ब्रज का वन वैभव

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इन्हें भी देखें: ब्रज के वन

वृक्ष[संपादित करें]

ब्रज के बन-वैभव के आधार वे वृक्ष हैं, जो वहाँ विविध जातियों और नाना प्रकारों के मिलते हैं। उनके नाम और आकार आदि क्रम से इस प्रकार हैं - अकोल, अगस्त, अनार, अमरुद, अमलतास, अरनी, अरुआ, अशोक, आम, आँवला, इमली इन्द्रजो, कचनार, कटहल, कटियारी, कटैया, कदंब, कनेर, कमरख, करील, केला कैत, खजूर, खिरनी, गूलर, गोंदी, छोंकर, जामुन, झाऊ, ढ़ाक, तमाल, धौ, नारंगी, नीबू, नीम, नीमचमेली (विलायती बकायन), पपीता, पसेंदू, पापड़ी, पारस, पीपल, पिलखन, पीलू, फरास, फालसेव, बकायन, बड़, बबूल, बरना, बहेड़ा, बेर, बेल, बायबिड़ंग, महुआ, मौल श्री, रीठा, रेमजा, लबेडा, लिसोड़ा, सहतूत, श्री फल, सहजना, सहोड़, सिरस, सीशम, सेंगर, हिंगोट और हींस। ये सव ब्रज के नैसर्गिक सौंदर्य की वृद्धि करने के साथ ही साथ अपने विविध उपयोगों द्वारा इसकी भौतिक समृद्धि में भी सहायक हैं।

धार्मिक एंव सास्कृतिक महत्व के बृक्ष -[संपादित करें]

ब्रज के कुछ वृक्षों का धार्मिक महत्व माना गया है। एसे वृक्षों में आमलक (आंवला) निन्यग्रोध (बड़) अश्वत्थ (पीपल) शमी (छोंकर) और तमाल के नाम उल्लेखनीय हैं। ब्रज में विविध अवसरों पर इन वृक्षों की पूजा होती है। बड़ अर्थात बट वृक्ष अत्यन्त विशाल और दीर्धायु का होता है। ब्रज में कई स्थानों पर दो-दो, तीन-तीन सौ वर्षों के पुराने बट वृक्ष मिलते हैं। ब्रज में कई बट वृक्षों की परम्परागत प्रसिद्धि भी रही है। श्री जगतनंद ने अपने काल के १० प्रसिद्ध बट वृक्षों का नामोल्लेख किया है। वह पिपरौली, जाव, रासौली, संकेत, परासोली, भांड़ीरवन स्थित बटों के अतिरिक्त अक्षय वट, वंशी वट, विशाल वट और श्याम वट थे। १ श्रीकृष्ण ने जिन स्थानों में विशिष्ट लीलाएँ की थी, उनकी स्मृति में वहां वे वट वृक्ष लगाये थे।

शमी अर्थात छोंकर के वृक्ष का बल्लभ संप्रदाय में अधिक महत्व माना गया है। सर्व श्री बल्लभाचार्य और विठठ नाथ जी ने ब्रज में जो धार्मिक प्रवचन किये थे, वे प्राय इन्हीं वृक्षों के नीचे बैठ कर हुए थे। उनकी अधिकांश बैठकें भी इन्हीं वृक्षों के नीचे बनी हुई हैं। तमाल के वृक्ष भी ब्रज के अनेक लीला स्थलों में मिलते हैं। इसका उल्लेख ब्रज के भक्त कवियों ने कृष्ण लीला के विविध प्रसंगों में किया है। उन्होंने श्री कृष्ण के सांवले रंग की तुलना श्याम तमाल से की से की है, जिससे इसका महत्व बड़ गया है। २

सास्कृतिक महत्व के वृक्षों का चित्रण ब्रज के प्राचीन कला वशेषों में मिलता है। ऐसे वृक्षों में पीपल, अशोक, कदंब चम्पा नाग केसर आदि हैं। ब्रज में पीपल की एक दुर्लभ जाति का वृक्ष भी मिलता है, जिसे पारस पीपर (परसिअन पीपल) कहते हैं। ग्राउज ने ब्रज के दो स्थान-मथुरा के ध्रुव टीला और महाबन के निकटवर्ती खेलन बन में इस वृक्ष का होने का उल्लेख किया है।

कंदंब ब्रज का प्रसिद्ध फूलदार वृक्ष है। वर्षा ॠतु में जव यह फूलता है, तव पूरा वृक्ष अपने हल्के पीले रंग के छोटे-२ फूलों से भर जाता है। उस समय इसके फूलों की मादक सुगंध से ब्रज के समस्त बन और उपबन महकने लगते हैं। ब्रज में इसकी कई जातियां पायी जाती हैं, जिसमें श्वेत-पीत लाल और द्रोण जाति के कदंब उल्लेखनीय हैं। साधारणतया यहां श्वेत-पीप रंग के फूलदार कदंबही पाये जाते हैं। किन्तु कुमुदबन की कदंबखंडी में लाल रंग के फूल वाले कदंब भी पाये जाते हैं। श्याम ढ़ाक आदि कुख स्थानों में ऐसी जाति के कदंब हैं, जिनमें प्राकृतिक रूप से दोनों की तरह मुड़े हुए पत्ते निकलते हैं। इन्हें 'द्रोण कदंब' कहा जाता है। गोबर्धन क्षेत्र में जो नवी वृक्षों का रोपड़ किया गया है, उनमें एक नये प्रकार का कदंब भी बहुत बडी संख्या में है। ब्रज के साधारण कदंब से इसके पत्ते भिन्न प्रकार के हैं तथा इसके फूल बड़े होते हैं, किन्तु इनमें सुगंध नही होती है। ब्रज में कदंब का वृक्ष सदा से बड़ा प्रसिद्ध और लोकप्रिय रहा है। राधा-कृष्ण की अनेक लीलाएँ इसी वृक्ष के सुगन्धित वातावरण में हुई थीं। मध्य काल में ब्रज के लीला स्थलों के अनेक उपबनों में अनेक उपबनों इस वहुत बड़ी संख्या में लगाया गया था। वे उपबन 'कदंबखंडी' कहलाते हैं।


फलदार वृक्ष -[संपादित करें]

ब्रज में मीठे और खटटे दोनों प्रकार के फलदार वृक्ष पाये जाते हैं। मीठे फल वृक्षों में अमरुद, आम, केला, कैत, खजूर, खिरनी, बेर, बेल, शहतूत, श्री फल आदि हैं। खटटे फल वाले वृक्षों में आंवला, इमली, कमरख, करोंदा, जामुन, नारंगी, नीबू आदि उल्लेखनीय हैं। कच्चा आम खटटा और पका हुआ मीठा होता है तथा कच्ची इमली खटटी और पकी खट-मिट्ठी होती है। इसी प्रकार कमरख और नारंगी भी खट-मीट्ठे फल हैं। इनमें जामुन और नारंगी को छोडकर शेष फलों का उपयोग चटनी, अचार और मुरब्बा आदि के लिये किया जाता है।

भारतीय फलों में आम वहुत महत्वपूर्ण और लोकप्रिय है। ब्रज में अति प्राचीन काल से ही इसकी कई जातियों के वृक्ष रहे हैं, जिनका उल्लेख संस्कृत और बृज-भाषा साहित्य में मिलता है। चीनी यात्री हेनसांग जब मथुरा आया था, तव उसने इस क्षेत्र में पाये जाने वाले आमों की बहुतायत का उल्लेख किया है उसने लिखा है - यहाँ पर आमों के वृक्ष इतनी अधिकता से पाये जाते हैं कि कहीं-कहीं पर उनके जंगल हो गये हैं। "यहाँ दो प्रकार के आम होते हैं। एक कच्चा फल छोटा होता है, जो कच्चा होने पर हरा और पकने पर पीला हो जाता है। दूसरे का फल बड़ा होता है, जो पकने पर भी हरा रहता है।" ३ इस उल्लेख से ज्ञात होता है कि यहां पर प्राचीन चूसबाँ और कलमी दोनों प्रकार के आम पर्याप्त मात्रा में होते थे। पिछली कही शताब्दियों से ब्रज में वर्षा कम होने से यहाँ रेगिस्तानी प्रभाव बढ़ गया है। इसके कारण यहाँ पर आमों की फसल कम हो गई है। आजकल यमुना नदी से पूर्व दिशा वाले ब्रज क्षेत्र में ही आमों के कुछ अधिक वृक्ष हैं, जबकि पश्चिमी दिशा वाले भाम में बहुत कम होते हैं।

ब्रज के भक्त कवियों ने विविध प्रसंगों पर आम का प्रचुरता से कथन किया है। सूरदास ने बालक कृष्ण के भोज्य पदार्थों की लम्बी सूची दी हैं। उनमें आम और आम का अचार का भी उल्लेख हुआ है। ४ परमानंददास ने एक आम बेचने वाली काहिनि का उल्लेख करते हुए कहा है कि उसकी आवाज सुनते ही बाल कृष्ण उसे भवन के अन्दर ले जाते हैं और वहाँ अपनी माता से आम खरीदने का आग्रह करते हैं। ५ ब्रज साहित्य में अनार और श्रीफल का उल्लेख भोज्य पदार्थ की अपेक्षा दांतों और ३रोजों के उपमान रूप में अधिक किया गया है।

फूलदार वृक्ष -[संपादित करें]

ब्रज में कदंब के अतिरिक्त मौल श्री और कनेर के फूलदार वृक्ष भी प्रचुरता से पाये जाते हैं। केतकी, केवड़ा, कूंद, गुलाब, चमेली, चंपा, जुही, बेला मोतिया, रात रानी आदि के फूल छोटे वृक्ष और झाड़ियों में तथा कमल, कुमुद, कुमुदिनी आदि कुंड सरोवरों में होते हैं। वे सभी फूल अधिकतर वसंत, वर्षा और शरद ॠतुओं में खिलते हैं। उस समय उनकी सुगंध से ब्रज के सभी बन-उपबन और बाग-बगीचे महकने लगते हैं।

बसंत ॠतु में खिलने वाले पुष्पों में गुलाब और बेला (मल्लिका) विशेष करु से उल्लेखनीय है। अमलताश और गुलमुहर ग्रीष्म ॠतु में फूलने वाले प्रमुख वृक्ष हैं। उनमें पीले और लाल रंग के झुर्रें लगते है यधपि उनमें सुगंध नहीं होती है तथापि वे अपने मनमोहक रंगो के कारण अति सुहावने दिखते हैं। सिरस (शिरीष) के पुष्प भी ग्रीष्म ॠतु में खिलते हैं। वर्षा ॠतु के फूलों में कदंब के पश्चात् मौलश्री (बकुल) उल्लेखनीय है। इस छोटे पुष्प की सुगंध बड़ी भीनी और मादक होती है। मरुआ की छोटी झाड़ी भी वर्षा ॠतु में फूलती है, जो बड़ी सुगंध देती है। वर्षा ॠतु में फूलने वाला वृक्ष कनेर भी है इस पर पीले, सफेद और गुलाबी रंग के पुष्प खिलते हैं। इसमें सुगंध तो नहीं होती है, किन्तु इनकी सुंदरता दर्शनीय है। शरद् ॠतु के पुष्पों में चमेली (मालती) रातरानी (शेफालिका अथवा पारिजात) छोटे वृक्षों पर तथा कमल, कुमुद और कुमुदिनी सरोवरों में खिलते हैं। इसी ॠतु में भोंरे सुगन्धित पुष्पों पर मँडराते हैं और श्वेत हंस सरोवरों के तट क्रीड़ा करते हैं।

ब्रज में पुष्पों का उपयोग लोक रजन के अतिरिक्त ठाकुर सेवा अदि धार्मिक कार्यों में विशेष कूप से होता है। भक्त कवियों ने अपनी रचनाओं में जिन पुष्पों का अधिक वर्णन किया है, उनमें कदंब, कुंद कमल, कुमुद कनेर, केतकी आदि उल्लेखनीय हैं। सूरदास ने अपनी रचनाओं में पुष्पों का प्रचुरता से वर्णन किया है। ६


तरकारी के वृक्ष और बेले -[संपादित करें]

जिन वृक्षों के फल ब्रज के शाकन्तकारी आदि के काम में आते हैं, उनमें करील, कचनार, महुआ और सहजना उल्लेखनीय हैं। करील के फल टेंटी कहलाते हैं, जिनका शाक व अचार बनाया जाता है। ७ सूरदास ने श्री कृष्ण के भोजन सम्बधी एक बड़े पद में विविध काध पदार्थों के साथ भटा (बैंगन) चना, चौराई, सोवा, सरसों, बथुआ, परबल, टेंटी, ढ़ेंढ़स, कुनस, ककोरा, कचरी, चीचड़ा, करेला, सहजना, करील, पाकर, अगस्त की फली, अरबी, इमली, पेठा, खीरा, रामतरोई, रतालू, ककड़ी, कचनार, केला, करोंदा आदि तरकारी के पेड़ों व बेलों का नामोल्लेख किया है। तरकारी फल और फलियों की उत्पत्ति अधिकतर छोटे पौधों और बेलों में होती है। सूरदास ने इस प्रकार के फलों में खरबूजा, तरबूजा, ककड़ी और खीरा का भी नाम उल्लेख किया है। ८

ओषध वृक्ष -[संपादित करें]

ब्रज में कुछ ब्रक्षों का उपयोग ओषध के लिये भी किया जाता है। ऐसे वृक्षों में अमलताश, आंवला, इन्द्रजौ, कटियार, नीम बाय विड़ग बहेड़ा और रीठा उल्लेखनीय हैं।

उक्त उपयोगों के अतिरिक्त ब्रज में वृक्षों से इमारती लकड़ी व ईंधन भी प्राप्त किया जाता है। इमारती काम में आने वाले वृक्षों में आम, नीम और शीसम उल्लेखनीय हैं। ईंधन के रूप में जलाने की लकड़ी-बबूल, छोंकर, फरास, नीम, पापड़ी, धौ, रेंमजा हींस आदि उल्लेखनिय हैं। ढांक के पत्तों से पत्तलें और झाऊ की लकड़ी से डालियाँ वनाई जाती हैं।