ओल्ड मैंज़ होप

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(बूढ़े की आशा से अनुप्रेषित)
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ऐलन ओक्टेवियन ह्यूम (1829-1912) ने ओल्ड मैंज़ होप कविता सबसे पहले सन् 1886 में छापी।

ओल्ड मैंज़ होप (अंग्रेज़ी: Old Man's Hope, बूढ़े की आशा) ऐलन ओक्टेवियन ह्यूम द्वारा लिखी गई एक कविता है जिसमें उन्होंने भारत के युवकों को उठकर अपने राष्ट्र में स्वशासन के लिए प्रेरित करने की कोशिश की। ह्यूम ने यह उसी दौर में लिखी जब वे भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की नीव डाल रहे थे।[1][2]

कविता[संपादित करें]

कविता की पंक्तियाँ इस प्रकार हैं[3][4] -

अंग्रेज़ी लिप्यन्तरण हिन्दी अनुवाद

Sons of Ind, why sit ye idle,
Wait ye for some Deva's aid?
Buckle to, be up and doing!
Nations by themselves are made!

Yours the land, lives, all, at stake, tho
Not by you the cards are played;
Are ye dumb? Speak up and claim them!
By themselves are nations made!

What avail your wealth, your learning,
Empty titles, sordid trade?
True self-rule were worth them all!
Nations by themselves are made!

Whispered murmurs darkly creeping,
Hidden worms beneath the glade,
Not by such shall wrong be righted!
Nations by themselves are made!

Are ye Serfs or are ye Freemen,
Ye that grovel in the shade?
In your own hands rest the issues!
By themselves are nations made!

Sons of Ind, be up and doing,
Let your course by none be stayed;
Lo! the Dawn is in the East;
By themselves are nations made!

संज़ ऑफ़ इन्ड, व्हाय सिट यी आइड्ल,
वेट यी फॉर सम देवाज़ एड?
बकल अप, बी अप ऐण्ड डूईन्ग!
नेशन्ज़ बाय दॅमसॅल्व्ज़ आर मेड!

यॉर्ज़ द लैण्ड, लाइव्ज़, ऑल, ऐट स्टेक, दो
नॉट बाय यू द कार्ड्ज़ आर प्लेड;
आर यी डम? स्पीक अप ऐण्ड क्लेम दॅम!
बाय दॅमसॅल्व्ज़ आर नेशन्ज़ मेड!

व्हॉट अवेल यॉर वॅल्थ़, यॉर लर्निन्ग?
ऍम्टी टाइटल्ज़, सॉर्डिड ट्रेड?
ट्रू सॅल्फ़-रूल वर वर्थ़ दॅम ऑल!
नेशन्ज़ बाय दॅमसॅल्व्ज़ आर मेड!

व्हिस्पर्ड मर्मर्ज़ डार्क्ली क्रीपिन्ग,
हिडन वर्म्ज़ बिनीथ़ द ग्लेड,
नॉट बाय सच शैल रॉन्ग बी राईटिड,
नेशन्ज़ बाय दॅमसॅल्व्ज़ आर मेड!

आर यी सर्फ़्स ऑर आर यी फ़्रीमॅन,
यी थ़ैट ग्रवल इन द शेड?
इन यॉर ओन हैन्ड्ज़ रॅस्ट द इशूज़!
बाय दॅमसॅल्व्ज़ आर नेशन्ज़ मेड!

संज़ ऑफ़ इन्ड, बी अप ऐण्ड डूईन्ग!
लॅट यॉर कोर्स बाय नन बी स्टेड;
लो! द डॉन इज़ इन दी ईस्ट;
बाय दॅमसॅल्व्ज़ आर नेशन्ज़ मेड!

हिंद के बेटों, हाथ धरे क्यों बैठे हो,
क्या किसी देवता की मदद का इंतज़ार कर रहे हो?
कमर कसो, उठो और जुट जाओ!
क़ौमें अपने भाग्य ख़ुद बनाती हैं!

तुम्हारी धरती, तुम्हारी ज़िंदगियाँ, सब दाव पर लगा है, लेकिन,
अपनी बाज़ी तुम ख़ुद नहीं खेल रहे;
क्या गूंगे हो? आवाज़ उठाओ और अपनी बाज़ी छीनो!
क़ौमें अपने भाग्य ख़ुद बनाती हैं!

तुम्हारी दौलत, तुम्हारी विद्या, किस काम की?
बेकार की उपाधियाँ, घिनौने सौदे?
सच्चा स्वराज्य इन सब से ज़्यादा क़ीमती है!
क़ौमें अपने भाग्य ख़ुद बनाती हैं!

अंधेरों में खुसर-फुसर करने वाले,
कीड़ों की तरह ज़मीन के नीचे छुपने वाले,
ऐसों से बिगड़ी कभी नहीं सँवरती!
क़ौमें अपने भाग्य ख़ुद बनाती हैं!

तुम गुलाम हो या तुम आज़ाद मर्द हो,
तुम जो परछाइयों में घुटनों पर चलते हो?
अपने मसलों का फैसला तुम्हारे अपने हाथों में है!
क़ौमें अपने भाग्य ख़ुद बनाती हैं!

हिंद के बेटों, उठो और जुट जाओ,
किसी को अपना रस्ता मत रोकने दो;
देखो! पूरब में पौ फट रही है;
क़ौमें अपने भाग्य ख़ुद बनाती हैं!

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Humanity: The Positivist Review", Watts, 1911.
  2. S.R. Mehrotra, "Towards India's Freedom and Partition", Vikas Publishing House, 1978, ISBN 0-7069-0712-4.
  3. Amvika Charan Mazumdar, "Indian National Evolution", Read Books, 2007, ISBN 1-4067-1210-8.
  4. K. Vyasa Rao, "India's claim for home rule", Ganeshi & Co., 1917.