बुटाटी धाम

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बुटाटी धाम , राजस्थान में नागौर से 50 किलोमीटर दूर अजमेर-नागौर मार्ग पर कुचेरा क़स्बे के पास स्थित है। इसे यहाँ 'चतुरदास जी महाराज के मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर वस्तुतः चतुरदास जी की समाधि है।

इतिहास[संपादित करें]

मान्यता है कि लगभग पांच सौ साल पहले संत चतुरदास जी का यहाँ पर निवास था। चारण कुल में जन्में वे एक महान सिद्ध योगी थे और अपनी सिद्धियों से लकवा के रोगियों को रोगमुक्त कर देते थे। आज भी लोग लकवा से मुक्त होने के लिए इनकी समाधी पर सात फेरी लगाते हैं। यहाँ पर देश भर से प्रतिवर्ष लाखों लकवा मरीज एवं अन्य श्रद्धालु विशेष रूप से एकादशी एवं द्वादशी के दिन आते है।

जेनिफर क्राफ्ट अमेरिकन मीडिया और सोशल मीडिया से बुटाटी धाम की जानकारी मिली[संपादित करें]

बुटाटी धाम के चमत्कार की बात सुनकर विश्व की महाशक्ति अमरीका के शिकागो से लकवाग्रस्त ! (पैरालिसिस) से पीडि़त जेनिफर क्राफ्ट भी परिक्रमा लगाने बुटाटी मन्दिर आई !

जेनिफर क्राफ्ट ने बताया कि मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें बुटाटी धाम के चमत्कार के बारे में पता चला ! और बिना कोई देरी किये अमेरीका से भारत चली आई ! जेनिफर क्राफ्ट “के साथ दिल्ली से आए आशुतोष शर्मा ने बताया कि क्राफ्ट का 2014 में मोटरसाइकिल से एक्सीडेंट हो गया था ! तब से रीढ की हड्डी में चोट लगने के कारण इनका कमर से नीचे का भाग बिल्कुल हिल ही नहीं पा रहा !

बुटाटी धाम के बारे में सुनने के बाद से ही वह यहां आने की जिद कर रही थी इसलिए उन्हें यहां बुटाटी धाम लाया गया ! और जेनिफर क्राफ्ट चतुर दास जी के चमत्कार के परिणाम स्वरूप यहां से तैयार होकर गई ! इस चमत्कार को देखकर अमेरिका के भी लोग मानने लगे हैं कि भारत में एक ऐसा मंदिर है ! जहां पैरालाइसिस यानी लकवा रोग का इलाज होता है !

बुटाटी धाम में  हर वर्ष एकादशी को वैशाख, भादवा और माघ महीने में मेला लगता जहां लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रहती है या देश विदेश से अनेक श्रद्धालु आते हैं और चतुरदास जी महाराज के सामने नतमस्तक होकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करते हैं

उत्सव[संपादित करें]

यहाँ हर माह की शुक्ल पक्ष की द्वादशी को मेला लगता है। इसके अतिरिक्त वैशाख , भादो और माघ महीने में पूरे महीने के विशेष मेलों का आयोजन होता है।

सप्त परिक्रमा[संपादित करें]

यह मंदिर सप्त परिक्रमा द्वारा लकवा के रोग से मुक्त कराने के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ लकवा के मरीजों को सात दिन का प्रवास करते हुए रोज एक परिक्रमा लगानी होती है। सुबह की आरती के बाद पहली परिक्रमा मंदिर के बाहर तथा शाम की आरती के बाद दूसरी परिक्रमा मंदिर के अन्दर लगानी होती है। ये दोनों परिक्रमा मिलकर पूरी एक परिक्रमा कहलाती है। सात दिन तक मरीज को इसी प्रकार परिक्रमा लगानी होती है

यहाँ मरीज के परिजन नियमित लगातार 7 मन्दिर की परिक्रमा लगवाते हैं- हवन कुण्ड की भभूति लगाते हैं और बीमारी धीरे-धीरे अपना प्रभाव कम कर देती है। शरीर के अंग जो हिलते डुलते नहीं हैं वह धीरे-धीरे काम करने लगते हैं।

बुटाटी की स्थापना 1600 ई की शुरूआत में की गई पैराणिक कथा बुजुर्गो के अनुसार बुरा लाल शर्मा (दायमा) नामक बाह्मण ने बुटाटी की स्थापना की उसी के नाम पर बुटाटी का नामाकरण हुआ इसके बाद बुटाटी पर राजपुतो का अधिकार हो गया। बुटाटी पर भौम सिंह नामक राजपुत ठाकुर साहब ने इस पर अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया उसके बाद बुटाटी नये नाम भौम सिंह जी की बुटाटी के नाम से जानी जाने लगी !

ग्राम में पश्चिम दिशा की ओर संत श्री चतुरदास जी महाराज का मंदिर है यह मंदिर आस्था का प्रमुख केन्द्र है इस मंदिर में लकवा पिडीत व्यक्ति मात्र सात परिक्रमा में एकदम स्वस्थ हो जाता है

भवन और सुविधाएं[संपादित करें]

इस मंदिर परिसर के चारों ओर चार दिवारी व दरवाजे बने हुए है-। मंदिर के बाहर से आने वाले यात्रीयों के लिए बिस्तर,भोजन पीने के लिए ठण्डा पानी, खाना बनाने के लिए समान व बर्तन, जलाने के लिए लकङी सात दिन रूकने के लिए कमरे आदि व्यवस्थाएं निःशुल्क होती है

नहाने धोने के लिए मंदिर परिसर में उचित व्यवस्था है- यहां एक सुलभ शौचालय भी बना हुआ है। मंदिर परिसर में पानी की एक बड़ी टंकी तथा पानी ठंडा करने के लिए जगह-जगह ठंडे पानी की मशीने लगी है। मंदिर परिसर की बहार की ओर लगभग 100 दुकानें है निवास के लिए यहाँ सुविधा युक्त धर्मशालाएं हैं यात्रियों को जरुरत का सभी सामान बिस्तर , राशन , बर्तन, जलावन की लकड़ियाँ आदि निःशुल्क उपलब्ध करवाई जाती हैं।

मंदिर समिति[संपादित करें]

मंदिर की व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने का दायित्व मंदिर ट्रस्ट का है इसके लिए एक समिति है जिसमें एक अध्यक्ष सहित ५० सदस्य हैं।

संदर्भ[संपादित करें]