बृहस्पतिवार व्रत कथा

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बृहस्पति व्रत
आधिकारिक नाम बृहस्पति
अन्य नाम बृहस्पति
अनुयायी हिन्दू, भारतीय, भारतीय प्रवासी
प्रकार Hindu
समान पर्व सप्ताह के अन्य दिवस

यह उपवास सप्ताह के दिवस बृहस्पतिवार व्रत कथा को रखा जाता है। किसी भी माह के शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र और गुरुवार के योग के दिन इस व्रत की शुरुआत करना चाहिए। नियमित सात व्रत करने से गुरु ग्रह से उत्पन्न होने वाला अनिष्ट नष्ट होता है।[क्या ये तथ्य है या केवल एक राय है?]

कथा और पूजन के समय मन, कर्म और वचन से शुद्ध होकर मनोकामना पूर्ति के लिए बृहस्पति देव से प्रार्थना करनी चाहिए। पीले रंग के चंदन, अन्न, वस्त्र और फूलों का इस व्रत में विशेष महत्व होता है।

विधि[संपादित करें]

सूर्योदय से पहले उठकर स्नान से निवृत्त होकर पीले रंग के वस्त्र पहनने चाहिए। शुद्ध जल छिड़ककर पूरा घर पवित्र करें। घर के ही किसी पवित्र स्थान पर बृहस्पतिवार की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। तत्पश्चात पीत वर्ण के गंध-पुष्प और अक्षत से विधिविधान से पूजन करें। इसके बाद निम्न मंत्र से प्रार्थना करें-

धर्मशास्तार्थतत्वज्ञ ज्ञानविज्ञानपारग। विविधार्तिहराचिन्त्य देवाचार्य नमोऽस्तु ते॥ तत्पश्चात आरती कर व्रतकथा सुनें।

बृहस्पतिवार व्रत के दिन क्या करें

इस दिन एक समय ही भोजन किया जाता है। व्रत करने वाले को भोजन में चने की दाल अवश्य खानी चाहिए। बृहस्पतिवार के व्रत में कंदलीफल (केले) के वृक्ष की पूजा की जाती है। == बृहस्पतिवार की कथा==?


बृहस्पतिवार व्रत कथा



प्राचीन समय की बात है।भारतवर्ष में एक राजा राज्य करता था वह बड़ा प्रतापी और दानी था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्‌मणों की सहायता करता था। वह प्रतिदिन मंदिर में भगव र्दशन करने जाता था परंतु यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी ऐसा करने से मना किया करती थी। एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे तो रानी और दासी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा मांगी तो रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा- हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूं। इस कार्य के लिए मेरे पतिदेव ही बहुत है अब आप ऐसी कृपा करेंगी सारा धन नष्ट हो जाए तथा मैं आराम से रह सकूं। साधु ने कहा- देवी तुम तो बड़ी अजीब हो। धन, सन्तान से कोई दुखी नहीं होता ईसको तो सभी चाहते हैं। पापी भी पुत्र और धन की इच्छा करता है यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखे मनुष्यो को भोजन कराओ प्याऊ लगवाओ ब्राह्मणों को दान दो कुआ तालाब बावड़ी बाग-बगीचे आदि का निर्माण कराओ मंदिर पाठशाला धर्मशाला बनवा कर दान दो निर्धनों की कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ साथ ही यज्ञ आदि कर्म करो अपने धन को शुभ कार्यों में खर्च करो। ऐसे करने से तुम्हारा नाम परलोक में सार्थक होगा एवं होगा एवं स्वर्ग की प्राप्ति होगी ।परन्तु रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली- महाराज मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं जिसको मैं अन्य लोगों को दान दु़ जिसको रखने और संभालने में ही मेरा सारा समय नष्ट हो जाए अब आप ऐसी कृपा करें कि सारा धन नष्ट हो जाए तथा मैं आराम से रह सकूं। साधु ने उत्तर दिया यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो जैसा मैं तुम्हें बताता हूं तुम वैसा ही करना बृहस्पतिवार को घर को गोबर से लीपना अपने केसों को पीली मिट्टी से धोना केसों को धोते समय स्नान करना, राजा से कहना वह हजामत बनवाए भोजन में मांस मदिरा खाना कपड़ा धोबी के यहां धुलने डालना, ऐसा करने से सात बृहस्पतिवार में आपका सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर वह साधु महाराज वहां से अन्तर्धान हो गये।


जैसे वह साधु कह कर गया था रानी ने वैसा ही किया। तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे कि उसका समस्त धन संपत्ति नष्ट हो गया और भोजन के लिए दोनों तरसने लगे। सांसारिक भोगों से दुखी रहने लगे। तब वह राजा रानी से कहने लगा कि तुम यहां पर रहो मैं दूसरे देश में जाउं क्योंकि यहां पर मुझे सभी मनुष्य जानते हैं इसलिए कोई कार्य नहीं कर सकता। देश चोरी परदेश भीख बराबर है ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया वहां जंगल को जाता और लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेंचता इस तरह जीवन व्यतीत करने लगा।

इधर, राजा के बिना रानी और दासी दुखी रहने लगीं । किसी दिन भोजन मिलता और किसी दिन जल पीकर ही रह जाती। एक समय जब रानी और दासियों को सात दिन बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा, हे दासी । पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है । वह बड़ी धनवान है । तू उसके पास जा आ और 5 सेर बेझर मांग कर ले आ ताकि कुछ समय के लिए थोड़ा-बहुत गुजर-बसर हो जा‌ए ।

दासी रानी की बहन के पास ग‌ई । उस दिन वृहस्पतिवार था । रानी का बहन उस समय वृहस्पतिवार की कथा सुन रही थी । दासी ने रानी की बहन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बहन ने को‌ई उत्तर नहीं दिया । जब दासी को रानी की बहन से को‌ई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुखी हु‌ई । उसे क्रोध भी आया । दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी । सुनकर, रानी ने कहां की है दासी इसमें उसका कोई दोष नहीं है जब बुरे दिन आते हैं तब कोई सहारा नही अच्छे बुरे का पता विपत्ति में ही लगता है जो ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा यह सब हमारे भाग्य का दोष है। यह सब कहकर रा रानी ने अपने भाग्य को कोसा । उधर, रानी की बहन ने सोचा कि मेरी बहन की दासी आ‌ई थी, परन्तु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुखी हु‌ई होगी । कथा सुनकर और पूजन समाप्त कर वह अपनी बहन के घर ग‌ई और कहने लगी, हे बहन । मैं वृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी । तुम्हारी दासी ग‌ई परन्तु जब तक कथा होती है, तब तक न उठते है और न बोलते है, इसीलिये मैं नहीं बोली । कहो, दासी क्यों ग‌ई थी ।

रानी बोली, बहन । हमारे घर अनाज नहीं था । ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आ‌ई । उसने दासियों समेत 7 दिन तक भूखा रहने की बात भी अपनी बहन को बता दी । इसीलिए मैंने दासी को तुम्हारे पास पांच सेर बेझर लेने के लिए भेजा था।रानी की बहन बोली, बहन देखो । वृहस्पतिदेव भगवान सबकी मनोकामना पूर्ण करते है । देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो । पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ परंतु बहन के आग्रह करने पर उसने दासी को अंदर भेजा।दासी घर के अन्दर ग‌ई तो वहाँ उसे एक घड़ा बेझर का भरा मिल गया । उसे बड़ी हैरानी हु‌ई क्योंकि उसे एक एक बर्तन देख लिया था । उसने बाहर आकर रानी को बताया । दासी रानी से कहने लगी, हे रानी । जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते है, इसलिये क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाये, हम भी व्रत किया करेंगे । दासी के कहने पर रानी ने अपनी बहन से वृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा । उसकी बहन ने बताया, वृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल गुड़ और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले के वृक्ष की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलायें और कथा सुने । उस दिन एक ही समय भोजनन करें भोजन पीले खाद्य पदार्थ का करें। इससे गुरु भगवान प्रसन्न होते है, अन्न, पुत्र,धन देते हैं। मनोकामना पूर्ण करते है । व्रत और पूजन की विधि बताकर रानी की बहन अपने घर लौट आ‌ई ।

रानी और दासी दोनों ने निश्चय किया कि वृहस्पतिदेव भगवान का पूजन जरुर करेंगें । सात रोज बाद जब वृहस्पतिवार आया तो उन्होंने व्रत रखा । घुड़साल में जाकर चना और गुड़ बीन ला‌ईं तथा उसकी दाल से केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया । अब पीला भोजन कहाँ से आ‌ए । दोनों बड़ी दुखी हु‌ई । परन्तु उन्होंने व्रत किया था इसलिये वृहस्पतिदेव भगवान प्रसन्न थे । एक साधारण व्यक्ति के रुप में वे दो थालों में सुन्दर पीला भोजन लेकर आ‌ए और दासी को देकर बोले, हे दासी । यह भोजन तुम्हारे लिये और तुम्हारी रानी के लिये है, इसे तुम दोनों ग्रहण करना । दासी भोजन पाकर बहुत प्रसन्न हु‌ई । उसने रानी से कहा चलो रानी जी भोजन कर लो परंतु रानी को भोजन आने के बारे में कुछ भी नहीं पता था इसलिए उसने कहा कि जा तू ही भोजन कर क्योंकि तू व्यर्थ में हमारी हंसी उड़ाती है। तब दासी ने कहा एक व्यक्ति भोजन दे गया है तब रानी ने कहा वह व्यक्ति तेरे लिए ही भोजन दे गया है तू ही भोजन कर। तब दासी ने कहा वह व्यक्ति हम दोनों के लिए दो थालों में सुंदर पीला भोजन दे गया है इसलिए मैं और आप दोनों ही साथ साथ भोजन करेंगे ।यह सुनकर रानी बहुत प्रसन्न हुए तथा दोनों ने गुरु भगवान को नमस्कार कर भोजन प्रारंभ किया।

उसके बाद से वे प्रत्येक वृहस्पतिवार को गुरु भगवान का व्रत और पूजन करने लगी । वृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास धन हो गया । परन्तु रानी फिर पहले की तरह आलस्य करने लगी । तब दासी बोली, देखो रानी । तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन के रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया । अब गुरु भगवान की कृपा से धन मिला है तो फिर तुम्हें आलस्य होता है । बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिये हमें दान-पुण्य करना चाहिये । अब तुम भूखे मनुष्यो को भोजन कराओ प्याऊ लगवाओ ब्राह्मणों को दान दो कुआ तालाब बावड़ी बाग-बगीचे आदि का निर्माण कराओ मंदिर पाठशाला धर्मशाला बनवा कर दान दो निर्धनों की कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ साथ ही यज्ञ आदि कर्म करो अपने धन को शुभ कार्यों में खर्च करो। जिसब तुम्हारे कुल का यश बढ़े तथा स्वर्ग प्राप्त हो और पित्तर प्रसन्न हों । दासी की बात मानकर रानी शुभ कर्म करने लगी । उसका यश फैलने लगा ।

एक दिन रानी और दासी आपस में विचार करने लगीं कि न जाने राजा किस दशा में होंगें, उनकी को‌ई खोज खबर भी नहीं है । उन्होंने श्रद्घापूर्वक गुरु (वृहस्पति) भगवान से प्रार्थना की कि राजा जहाँ कहीं भी हो, शीघ्र वापस आ जा‌एं उसी रात्रि को बृहस्पति देव ने राजा को स्वपन में कहा कि हे राजा उठ तेरी रानी तुझको याद करती है अपने देश को लौट जा। राजा प्रात: काल उठा और जंगल से लकड़ी काटने के लिए जंगल की ओर चल पड़ा। जंगल से गुजरते हुए विचार करने लगा कि रानी की गलती से उसे कितने दुःख भोगने पड़े राजपाट छोड़कर जंगल में आकर में आकर रहना पड़ा जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचकर गुजारा करना पड़ा। और अपनी दशा को याद करके व्याकुल होने लगा। उसी समय राजा के पास वृहस्पतिदेव साधु के वेष में आकर बोले, हे लकड़हारे । तुम इस सुनसान जंगल में किस चिंता में बैठे हो, मुझे बतला‌ओ । यह सुन राजा के नेत्रों में जल भर आया । साधु की वंदना कर राजा ने अपनी संपूर्ण कहानी सुना दी । महात्मा दयालु होते है । वे राजा से बोले, हे राजा तुम्हारी पत्नी ने वृहस्पतिदेव के प्रति अपराध किया था, जिसके कारण तुम्हारी यह दशा हु‌ई । अब तुम चिन्ता मत करो भगवान तुम्हें पहले से अधिक धन देंगें । देखो, तुम्हारी पत्नी ने वृहस्पतिवार का व्रत प्रारम्भ कर दिया है । अब तुम भी वृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल गुड़ और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले के वृक्ष की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलायें और कथा सुने । उस दिन एक ही समय भोजन करें भोजन पीले खाद्य पदार्थ का करें।। भगवान तुम्हारी सब कामना‌ओं को पूर्ण करेंगें । साधु की बात सुनकर राजा बोला, हे प्रभो । लकड़ी बेचकर तो इतना पैसा भ‌ई नहीं बचता, जिससे भोजन के उपरांत कुछ बचा सकूं । मैंने रात्रि में अपनी रानी को व्याकुल देखा है । मेरे पास को‌ई साधन नही, जिससे उसका समाचार जान सकूं । फिर मैं कौन सी कहानी कहूं, यह भी मुझको मालूम नहीं है । साधु ने कहा, हे राजा । मन में वृहस्पति भगवान के पूजन-व्रत का निश्चय करो । वे स्वयं तुम्हारे लिये को‌ई राह बना देंगे । वृहस्पतिवार के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़ियां लेकर शहर में जाना । तुम्हें रोज से दुगुना धन मिलेगा जिससे तुम भलीभांति भोजन कर लोगे तथा वृहस्पतिदेव की पूजा का सामान भी आ जायेगा । जो तुमने वृहस्पतिवार की कहानी के बारे में पूछा है, वह इस प्रकार है -

वृहस्पतिदेव की कहानी (story)

प्राचीनकाल में एक बहुत ही निर्धन ब्राहमण था । उसके को‌ई संन्तान न थी । वह नित्य पूजा-पाठ करता, उसकी स्त्री न स्नान करती और न किसी देवता का पूजन करती । इस कारण ब्राहमण देवता बहुत दुखी रहते थे अपनी पत्नी को बहुत समझाते किंतु उसका कोई परिणाम न निकलता। भगवान की कृपा से ब्राहमण के यहां एक कन्या उत्पन्न हु‌ई । कन्या बड़ी होने लगी । प्रातः स्नान करके वह भगवान विष्णु का जप करती । वृहस्पतिवार का व्रत भी करने लगी । पूजा पाठ समाप्त कर पाठशाला जाती तो अपनी मुट्ठी में जौ भरके ले जाती और पाठशाला के मार्ग में डालती जाती । लौटते समय वही जौ स्वर्ण के हो जाते तो उनको बीनकर घर ले आती । एक दिन वह बालिका सूप में उन सोने के जौ को फटककर साफ कर रही थी कि तभी उसकी मां ने देख लिया और कहा, कि हे बेटी । सोने के जौ को फटकने के लिये सोने का सूप भी तो होना चाहिये ।

दूसरे दिन गुरुवार था । कन्या ने व्रत रखा और वृहस्पतिदेव से सोने का सूप देने की प्रार्थना की और कहा कि हे प्रभु यदि सच्चे मन से मैंने आपकी पूजा की हो तो मुझे सोने का सूप दे दो। । वृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली । रोजाना की तरह वह कन्या जौ फैलाती हु‌ई पाठशाला चली ग‌ई । पाठशाला से लौटकर जब वह जौ बीन रही थी तो वृहस्पतिदेव की कृपा से उसे सोने का सूप मिला । उसे वह घर ले आ‌ई और उससे जौ साफ करने लगी । परन्तु उसकी मां का वही ढंग रहा ।

एक दिन की बात है । कन्य सोने के सूप में जब जौ साफ कर रही थी, उस समय उस नगर का राजकुमार वहां से निकला । कन्या के रुप और कार्य को देखकर वह उस पर मोहित हो गया । राजमहल आकर वह भोजन तथा जल त्यागकर उदास होकर लेट गया ।

राजा को जब राजकुमार द्घारा अन्न-जल त्यागने का समाचार ज्ञात हु‌आ तो अपने मंत्रियों के साथ वह अपने पुत्र के पास गया और पूछा हे बेटा ! तुम्हें किस बात का कष्ट है किसी ने तुम्हारा अपमान किया है अथवा कोई और कारण है मुझे बताओ मैं वही कार्य करूंगा जिससे तुम्हें प्रसन्नता हो। अपनी पिता की बातें सुनकर राजकुमार बोला हे पिताजी ! मुझे किसी बात का दुख नहीं है किसी ने मेरा अपमान नहीं किया है परंतु मैं उस लड़की के साथ विवाह करना चाहता हूं जो सोने के सुख में जो को साफ कर रही थी । राजकुमार ने राजा को उस लड़की के घर का पता भी बता दिया । मंत्री उस लड़की के घर गया । मंत्री ने ब्राहमण के समक्ष राजा की ओर से निवेदन किया । कुछ ही दिन बाद ब्राहमण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ सम्पन्न हो गाया ।

‌कन्या के घर से जाते ही ब्राहमण के घर में पहले की भांति गरीबी का निवास हो गया । एक दिन दुखी होकर ब्राहमण अपनी पुत्री से मिलने गये । बेटी ने पिता की अवस्था को देखा और अपनी माँ का हाल पूछा ब्राहमण ने सभी हाल कह सुनाया । कन्या ने बहुत-सा धन देकर अपने पिता को विदा कर दिया । लेकिन कुछ दिन बाद फिर वही हाल हो गया । ब्राहमण फिर अपनी कन्या के यहां गया और सभी हाल कहातो पुत्री बोली, हे पिताजी । आप माताजी को यहाँ लिवा लाओ । मैं उन्हें वह विधि बता दूंगी, जिससे गरीबी दूर हो जाए । ब्राहमण देवता अपनी स्त्री को साथ लेकर अपनी पुत्री के पास राजमहल पहुंचे तो पुत्री अपनी मां को समझाने लगी, हे मां, तुम प्रातःकाल स्नानादि करके विष्णु भगवन का पूजन करो और बृहस्पतिवार का व्रत करो तो सब दरिद्रता दूर हो जाएगी । परन्तु उसकी मां ने उसकी एक भी बात नहीं मानी । वह प्रातःकाल उठकर अपनी पुत्री की बच्चों का झूठन को खा लेती थी । एक दिन उसकी पुत्री को बहुत गुस्सा आया, उसने अपनी माँ को एक कोठरी में बंद कर दिया । प्रातः उसे स्नानादि कराके पूजा-पाठ करवाया तो उसकी माँ की बुद्घि ठीक हो ग‌ई। इसके बाद वह नियम से पूजा पाठ करने लगी और प्रत्येक वृहस्पतिवार को व्रत करने लगी । इस व्रत के प्रभाव से मृत्यु के बाद वह स्वर्ग को ग‌ई । वह ब्राहमण भी सुखपूर्वक इस लोक का सुख भोगकर स्वर्ग को प्राप्त हु‌आ । इस तरह कहानी कहकर साधु बने देवता वहाँ से लोप हो गये । धीरे-धीरे समय व्यतीत होने पर फिर वृहस्पतिवार का दिन आया । राजा जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचने गया । उसे उस दिन और दिनों से अधिक धन मिला । राजा ने चना, गुड़ आदि लाकर वृहस्पतिवार का व्रत किया । उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हु‌ए । परन्तु जब अगले गुरुवार का दिन आया तो वह वृहस्पतिवार का व्रत करना भूल गया । इस कारण वृहस्पति भगवान नाराज हो ग‌ए । उस दिन उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया था तथा अपने समस्त राज्य में घोषणा करवा दी कि सभी मेरे यहां भोजन करने आवें । किसी के घर चूल्हा न जले । इस आज्ञा को जो न मानेगा उसको फांसी दे दी जा‌एगी । राजा की आज्ञानुसार राज्य के सभी वासी राजा के भोज में सम्मिलित हु‌ए लेकिन लकड़हारा कुछ देर से पहुंचा, इसलिये राजा उसको अपने साथ महल में ले ग‌ए । जब राजा लकड़हारे को भोजन करा रहे थे तो रानी की दृष्टि उस खूंटी पर पड़ी, जिस पर उसका हारलटका हु‌आ था । उसे हार खूंटी पर लटका दिखा‌ई नहीं दिया । रानी को निश्चय हो गया कि मेरा हार इस लकड़हारे ने चुरा लिया है । उसी समय सैनिक बुलवाकर उसको जेल में डलवा दिया । लकड़हारा जेल में विचार करने लगा कि न जाने कौन से पूर्वजन्म के कर्म से मुझे यह दुख प्राप्त हु‌आ है और जंगल में मिले साधु को याद करने लगा । तत्काल वृहस्पतिदेव साधु के रुप में प्रकट हो ग‌ए और कहने लगे, अरे मूर्ख । तूने वृहस्पति देवता की कथा नहीं की, उसी कारण तुझे यह दुख प्राप्त हु‌आ हैं । अब चिन्ता मत कर । वृहस्पतिवार के दिन जेलखाने के दरवाजे पर तुझे चार पैसे पड़े मिलेंगे, उनसे तू वृहस्पतिवार की पूजा करना तो तेर सभी कष्ट दूर हो जायेंगे । अगले वृहस्पतिवार उसे जेल के द्घार पर चार पैसे मिले । राजा ने पूजा का सामान मंगवाकर कथा कही और प्रसाद बाँटा । उसी रात्रि में वृहस्पतिदेव ने उस नगर के राजा को स्वप्न में कहा, हे राजा । तूने जिसे जेल में बंद किया है, उसे कल छोड़ देना । वह निर्दोष है । वाले राजा है ।रानी का हार उसी खूंटी पर लटका हुआ है। अगर तू ऐसा नहीं करेगा तो मैं तेरे राज्य को नष्ट कर दूंगा।राजा प्रातःकाल उठा और खूंटी पर हार टंगा देखकर लकड़हारे को बुलाकर क्षमा मांगी तथा राजा के योग्य सुन्दर वस्त्र-आभूषण भेंट कर उसे विदा किया । गुरुदेव की आज्ञानुसार राजा अपने नगर को चल दिया । राजा जब नगर के निकट पहुँचा तो उसे बड़ा ही आश्चर्य हु‌आ । नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब और कु‌एं तथा बहुत-सी धर्मशाला‌एं, मंदिर आदि बने हु‌ए थे । राजा ने पूछा कि यह किसका बाग और धर्मशाला और मंदिर है ? तब नगर के सब लोग कहने लगे कि यह सब रानी और दासी द्घारा बनवाये ग‌ए है । राजा को आश्चर्य हु‌आ और गुस्सा भी आया कि उसकी अनुपस्थिति में रानी के पास धन कहां से आया होगा । जब रानी ने यह खबर सुनी कि राजा आ रहे है तो उसने अपनी दासी से कहा, हे दासी । देख, राजा हमको कितनी बुरी हालत में छोड़ गये थे । वह हमारी ऐसी हालत देखकर लौट न जा‌एं, इसलिये तू दरवाजे पर खड़ी हो जा । रानी की आज्ञानुसार दासी दरवाजे पर खड़ी हो ग‌ई और जब राजा आ‌ए तो उन्हें अपने साथ महल में लिवा ला‌ई । तब राजा ने क्रोध करके अपनी तलवार निकाली और पूछने लगा, बता‌ओ, यह धन तुम्हें कैसे प्राप्त हु‌आ है । तब रानी ने सारी कथा सुना‌ई कि यह सब धन‌ हमें बृहस्पति देव के व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है। राजा ने निश्चय किया कि मैं रोजाना दिन में तीन बार कहानी कहा करुंगा और रोज व्रत किया करुंगा । अब हर समय राजा के दुपट्टे में चने की दाल बंधी रहती तथा दिन में तीन बार कथा कहता । एक रोज राजा ने विचार किया कि चलो अपनी बहन के यहां हो आ‌ऊं । इस तरह का निश्चय कर राजा घोड़े पर सवार हो अपनी बहन के यहां चल दिया । मार्ग में उसने देखा कि कुछ आदमी एक मुर्दे को लिये जा रहे है । उन्हें रोककर राजा कहने लगा, अरे भा‌इयो । मेरी वृहस्पतिवार की कथा सुन लो । वे बोले, लो, हमारा तो आदमी मर गया है, इसको अपनी कथा की पड़ी है । परन्तु कुछ आदमी बोले, अच्छा कहो, हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगें । राजा ने दाल निकाली और कथा कहनी शुरु कर दी । जब कथा आधी हु‌ई तो मुर्दा हिलने लगा और जब कथा समाप्त हु‌ई तो राम-राम करके वह मुर्दा खड़ा हो गया। राजा आगे बढ़ा । उसे चलते-चलते शाम हो ग‌ई । आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलाता मिला । राजा ने उससे बृहस्पतिवार का व्रत सुनने को कहा कि जब तक मैं तेरी कथा सुनूंगा तब तक चार हरैया जोत लूंगा जा अपनी कथा कथा किसी और को सुनाना। राजा आगे चल पड़ा । राजा के हटते ही बैल पछाड़ खाकर गिर ग‌ए तथा किसान के पेट में बहुत जो रसे द्रर्द होने लगा । उसी समय किसान की मां रोटी लेकर आ‌ई । उसने जब देखा तो अपने पुत्र से सब हाल पूछा । बेटे ने सभी हाल बता दिया । बुढ़िया दौड़-दौड़ी उस घुड़सवार के पास पहुँची और उससे बोली, मैं तेरी कथा सुनूंगी, तू अपनी कथा मेरे खेत पर ही चलकर कहना । राजा ने लौटकर बुढ़िया के खेत पर जाकर कथा कही, जिसके सुनते ही बैल खड़े हो गये तथा किसान के पेट का दर्द भी बन्द हो गया । राजा अपनी बहन के घर पहुंच गया । बहन ने भा‌ई की खूब मेहमानी की । दूसरे रोज प्रातःकाल राजा जागा तो वह देखने लगा कि सब लोग भोजन कर रहे है । राजा ने अपनी बहन से जब पूछा, ऐसा को‌ई मनुष्य है, जिसने भोजन नहीं किया हो । जो मेरी वृहस्पतिवार की कथा सुन ले । बहन बोली, हे भैया यह देश ऐसा ही है यहाँ लोग पहले भोजन करते है, बाद में को‌ई‌ अन्य काम करते है । अगर कोई पड़ोस में हो तो देख आती हूं ऐसा कहकर वह देखने चली गई परंतु उसे ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसने भोजन ना किया हो। फिर वह एक कुम्हार के घर ग‌ई, जिसका लड़का बीमार था । उसे मालूम हु‌आ कि उसके यहां तीन दिन से किसी ने भोजन नहीं किया है । रानी ने अपने भाई की कथा सुनने के लिए कुम्हार से कहा तो वह तैयार हो गया। राजा ने जाकर वृहस्पतिवार की कथा कही । जिसको सुनकर उसका लड़का ठीक हो गया । अब तो राजा को प्रशंसा होने लगी । एक दिन राजा ने अपनी बहन से कहा, हे बहन । मैं अब अपने घर जा‌उंगा, तुम भी तैयार हो जा‌ओ । राजा की बहन ने अपनी सास से अपने भा‌ई के साथ जाने की आज्ञा मांगी । सास बोली हां चली जा मगर अपने लड़कों को मत ले जाना, क्योंकि तेरे भा‌ई के को‌ई संतान नहीं होती है । बहन ने अपने भा‌ई से कहा, हे भ‌इया । मैं तो चलूंगी मगर को‌ई बालक नहीं जायेगा । राजा बोला जब कोई बालक नहीं जाएगा तब तुम ही जाकर क्या करोगी। अपनी बहन को भी छोड़कर दुखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया । राजा ने अपनी रानी से सारी कथा बता‌ई कि हम निसंतान है इसलिए कोई हमारे घर आना पसंद नहीं करता है और बिना भोजन किये वह शय्या पर लेट गया । रानी बोली,वृहस्पतिदेव ने हमें सब कुछ दिया है, वे हमें संतान भी अवश्य देंगें । उसी रात वृहस्पतिदेव ने राजा को स्वप्न में कहा, हे राजा । उठ, सभी सोच त्याग दे । तेरी रानी गर्भवती है । राजा को यह जानकर बड़ी खुशी हु‌ई । नवें महीन रानी के गर्भ से एक सुंदर पुत्र पैदा हु‌आ । तब राजा बोला, हे रानी । स्त्री बिना भोजन के रह सकती है, परन्तु बिना कहे नहीं रह सकती । जब मेरी बहन आये तो तुम उससे कुछ मत कहना । रानी ने हां कर दी । जब राजा की बहन ने यह शुभ समाचार सुना तो वह बहुत खुश हु‌ई तथा बधा‌ई लेकर अपने भा‌ई के यहां आ‌ई । रानी ने तब उससे कहा घोड़ा चढ़कर तो नहीं आई गधा चढ़ी आई तो राजा की बहन बोली, भा‌ई । मैं इस प्रकार न कहती तो तुम्हारे घर औलाद कैसे होती । वृहस्पतिदेव सभी कामना‌एं पूर्ण करते है । जो सदभावनापूर्वक वृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पढ़ता है अथवा सुनता है और दूसरों को सुनाता है, वृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामना‌एं पूर्ण करते है, उनकी सदैव रक्षा करते है । जो संसार में सदभावना से गुरुदेव का पूजन एवं व्रत सच्चे हृदय से करते है, उनकी सभी मनकामना‌एं वैसे ही पूर्ण होती है, जैसी सच्ची भावना से रानी और राजा ने वृहस्पतिदेव की कथा का गुणगान किया, तो उनकी सभी इच्छा‌एं वृहस्पतिदेव जी ने पूर्ण की ।इसलिये सबको कथा सुनने के बाद प्रसाद लेकर जाना चाहिये । हृदय से उनका मनन करते हुये जयकारा बोलना चाहिये ।

॥ इति श्री वृहस्पतिवार व्रत कथा ॥

बृहस्पतिदेव आरती

जय बृहस्पति देवा, जय बृहस्पति देवा। छिन छिन भोग लगाऊ फल मेवा।। जय बृहस्पति देवा।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी। जगत पिता जगदीश्वर तुम सबके स्वामी।। जय बृहस्पति देवा।

चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता। सकल मनोरथ दायक, किरपा करो भर्ता।। जय बृहस्पति देवा।

तन, मन, धन अर्पणकर जो शरण पड़े। प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े।। जय बृहस्पति देवा।

दीन दयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी। पाप दोष सभ हर्ता, भाव बंधन हारी।। जय बृहस्पति देवा।

सकल मनोरथ दायक, सब संशय तारो। विषय विकार मिटाओ संतन सुखकारी।। जय बृहस्पति देवा।

जो कोई आरती तेरी, प्रेम सहित गावे। जेष्टानंद बन्द सो सो निश्चय पावे ।। जय बृहस्पति देवा।



ॐ जय जगदीश हरे

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे । भक्त / दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय जगदीश हरे...

जो ध्यावे फल पावे, दुःख विनसे मन का, स्वामी दुःख विनसे मन का । सुख सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥ ॐ जय जगदीश हरे...

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी । तुम / प्रभु बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी ॥ ॐ जय जगदीश हरे...

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी । पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी ॥ ॐ जय जगदीश हरे...

तुम करुणा के सागर, तुम पालन-कर्ता, स्वामी तुम पालन-कर्ता । मैं मूरख खल कामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॐ जय जगदीश हरे...

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति । किस विधि मिलूँ दयालु / गोसाईं, तुमको मैं कुमति ॥ ॐ जय जगदीश हरे...

दीनबन्धु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे, स्वामी तुम रक्षक मेरे । अपने हाथ उठा‌ओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा मैं तेरे ॥ ॐ जय जगदीश हरे...

विषय-विकार मिटा‌ओ, पाप हरो देवा, स्वमी कष्ट हरो देवा । श्रद्धा-भक्ति बढ़ा‌ओ, श्रद्धा-प्रेम बढ़ा‌ओ, सन्तन की सेवा ॥ ॐ जय जगदीश हरे...

तन मन धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा । तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा ॥ ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी ! जय जगदीश हरे । भक्त / दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥ ॐ जय जगदीश हरे

लाभ[संपादित करें]

बृहस्पतिवार व्रत के पूजन से स्त्री-पुरुष को वृहस्पतिदेव की अनुकम्पा से धन-संपत्ति का अपार लाभ होता है।[क्या ये तथ्य है या केवल एक राय है?] परिवार में सुख तथा शांति रहती है।[क्या ये तथ्य है या केवल एक राय है?] स्त्रियों के लिए बृहस्पतिवार का व्रत बहुत शुभ फल देने वाला है।[क्या ये तथ्य है या केवल एक राय है?] बृहस्पतिवार की पूजा के पश्चात कथा सुनने का विशेष महत्व है।[क्या ये तथ्य है या केवल एक राय है?] बृहस्पतिवार के व्रत करने और कथा सुनने से विद्या का बहुत लाभ होता है।[क्या ये तथ्य है या केवल एक राय है?] बृहस्पतिवार का नियमित व्रत रखने वाली स्त्री की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।[क्या ये तथ्य है या केवल एक राय है?]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]