बुन्देलखण्ड के दुष्यंत कुमार

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वीरेन्द्र खरे 'अकेला'(लेख-'अना' क़ासमी) शायरी की उम्रे-नाबालिग़ी में जब वीरेन्द्र खरे ‘अकेला’ का पहला ग़ज़ल संग्रह ‘शेष बची चौथाई रात’ मंज़रे-आम पर आया, तब उसे पढ़ कर लोगों ने जाना कि ‘अकेला’ के बारे में इस दौर के शहंशाहे-ग़ज़ल डॉ॰ बशीर बद्र का ये कहना वाक़ई सच है कि “ ‘अकेला’ की ग़ज़ल वो लहर है जो ग़ज़ल के समुन्दर में नई हलचल पैदा करेगी” और जनाब के बारे में हिन्दी गीत सम्राट डॉ॰ गोपालदास ‘नीरज’ की ये राय भी अविश्वसनीय नहीं है कि “ इन दिनों हिन्दी में ग़ज़लों की बाढ़ आई हुई है जिसके कारण ग़ज़ल के नाम पर बहुत कुछ कूड़ा-करकट इकट्ठा हो रहा है। हिन्दी के अधिकांश ग़ज़लकारों को न तो ग़ज़ल के मुहावरे का ज्ञान है न उसकी आत्मा से परिचय। लेकिन ‘अकेला’ अपवाद हैं। उनकी ग़ज़लों में भरपूर शेरीयत और तग़ज़्जुल है। छोटी बड़ी सभी प्रकार की बहरों में उन्होंने नये नये प्रयोग किये हैं और वे खूब सफल भी हुए हैं। उनके शेरों में यह ख़ूबी है कि वे ख़ुद-ब-ख़ुद होठों पर आ जाते हैं। ” शायरी वो नहीं जो काग़ज़ का सीना सियाह कर दे। शायरी वो है जो एहसास की नर्मो-नाजुक उंगलियों से दिल की गहराई में लफ़्ज़ों की टीस उकेर दे और ऐसे शायर को उसकी किताबें नहीं बल्कि वो शेर ज़िन्दा रखते हैं जो लोगों की जुबान की ख़ुश्बू बन कर ज़हनो-दिल पर ज़रूर नक्श हो गये हैं। यही वजह है कि उनके शेर कहीं भी किसी की भी ज़ुबानी सुनने को मिल जाते हैं।

‘अकेला’ जी ने ग़ज़लें, गीत, मुक्तक, छन्द, दोहे और आज़ाद नज़्में, हर विधा में अपनी सलाहियत के जौहर दिखाए हैं। सबसे पहले मैं उनकी ग़ज़ल का तअ़र्रूफ़ कराता हूँ।

ग़ज़ल एक ऐसी विधा है जिसमें शायर अपने दिल की बात अपनी शायरी की ज़बान में कम से कम लफ़्ज़ों में जितने प्रभावशाली तरीक़े से कह लेता है उतना शायरी की किसी और विधा में मुमकिन नहीं। यानी एक ग़ज़ल में अगर सात शेर हैं तो उसमें अलग अलग सात मज़मून हैं, सात अलग अलग भावनाएँ हैं और उस पर भी शायर की कोशिश ये है कि हर मज़मून की तह तक उतरने की कोशिश करे और अपने हर मज़मून के साथ सामयीन को जोड़ने की पूरी कोशिश करे।

एक ज़माने में ग़ज़ल फ़ारसी वालों की मीरास मानी जाती थी जिसका मक़ान बादशाहों और नवाबों के दरबार हुआ करते थे। जिसका कुल सरमाया हुस्नो-इश्क़ और नाज़ुक मिज़ाजी ही हुआ करता था। फ़ारसी से उर्दू तक इस ग़ज़ल को आने में जिन जिन रास्तों से गुज़रना पड़ा ठीक वही रास्ते हिन्दी ग़ज़ल को उर्दू ग़ज़ल से रास्ता तय करके अपने मक़ाम तक आने में दरपेश आये।

हर अच्छी चीज़ किसी की मीरास (विरासत) नहीं होती। आखि़र ग़ज़ल की इतनी अच्छी विधा को बादशाहों और नवाबों के महल कहाँ तक बाँध पाते। ग़ज़ल की ये विधा जब ऐवानों से निकल कर दिल्ली की सड़कों पर आयी तो इसने वहाँ के लोगों की अपनी आम ज़बान को अपनाया।

अब ऐसे ख़ास मोड़ का बयान करना यहाँ बहुत ज़रूरी है कि क्या वो तमाम शायर जो फ़ारसी से हट कर ग़ज़ल कह रहे थे उन सभी के नामों से हम वाक़िफ़ है? नहीं, उनमें से आज जो नाम बाक़ी हैं ये सिर्फ़ उन शायरों के नाम बाक़ी हैं जिन्होंने बेसमझे-बूझे शायरी नहीं की थी, बल्कि ये वो लोग हैं जो फ़ारसी से, फ़ारसी ग़ज़ल के लबो-लहजे, उसके औज़ान और उसकी तमाम नज़ाक़तों से वाक़िफ़ थे और ऐसे लोगों ने जब फ़ारसी से हट कर उस दौर की अवाम की लश्करी ज़बान उर्दू में शायरी की तो वो फ़ारसी ग़ज़ल का पूरा रंग उर्दू ग़ज़ल में भरने में कामयाब हुए और जब फ़ारसी दाँ तबक़े ने उस उर्दू ग़ज़ल को सुना और पढ़ा तो उसे कहना पड़ा कि हाँ वाक़ई ये ग़ज़ल है। सिर्फ़ लफ़्ज़ बदले हैं ग़ज़ल की आत्मा नहीं बदली। जब तक उर्दू ग़ज़ल ने अपने आप को फ़ारसी ग़ज़ल की कसौटी पर नहीं रखा तब तक उर्दू के ये दो दो मिसरे ग़ज़ल के मक़ाम तक नहीं पहुंचे।

ये बात बिलकुल समझ में आने वाली है कि अगर किसी भी ज़बान का शायर दोहा या कोई सवैया लिखे तो उसे पैमाना हिन्दी विधा के दोहे या सवैये को ही बनाना पड़ेगा। उसकी नाप-तौल भी उसी पैमाने पर होगी और अगर ऐसा नहीं है तो किसी को हरगिज़ ये हक़ हासिल नहीं कि वो अपने हिसाब से कोई भी पैमाना मुक़र्रर कर ले और उसे दोहा या सवैया का नाम दे दे। फ़ारसी दाँ लोगों ने उस दौर में उर्दू ग़ज़ल को जो नकारा था, उसकी अस्ल वजह यही थी और आज भी जो लोग हिन्दी ग़ज़ल को ग़ज़ल नहीं मानते उसकी भी अस्ल वजह यही है। हिन्दी के ज़्यादातर ग़जलकार जो उर्दू की औज़ाने-शायरी से वाक़िफ़ नहीं हैं उन्होंने जब ग़ज़ल लिखी तो वो ग़ज़ल की कसौटी पर खरी नहीं उतरी और उसे ग़ज़ल नहीं स्वीकारा गया। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी आये जो ग़ालिबो-मीर की ज़बान से वाक़िफ़ थे, ग़ज़ल जिनकी आत्मा में सरायत थी, जो अमीर खुसरो से लेकर बशीर बद्र तक के ग़ज़ल के सफ़र से वाक़िफ़ थे और इसके साथ ही हिन्दी भाषा पर भी उनका अधिकार था। ऐसे कुछ लोगों ने जब यही दो दो मिसरों वाली हिन्दी शायरी की तो उर्दू वाले भी चौंक गए और उन्होने कहा कि ये तो ग़ज़ल है। ऐसे शुरू हुई हिन्दी ग़ज़ल; फ़ारसी से उर्दू की तरह-उर्दू से हिन्दी ग़ज़ल का ये मोड़ बहुत ज़रूरी था क्योंकि आज की अवामी ज़बान वालों को ख़ालिस उर्दू समझ में आना मुमकिन नहीं। ज़रूरत खुद अपने रास्ते बना लेती है और इस रास्ते के खूबसूरत मोड़ पर जो चंद लोग खड़े हैं, जिनकी शायरी के आधार पर आने वाले साहित्यिक नस्लें हिन्दी ग़ज़ल का अपना पैमाना बनाएंगी उनमें एक नाम वीरेन्द्र खरे ‘अकेला’ का भी है। अब ज़रा देखें उर्दू ग़ज़ल के नशेबो-फ़राज़ ‘अकेला’ साहब की हिन्दी ग़ज़ल में -

कहाँ खुश देख पाती है किसी को भी कभी दुनिया सुकूँ में देखकर हमको न कर ले खुदकुशी दुनिया जो पैसा हो, तो सब अपने न हो तो सब पराये हैं ज़रा सी उम्र में ही मैंने यारो देख ली दुनिया • * * * * * * * ये घातों पर घातें देखो/क़िस्मत की सौगातें देखो धरती को जन्नत कर देंगे/मक्कारों की बातें देखो

उर्दू से हिन्दी ग़ज़ल के जिस खूबसूरत मोड़ पर ‘अकेला’ खड़े हैं सिर्फ़ यही बात उनके नाम को सदियों ज़िन्दा रखने के लिए काफ़ी है, मगर इनके इस बस्फ़ के साथ एक और जो सिफ़त मौजूद है कि वो अपने दौर के तमाम हालात को इतने क़रीब से देख रहे हैं जैसे आज का युग उन्हें घूर रहा हो और वो खडे़ उसे आँख दिखा रहे हों। ‘अकेला’ साहब शायरी के साथ तकल्लुफ़ात नहीं बरतते बल्कि हर वो सच्ची बात जे़रे-क़लम ले आते हैं जो आज के समाज की सही मंज़रकशी कर सके। कुछ उदाहरण देखें-

रिश्ते आते कहाँ हैं उसके लिए लड़का अच्छा है पर कमाता नहीं • * * * * * जा गवाहों पे कुछ खर्च कर और बेदाग़ हो जा बरी एक कथरी मयस्सर है बस वो ही चादर है वो ही दरी • * * * * * अरे चूहे तू दावे लाख कर लेकिन यही सच है गले में बिल्लियों के घंटियाँ पहना नहीं सकता • * * * * * * * जनता की तक़लीफ़ें सुनने का ये ढंग निराला है देखो बैठे हैं साहब जी रूई ठूंसे कान में • * * * * * * * इन तमाम शरों में आज शेरों में आज की कड़वी सच्चाईयों को बेलाग तरीक़े से कहा गया है। इन इज़ाफी खुसूसियात के अलावा भी वीरेन्द्र खरे 'अकेला' की ग़ज़लों में कई और ऐसे पहलू हैं जो दिल को टटोलते हैं, कभी आँखों को नम करते हैं, कभी लबों पर मुस्कान लाते हैं, कभी दिमाग़ को झिझोड़ते हैं तो कभी पीठ पर थपकियाँ देकर हौसला बँधाते हैं।

ये एक मुख़्तसर सा तअ़र्रूफ़ था ‘अकेला’ की ग़ज़लों का। ‘अकेला’ ने सिर्फ़ ग़ज़लें ही नहीं कहीं बल्कि मौजूदा दौर की हिन्दी शायरी की तमाम विधाओं पर तबा आज़माई की है और एक मजे हुए खिलाड़ी की तरह अपने क़लम के जौहर साहित्य के हर मैदान में दिखाए हैं। यूँ लगता है जैसे अल्फ़ाज़, अहसास, शऊर और इनके साथ लफ़्ज़ों के खेल पर ‘अकेला’ जी को पूरी तरह दस्तरस हासिल है। उन्होंने जिस विधा को भी छुआ उसे पाया-ए-तकमील तक पहुँचाया। ‘अकेला' के गीत और आज़ाद नज़्में इस बात की पुख़्ता गवाह हैं। ‘अकेला' के गीतों और आज़ाद नज़्मों में सच्चाई का एक ऐसा अक्स देखने को मिलता है जो हालात और समाज पर कभी तीखे और कभी नर्म तंज़ (व्यंग्य) से पुर होता है। यही वजह है कि हर शख़्स उन्हें पढ़कर सोचने पर मजबूर हो जाता है शायद इसी लिए आज ‘अकेला’ के गीत और कविताएँ हज़ारों दिलों की धड़कन बन गये हैं। गीत और आज़ाद नज़्म से एक उदाहरण देखें- भीष्म पितामह नित्य प्रतिज्ञाएँ करते हैं भंग धर्मराज अक्सर दिखाई देते अधर्म के संग विदुर नीति को त्याग सदा चलते अनीति की चाल कर्ण महादानी हड़पा करते औरों का माल

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हमारे पाठ्यक्रम में/शामिल है/ एक बहुत छोटा सा पाठ कोमलता पर/ और चलती है/ एक पूरी किताब/ निष्ठुरता सिखाने वाली/

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि ‘अकेला’ को ग़ज़लों की तरह गीतों और आज़ाद नज़्मों की ज़मीन पर भी मलका हासिल है। अस्ल बात ये है जैसा कि इक़बाल ने कहा है-“दिल से जो बात निकलती है असर रखती है।” ‘अकेला’ एक सच्चा आदमी है वो कुछ भी सोचता, बोलता और लिखता पूरी सच्चाई के साथ है और सच बात अपना एक असर छोड़ती है। अब ये सच्चाई चाहे एक ग़रीब आदमी की रोज़ी रोटी जुटाने के लिए दर दर भटकने की हो, चाहे राजनेताओं के पाखण्डों के खि़लाफ़ हो या फिर मौजूदा चौपट व्यवस्था को बदलने की कोशिशों की शक्ल में हो। बहरहाल सच्चाई अपनी रोशनी छोड़ कर ही जाती है और इसी सच्चाई की मौजूदगी ने ‘अकेला’ की शायरी को एक ऐसी जगमगाहट दी है जो लोगों को बरबस अपनी ओर खींचती है। राजनेताओं के तथाकथित बड़प्पन की ये सच्चाई क्या खूब है- “आत्मकथ्य ऊँचे हैं बोनी करनी है/ऐसे में कुछ हालत कहाँ सुधरनी है। प्रभु को है परहेज़ चरण-रज देने में/कहिये फिर किस तरह अहिल्या तरनी है। चलनी में जल भरने का प्रहसन जारी/ ये दुखड़े प्रतिबंधित होंगे तो कैसे। सच्चाई का ये बयाँ भी कम नहीं है- दो धन दो को चार सिद्ध करते रह गए अभागे सात पे नौ उनहत्तर जिनने बाँचा वो हैं आगे विद्या नई, पुरानी विद्याओं से है कुछ हट के

‘अकेला’ की रचनाओं की मक़बूलियत का राज़ एक और भी है और वो ये है कि उनकी रचनाओं को न तो आजकल के काव्य मंचों की फूहड़ता का रोग लग पाया है और न तथाकथित शुद्ध साहित्यिक खेमे की अति बौद्धिकता ही उन पर हावी हो पायी है। उन्होंने कविता को उसके स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत करके उसे दुर्लभ प्रजाति का जीव होने से बचा लिया है। आप सभी जानते हैं कि आजकल हिन्दी कविता एक ऐसे दुर्दशा के दौर से गुज़र रही है जैसे कोई शहज़ादी किसी जंगल में अपना रास्ता भटक गई हो। एक तरफ़ तो मंच की वो शायरी है जिसे साहित्य से कुछ लेना देना नहीं है। जो भद्दे चुटकुलों और स्तरहीन रचनाओं के ज़रिये पब्लिक को बेवकूफ़ बना कर पैसा बटोरने की होड़ में जुटी है जैसा कि ख़ुद ‘अकेला’ ने कहा है-“ बेतुके भद्दे लतीफ़े, कर्णप्रिय तुकबंदियाँ/मंचवालों की नज़र में शायरी इतनी ही थी।” और दूसरी तरफ़ शुद्ध साहित्य के नाम पर उन रचनाकारों की रचनाएँ हैं जिन्हें हल करने में हमारी डिक्शनरियाँ ही ओछी पड़ जायें या जिनके शब्द तो सब समझ में आयें मगर अर्थ निकालने में पसीना मार जाये। ऐसे में ‘अकेला’ ने जिस सधे हुए ज़हन के साथ जनता की बात जनता की ज़बान में पूरी काव्यात्मकता का निर्वाह करते हुए जिस तरीक़े से क़लमबंद की है, वही उनकी ख़ासियत बन गयी। और यही कारण है कि ‘अकेला’ की शायरी को साहित्यिक गोष्ठियों और मंचों पर एक जैसी मक़बूलियत हासिल हो रही है। जहाँ कहीं भी मंच पर ‘अकेला’ जाते हैं तो बस छा जाते हैं और इस बात को साबित कर देते हैं कि अच्छी शायरी भी मंच पर सुनी जाती है। ये अलग बात है कि वो मंचों पर कम दिखाई देते हैं। दरअसल मंचों का अपना एक सिस्टम है- ‘गिव इन टेक’ का सिस्टम कि अगर किसी कवि को मंचों तक जाना है तो पहले उसे कोई मंच डालना होगा, फिर वो जिन कवियों को बुलाएगा, बदले में वो कवि उसे बुला लेंगे और जो पेमेण्ट वो उन्हें देगा वही पेमेण्ट उसे बुलाकर लौटा दिया जायेगा। इतना हाथ घुमा कर कान पकड़ने की ‘अकेला’ में सलाहियत ही नहीं।

‘अकेला’ की आज़ाद नज़्में भी बहुत अच्छी हैं आज़ाद नज़्में लिखना बड़ा मुश्किल फ़न है। ये और बात कि आजकल लोगों ने इसे शॉर्टकट मान लिया है और आज़ाद कविता करने वालों की एक बड़ी भीड़ जमा हो गयी है। इनमें कुछ तो वो हैं जो छन्दबद्ध लिखने में नाकामी के बाद छन्द मुक्त पर उतर आये और कुछ वो हैं जिन्हें कवि बन कर बुद्धिजीवी कहलाने का शौक़ चढ़ा तो इस विधा का सहारा ले लिया और समझा चलो अच्छा है कि इसमें न रूल्स हैं न रेग्यूलेशन, फ्री स्टाइल गेम है। पर ऐसा नहीं है। छन्द मुक्त रचनाएँ वही बेहतर लिख सकता है जिसे छन्दबद्ध रचनाओं पर उबूर हासिल हो। ठीक उसी तरह जैसे एक अच्छा ड्राइवर जो भरे रोड पर कुशलता पूर्वक गाड़ी चलाना जानता हो और ट्राफिक के तमाम नियमों का पालन करता हो, अगर उसे कभी खेतों, खलिहानों, पगडंडियों, पहाड़ियों पर गाड़ी दौड़ाना पड़ जाये तो बेहतर तरीके़ से अपने ड्राइविंग के फ़न को आज़माते हुए इस तरह गाड़ी दौड़ायेगा कि गाड़ी की दुर्दशा न हो, दुर्घटना में हाथ-पैर न टूटें और सही सलामत मंज़िल को भी पहुँचा जा सके। ‘अकेला’ शायरी के ट्राफिक के पूरे रूल से वाक़िफ़ हैं। इनके क़लम की गाड़ी लाल, हरी, पीली बत्ती देखकर जिस तरह चलती है उसी तरह जंगलों और रेगज़ारों में भी इनके हाथ बहकते नहीं। इन पर बशीर बद्र का ये शेर पूरी तरह खरा उतरता है कि- “ हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जायेगा।”

भाई वीरेन्द्र खरे ने जब अपना तख़ल्लुस ‘अकेला’ रखा होगा तब न जाने क्या ख़्याल इनके ज़हन में रहा होगा। भले ही उनका ये सफ़र कभी अकेले ही शुरू हुआ हो लेकिन आज लोगों ने इस ‘अकेला’ को अकेला नहीं रहने दिया बल्कि एक भीड़ उसके साथ है। ‘अकेला’ के लिए ये कहना हक़-ब-जानिब होगा कि- “ मैं अकेला ही चला था जानिबे-मंज़िल मगर लोग साथ आते गये और कारवाँ बनता गया।” मेरी दुआ है कि अल्लाह वीरेन्द्र खरे ‘अकेला’ के क़लम को और भी तक़वीयत (सामर्थ्य) अता करे और ये क़लम के ऐसे धनी बनें कि सदियों इन्हें याद रखा जाये।

'अना' क़ासमी हिन्दी ग़ज़ल और गीत के क्षेत्र में युवा कवि वीरेन्द्र खरे ‘अकेला’ का नाम बहुत जाना पहचाना है। बुन्देलखण्ड में दूसरे दुष्यन्त कुमार कहे जाने वाले ‘अकेला’ ने अपनी मूल छवि के अनुरूप आम लोगों के दुख-दर्दों को समर्थ वाणी देने वाली हिन्दी ग़ज़लें कह कर दुष्यन्त कुमार की ग़ज़ल परम्परा को तो आगे बढ़ाया ही है साथ ही उन्होंने पारम्परिक हिन्दी गीत विधा को कथ्य और शिल्प की दृष्टि से एक नवीन सर्वग्राही रूप प्रदान करने का सराहनीय कार्य भी किया है। ‘अकेला’ की यह दूसरी कृति उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा को और पुख़्तगी देगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

-डॉ॰ गंगा प्रसाद बरसैंया