बुक ऑफ डॉक्यूमेंट्स
| मूल शीर्षक | 書經 / 尚書 |
|---|---|
| भाषा | प्राचीन चीनी (शास्त्रीय चीनी) |
| विषय | चीनी इतिहास, राजनीतिक दर्शन, और कन्फ्यूशीवाद |
| शैली | ऐतिहासिक दस्तावेज़ / क्लासिक साहित्य |
| प्रकाशन तिथि | संकलन का काल: लगभग 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी ईसा पूर्व |
| प्रकाशन स्थान | प्राचीन चीन |
दस्तावेज़ों की पुस्तक (अंग्रेज़ी: Book of Documents), जिसे चीनी भाषा में शूजिंग, शांगशू या इतिहास का क्लासिक कहा जाता है, प्राचीन चीन के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथों में से एक है। यह 'कन्फ्यूशीवाद' के उन प्रसिद्ध 'पाँच क्लासिक्स' का एक प्रमुख हिस्सा है, जिनका अध्ययन सदियों तक चीनी शाही परीक्षाओं के लिए अनिवार्य था। इस ग्रंथ में मुख्य रूप से प्राचीन चीनी राजाओं, सम्राटों और मंत्रियों के भाषण, घोषणाएँ, शासनादेश और संवाद संकलित हैं। पारंपरिक चीनी मान्यताओं के अनुसार, इस विशाल ग्रंथ का संपादन और संकलन स्वयं महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने किया था।[1][2]
संरचना और विषयवस्तु
[संपादित करें]यह ग्रंथ मुख्य रूप से चार ऐतिहासिक कालखंडों में विभाजित है, जो प्राचीन चीन के प्रारंभिक राजवंशों के इतिहास को दर्शाते हैं:
- यू शू: इसमें चीन के पौराणिक और आदर्श 'ऋषि राजाओं' जैसे सम्राट याओ और शुन के नैतिक शासन का वर्णन है।
- ज़िया शू: यह चीन के पहले माने जाने वाले 'ज़िया राजवंश' के शासकों और 'महान यू' द्वारा बाढ़ को नियंत्रित करने के कार्यों का विवरण देता है।
- शांग शू: इसमें शांग राजवंश (लगभग 1600–1046 ईसा पूर्व) के उद्भव और पतन की घोषणाएँ शामिल हैं।
- झोउ शू: यह ग्रंथ का सबसे बड़ा और सबसे प्रामाणिक हिस्सा है, जो झोउ राजवंश के प्रारंभिक राजाओं (जैसे राजा वेन और राजा वू) के भाषणों और राजनीतिक विज़न को प्रस्तुत करता है।[3][4]
'स्वर्ग का जनादेश'
[संपादित करें]राजनीतिक दर्शन के दृष्टिकोण से इस पुस्तक का सबसे बड़ा योगदान स्वर्ग का जनादेश (चीनी: तियानमिंग) का सिद्धांत है। झोउ शासकों ने शांग राजवंश को उखाड़ फेंकने के अपने कृत्य को वैध ठहराने के लिए इसी ग्रंथ में यह तर्क दिया था कि "स्वर्ग (ईश्वर या सर्वोच्च प्रकृति) केवल उसी शासक को शासन करने का अधिकार देता है जो नैतिक, न्यायपूर्ण और प्रजा के प्रति दयालु हो।"
यदि कोई राजा अत्याचारी या भ्रष्ट हो जाता है, तो स्वर्ग अपना 'जनादेश' वापस ले लेता है और किसी अन्य योग्य व्यक्ति को सत्ता सौंप देता है। इस सिद्धांत ने अगले दो हज़ार वर्षों तक चीनी शासन प्रणाली और विद्रोहों के लिए वैचारिक और कानूनी आधार प्रदान किया।[5]
पाठ्य इतिहास और 'पांडुलिपि विवाद'
[संपादित करें]'दस्तावेज़ों की पुस्तक' का पाठ्य इतिहास चीन के इतिहास में सबसे जटिल और विवादास्पद विषयों में से एक है। 213 ईसा पूर्व में जब किन शी हुआंग ने 'पुस्तकों का दहन' का आदेश दिया, तो इस ग्रंथ की अधिकांश प्रतियाँ नष्ट हो गईं।
बाद में हान राजवंश के दौरान, फू शेंग नामक एक वृद्ध विद्वान ने अपनी स्मृति से इसके 29 अध्यायों को पुनर्जीवित किया, जिसे न्यू टेक्स्ट कहा गया। कुछ समय बाद, कन्फ्यूशियस के पैतृक घर की एक दीवार के भीतर से एक और पांडुलिपि मिलने का दावा किया गया, जिसे ओल्ड टेक्स्ट का नाम दिया गया। सदियों तक इन दोनों को प्रामाणिक माना जाता रहा, लेकिन 17वीं शताब्दी (किंग राजवंश) में चीनी विद्वान यान रुओजू ने ऐतिहासिक और भाषाई प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध कर दिया कि 'ओल्ड टेक्स्ट' के अध्याय वास्तव में तीसरी या चौथी शताब्दी ईस्वी में रचे गए जाली दस्तावेज़ थे।[6]
ऐतिहासिक महत्व
[संपादित करें]कुछ अध्यायों के जाली साबित होने के बावजूद, 'दस्तावेज़ों की पुस्तक' का महत्व कम नहीं होता। यह न केवल प्राचीन चीनी भाषा और बयानबाज़ी का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि यह इस बात का भी प्रमाण है कि प्राचीन चीनी समाज किस प्रकार नैतिकता, सुशासन और ब्रह्मांडीय व्यवस्था को एक साथ जोड़कर देखता था।[7]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Nylan, Michael (2001). The Five "Confucian" Classics. Yale University Press. pp. 120–125. ISBN 978-0300081855.
- ↑ "First Research Results on Warring States Bamboo Strips Collected by Tsinghua University Released"
- ↑ Kern, Martin (2010). Early Chinese Literature, Beginnings through Western Han. Cambridge University Press. pp. 25–28. ISBN 978-0521851527.
- ↑ "Philosophy (i-li) versus philology (k'ao-cheng)—the jen-hsin Tao-hsin debate"
- ↑ Pines, Yuri (2002). Foundations of Confucian Thought: Intellectual Life in the Chunqiu Period, 722-453 B.C.E. University of Hawaii Press. pp. 58–61. ISBN 978-0824823962.
- ↑ Shaughnessy, Edward L. (2006). Rewriting Early Chinese Texts. State University of New York Press. pp. 45-48. ISBN 978-0791466445.
- ↑ Legge, James (1865). The Chinese Classics, Vol. III: The Shoo King or the Book of Historical Documents. Oxford University Press. pp. Prolegomena (1-10).