बुरा

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बुरा हरियाणा में पायी जाने वाली एक जाट गोत्र है।[1]

अमृतमपत्रिका, gwalior से साभार.... कबीरदास जी लिखा है कि-

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय!

एक बात यह भी सही है कि-

बुरी है बुराई मेरे दोस्तों…

बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत करो।

बुरा नाम की हरियाणा राज्य में में पायी जाने वाली एक जाट गोत्र है।

फिर इतना भी याद रखें कि- अगर बुरे लोग की समझ आ जाती, तो बासुरी बजाने वाले, कभी महाभारत नहीं होने देता।

किसी ने कहा है कि-

जीवन में कभी किसी को कसूरवार न ठहराएं।

अच्छे लोग खुशियां लाते हैं, बुरे लोग तजुर्बा।।

कुछ बुरे लोग, बुरे वक्त में काम आते हैं।

फिर,

याददाश्त का कमजोर होना,

कोई बुरी बात नहीं है साहब।

बहुत बेचेंन रहते हैं, वे लोग,

जिन्हें हर बात याद रहती है।

भिण्ड मुरैना के लोग मजाकिया ज्यादा होते हैं वे, अक्सर व्यंग्य या तंज कसते हैं कि-

बुराई शब्द की उत्पत्ति बुर से हुई है। यानी स्त्रियों से हुई है। कहते हैं …

जबसे घर में बुर आई,

तब से होने लगी बुराई।

आयुर्वेद के अनुसार बुर, बूरा और बुरा ये तीनों चीजें स्वास्थ्य के लिए हनिदायक है।

बुर के कारण बुढ़ापा जल्दी आता है।

बूरा मधुमेह रोग देता है तथा बुरा करने, सोचने, सुनने से मानसिक अशांति बढ़ती है।

यह पूरा जबाब व्यंग्यात्मक है। दिल या दिमाग पर न लेवें।

अंत में बस इतना ही कहेंगे…

खुद महफूज रखे उन आंखों को फंगस से,

जिनमें आजकल हम चुभते बहुत हैं।

अतः तन-मन की तंदरुस्ती के लिए हर बुरी चीजों से बचें। कब किसको कैसी बुर मिले, कितना बुरा होगा अल्लाह भी नहीं जानता।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Jat Gotra ~ Jat Mahasabha". jatmahasabha.in. jatmahasabha.in. मूल से 3 अक्तूबर 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 18 अक्तूबर 2017.