बुल्ला की जाना

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बुल्ला की जाना (पंजाबी: بُلھا کی جاڻا(शाहमुखी), ਬੁਲ੍ਹਾ ਕੀ ਜਾਣਾ (गुरुमुखी)) पंजाबी सूफी संत बुल्ले शाह द्वारा लिखित सबसे प्रसिद्ध काफ़ी कविताओं में से एक है।

1990 के दशक में पाकिस्तानी रॉक बैंड जुनून ने, "बुल्ला की जाना" को एक गीत का रूप दिया। 2005 में, रब्बी शेरगिल का रॉक संस्करण भारत और पाकिस्तान में बहुत लोकप्रिय हुआ।[1][2] भारत से एक पंजाबी सूफ़ी समूह, वडाली बंधुओं ने भी अपने एलबम आ मिल यार... कॉल ऑफ़ द बिलवेड में "बुल्ला की जाना" का एक संस्करण जारी किया है। एक और संस्करण लखविंदर वडाली द्वारा "बुल्ला" के नाम से प्रदर्शित किया गया। अपने पहले एल्बम "वज्ज" में अरीब अजहर ने भी इस कविता पर आधारित एक गीत जारी किया।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. ज़ीशान जावेद (4 जून 2005). "Soundscape for the soul". कोलकाता: द टेलीग्राफ. मूल से 1 दिसंबर 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2008-04-23.
  2. बागेश्री एस (26 मार्च 2005). "Urban balladeer". द हिन्दू. मूल से 16 अप्रैल 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2008-04-23.