ब्रज

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
(बृज से अनुप्रेषित)
Jump to navigation Jump to search
प्रस्तावित राज्य
ब्रज
राज्य उत्तर प्रदेश
भाषाएँ संस्कृत
हिंदी
ब्रजभाषा
नागरिकता ब्रजवासी
ऐतिहासिक केन्द्र मथुरा
क्षेत्रीय पशु गाय एवं बैल
क्षेत्रीय वाहन बैलगाड़ी
शेठ लक्ष्मीचन्द मन्दिर का द्वार (१८६० के दशक का फोटो)

वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के मथुरा नगर सहित वह भू-भाग, जो श्रीकृष्ण के जन्म और उनकी विविध लीलाओं से सम्बधित है, ब्रज कहलाता है। इस प्रकार ब्रज वर्तमान मथुरा मंडल और प्राचीन शूरसेन प्रदेश का अपर नाम और उसका एक छोटा रूप है। इसमें मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, गोकुल, महाबन, वलदेव, नन्दगाँव, वरसाना, डीग ,कामबन और होडल आदि भगवान श्रीकृष्ण के सभी लीला-स्थल सम्मिलित हैं। उक्त ब्रज की सीमा को चौरासी कोस माना गया है। सूरदास तथा अन्य व्रजभाषा के भक्त कवियों और वार्ताकारों ने भागवत पुराण के अनुकरण पर मथुरा के निकटवर्ती वन्य प्रदेश की गोप-बस्ती को ब्रज कहा है और उसे सर्वत्र 'मथुरा', 'मधुपुरी' या 'मधुवन' से पृथक वतलाया है। ब्रज क्षेत्र में आने वाले प्रमुख नगर ये हैं- मथुरा, जलेसर, भरतपुर, आगरा, हाथरस, धौलपुर, अलीगढ़, इटावा, मैनपुरी, एटा,फ़र्रूख़ाबाद कासगंज, फिरोजाबाद और पलवल

ब्रज शब्द संस्कृत धातु 'व्रज' से बना है, जिसका अर्थ गतिशीलता से है। जहां गाय चरती हैं और विचरण करती हैं वह स्थान भी ब्रज कहा गया है। अमरकोश के लेखक ने ब्रज के तीन अर्थ प्रस्तुत किये हैं- गोष्ठ (गायों का बाड़ा), मार्ग और वृंद (झुण्ड)। संस्कृत के व्रज शब्द से ही हिन्दी का ब्रज शब्द बना है।

वैदिक संहिताओं तथा रामायण, महाभारत आदि संस्कृत के प्राचीन धर्मग्रंथों में ब्रज शब्द गोशाला, गो-स्थान, गोचर भूमि के अर्थों में भी प्रयुक्त हुआ है। ऋग्वेद में यह शब्द गोशाला अथवा गायों के खिरक के रूप में वर्णित है। यजुर्वेद में गायों के चरने के स्थान को ब्रज और गोशाला को गोष्ठ कहा गया है। शुक्लयजुर्वेद में सुन्दर सींगों वाली गायों के विचरण स्थान से ब्रज का संकेत मिलता है। अथर्ववेद में गोशलाओं से सम्बधित पूरा सूक्त ही प्रस्तुत है। हरिवंश तथा भागवतपुराणों में यह शब्द गोप बस्त के रूप में प्रयुक्त हुआ है। स्कंदपुराण में महर्षि शांण्डिल्य ने ब्रज शब्द का अर्थ व्थापित वतलाते हुए इसे व्यापक ब्रह्म का रूप कहा है। अतः यह शब्द ब्रज की आध्यात्मिकता से सम्बधित है।

वेदों से लेकर पुराणों तक में ब्रज का सम्बध गायों से वर्णित किया गया है। चाहे वह गायों को बांधने का बाडा हो, चाहे गोशाला हो, चाहे गोचर भूमि हो और चाहे गोप-बस्ती हो। भागवतकार की दृष्टि में गोष्ठ, गोकुल और ब्रज समानार्थक हैं। भागवत के आधार पर सूरदास की रचनाओं में भी ब्रज इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

मथुरा और उसका निकटवर्ती भू-भाग प्राचीन काल से ही अपने सघन वनों, विस्तृत चारागाहों, गोष्ठों और सुन्दर गायों के लिये प्रसिद्ध रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म यद्यपि मथुरा नगर में हुआ था, तथापि राजनैतिक कारणों से उन्हें जन्म लेते ही यमुना पार की गोप-वस्ती में भेज दिया गया था, उनकी वाल्यावस्था एक बड़े गोपालक के घर में गोप, गोपी और गो-वृंद के साथ बीती थी। उस काल में उनके पालक नंदादि गोप गण अपनी सुरक्षा और गोचर-भूमि की सुविधा के लिये अपने गोकुल के साथ मथुरा निकटवर्ती विस्तृत वन-खण्डों में घूमा करते थे। श्रीकृष्ण के कारण उन गोप-गोपियों, गायों और गोचर-भूमियों का महत्व बड़ गया था।

पौराणिक काल से लेकर वैष्णव सम्प्रदायों के आविर्भाव काल तक जैसे-जैसे कृश्णोपासना का विस्तार होता गया, वैसे-वैसे श्रीकृष्ण के उक्त परिकरों तथा उनके लीला स्थलों के गौरव की भी वृद्धि होती गई। इस काल में यहां गो-पालन की प्रचुरता थी, जिसके कारण व्रजखण्डों की भी प्रचुरता हो गई थी। इसलिये श्री कृष्ण के जन्म स्थान मथुरा और उनकी लीलाओं से सम्वधित मथुरा के आस-पास का समस्त प्रदेश ही ब्रज अथवा ब्रजमण्डल कहा जाने लगा था।

इस प्रकार ब्रज शब्द का काल-क्रमानुसार अर्थ विकास हुआ है। वेदों और रामायण-महाभारत के काल में जहाँ इसका प्रयोग 'गोष्ठ'-'गो-स्थान' जैसे लघु स्थल के लिये होता था। वहां पौराणिक काल में 'गोप-बस्ती' जैसे कुछ बड़े स्थान के लिये किया जाने लगा। उस समय तक यह शब्द प्रदेशवायी न होकर क्षेत्रवायी ही था।

भागवत में 'ब्रज' क्षेत्रवायी अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। वहां इसे एक छोटे ग्राम की संज्ञा दी गई है। उसमें 'पुर' से छोटा 'ग्राम' और उससे भी छोटी बस्ती को 'ब्रज' कहा गया है। १६वीं शताब्दी में 'ब्रज' प्रदेशवायी होकर 'ब्रजमंडल' हो गया और तव उसका आकार ८४ कोस का माना जाने लगा था। उस समय मथुरा नगर 'ब्रज' में सम्मिलित नहीं माना जाता था। सूरदास तथा अन्य ब्रज-भाषा कवियों ने 'ब्रज' और मथुरा का पृथक् रूप में ही कथन किया है, जैसे पहिले अंकित किया जा चुका है।

कृष्ण उपासक सम्प्रदायों और ब्रजभाषा कवियों के कारण जब ब्रज संस्कृति और ब्रजभाषा का क्षेत्र विस्तृत हुआ तब ब्रज का आकार भी सुविस्तृत हो गया था। उस समय मथुरा नगर ही नहीं, बल्कि उससे दूर-दूर के भू-भाग, जो ब्रज संस्कृति और ब्रज-भाषा से प्रभावित थे, व्रज अन्तर्गत मान लिये गये थे। वर्तमान

काल में मथुरा नगर सहित मथुरा जिले का अधिकांश भाग पलवल जिले की होडल तहसील हरियाणा, तथा राजस्थान के डीग और कामबन का कुछ भाग, जहाँ से ब्रजयात्रा गुजरती है, ब्रज कहा जाता है। ब्रज संस्कृति और ब्रज भाषा का क्षेत्र और भी विस्तृत है।

उक्त समस्त भू-भाग रे प्राचीन नाम, मधुबन, शुरसेन, मधुरा, मधुपुरी, मथुरा और मथुरामंडल थे तथा आधुनिक नाम ब्रज या ब्रजमंडल हैं। यद्यपि इनके अर्थ-बोध और आकार-प्रकार में समय-समय पर अन्तर होता रहा है। इस भू-भाग की धार्मिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक और संस्कृतिक परंपरा अत्यन्त गौरवपूर्ण रही है।[1]

ब्रज में प्रमुख धार्मिक स्थान[संपादित करें]

  • मथुरा - श्रीकृष्ण का जन्मस्थान
  • वृन्दावन - भगवान श्री कृष्ण का क्रीडास्थल
  • नन्दगाँव - नन्द बाबा का गाँव।
  • बरसाना - राधा जी का गाँव कहा जाता है, कुछ धर्मगुरुओं का मानना है कि राधा जी का गाँव रावल था।
  • पैगाँव - कृष्णजी से जुडा गाँव जहां भगवान ने दूध माँग कर पिया था। इसे पैवन भी कहा जाता है।
  • छाता - भगवान कृष्ण की लीला स्थली। वास्तिविक नाम छत्रवन है।
  • गोवर्धन - जहां प्रभु ने पर्वत उंगली पर उठाया था।
  • भद्रवन - इस वन में कृष्ण जी ने लीला की थी। इसे भदावल नाम से भी जाना जाता है।

ब्रज का प्राचीन गौरव[संपादित करें]

यमुना नदी की पावन धारा के तट का यह भू-भाग, जिसे आजकल ब्रजमण्डल या मथुरामण्ल कहते हैं और जो पहिले 'मध्य देश' अथवा 'ब्रह्मर्षि देश' के अन्तर्गत शूरसेन जनपद के नाम से प्रसिद्ध था, भारतवर्ष का अत्यन्त प्राचीन और महत्वपूर्ण प्रदेश माना गया है। अत्यन्त प्राचीन काल से ही इसी गौरव-गाथा के सूत्र मिलते हैं। हिन्दू, जैन और बौद्धों की धार्मिक अनुश्रुतियों तथा संस्कृत, पालि, प्रकृत के प्राचीन ग्रन्थों में इस पवित्र भू-खण्ड का विशद वर्णन मिलता है।

हिन्दू उल्लेख और अनुश्रुतियाँ[संपादित करें]

संसार के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ॠग्वेद में यमुना तट की इस मनोरम भूमि और इस पर विचरण करने वाली लम्बे सीगों से सम्पन्न सुन्दर गायों के उल्लेख के साथ ही साथ, कतिपय भाष्यकारों के मतानुसार, कुछ ब्रज लीलाओं का भी संकेत मिलता है। अथर्ववेद, शतपथ ब्राह्मण, रामायण, महाभारत और हरिवंश पुराण आदि में इस भू-भाग का विविध प्रकार से वर्णन प्रस्तुत किया गया है।

  • आर्य ग्रन्थों के अनुसार मानवजाति के आदि पिता स्वायम्भुव मनु थे, जो मनुओं की परम्परा में प्रथम माने जाते है। उनके समय में यमुना तट का यह प्रदेश विशाल सधन वनों से अच्छादित था। कालान्तर में यह बन्य प्रदेश ॠषि-मुनियों की तपो-भूमि के रूप में परिणित हो गया, जहां अनेक सिद्ध रूप यमुना के तट के आश्रमों में तपस्या करते हुए ब्रम्ह का चिन्तन मनन करते थे। उस बन को 'मधुबन' कहा गया है। वेदों में ब्रम्हविद्या अथवा अत्मविद्या की संज्ञा 'मधुविद्या' है। कदाचित इसीलिये उस सिद्ध बन को 'मधुबन' का नाम प्राप्त हुआ था।
  • मधुबन के महत्व की प्राचीनतम स्वीकृति उस पौराणिक उल्लेख में है, जिस में कहा गया हैं कि स्वायंभुव मनु के पुत्र ध्रुव ने नारद मुनि के उपदेश से उसी बन में तपस्या की थी। नारद जी ने ध्रूव को वतलाया था कि मधुबन की पुण्य भूमि को भगवान श्री हरि: का नित्य सानिध्य प्राप्त है। ३ अतः यहां पर तप आराधना करने से इच्छित फल की सीध्र उपलब्धि होती है। राजा अंबरीष को भी विष्णु के चक्र के द्वारा इसी भूमि पर अभय प्रदान करने की अनुश्रति प्रलित है। पौराणिक जगत् के उन प्राचीन भक्तों की स्मृति रक्षार्थ ब्रज के वर्तमान मधुबन ग्राम में ध्रुव आश्रम और ध्रुव गुफा तथा मथुरा नगर में ध्रुव टीला, अंबरीष टीला और चक्र तीर्थ जैसे पुण्य स्थल विधमान हैं, जो ब्रज की प्राचीनता और पवित्रता के साक्षी हैं।
  • मथुरा गोवर्धन मार्ग पर शांतनुकुण्ड नामक एक प्राचीन सरोवर है, जो पौख वंश के प्रतापी महाराज शांतनु का स्मृति स्थल माना जाता है। शांतनु के पुत्र भीष्म थे, जो श्री कृष्ण के सम्बधी और कृपापात्र पाण्डवों के पितामह थे। शांतनु ने अपनी बृद्धावस्था में एक केवट कन्या सत्यवती से विवाह किया था। शांतनु कुंड के समीप का सतोहा ग्राम उक्त सत्यवती के नाम पर ही प्रसिद्ध हुआ कहा जाता है।
  • मथुरा में यमुना नदी के जो प्राचीन धाट हैं, उनमें सोम (वर्तमान गोधाट) वैकुंठ धाट और कृष्ण गंगा नामक धाट उल्लेखनीय हैं। वाराह पुराण में कृष्ण गंगा धाट की स्थिति सोमधाट और वैकुंठ धाट के मध्य में वर्णित की गयी है और उसे महार्षि व्यास का तपस्थल कहा गया है। ४ उक्त स्थल पर किसी काम में कृष्ण गंगा नामक एक नदी यमुना में मिलती थी। व्यास जी का नाम द्वेैपाथन कृष्ण था। उनके नाम पर कृष्ण गंगा और यमुना के संगम का वह धाट कृष्ण गंगा धाट कहा जाने लगा था। ब्रज में यह अनुश्रुति प्रसिद्ध है कि व्यास जी ने इसी स्थल पर पुराणों की रचना की थी। वर्तमान काल में कृष्ण गंगा नदी तो नहीं है, किन्तु इस नाम का धाट अब भी विधमान है।
  • प्रागैतिहासिक कालिन मधुबन के विशिष्ट भाग में यमुना नदी के तट पर एक सुन्दर नगरी का निर्माण किया गया। वह नगरी पहिले मधुपुरी अथवा मधुरा और बाद में मथुरा के नाम से विख्यात हुई। उसके एक ओर यमुना पुलिन और उसके तट की सधन कूंजों का मनोरम दृष्य था तथा तीन ओर बन-उपबन, लता और गुल्मों का प्राकृतिक वैभव था। उसके पश्चिम में कुछ दूर गोवर्धन पहाड़ी का नैसंगिक सौन्दर्य था। इस प्रकार यमुना नदी और गोवर्धन पहाड़ी से परिवेष्ठत वह रमणीक पुरी 'मथुरा' के नाम से लोक में प्रसिद्ध हुई। ५ इसके निर्माण और विकास के लिये मधु और उसके पुत्र लवण, रामानुज, शत्रुधन और उसके पुत्र सवाहु-शूरसेन तथा सत्वत से लेकर उग्रसेन और उनके पुत्र कंस तक क्रमशः दैत्यवंशी, सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी कई राजा-महाराजाओं के नाम पुराणों में प्रसिद्ध सहित वर्णित हैं।

जैन ग्रन्थ और अनुश्रुति[संपादित करें]

भारतवर्ष के अवैदिक धर्मों में जैन धर्म सर्वाधिक प्राचीन माना जाता है। इसके तीर्थकरों की वहुत पुरानी परम्परा है। प्रथम तीर्थकर ॠषभदेव सहित कई तीर्थकरों का प्राचीन ब्रज अथवा शूरसेन जनपद से धनिष्ठ सम्वध रहा है जिनसे नाचार्य कृत महापुराण में वर्णित है कि भगवान ॠषभदेव के आदेश से इंद्र ने इन इस भूतल पर जिन ५२ देशों का निर्माण किया था उनमें एक सूरसेन देश भी था, जिसकी राजधानी मथुरा थी। १ जैन मान्यतानुसार बाइसवे तीर्थाकर श्री नेमिनाथ श्री कृष्ण के भाई थे, इस लिये जैन धर्मावलंबियों को भी श्री कृष्ण के जन्मस्थान मथुरा और ब्रज का सदा ही महत्व स्वीकृत रहा है।

सतवें तीर्थकर श्री सुपार्श्वनाथ और तेइसवे तीर्थकर पार्श्वनाथ भ्रमण भी मथुरा में हुआ था २ तथा अन्तिम तीर्थकर श्री महावीर जी भी मथुरा पधारे थे। अन्तिम केवलि जम्बूस्वामी के तप और निर्वाण की भूमि होने से मथुरा जैनियों के लिये विशेष रूप से तीर्थ स्थान रहा है। मथुरा में चौरासी नामक स्थल जम्बूस्वामी की तपोभूमि होने के साथ ही साथ उनका निर्वाण स्थल भी कहा जाता है। इस प्रकार ब्रज प्रदेश और मथुरा कई तीर्थकरों की विहार भूमि विविध मुनियों की तपोभूमि एंव अनेक सिद्ध पुरुषों की निर्वाण भूमि होने के साथ-साथ जैन धर्म के सुप्रसिद्ध स्तूपों, मन्दिरों और कलाकृतियों के कारण अत्यन्त प्राचीन काल से ही सिद्ध क्षेत्र तथा उत्तरापथ का प्रमुख तीर्थ स्थल माना गया है।

बौद्ध ग्रन्थ और अनुश्रुतियां में ब्रज[संपादित करें]

बौद्ध धर्म के सर्वास्तिवादी सम्प्रदाय की मान्यता है कि इस भू-तल के मानव समाज ने सर्वसम्मति से अपना एक नेता निर्वाचित किया था, जो 'महा सम्मत' कहलाता था, वह राज एवं पिता के समान, बका परिपालक था। सर्वास्तिवादी 'विनयपिटक' में कहा गया है कि उस राजा ने मथुरा के पास अपना सर्वप्रथम राज्य स्थापित किया था। इस प्रकार बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार भी मथुरा इस भू-तल का आदि राज्य है। १ जिस समय भगवान बुद्ध मथुरा पधारे, तव उन्होंने अपने शिष्य आनन्द से कहा था कि यह आदि राज्य है जिसने अपने राजा चुना था। २ पालि साहित्य के प्रचीनतम ग्रन्थ 'अगुन्तर निकाय' निकाय में भगवान बुद्ध से पहिले के जिन १६ महा जनपदों का नामोल्लेख मिलता है, उनमें पहिला नाम शूरसेन जनपद का है। इस प्रकार बौद्ध धर्म के साहित्य में भी ब्रज की प्रागैतिहासिक परम्परा के उल्लेख प्राप्त होते हैं। स्वयं बुद्ध मथुरा पधारे थे। मथुरा से वे व्रज में स्थित वैरंजा नगर में वापिस होकर वहां वर्षावास किया था।

सन्दर्भ[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]