ब्रह्मदत्त 'जिज्ञासु'

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पण्डित ब्रह्मदत्त 'जिज्ञासु' (14 अक्टूबर 1882 - 22 दिसम्बर 1964) संस्कृत के विद्वान तथा वैदिक साहित्य के शिक्षक थे। उन्हें 'राष्ट्रीय पण्डित' की पदवी से सम्मानित किया गया था। उन्होने संस्कृत पठन-पाठन की सरलतम विधि विकसित की थी जो पाणिनि के अष्टाध्यायी पर आधारित थी।[1]

वेदों के तलस्पर्शी विद्वान तथा पाणिनीय पद्धति से संस्कृत व्याकरण की शिक्षा देने के प्रबल समर्थक पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु का जन्म जालंधर जिले के मल्लूपोता ग्राम में १४ अक्टूबर १८८२ को हुआ। इनके पिता का नाम रामदास तथा माता का नाम परमेश्वरी देवी था। जिज्ञासु जी ने संस्कृत का अध्ययन अष्टाध्यायी के प्रकाण्ड विद्वान स्वामी पूर्णानन्द से किया। व्याकरण में व्युत्पन्न होने के पश्चात् स्वामी सर्वदानन्द द्वारा स्थापित साधु आश्रम हरदुआगंज में उन्होंने आर्ष ग्रंथों का अध्ययन १९२० से प्रारम्भ किया। १९२१ में यह आश्रम गंडासिंह नाला अमृतसर में विरजानन्दाश्रम के नाम से स्थानान्तरित हो गया।

जनवरी १९३२ में मीमांसा दर्शन का विशिष्ट अध्ययन करने की दृष्टि से जिज्ञासु जी काशी आये। यहाँ उन्होंने महामहोपाध्याय पण्डित चिन्नस्वामी शास्त्री से उक्त दर्शन का गंभीर अध्ययन किया। १९३५ में वे काशी से लाहौर चले आये और रावी के तट पर शहादरे में छात्रों को अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरुक्त, वेद, दर्शन आदि का अध्ययन कराने लगे। देश विभाजन के पश्चात् जिज्ञासु जी काशी आये, और मोतिझील अजमतगढ़ पैलेस में पाणिनीय महाविद्यालय की स्थापना की। पूर्ववत् यहाँ पर संस्कृत व्याकरण तथा अन्य शास्त्रों का शिक्षण करने लगे। भारत के राष्ट्रपति ने संस्कृत विद्वान के रूप में उन्हें सम्मानित किया। २२ दिसम्बर १९६४ में वाराणसी में उनका निधन हुआ।

जीवन परिचय[संपादित करें]

पण्डित ब्रह्मदत्त जिज्ञासु का जन्म १४ अक्तूबर १८९२ ईसवी को पंजाब के जालन्धर जिले के मल्लूपोटा बंगा में हुआ था। उनका मूल नाम 'लब्भूराम' था। 'ब्रह्मदत्त' नाम उसके गुरु द्वारा दिया गया नाम था। उसके पिता का नाम रणदास सारस्वत पाठक और माताजी का नाम श्रीमती परमेश्वरी देवी था।

नौ वर्ष की अल्पायु में ही उनके माता-पिता का देहान्त हो गया। दयानन्दी समाज के किसी सज्जन ने उसे १०वीं कक्षा तक शिक्षित होने में सहायता की। १९१२ में उसने घर त्याग दिया तथा अपने गुरु स्वामी पूर्णानन्द से पाणिनीय व्याकरण की शिक्षा ली तथा काशी में वेदांग, उपांग, तथा वैदिक साहित्य का गहन अध्ययन किया।

अपने गुरु श्री स्वामी पूर्णानन्द जी सरस्वती से व्याकरण का अध्ययन करके ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी ने सन् १९२० में स्वामी सर्वदानन्द जी के 'साधु आश्रम पुलकाली नदी, अलीगढ़' में छात्रों के अध्ययन-अध्यापन को प्रारम्भ किया था। साथ में कार्य करने के लिये अपने पूर्व परिचित काशी में अध्ययन करनेवाले श्री पं० शङ्करदेव जी को और उनके साथी श्री पं० बुद्धदेव जी धारनिवासी को ले आये थे। ये दर्शनों के अच्छे विद्वान थे और चिकित्सा में बहुत कुशल थे। श्री स्वामी सर्वदानन्द जी महाराज ने इस आश्रम के लिये अमृतसर में शहर से चार मील दूर मजीठा रोड पर गण्डासिंहवाला ग्राम के समीप सुन्दर व्यवस्था कर दी थी, अतः सन १९२१ के अन्त में जिज्ञासु जी अपने सब साथियों और छात्रों को लेकर अमृतसर चले गये । [2]

सन् १९२३-२४ में 'आगरा शुद्धि सभा' की ओर से विस्तृत रूप में मलकाने मुसलमानों की शुद्धि का आन्दोलन चला, जिसमें सनातन धर्म सभा और आर्यसमाज दोनों के सदस्य यथाशक्ति सम्मिलित हुए। इसमें इस आश्रम से जिज्ञासु जी और पं० बुद्धदेवजी तथा चार बड़ी आयु के पुराने छात्र भी इस कार्य में लग गये। लगभग डेढ़ वर्ष के अन्तराल में आश्रम पर श्री पं० शङ्करदेव जी अकेले अध्यापन कार्य करते रहे। आश्रम का प्रबन्ध करनेवाली सभा का नाम 'सर्वहितकारिणी सभा' था। इसमें गुरुकुल विभाग और कालेज विभाग दोनों के सदस्य सम्मिलित थे। परन्तु इन दोनों विभागों का मेल कुछ काल के बाद ही लड़खड़ाने लगा और व्यय आदि की भी अव्यवस्था हो गयी। अन्त में इस सभा के साथ सम्बन्ध विच्छेद करके जिज्ञासु जी ने अपने दमखम पर ही अमृतसर के परिचित आर्यजनों को मिलाकर एक नई व्यवस्थापिका सभा बनाई, जिसके द्वारा छः महीने तक आश्रम की व्यवस्था निरापद सुचारू रूप से चलती रही, परन्तु पुरानी सर्वहितकारिणी सभा ने इसे भी कार्य न करने दिया।

इस समय तक पं० बुद्धदेव जी पाश्रम से पृथक् हो गये थे। आश्रम में इस समय लगभग ३५ ब्रह्मचारी थे। जिज्ञासु जी को अनुभव हुआ कि सर्व हितकारिणी सभा के लोग न स्वयं आश्रम की व्यवस्था सुचारु रूप से चलायेंगे और न हमें चलाने देंगे, अतः उन्होंने अमृतसर छोड़ने का निश्चय कर लिया। उन्होने पं० शङ्करदेव जी से सलाह करके काशी जाने का निश्चय किया, क्योंकि वहाँ एक समय की व्यवस्था 'अन्नक्षेत्र' में सुगमता से हो जाती थी। अतः आश्रम में जितने विद्यार्थी थे, उन के सभी माता-पिता और अभिभावकों को पत्र द्वारा सूचित कर दिया और लिख दिया कि वर्तमान कण्टकापूर्ण अवस्था में भी जो हमारे पर विश्वास करके अपने पुत्र को हमारे साथ काशी भेजना चाहें, वे हमें स्पष्ट लिखें और शेष छात्रों के माता-पिता अपने पुत्रों को आकर ले जावें । इस प्रकार जिज्ञासु जी पं० शङ्करदेव जी एवं १०-१२ छात्रों के साथ काशी पहुंचे। वहाँ पर श्री पं० शङ्करदेव जी का स्वास्थ्य प्रायः ठीक नहीं रहा। उनका अधिक काल अपनी चिकित्सा में ही लगा।

प्रातः सन् १९२८ में वे जिज्ञासु जी से अलग हो गये। इसके पश्चात् श्री पं० शङ्करदेव जी का साथ दूसरी बार काशी जाने पर ही सन् १९३१ के अन्त में हुआ और वह भी काशी निवास काल तक सीमित रहा। इस प्रकार जनवरी सन् १९२६ से लेकर अन्त तक वे एकाकी ही अध्यापन एवं ग्रन्थ लेखन सम्बन्धी कार्य कभी अमृतसर, पुनः काशी, वापस लाहौर, पुनः मीमांसा के विशेष अध्ययन के लिये पुनः काशी आदि स्थानों में रहते हुए करते रहे । देश विभाजन के बाद पुनः तीसरी बार काशी गये। इस बार उन्होंने काशी के पण्डित समाज के साथ विशेष सम्पर्क किया और अपने 'विरजानन्द आश्रम' का नाम 'पाणिनि महाविद्यालय' प्रख्यात किया। देश-विभाजन के कारण रामलाल कपूर ट्रस्ट का पूर्व प्रकाशन जो नष्ट हो गया था, पुनः प्रकाशित करने की व्यवस्था की। इसी काल में यजुर्वेद-भाष्य-विवरण के प्रथम भाग का द्वितीय संस्करण छपा और अष्टाध्यायी-भाष्य के प्रकाशित करने की योजना बनायी।

काशी के पण्डित प्रायः कहा करते थे कि जिज्ञासु जी ने कोई देवी सिद्ध कर रखी है, जिसके कारण मूर्ख से मूर्ख छात्र को भी कठिन से कठिन अष्टाध्यायी के सूत्रों का बोध अनायास ही करा देते हैं। इस पर गुरुजी हँसकर कहा करते थे कि आप लोगों की आधी बात सत्य है और आधी बात गलत है। निश्चय ही मैंने एक देवी सिद्ध कर रखी है, किन्तु वह आप लोगों की कल्पनिक देवियों में से नहीं है, मेरी देवी है 'अष्टाध्यायी'। इस अष्टाध्यायी से शास्त्रकार के क्रम के आधार पर मैं क्लिष्टतम विषय आसानी से समझा देता हूँ।

काशी में ही निवास करते हुए अन्तिम दिनों में राष्ट्रपति की ओर से संस्कृत पण्डित के रूप में उन्हें सम्मानित किया गया और उसके उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष डेढ़ हजार रुपया (उस समय इतना ही दिया जाता था) मिलने लगा। इस प्रकार अन्त तक घोर परिश्रम पूर्वक ऋषि दयानन्द के मन्तव्य के अनुसार पाणिनीय व्याकरण का अध्यापन एवं वैदिक ग्रन्थों के शोध पर कार्य करते हुए उन्होंने २२ दिसम्बर सन् १९६४ को प्रात: दो बजे अपनी इहलीला समाप्त की।

लेखन कार्य[संपादित करें]

यजुर्वेद भाष्य विवरण[संपादित करें]

स्वामी दयानन्दकृत यजुर्वेद भाष्य के प्रथम १५ अध्यायों पर जिज्ञासु जी ने विस्तृत विवरण लिखा। विवरणकार ने दयानन्द भाष्य पर विस्तृत टिप्पणियाँ लिखीं, तथा भाष्य में प्रयुक्त संस्कृत भाषा के व्याकरण विषयक तथाकथित अपप्रयोगों की साधुता सिद्ध की है। विवरण की विस्तृत भूमिका में वेद ज्ञान के स्वरुप, वेद और उसकी शाखाएँ, देवता वाद, छंदोंमीमांसा, धातुओं का अनेकार्थत्व तथा यौगिक वाद, वेदार्थ की विविध प्रक्रिया आदि महत्वपूर्ण विषयों का विवेचन किया गया है। इस विवरण का प्रथम १० अध्यायात्मक भाग रामलाल कपूर ट्रस्ट अमृतसर द्वारा २००३ विक्रम में प्रकाशित किया गया। अवशिष्ट पाँच अध्यायों का विवरण जिज्ञासु जी के निधन के पश्चात् २०२८ विक्रम में प्रकाशित हुआ।

  • वेदार्थ प्रकिया के मूलभूत सिद्धान्त (१९४५)
  • वेद और निरुक्त – प्रथम आर्य विद्वत् सम्मलेन (१९३२) में पठित यह निबन्ध सर्वप्रथम ओरियंटल कालेज लाहौर की शोध पत्रिका में १९३३ में प्रकाशित हुआ।
  • निरुक्तकार और वेद में इतिहास – यह निबन्ध भी आर्य विद्वत् सम्मलेन में पढ़े जाने के पश्चात् ओरिएंटल कालेज लाहौर की शोध पत्रिका में छपा (१९४५),
  • देवापि और शन्तनु के वैदिक आख्यान का वास्तविक स्वरुप (२००३ विक्रम),
  • अष्टाध्यायी भाष्य प्रथमावृत्ति – अष्टाध्यायी के प्रत्येक सूत्र का पदच्छेद, विभक्ति, समास, अर्थ, उदाहरण और उसकी सिद्धि पूर्वक यह भाष्य संस्कृत तथा हिन्दी दोनों भाषाओं में लिखा था। अवशिष्ट ३ अध्यायों पर भाष्य उनकी अन्तेवासिनी कुमारी प्रज्ञा देवी ने लिखा। प्रथम भाग रामलाल कपूर ट्रस्ट २०२१ विक्रम (१९६४), द्वितीय भाग द्वितीय संस्करण २०३१ विक्रम (१९७४), तृतीय भाग (प्रज्ञादेवी लिखित) २०२४ विक्रम (१९६८) में छपा।
  • संस्कृत पठनपाठन की अनुभूत सरलतम विधि-अष्टाध्यायी के माध्यम संस्कृत सीखने की सरल विधि को लेखक ने अनेक पाठों में निबद्ध किया है। (१९५५)

अन्य ग्रन्थ

  • भारत के समस्त रोगों की अचूक औषधि – ऋषि प्रणाली (१९५९),
  • गोरखपुर तथा मेरठ में आयोजित वेद सम्मलेन के अध्यक्षीय भाषण (१९५९ तथा १९५१)।
  • यजुर्वेद भाष्य विवरण (दो भागों में)
  • वेद और निरुक्त
  • देवापि और शन्तनु के वैदिक आख्यान का वास्तविक स्वरूप
  • संध्योपासना [3]

लेख[संपादित करें]

  • वेद वेदार्थ विवेचन
  • यजुर्वेदभाष्य विवरण की भूमिका
  • वेद और निरुक्त
  • निरुक्तकार और वेद में इतिहास
  • देवापि और शन्तनु के वैदिक आख्यान का वास्तविक स्वरुप
  • उपोद्घात भूमिकाएँ
  • उपोद्घातः (काशिका)
  • प्रथमवृति भूमिका
  • प्रथमवृति प्राकथन
  • सरलतमविधि भूमिका
  • आर्याभिविनय भूमिका
  • सन्ध्योपासनविधि
  • वेद सम्मेलनों में अध्यक्षीय भाषण
  • वेद सम्मेलन, लाहौर
  • आर्य विद्वत सम्मेलन, कलकत्ता
  • वेद सम्मेलन, खुरजा
  • वेद सम्मेलन, मेरठ
  • वेदवाणी में निबन्ध
  • सायणाचार्य का वेदार्थ
  • महर्षि दयानन्द के भाष्य की विशेषतायें
  • वेदों का प्रादुर्भाव
  • ऋषिदयानन्द कत वेदभाष्य के सम्बन्ध में मेरी धारणा
  • ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित यजुर्वेद भाष्य विवरण और परोपकारिणी सभा
  • भारत की अपूर्व सम्पति वेद
  • वेदार्थ का महान पुनरुद्धारक ऋषि दयानन्द
  • वेदमन्त्रों का विनियोग
  • सायण का वेदार्थ
  • वेदार्थ प्रक्रिया के मुलभुत सिद्धान्त
  • रिसर्च (खोज) विषय में पाश्चात्यों की गहरी भूलें, वैबर और कैलेएड की प्रमाणिकता का परीक्षण
  • निरुक्तविषय में पाक्षात्त्य मत की मौलिक भूल वा अनधिकार चेष्टा
  • यास्क और देवतावाद
  • वेद का स्वरुप, एक आवश्यक और गम्भीर विचारणीय विषय
  • वेद का अनुसन्धान
  • वेदार्थ की मूल भित्ति
  • भारत के समस्त रोगों की अचूक औषध, ऋषिप्रणाली
  • संस्कृत का प्रसार तथा व्यापक ज्ञान कैसे हो?
  • वेदवाणी में अग्रलेख
  • वेद और ईश्वर का सम्बन्ध
  • संस्कारविधि पर किये गए आक्षेपों के सम्बन्ध में मेरा व्यक्तव्य
  • मेरा सम्पादकत्व
  • महाऋषि दयानन्द कृत वेदभाष्य की स्थिति
  • वेद और उसकी शाखायें
  • वेदों के छंद
  • मेरा निवेदन
  • संस्कारविधि के विवाहप्रकरणस्थ मन्त्र पर विचार
  • वेद में इतिहास
  • वेद का प्रादुर्भाव
  • ऋषियों ने सीधा सरल वेदार्थ या वेदभाष्य क्यों नही किया ?
  • वैदिक छांदोवद
  • माननीय टंडन जी की विजय
  • हा श्री. पं. महेशप्रसाद जी
  • आर्यासम्मेलन मेरठ
  • आर्य महासम्मेलन का सिंहावलोकन
  • अज्ञानी भारत
  • वेदवाणी का सप्तम वर्ष
  • पाक्षात्य मत परीक्षणक का उपक्रम
  • काश्मीर समस्या की आड़ में अमेरिका और ब्रिटेन का भारत के विरुद्ध षड्यन्त्र
  • भारत के शत्रु इंग्लैंड और अमेरिका नंगे हो गए
  • न्याय की नीति हो सची नीति
  • वेद का सामयिक आदेश
  • अन्यत्र प्रकाशित लेख निबन्ध
  • वेदार्थ पुनरुद्धारक ऋषि दयानन्द
  • 'आर्यसमाज का इतिहास' दो भाग
  • वेद के देवता

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. [https://web.archive.org/web/20160527012936/http://www.vedicgranth.org/home/the-great-authors/pandit-brahmadatta-jijnasu-1882-1964 Archived 27 मई 2016 at the वेबैक मशीन. Pandit Brahmadatta Jijnasu (1882-1964)
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इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]