्रह्मलोक (पाली: ब्रह्मलोक) में हो सकता है।[2]

शब्दोत्पत्ति एवं अनुवाद

[संपादित करें]
  • पाली: cattāri brahmavihārā
  • सिंहला: සතර බ්‍රහ්මවිහාරා (sathara brahmavihārā)

‘ब्रह्मविहार’ को ‘ब्रह्म’ और ‘विहार’ में विभाजित किया जा सकता है, जहाँ ‘ब्रह्म’ का संकेत दिव्य या परम् (उच्चतम) चित्त की ओर होता है और ‘विहार’ का अर्थ निवास या वास होता है। अतः शाब्दिक रूप से यह “दिव्य चित्त के निवास” का भाव व्यक्त करता है।[3]

“अपरिमेय” (पाली: अप्पमाण) का शाब्दिक अर्थ है “अमापनीय”, “असीम” या “बाउंडलेस”। जब ये चार भाव ध्यान में परिपक्व हो जाते हैं, तो मन “अपरिमेय” बनकर देवीय ब्रह्म के चित्त सदृश हो जाता है।[4]

ब्रह्मविहार के चार गुण

[संपादित करें]

१. मैत्री (मेत्ता)

सब प्राणियों के प्रति सक्रिय रूप से कल्याण की कामना करना, उनके लिए शुभकामनाएँ रखना और प्रेमपूर्ण सौहार्द से देखना।[5][6]

२. करुणा

दूसरों के दुःख को अपने दुःख के समान समझकर उस दुःख का निवारण करने की इच्छा रखना।[7][8]

३. मुदिता

दूसरों की खुशी में सहानुभूतिपूर्ण आनंद अनुभव करना, चाहे आपने स्वयं उस खुशी को उत्पन्न न किया हो।[9]

४. उपेक्षा

सभी प्राणियों के प्रति समतापूर्ण, शांत और निष्पक्ष दृष्टिकोण रखना, उन्हें भेदभाव या द्वेष के बिना देखना।[10][11]

  1. Wetlesen, Jon (2002). "Did Santideva Destroy the Bodhisattva Path?". Journal of Buddhist Ethics. 9. मूल से से 2007-02-28 को पुरालेखित।.
  2. "AN 4.125, Metta Sutta". Access to Insight. 2006. See note 2 on the different kinds of Brahmas mentioned.{{cite web}}: CS1 maint: postscript (link)
  3. "AN 10.208: Brahmavihara Sutta: The Sublime Attitudes". Access to Insight. 2004.
  4. Harvey, Peter (2000). An Introduction to Buddhist Ethics. Cambridge University Press. p. 104.
  5. Merv Fowler (1999). Buddhism: Beliefs and Practices. Sussex Academic Press. pp. 60–62. ISBN 978-1-898723-66-0.[मृत कड़ियाँ]
  6. Peter Harvey (2012). An Introduction to Buddhism: Teachings, History and Practices. Cambridge University Press. pp. 154, 326. ISBN 978-1-139-85126-8.
  7. Merv Fowler (1999). Buddhism: Beliefs and Practices. Sussex Academic Press. pp. 60–62. ISBN 978-1-898723-66-0.[मृत कड़ियाँ]
  8. Peter Harvey (2012). An Introduction to Buddhism: Teachings, History and Practices. Cambridge University Press. pp. 154, 326. ISBN 978-1-139-85126-8.
  9. Merv Fowler (1999). Buddhism: Beliefs and Practices. Sussex Academic Press. pp. 60–62. ISBN 978-1-898723-66-0.[मृत कड़ियाँ]
  10. Merv Fowler (1999). Buddhism: Beliefs and Practices. Sussex Academic Press. pp. 60–62. ISBN 978-1-898723-66-0.[मृत कड़ियाँ]
  11. Peter Harvey (2012). An Introduction to Buddhism: Teachings, History and Practices. Cambridge University Press. pp. 154, 326. ISBN 978-1-139-85126-8.