बेयोनेट
| बेयोनेट (संगीन) | |
|---|---|
| प्रकार | धारदार हथियार |
| उत्पत्ति का मूल स्थान | फ्रांस (बायोन शहर) |
| उत्पादन इतिहास | |
| संस्करण | प्लग बेयोनेट, सॉकेट बेयोनेट, स्वोर्ड बेयोनेट, नाइफ बेयोनेट |
| निर्दिष्टीकरण | |
बेयोनेट (अंग्रेज़ी: Bayonet), जिसे हिंदी और उर्दू में आमतौर पर संगीन कहा जाता है, एक प्रकार का चाकू, खंजर या भाले के आकार का धारदार हथियार है। इसे मुख्य रूप से किसी राइफल, मस्कट या इसी तरह के आग्नेयास्त्र की नली के अगले हिस्से पर लगाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। बेयोनेट लगाने के बाद एक बंदूक प्रभावी रूप से एक लंबे भाले में बदल जाती है, जिसका उपयोग 'नज़दीकी मुठभेड़' या आमने-सामने की लड़ाई में दुश्मन पर वार करने के लिए किया जाता है।[1]
उत्पत्ति और इतिहास
[संपादित करें]'बेयोनेट' शब्द की उत्पत्ति 17वीं शताब्दी की शुरुआत में फ्रांस के बायोन शहर से मानी जाती है, जहाँ पहली बार इस प्रकार के हथियारों का निर्माण किया गया था।
17वीं सदी के मध्य से पहले, यूरोपीय सेनाओं में दो प्रकार के पैदल सैनिक होते थे: बंदूकधारी और भालाधारी। बंदूकधारियों को अपनी बंदूक रीलोड करने में बहुत समय लगता था, और इस दौरान वे दुश्मन के घुड़सवारों के हमलों के प्रति बेहद संवेदनशील होते थे। इसलिए उन्हें बचाने के लिए लंबे भालों वाले सैनिकों की आवश्यकता होती थी। बेयोनेट के आविष्कार ने इस व्यवस्था को हमेशा के लिए बदल दिया। एक बार जब बंदूकधारी के पास संगीन आ गई, तो वह अपनी बंदूक को ही भाले के रूप में इस्तेमाल कर सकता था। इससे सेनाओं को अलग से भालाधारियों को रखने की आवश्यकता समाप्त हो गई और पूरी पैदल सेना को आग्नेयास्त्रों से लैस किया जा सका।[2][3][4]
बेयोनेट के प्रमुख प्रकार
[संपादित करें]इतिहास के दौरान बेयोनेट के डिज़ाइन में कई महत्वपूर्ण तकनीकी बदलाव आए हैं:

- प्लग बेयोनेट: यह सबसे प्रारंभिक संस्करण था। इसके हैंडल को सीधे बंदूक की नली के अंदर घुसा दिया जाता था। इसकी सबसे बड़ी खामी यह थी कि इसे लगाने के बाद सैनिक बंदूक से गोली नहीं चला सकता था।
- सॉकेट बेयोनेट: 17वीं सदी के अंत में इसका आविष्कार हुआ। इसमें एक खोखली नली होती थी जो बंदूक की नली के बाहर फिट हो जाती थी। इससे ब्लेड नली के बगल में आ जाता था, जिससे सैनिक बेयोनेट लगे होने पर भी गोली चला सकते थे।
- स्वोर्ड बेयोनेट: 19वीं सदी में यह लोकप्रिय हुआ। इसमें एक छोटी तलवार जैसा लंबा ब्लेड होता था, जिसे राइफल पर लगाया जा सकता था या हथियार के रूप में अलग से भी हाथ में लेकर इस्तेमाल किया जा सकता था।
- नाइफ बेयोनेट: आधुनिक युग (प्रथम विश्व युद्ध के बाद) में लंबे स्वोर्ड बेयोनेट की जगह छोटे 'चाकू बेयोनेट' ने ले ली, जो खाइयों जैसी तंग जगहों में लड़ने के लिए अधिक व्यावहारिक थे।
सामरिक उपयोग और आधुनिक भूमिका
[संपादित करें]18वीं और 19वीं शताब्दी के युद्धों में 'बेयोनेट चार्ज' एक बहुत ही सामान्य और आक्रामक रणनीति थी। दुश्मन की पंक्ति की ओर संगीन तानकर दौड़ना अत्यधिक मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करता था, जो अक्सर बिना कोई वार किए ही दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर देता था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 'खाइयों के युद्ध' में भी नज़दीकी लड़ाई के लिए संगीनों का व्यापक उपयोग हुआ।[5]
आधुनिक युद्ध प्रणाली में, जहाँ स्वचालित हथियारों और सटीक मारक क्षमता का बोलबाला है, एक हथियार के रूप में बेयोनेट की भूमिका बहुत सीमित हो गई है। हालांकि, आज भी दुनिया भर की सेनाएँ अपनी असॉल्ट राइफलों के साथ बेयोनेट प्रदान करती हैं। आधुनिक बेयोनेट का उपयोग मुख्य रूप से एक बहुउद्देश्यीय उपकरण के रूप में किया जाता है, जैसे कि कांटेदार तार काटना, डिब्बे खोलना, या दंगा नियंत्रण के दौरान मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना।
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Keegan, John (1993). A History of Warfare. Vintage Books. pp. 342-345. ISBN 978-0679730828.
- ↑ Norris, John (2016). Fix Bayonets!: A Royal Welch Fusilier at War. Pen and Sword. pp. 18–22. ISBN 978-1473860582.
- ↑ "The Collector's Guild"
- ↑ Military History: The Definitive Visual Guide to the Objects of Warfare
- ↑ Ladd, James (1999). "The Psychological Shock of the Bayonet Charge". Military History Quarterly. 14 (2): 65–70.
