बुंदेलखंड का काव्य

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

छत्रसाल के समय में जहां बुन्देलखण्ड को "इत जमुना उत नर्मदा, इत चम्बल उत टोंस" से जाना जाता है, वहीं भौगोलिक दृष्टि जनजीवन, संस्कृति और भाषा के संदर्भ से बुन्देला क्षत्रियों के वैभवकाल से जोड़ा जाता है। बुन्देली इस भू-भाग की सबसे अधिक व्यवहार में आने वाली बोली है। विगत ७०० वर्षों से इसमें पर्याप्त साहित्य सृजन हुआ। बुन्देली काव्य के विभिन्न साधनाओं, जातियों और आदि का परिचय भी मिलता है। काव्रू का आधार इसीलिए बुन्देलखण्ड की नदियां, पर्वत और उसके वीरों को बनया गया है। विभिन्न प्रवृत्तियों और आन्दोलनों के आधार पर बुन्देलखण्ड काव्य के कुल सात युग माने जा सकते हैं, जिन्हें अध्ययन के सुविधा से निम्न नामों से अभिहित किया गया है।

१. भाषा काव्य आन्दोलन - नवीं शती विक्रमी से तेरहवीं शती तक २. कथा काव्य काल - तेरहवीं से सोलहवीं शदी विक्रमी तक ३. रीति भक्ति काव्य काल - सत्रहवीं शदी से सत्रहवीं शती विक्रमी तक। ४. सांस्कृतिक उन्मेष काल - सत्रहवीं शती से अट्ठाहरवीं शती विक्रमी तक। ५. श्रृंगार काव्य काल - अट्ठारहवीं शती से उन्नीस सौ पचास विक्रमी तक। ६. स्वतन्त्रता पूर्व आधुनिक - सम्वत् १९५० से २००० विक्रमी तक। ७. अत्याधुनिक काल - सम्वत् २००० से अब तक।

भाषा काव्य आन्दोलन काल[संपादित करें]

९वीं शती विक्रमी से १३वीं शती विक्रमी तक

छान्दस का संस्कृत में अपभ्रंशी के माध्यम से लोक भाषा में विकसित होना, एक घटना नहीं है, यह समय की आवश्यकता रही है। छान्दस, प्राकृत संस्कृत और अपभ्रंश के समीकरणों पर अनेक विचार दिए गए हैं। छठी शताब्दी में अपभ्रंश का प्रयोग भाषा के रूप में मिलता है। १२वीं शताब्दी तक वह साहित्यिक भाषा सी रही है पर जनपदीय बोलियों से यह भी मुक्त नहीं मानी गयी है। नव्य भारतीय आर्य भाषा का विकास मध्य देशीय शौरसेनी से माना गया है और अपभ्रंश के विकासोन्मुख रूप ग्रहण करते समय अवह की स्थिति मानी गयी। अवह का प्रयोग सबसे पहले अपभ्रंश के लिए हुआ है। अनेक जैन रचनाएं बौद्ध रचनाएं, नाथ पंथियों की रचनाएं आदि समाने आयी है। सिद्धों ने जिस भाषा का प्रयोग किया है वह लोक भाषा अधिक है। हिन्दी का प्रारंभिक नाम भाषा ही कहा गया है।

भाषा के स्वरुप में अनेक परिवर्तन एवं समृद्धियां आयीं। मौखिक परम्परा से भी काव्य सृजन हुआ। यह लोक काव्य तक ही सीमित रहा है। लिखित काव्यों में कथा काव्यों की भरमार रही है। इनमें प्रमुख कृति विष्णुदास लिखित रामायण कथा, महाभारत कथा, रुक्मिणी मंगल, स्वर्गारोहण कथा आदि ऐसी कृतियां है, जिनसे भाषा काव्य की परम्परा पर प्रकाश पड़ता है। भाषा काव्य के प्रारम्भिक चरण में जिस कृति को प्रस्तुत किया गया हैं वह स्थानीयता के प्रभावों से प्रायः मुक्त है। इसलिए किसी भी बोली से प्रारम्भिक रूप से मेल खाती, व्यापक भाषा का स्वरुप प्रस्तुत करती है।

मौखिक परम्परा के महाकाव्य आल्हाखण्ड का वैशिष्ट्य बुन्देली का अपना है। महोवा १२वीं शती तक कला केन्द्र तो रहा है जिसकी चर्चा इस प्रबन्ध काव्य में है। इसकी प्रामाणिकता के लिए न तो अन्तःसाक्ष्य ही उपादेय और न बर्हिसाक्ष्य। इतिहास में परमार्देदेव की कथा कुछ दूसरे ही रूप में है परन्तु आल्हा खण्ड का राजा परमाल एक वैभवशाली राजा है, आल्हा और ऊदल उसके सामन्त है। यह प्रबन्ध काव्य समस्त कमजोरियों के बावजूद बुन्देलों जन सामान्य की नीति और कर्तव्य का पाठ सिखाता है। बुन्देलखण्ड के प्रत्येक गांवों में घनघोर वर्षा के दिन आल्हा जमता है।

भरी दुपहरी सरवन गाइये, सोरठ गाइये आधी रात। आल्हा पवाड़ा वादिन गाइये, जा दिन झड़ी लगे दिन रात।।

आल्हा भले ही मौखिक परम्परा से आया है, पर बुन्देली भूमि संस्कृति और बोली का प्रथम महाकाव्य है, जगनिक इसके रचयिता है। भाषा काव्य में बुन्देली बोली का उत्तम महाकाव्य स्वीकार किया जाना चाहिए। बुन्देली बोली और उसके साहित्य का समृद्ध इतिहास है और भाषा काव्यकाल में उसकी कोई भी लिखित कृति उपलब्ध नहीं है।

कथा काव्य काल[संपादित करें]

१३वीं शती विक्रमी से १६वीं शती विक्रमी तक

कथा काव्य प्रबन्ध काव्य का ही एक भेद है जिसमें महाकाव्य के विधान की ही हर चीज होती है परन्तु कथा सहज प्रवाह युक्त बिना किसी गम्भीर गहन जीवन दर्शन के होती है। बुन्देलखण्ड में जगनिक के बाद विष्णुदास ही ऐसे कवि हैं जिन्होंने १४वीं शती में दो कथा काव्य महाभारत कथा और रामायण कथा लिखी। इन दोनों कथाओं का आधार कृष्ण कथा और रामकथा है पर उनके निर्वाह की शैली में संस्कृत कथा काव्यों और हिन्दी कथा काव्यों से भिन्नता है। यह बुन्देली के प्रथम ग्रन्थ है। बुन्देली ब्रज की सहोदरा दीर्घकाल तक मानी गयी है। जब तक उसका बुन्देली अस्मिता को बृज से आक्रान्त करने पर भी कोई क्षति नहीं पहुंची। बुन्देली माटी के कवि विष्णुदास की रचनाएं अनेक समय तक अज्ञात रहीं। जब बुन्देली पीठ सागर के प्रकाश में आयी तो उनमें बुन्देली का मार्दव, ओज लालित्य एवं संस्कृति मूर्तिमान दिखे।

कवि ने युग की चेतना को दोनों कथाओं के माध्यम से व्यक्त किया है और तत्कालीन परिस्थितियों पर प्रकाश डाला है। महाभारत की रचना का समय १४३५ ई. और रामायण कथा की रचना १४४३ ई. सिद्ध हो जाती है। भाषा की दृष्टि से विष्णुदास का काव्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बुन्देली कवियों ने जन भाषा में काव्य रचनाएं प्रस्तुत की। कथा काव्य शैली में दोहा, सोरठा, चौपाई और छन्दों का प्रयोग अधिक है। यही बाद में भक्ति काव्य की भूमि का कार्य करते हैं।

रीतिभक्ति काव्य काल[संपादित करें]

१६वीं शती विक्रमी से १७वीं विक्रमी तक

समाज में व्याप्त जड़ता उदासी और अकर्मण्यता के स्थान पर भक्ति की ओर प्रवृत्ति मिलती है। बुन्देलखण्ड में भक्ति की उस पावन धार के दर्शन नहीं होते जो बृज प्रदेश में प्रवाहित हुए। यहां सभी प्रकार की उपासनाओं का जोर रहा। गोस्वामी तुलसीदास भी इसी भू-भाग से जुड़े हुये थे। प्रसिद्ध कवि रहीम भी बुन्देलखण्ड की संस्कृति के प्रति श्रद्धावान थेा जो उनकी उक्ति

चित्रकूट में रम रहे रहिमन अवध नरेश। जा पर विपदा पड़त है सो आवत इहि देश।।

महाकवि बलभद्र मिश्र अत्यन्त प्रतिभाशाली कवि हैं। इनके प्रमुख ग्रन्थों में सिखनख, भाषा-भाष्य, बलभद्री व्याकरण, हनुमानाष्टक टीका, गोवर्द्धन सतसई अधिक चर्चित है। इनके समय तक ओरछा, पन्ना, छतरपुर, झांसी, टीकमगढ़, दतिया और सागर केन्द्र के रूप में उभरकर सामने आने लगे। महाकवि केशव के पूर्व महाराज मधुकर शाह, पंडित हरिराम व्यास आदि कवियों ने बुन्देली काव्यधारा में महत्वपूर्ण योगदान किया है। मधुकर शाह "टिकैत' बुन्देलखण्ड की रक्षा में ही प्रसिद्ध हुए। कवि देशभक्त और धर्म प्रवर के रूप में उनका स्मरण अब तक किया जाता है। पंडित हरिराम व्यास मधुकर शाह को दीक्षा देने वाले गुरु, एक संगीतज्ञ, भक्त और साधक के रूप में विख्यात हुए। उनकी रचनाओं में राग माली, व्यास वाणी, राग पर्यायाची आदि में बुन्देली और तथा रीति सावेत का अद्भुत समन्वय मिलता है।

केशवदास (सम्वत १६१२) इस काल के अन्यतम् कवि हैं। इनकी समस्त कवियों का आधार संस्कृत के ग्रंथ हैं पर कवि प्रिया, रसिक प्रिया, रामचन्द्रिका, वीरसिंहदेव चरित्र, विज्ञान गीता, रतन वादनी और जहाँगीर रसचन्द्रिका में कवि की व्यापक काव्य भाषा प्रयोगशीलता एवं बुन्देल भूमि की संस्कृति रीति रिवाज भाषागत प्रयोगों से केशव बुन्देली के ही प्रमुख कवि हैं। रीति और भक्ति का समन्वित रूप केशव काव्य में आद्योपान्त है। रीतिवादी कवि ने कविप्रिया, रसिकप्रिया में रीति तत्व तथा विज्ञान गीता एवं रामचन्द्रिका में भक्ति तत्व को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया है। आचार्य कवि केशवदास ने बुन्देली गारी (लोकगीत) को प्रमुखता से अपने काव्य में स्थान दिया और सवैया में इसी गारी'गीता को परिष्कृत रूप में रखा है। रामचन्द्रिका के सारे सम्वाद सवैयों में है ऐसी सम्बाद योजना दुर्लभ है। रामलीलाओं में केशव के संवादों का प्रयोग शताब्दियों से हो रहा है।

प्रवीण राय महाराज इन्द्रजीत सिंह के दरबार में थी। महाराज इन्द्रजीत स्वयं "धीरज नरेन्द्र" उपनाम से कविता करते थे। पं॰ गौरीशंकर द्विवेदी ने इनका समय सं. १६२० विक्रमी माना है। इन्हीं के समय में कल्याण मिश्र (विक्रमी सं.) १६३५ कवित्त लेखन में श्रेष्ठ माने गये हैं। ऐसे ही नाम बालकृष्ण मिश्र तथा गदाधर भ के माने गये हैं। बुन्देली के अनेक मुहावरों का प्रयोग बिहारी सतसई में मिलता है। बलभद्र मिश्र के पौत्र श्री शिवलाल मिश्र (सं. १६६०) ने ठेठ बुन्देली के क्रिया पदों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार स्वामी अग्रदास की कुण्डलियों में शत-प्रतिशत बुन्देली लोकोक्तियों को आधार बनाकर लोक संदेश दिया है। इसी काव्यधारा में सुन्दर दास का "सुन्दर श्रृंगार' परगणित किया जाता है। रीतिभक्ति काव्य में खेमदास रसिक सुवंश कायस्थ, पोहनदास मिश्र तथा ओरछा के अनेक कवियों का योगदान है। भक्ति काव्य बुन्देलखण्ड में पूरी समग्रता के साथ में आया। यहाँ के राजाओं ने उसे प्रोत्साहन दिया। अनेक रचनाएं आश्रयदाता की इच्छा के अनुसार मिलती है। रीति भक्ति काव्यकाल में प्रस्तुत की गयी प्रतियों में बुन्देली संस्कृति, भाषा और रीति तत्व की अभिव्यक्ति विशेष है। इसी काल के उपरान्त बुन्देली की रचनाओं में ठेठ स्थानीयता का प्रभाव दिखने लगता है।

[सांस्कृतिक उन्मेषकाल]

१७वीं विक्रमी से १८वीं विक्रमी

बुन्देलखण्ड में चम्पतराय के बाद छत्रसाल ने स्वातन्त्रता की मशाल जलाई। औरंगजेब ने छत्रसाल को जितना दबाया उतना ही वे अधिक उभरते गए। स्वतन्त्र सत्ता स्थापित करने में छत्रसाल ने मुगल अधिकार के सभी शहरों, राज्यों को लूटा। अपनी धाक जमाते हुए एकछत्र राज्य बनाने के उपक्रम में छत्रसाल ने विकट संघर्ष किया। लालकृत 'छत्रप्रकाश' इसी प्रकार के बुन्देलखण्ड राजा का काव्य इतिहास है। लाल कवि और "भूषण' दोनों का लक्ष्य एक ही है। पूरी शताब्दी में सांस्कृतिक क्षेत्रों में जागरुकता का परिचय मिलता है। रीतिभक्ति की मिश्रित काव्य धारा प्रच्छन्न रूप में प्रवाहित होती रही पर छत्रसाल, अक्षय अनन्य, गोरे "लाल लाल' बख्शी हंसराज, हरिसेवक मिश्र आदि कवियों की रचनाओं का समाज पर अनुकल प्रभाव पड़ा। एक दृष्टि से समाज का चतुर्दिक विकास इस काल में हुआ है। लाल और छत्रसाल जहां हिन्दुत्व और स्वाधीन बुन्देलखण्ड का समर्थन करते हैं तथा पृथक अस्तित्व बनाते हैं। अक्षर अनन्य भक्ति और उपासना के क्षेत्र में निर्गुण काव्य-धारा का समर्थन कबीर की भाँति करते हैं। प्रेममार्गी काव्यधारा में हरिसेवक मिश्र तथा सगुण कृष्ण भक्ति काव्य में बख्शी हंसराज के द्वारा मधुराभक्ति का प्रतिपादन हुआ। राम काव्यधारा में केशव के उपरान्त अनेक कवियों ने काव्य रचना की, पर केशव की तुलना में वे कम ही प्रभाव डाल सकें। इस प्रकार बुन्देलखण्ड के कबीर (अक्षर अनन्य) सूर (बख्शी हंसराज), जायसी (हरिसेवक मिश्र), राष्ट्रीय कवि "लाल' आदि ने चतुर्दिक उन्मेष का संदेश दिया।

कवियों का प्रदेय इस प्रकार है कि बख्तबली महाचार्य ने चम्पतराय के युद्धों का वर्णन किया तो उनके पुत्र भानुभ (१७०१ वि.) ने भी छत्रसाल के युद्धों का वर्णन और राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया। इन्हीं के दूसरे पुत्र गुलाब भी इसी धारा के कवि थे। "लाल' का प्रदेय इस काल में इसलिए अधिक है कि उन्होंने छत्रसाल को नायक बनाकर उकने समस्त घटनाओं का यथार्थ चित्रण किया है लाल की पंक्तियों को तत्कालीन राजाओं ने धर्मवाक्य के रूप में लिया है। छत्रप्रकाश में युद्धों का धारावाहिक चित्रण करने वाले लाल ने लिखा-

धनि चम्पत के औतरो पंचम श्री छत्रसाल। जिनकी आज्ञा शीषधरि करि कहानी लाल।।

छत्रसाल स्वयं एक कवि भी रहे हैं। युद्ध कला और काव्यकला का अद्भुत मेल उनमें मिलता है। बुन्देलखण्ड के चरित-नायक बनकर वे महान कार्य में लगे रहे। इनके बाद सं. १७१२ वि. में देवीदास, अक्षर अनन्य (१७०० वि.) के नाम महत्वपूर्ण है। अक्षर अनन्य ने व्यापक काव्यभाषा को अपनाया पर बुन्देली रीतिरिवाज, संस्कृति, उक्तियों और मुहावरों को अपनाकर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी प्रवाहित की। उन्होंने कबीर की भाँति मानवधर्म का प्रतिपादन किया और समाज की बुराइयों को दूर करने में योगदान दिया। इसी प्रकार हरिसेवक मिश्र सं. १७२० ने प्रेममार्गी काव्यधारा में "कामरुप कथा' के माधक से एकनिष्ठ प्रेम का संदेश दिया। देशी रियासतों में महाराज उदोतसिंह के आश्रय में कोविदमिश्र ने भाषा में हितोपदेश, रामभूषण मुहूर्त दपंण, नायिका भेद आदि ग्रंथ लिखे। सागर के सुवेश कायस्थ ने हितोपदेश और मित्रमिलाप लिखे। बुन्देली मुहावरों और कविताओं का उत्तम प्रयोग कवि ने अपने ग्रन्थों में किया है। इस समय के शासकों में महाराज उदीतसिंह स्वयं एक कवि रहे हैं।

काल्पी के श्रीपति दतिया के जागीरदार, पृथ्वीसिंह रसनिधि, दतिया के रोहुँड़ा ग्राम के हरिकेश आदि कवियों ने अपने काव्य से जनसमाज को अमूल्य कृतियाँ दी। हरिकेश की ""जगतसिंह दिग्विजय बुन्देलखण्ड के इतिहास की महत्वपूर्ण कृति है।

बख्शी हंसराज की तीन रचनाओं-मेहराज चरिॠ सनेहसागर और विरह'विलास में अंतिम दो ऐसी रचनाएँ हैं जिनमें सूर के समान वात्सल्य, विरहवर्णन, मधुराभक्ति और बुन्देली संस्कृति का दर्शन होता है। इसी काल में पद्माकर कवि के पिता मोहनभट्ट, कृष्णकवि सना ओरछा, गोपकवि --रसनिधि के दरबारी कवि-- रुपनारायण मिश्र, खण्डन कायस्थ दतिया, कवीन्द्र ज्ञानी जू, गुमानमिश्र --कविताकाल,-- बोधा कवि का कृतित्व बुन्देली काव्य के इतिहास में अमूल्य मणि टाकता है।

सांस्कृतिक उन्मेष काव्यकाल बुन्देलखण्ड की चतुर्दिक प्रतिभाओं से परिचय ही नहीं करता बल्कि बुन्देलखण्ड के विकास में योग देता है। इसके उपरान्त बुन्देलखण्ड में श्रृंगार काव्य काल आता है।

शृंगार काव्य काल[संपादित करें]

१८वीं विक्रमी से १९५० वि. तक

भक्तिकाल की समृद्धि बृजभूमि मानी जाती है तो रीति या श्रृंगार काव्य का पूर्ण उन्मेष बुन्देलभूमि में ही हुआ है। आचार्य कवि केशवदास रीतिकाल के श्रेष्ठतम कवि माने जाते हैं। उनके बाद श्रृंगार की धारा में पद्माकर—सं. १८१०—खुमानकवि, ठाकुर, दामोदर देव, मंचित, नवलसिंह कायस्थ झाँसी, प्रताप साहि चरखारी, पजनेस पन्ना, गदाधर भट्ट, सरदारकवि ललितपुर, भगवंत कवि पन्ना, ईसुरी, गंगाधरव्यास छतरपुर, ख्यालीराम चरखारी, भगवंत कवि पन्ना, ईसुरी, गंगाधरव्यास छतरपुर, ख्यालीराम चरखारी, आदि कवियों ने बुन्देली की श्रृंगार माधुरी को अनेक प्रकार से संवर्किद्धत किया है।

पद्माकर के आते-आते- बुन्देलखण्ड के वे सौ वर्ष बीत गये जिनसे इस भू-भाग में सांस्कृतिक उन्मेष का प्रवाह आया। छत्रसाल की मृत्यु के बाद समग्र बुन्देलखण्ड छोटी-छोटी इकाइयों में बँट गया। इन सबसे में एक होड़ अवश्य थी पर वह श्रृंगार तक ही सीमित रही। अनेक राजाओं के आश्रय से प्रभावित उनकी समस्त कृतियों में रीतिबद्ध श्रृंगार क्रमशः लोकतत्व से जुड़ता गया। कदाचित् पद्माकर के द्वारा ही श्रृंगार का पिष्टपेषण भी बहुत हो चुका था, अतः वे रचनायें अधिक सुन्दर बन पड़ीं जिनमें लोक जीवन रहा है। इसलिए फाग साहित्य अथवा ॠतुकाव्य अधिक आकर्षक बन पड़े हैं। पद्माकर ने बुन्देली संस्कृति, भाषा और जीवनदर्शन को श्रृंगार रस से समन्वित करके प्रस्तुत किया है। जगत् विनोद, पद्माभरण, प्रबोधपचासा और गंगालहरी कृतियों में उनकी प्रतिभा के दर्शन होते हैं। विरुदावली में वे उतने नहीं जमे जितने लोकतत्व समन्वित काव्य में फाग का एक नमूना पर्याप्त है-

फाग की भौरें अभीरैं लै गहि गोविन्द भीतर गोरी। आई करी मन की पद्माकर ऊपर नाई अबीर की झोरी।। छीन पीताम्बर कम्म्र तैं सु बिदा दई मीड़ कपोलन रोरी। नैन नचाई कहौ मुस्काई, आइयो लला फिर खेलन होरी।।

इसी प्रकार गंगालहरी में "सुधर सो हो तो माँग लेतो और दूजो कहूँ/जातो बन खेती करि, खातो एक हर की' में बुन्देली की अद्भुत छटा है। पद्माकर का अभिधामूलक चित्रण कभी-कभी इतना सतही हो गया है कि वह अश्लीलता के स्तर पर पहुँच जाता है। फाग से पद्माकर ने भी एकाध स्थान पर ऐसा अभिधात्मक प्रयोग कर दिया है। पद्माकर के बाद श्रृंगार काल के कवियों में काव्यादेश देने की क्षमता नहीं रही थी। रूप साहि, दामोदर देव, मंचित ने अलंकार और नायिका भेद को महत्व दिया है तो नवलसिंह कायस्थ के कृतित्व ""रास पंचाध्यायी, आल्हा रामायण, रामचन्द्र विलास, रुपक रामायण में कवि और चित्रकार दोनों का समन्वय हुआ है। प्रताप साहि चरखारी, रतनेस वंदीजन के पुत्र माने जाते हैं। नायक-नायिकाओं और व्यंग्य चित्रण में ये पद्माकर के समान प्रतिभाशाली हैं। इनके विम्ब चित्रण के आधार पर इन्हें दूसरा पद्माकर भी कहा जाता है। नरेस, ओरछा नरेश तेजसिंह और सुजानसिंह के आश्रय में रहे हैं। इन्होंने झाँसी की रानी (कविता) को पूरे इतिहास के साथ चित्रित करने की चेष्टा की है। पजनेरा का कृतित्व एवं व्यक्तित्व उनका "पजनेस प्रकाश' है। ये पूर्णतः बुन्देली के कवि हैं पर ब्रज और फारसी के शब्दों का प्रयोग यथास्थान करते हैं।

पद्माकर के प्रपौत्र गदाधर भट्ट, सरदार कवि, भगवंत कवि, बुन्देलखण्ड के ऐसे कवि हैं जिन्होंने छिटपुट रचनाओं में ही अपनी प्रतिभा दिखाई है।

श्रृंगार काव्य काल के प्रदेय के संबंध में यह कहना अभीष्ट होगा कि मुगलकाल के शासकों के विरोध में छोटे-छोटे देशी राज्य उठ खड़े हुए। रीतिकालीन कवि ने इनके आश्रित रहकर एक शताब्दी तक जीविका कमाई और बहूमूल्य कृतियाँ दी। सांस्कृतिक उन्मेष का सारा कार्य छत्रसाल के मंच से हटते ही प्राय- समाप्त हो गया। श्रृंगार काव्य की चरम सीमा धोर श्रंगार'या यों कहें कि अभिधात्मक काव्य में हुई। कुछ कवियों ने अलबत्ता लक्षण ग्रन्थों का निर्माण किया। पद्माकर, प्रतापसिंह, नवलसिंह, कायस्थ आदि के काव्य में स्वस्थ श्रृंगार सामने आया। समस्त काल का प्रमुख रस श्रृंगार ही रहा पर वीर और शान्त रस को भी अभिव्यक्ति मिली। देश की राजनैतिक स्थिति और अर्थव्यवस्था ने बुन्देलखण्ड के लोगों को भाग्यवादी सामन्ताश्रित अधिक बनाया। भाषा की दृष्टि से निश्चित ही अच्छे प्रयोग हुए। बुन्देली अध्येताओं के लिए अठारहवीं-उन्नीसवीं विक्रमी विशेष महत्व की है क्योंकि इस समय के कवियों का स्थानीय भाषा में ही अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करनी पड़ी है।

आधुनिक काल[संपादित करें]

वि॰सं॰ १९५० से २००० वि. तक

श्रृंगार काव्य की प्रवृत्तियाँ प्रारंभिक दशकों तक ही सीमित रही है। इसी समय सन् १८५७ की गदर की भूमिका बनी स्वतंत्रता के लिए उत्तरभारत और बुन्देलखंड के वीरों ने अनेक बलिदान दिए। ये बलिदान व्यक्तिगत भूमिका पर होते-होते राष्ट्रीय महत्व के हो गए। झांसी की रानी, नाना साहब, तात्या टोपे, नवाब बांदा आदि ने एक झंडे तले खड़े होकर क्रांति का बाना पहना। उनके अनुयायियों में बख्तबली, मर्दनसिंह जैसे क्रांतिवीरों के नाम लिये जाते हैं। अंग्रेजी शासन धीमे-धीमे स्थापित होता गया और नए प्रांत बने। बुंदेलखण्ड उत्तरप्रदेश और मध्यप्रांत में विभाजित हो गया। संवत् १९०० से १९५ विक्रमी की कृतियों का पूरा लेखा-जोखा तक नहीं मिल पाया क्योंकि क्रांति दबाने के प्रयास में ये कृतियां काल के गर्त में दब गई। कुछ का पता चला जो अब शनै:-शनै: सामने आ रही है।

आधुनिक काल में चार प्रकार के कवि मिलते हैं। प्रथम वर्ग में कवि आते हैं जिन्होंने अतीत के चरित्रों को आधार बनाकर तथा संस्कृति, धर्म, देशभक्तिपरक रचनायें की। द्वितीय वर्ग के कवियों ने आधुनिक चेतना एवं स्वातंत्रयोन्मुख विचारधारा को ठेठ बुन्देली में प्रस्तुत किया। तृतीय वर्ग के कवियों ने स्फुट छंदों में काव्य रचनायें प्रस्तुत की। समस्यापूर्ति इन्हें श्रृंगारकाल से विरासत में मिली। चतुर्थ वर्ग में लोककाव्य शैली अपनाने वाले कवियों ने ग्रामीण जीवन को प्रस्तुत किया।

प्रथम वर्ग के कवियों ने ब्रज और बुन्देली के साथ खड़ी बोली के शब्दों का प्रयोग किया। इन्होंने भले ही मिश्रित भाषा में काव्य लिखा पर उच्चारण से वे कृतियों को बुन्देली में ही पढ़ते हैं।

दूसरे वर्ग के कवियों ने भाषा, लोक संस्कृति, लोक जीवन, लोक विश्वास आदि सभी में बुन्देलखंड की भाषा को जीवित रखा है। तीसरे वर्ग के कवियों में मूलतः खड़ी बोली और ब्रज का प्रयोग अधिक मिलता है। इनमें बुन्देली के शब्द अनायास आ गये हैं। ये बुन्देली संस्कृति और माटी से दूर नहीं जा पाये हैं। चौथे वर्ग के कवियों की रचनायें लोककाव्य की प्राण हैं। इन कवियों ने अधिकांश में दीवारी, फागें, भजन और श्रृंगारिक गीत अधिक लिखे हैं। समस्त कवियों का संक्षिप्त परिचय उनकी प्रवृतियों के आधार पर इस प्रकार है। मदन मोहन द्विवेदी "मदनेशद' रासो-काव्य परम्परा में ""लक्ष्मीबाई रासो जैसी अमूल्य कृति प्रस्तुत करते हैं जो डॉ॰ भगवानदास माहौर के सानिध्य से प्रकाश में आई। हरनाथ ने व्यापक काव्य भाषा अपनाई, बुन्देली चरित्र देशभक्ति, नीति, श्रृंगार आदि को काव्य का विषय बनाया। डॉक्टर भवानी प्रसाद ने बुन्देली कहावतों, मुहावरों को काव्य में विषय बनाकर अपने विचार दिए। ऐनानन्द ने सिद्धांत सार नामक ग्रन्थ लिखा। सुखराम चौबे गुणाकर, गौरीशंकर शर्मा, गौरीशंकर सुधा जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, पं॰ जानकी प्रसाद द्विवेदी, शिवसहाय चतुर्वेदी, रामचंद्र भार्गव, घासीराम व्यास आदि अनेक कवियों की कृतियों में बुंदेलखंड की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों का परिचय मिलता है।

लोक संस्कृति के चित्रकारों में श्रृंगार काव्य काल के अवसान पर ईसुरी, ख्यालीराम और गंगाधर के नाम सामने आये जिन्होंने फाग साहित्य को अत्यधिक समृद्ध बना दिया। उनके बाद रामचरण हयारण मित्र, हरिप्रसाद "हरि', गौरी शंकर द्विवेदी "शंकर', द्वारिकेश, संत बृजेश सुधाकर शुक्ल शास्री, पं॰ ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी, शंभुदयाल श्रीवास्तव "बृजेश', भैयालाल व्यास, लक्ष्मीनारायण पथिक, चतुर्भुज दीक्षित, रघुनाथ प्रसाद गुरु, रामदयाल श्रीवास्तव आदि अनेक कवियों ने नए विषय, नीति ओर संस्कारों के साथ'साथ बुन्देली माटी और देश का गान किया। ये कवि देश की स्वतंत्रता धारा से पूर्णतः सिक्त एवं अनुप्रमाणित हैं। बुन्देलखंड के प्रदेशों में बंट जाने के बाद बुन्देली संस्कृति, जनजीवन और काव्य धारा में पर्याप्त विलम्ब से योगदान हुआ।

अत्याधुनिक काव्य काल[संपादित करें]

सं. २००० वि. से कब तक

विक्रम की २० वीं शताब्दी में बुंदेलखंड में बुन्देली और अन्य प्रदेशों में स्थानीय बोलियों के साहित्य की विपुल राशि दृष्टिगत होती है। सागर वि.वि. बुन्देलीपीठ से डॉ॰ बलभद्र तिवारी ने बुन्देली काव्य परम्परा के तीन ग्रंथ प्रकाशित किए जो प्राचीन और नवीन काव्य धारा में श्रृंखला का कार्य करते हैं। आधुनिक काव्य-धारा का परिचय बुन्देली काव्य परम्परा भाग २ --आधुनिक काव्य-- में मिलता है। बुन्देली के उन कवियों को इस कृति में स्थान दिया गया है जो सन् १९०० के बाद बुन्देली जनजीवन को ही चित्रित नहीं करते बल्कि राष्ट्रीय एवं सामाजिक परिवेश के प्रति जागरुक हैं। हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग की अवसान बेला में पं॰ रामनरेश त्रिपाठी और विदेशी भाषाविदों ने प्रदेशिक भाषा, संस्कृति और साहित्य पर विशेष ध्यान दिया है।

छायावाद युग के साथ राष्ट्र प्रेम की कविताओं का विशेष उफान आता है। बुन्देलखण्ड के मुन्शी रामाधीन खरे, नरोत्तम दास पाण्डे "मधु' इस भावधारा की रचनायें प्रस्तुत करते हैं। सन् १९२० में जलियांवाला बाग का काण्ड घटित हुआ। अंग्रेज सरकार की नीति के विरोध में घासीराम व्यास, रामनाथ त्रिवेदी, रामनाथ, राव ठाकुरदास, नाथूराम चतुरेश परासर, नन्दराम शर्मा आदि कवियों ने अनेक कविताएँ लिखी है। एक अन्य धारा में गौरीशंकर शर्मा, जानकी प्रसाद द्विवेदी, सुखराम चौबे गुणाकर, रामचन्द्र भार्गव, शिवसहाय चतुर्वेदी, लोकनाथ सिलाकारी, सुधाकर शुक्ल शास्री, ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जैसे कवि आते हैं जो समाज और संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर विचार तो करते ही हैं साथ ही राष्ट्रीय उद्बोधन के गीत भी गाते हैं। अतीत के भारत को वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न करने की चेष्टा में वे खड़ी बोली और बुन्देली दोनों में रचनाएँ प्रस्तुत करते हैं।

इसी समय का लोक साहित्य फाग से अनुप्राणित होकर सामने आता है। इंसुरी, ख्यालीराम, गंगाधर व्यास के सिवा अनेक स्फुट छंद लिखने वाले कवियों ने समसामयिक आंदोलन को अपनी कविताओं में प्रोत्साहित किया है।

एक अन्य वर्ग व्यापक काव्य भाषा अपनाकर भी बुंदेली के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता है। इसमें डॉ॰ लक्ष्मी प्रसाद "रमा', गौरीशंकर द्विवेदी "शंकर', हरगोविंद गुप्ता, बालमुकुन्द कन्हैया, रामलाल बरानिया "द्विजदीन', गौरीशंकर पंडा, सैय्यद मीर अमीर अली "मीर', नाथूराम प्रेमी एवं उनके सहयोगी के नाम विशेष है। सारतः बुन्देली काव्य के आधुनिक काल में चार प्रकार के कवि मिलते हैं।

१. अतीत के चरित्रों को आधार बनाकर रचनायें लिखने वाले संस्कृति-धर्मी और देशभक्त कवि। २. आधुनिक चेतना के बुन्देली में लिखने वाले कवि। ३. छिटपुट विषयों पर अल्प कृतित्व वाले कवि। ४. लोक काव्य शैली के रचयिता कवि।

समस्त कवियों में आधुनिक काल के पूर्वार्द्ध में जानकी प्रसाद द्विवेदी, शिवसहाय चतुर्वेदी, रामचंद्र भार्गव, हरिप्रसाद हरि, लोकनाथ द्विवेदी सिलाकारी, सन्त ब्रजेश, रामचरण हयारण मित्र, सुधाकर शुक्ल शास्री और ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी प्रमुख है। इनकी रचनायें समस्यापूर्ति शैली से प्रारंभ होकर आधुनिक युग की समस्याओं तक केन्द्रित हैं। ये बुन्देलखंड के जन-जीवन का खड़ी बोली और बुन्देली दोनों में चित्रण करते हैं। विशुद्ध बुन्देली में काव्य रचना करने वालों में सन्तोषसिंह, अवधेश, बाबूलाल खरे, माधव शुक्ल, दुर्गेश, गुणसागर, लक्ष्मी प्रसाद गुप्त, नीरज जैन आदि हैं। इनके काव्य में ग्राम्य जीवन, प्राकृतिक सुषमा और देहात की समस्याओं के चित्र आते हैं।

बुंदेली के नये काव्य का प्रतिनिधित्व भैयालाल व्यास "विन्ध्य कोकिल', चतुर्भुज चतुरेश, शर्मनलाल जैन "पथिक', रतिभानु तिवारी तेज 'कंज', भगवान सिंह गौड़, शंभुदयाल श्रीवास्तव "ब्रजेश', रामकृष्ण पांडे, गोरेलाल साहू, महेश कुमार मिश्र "मधुकर', जीजा बुन्देलखंडी, कैलाश मड़वैया, प्रकाश मड़वैया, प्रकाश सक्सेना, लोकेंद्र सिंह "नागर' संतोष सिंह बुन्देला, अयोध्या प्रसाद चौबे, द्वारिका प्रसाद अग्रवाल, केदारनाथ अग्रवाल आदि करते हैं। इन कवियों में समकालीन समाज, संस्कृति और राजनीति के प्रति जागरुकता है। ये जमीन से जुड़े हुए कवि हैं। समकालीन जीवन बोध से संपृक्त जीवन दृष्टि के कारण बुन्देली काव्य में आज नये प्रयोग भी हो रहे हैं।

कुल मिला कर बुन्देली काव्य की एक निश्चित परम्परा है जो पिछले सात सौ वर्षों तक फैली हुई है। हिन्दी की समर्थ बोली का साहित्य इसमें मिलता है। अतः यह कहने में हमें कोई संकोच नहीं कि इसे भाषा का गौरव दिया जा सकता है।

बाल्मीकि तुलसी केशव ने कविता रच दी प्यारी।। इतै फूल रही आदि काल से काव्य कला की क्यारी।। राष्ट्रकवि को सुघर लेखनी भाषै रूप निखारै। वीर भूमि बुन्देलखण्ड खों सगरो देश निहारे।। चन्द्रसखी भूषण, पद्माकर भाषा के उजियारे।। लोक रागिनी प्रान ईसुरी बुन्देली के तारे।। राय प्रवीन वीन कविता की प्यारे बोल उचारे।। -रतिभान सिंह "कंज'

प्रेम व्यास, रसिकेन्द्र, गुणाकर, लाल विनीत मीर से कविवर। काव्य कला कमनीय दिवाकर अमर कर गये नाम।। प्रांत यह है गुणियों का धाम, कोविद कृष्णदास, कविकारे, दिग्गज रतनलाल परम नारे। अम्बुज, काली, नन्द कुमार, नवल सिंह, पजनेश हुए थे मंचित, द्विज, अवधेश।

३. बुन्देलखण्ड में कवि इसलिए अधिक होते हैं कि यहां का प्रकृति सौन्दर्य अद्वितीय है। -कृष्ण कान्त मालवीय

वामदेव, सनकादि आदि महाॠषियों की तप स्थली है, यहीं महाकवि वाल्मीकि, तुलसी की कलम चली है।। ज्ञानी, वेदव्यास कृष्ण द्वेैपायन कवि कुल केशव, यहीं बिहारी, पदमाकर, भूषण का बीता वैभव। जगनिक की वाणी में आल्हा ऊदल का शौर्य समर जागा, भौभूति कलाधर, वेदव्यास संस्कृत का काव्य भ्रमण जागा।

  • गोस्वामी तुलसीदास
  • आचार्य केशवदास
  • आचार्य पद्माकर
  • राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त
  • वृन्दावनलाल शर्मा
  • सियारामशरण गुप्त
  • डॉ॰ रामकुमार वर्मा
  • श्री अम्बिका प्रसाद दिव्य
  • केदारनाथ अग्रवाल

गोस्वामी तुलसीदास[संपादित करें]

चित्रकूट जनपद में राजापुर नामक कस्बा यमुना नदी के तट पर स्थित है। तुलसी के प्रतितामह राजपुर आये थे। यहाँ आत्माराम दुबे नामक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण रहते थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम हुलसी था। सम्वत् १५५४ विक्रमी की श्रावण सप्तमी के दिन इसी दम्पति की कोख से अभुक्त मूल नक्षत्र में रामबोला --तुलसीदास-- का जन्म हुआ। माता का देहान्त दूसरे दिन हो गया, चुनिया नामक दासी ने साढ़े पाँच वर्ष तक आयु तक उन्हें पाला। भगवान शंकर की प्रेरणा से रामशैल्य पर रहने वाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्री नरहर्यानन्द जी ने इस बालक को राम बोला नाम दिया। यज्ञोपवीत संस्कार कर राम मंत्र की दीक्षा दी।

सं. १५८३ वि. जेष्ठ शुक्ल १३ को भरद्वाज गोत्र की सुन्दरी कन्या रत्नावली से उनका विवाह हुआ। पत्नी द्वारा प्रोमाधिक्य धिक्कारे जाने पर गृह त्याग दिया और साधू वेश ग्रहण किया। विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते हुए अयोध्या पहुँचे। चैत्र शुक्ल नौमी --रामजन्त तिथि-- सं. १६३१ वि. में रामचरित मानस की रचना प्रारम्भ की और मार्ग शीर्ष शुक्ल पक्ष में राम विवाह के दिन अर्थात २ वर्ष ७ माह २६ दिन में सातों काण्ड रामचरित मानस के पूर्ण किये। अवधी और ब्रजभाषा में तथा विभिन्न कवित्व शैलियों में उन्होंने दोहावली कवितावली, बरवै रामायण, रामलला नहछू, तथा विनयपत्रिका के पदों की रचना की।

रामचरित मानस ने तत्कालीन हिन्दू जाति के नैराश्य को समाप्त किया। उनमें भक्ति भाव जगाये। शैव और वैष्णव सम्प्रदाय की कटुता को समाप्त कर हिन्दू विचारधारा को उदारमना बनाया। हिन्दुओं को अत्याचार, अनाचार के समाप्ति की किरण दिखाई। गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठतम कवि और रचनाकार हैं। सं. १६८० वि. श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार को असीघाट --वाराणसी-- पर राम राम कहते हुए अपना भौतिक शरीर परित्याग किया। उनके ग्रन्थों का अनुवाद भारत की समस्त भाषाओं में तथा विश्व के अनेकानेक भाषाओं में सम्पन्न हो चुका है। गोस्वामी तुलसीदास जी की जीवनी और साहित्य पर अनेकानेक शोध-प्रबन्ध देश और विदेश में प्रस्तुत किये गये हैं। तुलसीदास शोध पीठ अयोध्या तथा चित्रकूट में स्थापित हैं। मध्य प्रदेश शासन "तुलसी पुरस्कार समारोह' आयोजित करती है।

गोस्वामी तुलसीदास सत्य, शील, सौन्दर्य के अप्रतिभ कवि हैं। विनय पत्रिका भक्तों के गले का हार है। गीतावली अपनी संगीतात्मकता के साथ माधुरी एवं सरस प्रसंगों के लिए लोकप्रिय है। रामचरित-मानस लोकमानस का अमर काव्य है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भारत में ही नहीं विश्व को अपनी महनीयता से प्रभावित कया है तथा भविष्य में भी मानस समाज को सत्प्रेरणा देते रहेंगे।

१. यह निर्विवाद तथ्य है कि गोस्वामी तुलसीदास भाषा के अप्रतिभ अधिकारी थे। भाषा पर जैसा अधिकार गोस्वामी जी का था वैसा और किसी कवि का नहीं है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल[संपादित करें]

२. "नो पोएट इन द वर्ल्ड हैज़ एवर वीन टु द मासेज़ व्हाट तुलसीदास हैज बीन टु दि पीपुल्स ऑफ दिस लैण्ड।" -एडविन ग्रीब्ज

"गोस्वामी तुलसीदास की कविता तो कविता है ही नहीं, मैं तो उसे सर्वोत्तम महामंत्र मानता हूँ।"

  1. तुलसी गंग दुओ भये सुकविअन के सरदार, इनके काव्यन में मिली भाषा विविध प्रकार।
  2. परशुराम पर पिता हमारे राजापुर सुख भवन सिधारे। प्रथम तीर्थ यात्रा महं आये चित्रकूट लखि अति सुख पाये।

परशुराम सोय सुख पाई तहि मरुत सुख स्वप्न दिखाई। बसहु जाय राजापुर धामा, उत्तर भाग सुभूमि ललामा। -बाबा रघुवर दास रचित तुलसी चरित

"गोस्वामी तुलसीदास का नाम न तो आइन-ए-अकबरी और न समकालीन फारसी इतिहासकारों पर आधारित यूरोपीय लेखकों के ग्रन्थ में मिलेगा, फिर भी वह भारत में अपने समय के सबसे महान पुरुष थे। वह अकबर से भी महान थे क्योंकि इस कवि ने करोड़ों मनुष्यों के हृदय पर अधिकार कर लिया है और यह विजय सम्राट द्वारा युद्ध में प्राप्त किसी भी विजय अथवा उसकी सभी विजयों से कहीं अधिक चिरस्थायी एवं महत्वपूर्ण है।" -वी.ए. स्मिथ

आचार्य केशवदास[संपादित करें]

पितामह श्री कृष्ण दत्त मिश्र तथा पिता आचार्य काशी नाथ जी ओरछा दरबार के प्रतिष्ठित विद्वान थे। इसी परिवार में केशवदास जी का जन्म बेतवा नदी के तट पर तुंगारण्य --ओरछा-- में रामनवमी तिथि सं. १६१८ वि. में हुआ। ओरछा नरेश महाराज रामसिंह के राजपंडित पद पर प्रतिष्ठित, सभा चतुर एवं वाकपटु थे। महाराज के छोटे भाई इन्द्रजीत सिंह का उन पर गुरुवत आदर भाव था। राजा बीरबल, टोडरमल, अब्दुर्ररहीम खानखाना स्नेही थे। उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ रसिक-प्रिया --सं. १६४८ वि.-- कवि प्रिया --सं. १६५८ वि.-- रस-ज्ञान, अलंकार-समीक्षा के श्रेष्ठतम ग्रन्थ हैं। महाकाव्य रामचन्द्रिका में नाटकीय शैली का समावेश कर प्रतिभा तथा मौलिकता का परिचय दिया। वीरसिंहदेव चरित्र, जहांगीर जसचन्द्रिका, रतनबाउनी में तत्कालीन संस्कृति तथा ऐतिहासिक घटनाओं की झलक प्राप्त है। नखशिख तथा छंदमाला में काव्याचार्य की प्रतिभा प्रतिबिम्बित है। "रामालंकृत मंजरी' पिंगल शास्र का ग्रन्थ है। विज्ञान गीता अध्यात्मक विषयक अनूठा ग्रन्थ है। आचार्य केशवदास मिश्र काव्य रीति की एक विशिष्ट प्रणाली के प्रवर्तक हैं। अलंकार संबन्धी समीक्षा में उनका स्थान अद्वितीय है। उनकी कृतियों में तत्कालीन वृत्तियों का चित्रण प्राप्त है। हिन्दी साहित्य के प्रथम आचार्य का निधन सं. १६७४ वि. में हुआ। रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार उनका जन्म सं. १६१२ वि. है। श्री भगवानदीन के अनुसार जन्म सं. १६१८ वि. है। उनका जीवन युग के अनुरुप रंगीनी रसिकता अनेकपता तथा रोचकता से परिपूर्ण है। उनकी समस्त कृतियों का आधार संस्कृत ग्रन्थ माने जाते हैं। रीति भक्तिकाल में केशव सर्वप्रमुख कवि हैं जिन्होंने बुन्देली साहित्य को ही नहीं हिन्दी के रीतिकाव्य को भी महत्वपूर्ण देन दी है।

१. केशव सब कबियन में मीरा, ज्यों मुतियन में हीरा। मिसरी सी निसरी इमि, बानी बोले मोर पपीरा।। तुगं भूमि तप भूमि ओरछो, बसै बेतवा तीरा।। रामचन्द्रिका सरस बखानी, हरै सकल भव पीरा।।

पंडित कपिल देव तैलंग[संपादित करें]

२. जगवंदित द्विज कुल तिलक अनुपम प्रतिभावान कविता कानन केसरी केशव सुकवि सुजान

-शंकर द्विवेदी

३. देखी केशव की कवितायी, रसिकन के मन भायी। आखर अरथ अनोखे विवरण, वरनन की फुलवायी।।ं कितऊ सरल जन मन को आवै समझत क कठिनाई। जिनके काव्य कसौटी कस के कवियन मिलत बिदाई।। कविता करता तीन है तुलसी केशव सूर। कविता खेती इन चुनी सीला बिनत मजूर।।

आचार्य पद्माकर[संपादित करें]

मूल नाम प्यारेलाल का जन्म सम्वत् १८१० विक्रमी में सागर नगर में हुआ। इनके पिता श्री मोहनलाल भ सागर के शासक रघुनाथ राव के आश्रित थे। इनका जन्म स्थान बांदा भी माना जाता है। सम्वत् १८३० विक्रमी में नोने अर्जुन सिंह ने इन्हें अपना दीक्षा गुरु बनाया। वे रोसाई हिम्मत बहादुर के दरबार में भी रहे। बनगांव के युद्ध में उनके साथ थे। युद्ध का वर्णन हिम्मत बहादुर विरदावली में है। सम्वत् १८९० वि. में उनका शरीरान्त गंगा तट पर कानपुर में हुआ। उनके काव्य में रूप और यौवन के मनोहारी चित्र अंकित हैं। नायिका के शारीरिक सौन्दर्य के चित्रांकन है। वे रस सिद्ध कवि हैं। उनके कविता में जीवन की सक्रियता एवं यथार्थता है। ईश्वर पचीसी में संसार की असारता का चित्रण है। उनके काव्य में वीर और श्रृंगार रस का अद्भुत समन्वय है। प्रतापशाह विरदावली, हिम्मत बहादुर विरदावली, अर्जुनरायसा व्यक्तिरक ऐतिहासिक काव्य ग्रन्थ है। रामरसायन अन्तिम ग्रन्थ है। पद्माकर हिन्दी साहित्य के श्रृंगार, वीर एवं भक्ति भाव कविता के लिए प्रसिद्ध है। प्रकृति का वर्णन निरपेक्ष है। श्रृंगार काव्य के वे अग्रगण्य कवि हैं। सागर के सूबेदार रघुना# राव ने पद्माकर की कविता की सराहना करते हुए एक लाख रु. का नकद पुरस्कार दिया था। वे लाव-लश्कर के साथ यात्रा करते थे। उनकी कविता रीतिकालीन युग श्रृंगार तथा विलासिता की अभिव्यक्ति करती है। उन्होंने बुन्देली शब्दों की व्यापक काव्य के साथ इस प्रकार संयुक्त किया है कि वे उनमें विलीन हो गये हैं। इनकी भाषा ही इन्हें बुन्देलखण्ड तथा बुन्देली दोनों का श्रेष्ठ कवि घोषित करती है।

तुलसी, केशव, पद्माकर, गंगाधर लाल, बिहारी। गई लिखी मधुरिमा जाकी वही ईसुरी न्यारी।। रहे स्वतन्त्र मंदिर हिन्दी की जा हिन्दी को धारे। रे मन चल बुन्देल भारती की आरती उतारे।।

तुलसी कवि केशवदास हुए, अरु आदि कवि इसी भूमि में आये। गुप्त, बिहारी यहां जन्मे, चतुरेश, रमेश, ने छन्द रचाए।। भूषण की जब डोली उठी तब दत्र ने कांधे दै मान बढ़ाए। तुलसी ने घिसे जब चन्दन तो श्रीराम ने माथे में खौर लगाए।।

-पन्नालाल उपाध्याय[संपादित करें]

वेद व्यास, तुलसी, केशव की छायी कीर्ति। धन्य कवि भूमि पुण्य प्रतिभा प्रसारिणी।। रघुकुल सूर्य चित्रकूट में रमे थे यहीं। अति रमणीय तीर्थ भूमि मोक्ष कारिणी।। श्रीश गुण गांऊ पढ़ चूम चूम झूम झूम।। हे बुन्देल भूमि हिन्द मानस विहारिणी।।

-हरिदास शर्मा "श्रीश

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त[संपादित करें]

हिन्दी साहित्य के प्रखर नक्षत्र, माँ भारती के वरद पुत्र मैथिलीशरण गुप्त का जन्म ३ अगस्त सन १८८६ई. में पिता सेठ रामचरण कनकने और माता कौशिल्या बाई की तीसरी संतान के रूप में चिरगांव, झांसी में हुआ। माता और पिता दोनों ही परम वैष्णव थे। "कनकलताद्ध नाम से कविता करते थे। विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। घर में ही हिन्दी, बंगला, संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरी जी ने उनका मार्गदर्शन किया। १२ वर्ष की आयु में ब्रजभाषा में कविता रचना आरम्भ किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में भी आये। उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक "सरस्वती' में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई। प्रथम काव्य संग्रह "रंग में भंग' तथा वाद में "जयद्रथ वध' प्रकाशित हुई। उन्होंने बंगाली के काव्य ग्रन्थ "मेघनाथ वध' "ब्रजांगना' का अनुवाद भी किया। सन् १९१४ ई. में राष्टीय भावनाओं से ओत-प्रोत "भारत भारती' का प्रकाशन किया। उनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई। संस्कृत में लिखित "स्वप्नवासवदत्त' का अनुवाद प्रकाशित कराया। सन् १९१६-१७ ई. में महाकाव्य "साकेत' का लेखन प्रारम्भ किया। उर्मिला के प्रति उपेक्षा भाव इस ग्रन्थ में दूर किये। स्वतः प्रेस की स्थापना कर अपनी पुस्तकें छापना शुरु किया। साकेत तथा अन्य ग्रन्थ पंचवटी आदि सन् १९३१ में पूर्ण किये। इसी समय वे राष्ट्रपिता गांधी जी के निकट सम्पर्क में आये। 'यशोधरा' सन् १९३२ ई. में लिखी। गांधी जी ने उन्हें "राष्टकवि' की संज्ञा प्रदान की। सन् १९४१ ई. में व्यक्तिगत सत्याग्रह के अंतर्गत जेल गये। उनकी तीन पत्नियां तथा आठ संतान हुई। आगरा विश्वविद्यालय से उन्हें डी.लिट. से सम्मानित किया गया। १९५२-१९६४ तक राज्य सभा के सदस्य मनोनीत हुये। सन् १९५३ ई. में भारत सरकार ने उन्हें "पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने सन् १९६२ ई. में अभिनन्दन ग्रन्थ भेंट किया तथा हिन्दू विश्वविद्यालय के द्वारा डी.लिट. से सम्मानित किये गये।

इसी वर्ष प्रयाग में सरस्वती की स्वर्ण जयन्ती समारोह का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता श्री गुप्त जी ने की। सन् १९६३ ई. में अनुज सियाराम शरण गुप्त के निधन ने अपूर्णनीय आघात पहुंचाया। १२ दिसम्बर १९६४ ई. को दिल का दौरा पड़ा और साहित्य का जगमगाता तारा अस्त हो गया। ७८ वर्ष की आयु में दो महाकाव्य, १९ खण्डकाव्य, काव्यगीत, नाटिकायें आदि लिखी। उनके काव्य में राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक भावना और मानवीय उत्थान प्रतिबिम्बित है। भारत भारती के तीन खण्ड में देश का अतीत, वर्तमान और भविष्य चित्रित है। वे मानववादी, नैतिक और सांस्कृतिक काव्यधारा के विशिष्ट कवि थे। डॉ॰ नगेन्द्र के अनुसार वे राष्ट्रकवि थे, सच्चे राष्ट्रकवि। दिनकर जी के अनुसार उनके काव्य के भीतर भारत की प्राचीन संस्कृति एक बार फिर तरुणावस्था को प्राप्त हुई थी।

वृन्दावनलाल वर्मा[संपादित करें]

महान उपन्यासकार श्री वृन्दावनलाल वर्मा का जन्म मऊरानीपुर --झांसी-- में ९ जनवरी सन् १८८९ ई. में हुआ। उनके पिता श्री अयोध्या प्रसाद श्रीवास्तव कानूनगो थे। विद्यार्थी जीवन में ही आपने शेक्सपीयर के चार नाटकों का हिन्दी अनुवाद किया। सन् १९१३ में वकालत शुरु की, सन् १९०९ में राजपूत की तलवार --कहानी संग्रह—प्रकाशित हुई। "गढ़-कुण्डार', "विराटा की पद्मिनी', "झांसी की रानी', "हंस मयूर', "माधवराय सिन्धिया', "मृगनयनी', पूर्व की ओर, ललित विक्रम, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई "कीचड़' और "कमल' "देवगढ़ की मुस्कान', "रामगढ़ की रानी', "महारानी दुर्गावती', "अब क्या हो', "सोती आग', --ऐतिहासिक उपन्यास--, "लगन, "संगम', "प्रत्यागत', कुण्डली चक्र, प्रेम की भेंट, मंगलसूत्र, राखी की लाज, अचल मेरा कोई, बाँस का फांस, खिलौनी की खोज, कनेर, पीले हाथ, नीलकंठ, केवट, देखा-देखी, उदय, किरण, आहत, आदि सामाजिक उपन्यासों का लेखन पूर्ण किया। अंगूठी का दान, कलाकार का दण्ड, रश्मि समूह, शरणागत, मेढ़क का ब्याह, ऐतिहासिक कहानियां, गौरव गाथाएं, सरदार राने खां, राष्ट्रीय ध्वज की आन, एक दूसरे के लिए हम, आदि कहानियां लिखी। झांसी की रानी, बीरबल, चले चलो, नाटक तथा तीन एकांकी लिखे। हृदय की हिलोर, --गद्य काव्य--, दबे पांव --शिकार अनुभव, सोना --आंचलिक कहानी--, युद्ध के मोर्चे से, --वीरगाथा जीवनी-- १८५७ के अमर वीर --स्केच-- अपनी कहानी --जीवनी-- बुन्देलखण्ड के लोकगती, काश्मीर का कांटा, --राजनैतिक नाटक—भारत यह है --रिपोर्ताज़-- आदि विविध रचनाएं लिखी। ललितादित्य डूबता शंखनाद, अमर ज्योति, आदि प्रकाश्य है। आपकी विभिन्न पुस्तकों का अनुवाद देशी और विदेशी भाषाओं में सम्पन्न हुआ।

भारत सरकार द्वारा सन् १९६५ ई. में "पदम् भूषण' द्वारा सम्मानित हुए। आगरा विश्वविद्यालय द्वारा सन् १९६८ में डी.लिट. उपाधि प्रदत्त हुयी। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा सन् १९६५ में ""साहित्य वाचस्पति उपाधि प्रदान की गयी। "सोवियत भूमि नेहरु पुरस्कार', "साहित्य अकादमी पुरस्कारद्ध, "हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कारद्ध तथा "बटुक प्रसाद पुरस्कार' --काशी नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी-- प्राप्त हुए। २३ फ़रवरी सन् १९६९ ई. को ८१ वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हुए।

श्री वर्मा जी की कहानियां, उपन्यास, नाटक आदि आंचलिकता का गुण लिये हुए हैं। उनकी तुलना या प्रेरणा स्रोत सर वाल्टर स्काट को माना जाता है, यह भ्रामक है। उनकी घटनाचक्रों की पृष्ठभूमि, पात्रों की मानसिकता तथा वातावरण शुद्धतम भारतीय तथा बुन्देलखण्डी है।

बुदेलखण्ड का चप्पा-चप्पा उनका जाना और छाना हुआ था। यहाँ के निवसी उनकी रचनाओं में अनुप्राणित हैं। बुन्देलाण्ड का समस्त जीवन उनमें प्रतिफलित है। उनका जीवन एक महाकाव्य था। जिसमें विविध सर्ग उनकी रचनाएं थीं। उनके जीवन में बुन्देलखण्ड की मिट्टी की सुगन्ध बसी हुयी थी और वही उनकी रचनाओं में भी मुखरित थी। हिन्दी में एक वही लेखक थे जिसमें एक व्यापक भूखण्ड का अतीत, वर्तमान और भविष्य बोलता है। मानो वह कोई दपंण है जिसमें युगों के चित्र उभरतें, मिटते और मिट-मिट कर फिर उभरते हैं। --पुस्तकांश "मैंने स्मृति के दीप जलाएं' -श्री रामनाथ सुमन सन् १९७६--

सियारामशरण गुप्त[संपादित करें]

बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार श्री सियारामशरण गुप्त का जन्म भाद्र पूर्णिमा सम्वत् १९५२ वि. तद्नुसार ४ सितम्बर १८९५ ई. को सेठ रामचरण कनकने के परिवार में श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुज रूप में चिरगांव, झांसी में हुआ था। प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर घर में ही गुजराती, अंग्रेजी और उर्दू भाषा सीखी। सन् १९२९ ई. में राष्ट्रपिता गांधी जी और कस्तूरबा के सम्पर्क में आये। कुछ समय वर्धा आश्रम में भी रहे। सन् १९४० ई. में चिरगांव में ही नेता जी सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत किया। वे सन्त बिनोवा जी के सम्पर्क में भी आये। उनकी पत्नी तथा पुत्रों का निधन असमय ही हो गया। मूलत- आप दु:ख वेदना और करुणा के कवि बन गये। साहित्य के आप मौन साधक बने रहे।

'मौर्य विजय' प्रथम रचना सन् १९१४ में लिखी। अनाथ, आर्द्रा, विषाद, दूर्वा दल, बापू, सुनन्दा, गोपिका आपके खण्ड काव्य हैं। मानुषी --कहानी संग्रह--, पुण्य पर्व --नाटक--, गीता सम्वाद, --अनुवाद--, उन्मुक्त गीत --नाट्य--, अनुरुपा तथा अमृत पुत्र --कविता संग्रह—सर्वप्रसिद्ध है। दैनिकी नकुल, नोआखली में, जय हिन्द, पाथेय, मृण्मयी, आत्मोसर्ग काव्यग्रन्थ हैं। "अन्तिम आकांक्षा', "नारी' और गोद उपन्यास है। "झूठ-सच' निबन्ध संग्रह है। ईषोपनिषद, धम्मपद भगवत गीता का पद्यानुवाद आपने किया।

दीर्घकालीन हिन्दी सेवाओं के लिए सन् १९६२ ई. में "सरस्वती' हीरक जयन्ती में सम्मानित किये गये। आपको सन् १९४१ ई. में "सुधाकर पदक' नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी द्वारा प्रदान किया गया। आपकी समस्त रचनाएं पांच खण्डों में संकलित कर प्रकाशित है। असमय ही २९ मार्च १९६३ ई. को लम्बी बीमारी के बाद मां सरस्वती के धाम में प्रस्थान कर गये।

डॉ॰ रामकुमार वर्मा[संपादित करें]

एकांकी सम्राट डॉ॰ रामकुमार वर्मा का जन्म १५ सितम्बर सन् १९०५ ई. में मोहल्ला गोपालगंज, सागर में हुआ था। आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विभागाध्यक्ष --हिन्दी-- पद से सेवा निवृत हुये। वीर हम्मीर, चित्तौड़ विजय—प्रबन्ध काव्य-- निशीथ, बालि वध, एकलव्य, --खण्ड काव्य-- कुलललना, नूरजहाँ, भोजराज, जौहर—आख्यान गीत, पृथ्वीराज की आंखें, रेशमी टाई, रुप-रंग, कुन्ती का परिताप, शिवाजी, रिम-झिम, कौमुदी महोत्सव—ऐतिहासिक एकांकी-- मयूर पंख, खट्टे-मीठे, ललित एकांकी, मेरे श्रेष्ठ रंग एकांकी प्रकाशित हैं। साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, कबीर ग्रन्थावली --सम्पादित-- कबीर का रहस्यवाद, कबीर : एक अनुशीलन, संस्मरणों के सुमन भी प्रकाशित हैं। आपके काव्य संग्रह अंजलि, अभिशाप, रुपराशि, चारुमित्र, सप्तकिरण, हिमहास, स्मृति के अंकुर, रुप-रंग, ॠतुराज, दीपदान, कामकंदला, चन्द्र किरण, बापू, इन्द्रधनुष, अग्निशिखा, अशोक का शोक आदि हैं।

डॉ॰ वर्मा बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे। वे श्रेष्ठ कवि तथा एकांकी लेखन के अद्वितीय रचनाकार थे। एक महान नाटककार एवं साहित्य के मूर्धन्य अध्येता थे। उनका प्रत्येक ग्रन्थ साहित्य जगत में प्रकाशमान है। सन् १९६३ ई. में "पद्म भूषण' से सम्मानित हुए।

श्री अम्बिका प्रसाद दिव्य[संपादित करें]

अजयगढ़ जिला पन्ना के सुसंस्कृत कायस्थ परिवार में श्री अम्बिका प्रसाद, "दिव्य' का जन्म १६ मार्च सन् १९०६ ई में हुआ था। एम. ए. --हिन्दी-- साहित्यरत्न उपाधि सम्पन्न "दिव्य जी' ने म.प्र. शिक्षा विभाग में सेवा कार्य प्रारंभ किया, प्राचार्य पद से सेवा निवृत हुवे। आप अंग्रेजी, संस्कृत, रुसी, फारसी, उर्दू भाषाविद् थे। आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। खजुराहो की अतिरुपा, प्रीताद्रि की राजकुमारी, काला भौंरा, योगी राजा, सती का पत्थर, फजल का मकबरा, जूठी पातर, जयदुर्ग का राजमहल, असीम का सीमा, प्रेमी तपस्वी आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की। निमिया, मनोवेदना, बेलकली सामाजिक उपन्यास लिखे। गाँधी परायण, अंतर्जगत, रामदपंण, खजुराहो की रानी, दिव्य दोहावली, पावस, पिपासा, स्रोतस्विनी, पश्यन्ति, चेतयन्ति, अनन्यमनसा, विचिन्तयंति, भारतगीत प्रसिद्ध महाकाव्य तथा मुक्त रचनायें हैं। आपने लंकेश्वर, भोजनन्दन कंस, निर्वाण पथ, तीन पग, कामधेनु, सूत्रपात, चरण चिन्ह, प्रलय का बीज, रुपक सरिता, रुपक मंजरी, फूटी आँखे, भारत माता, झाँसी की रानी, आदि नाटक लिखे। निबन्ध विविधा, दीप सरिता, हमारी चित्रकला म.प्र. शासन—छत्रसाल पुरस्कार-- द्वारा पुरस्कृत है। वीमेन आॅफ खजुराहो अंग्रेजी की सुप्रसिद्ध रचना है। दिव्य जी का पद्य साहित्य मैथिली शरण गुप्त, नाटक साहित्य रामकुमार वर्मा तथा उपन्यास साहित्य वृंदावन लाल वर्मा जैसे शीर्ष साहित्यकारों के सन्निकट हैं। आपने कीर के कागर समान अपना शरीर ५ सितम्बर १९८६ ई. को शिक्षक दिवस समारोह में भाग लेते हुये हृदय-गति रुक जाने से त्याग दिया। आप आदर्श प्राचार्य के रूप में सन् १९६० में सम्मानित किये गये थे। दिव्य जी के उपन्यासों का केन्द्र बिन्दु बुन्देलखंड अथवा बुन्देले नायक हैं। बेल कली --पन्ना नरेश अमान सिंह-- जय दुर्ग का रंग महल—अजयगढ़-- सती का पत्थर—गठौरा का युद्ध-बुन्देलखण्ड का महाभारत—पीताद्रे का राजकुमारी --रानी दुर्गावती-- तथा निमिया की पृष्ठभूमि बुन्देलखण्ड का जनजीवन है। सन् १९८६ ई. में मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा समिति भोपाल द्वारा "दिव्य पुरस्कार' का शुभारम्भ अहिन्दी प्रदेश के नाटककारों के लिए किया गया है। साहित्य सदन—अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति समारोह द्वारा उपन्यास विधा हेतु तथा दो हजार रुपये की राशि तथा द्वितीय पुरस्कार "कविता विधा हेतु' घोषित किये गये हैं। तथा "दिव्यालोक' का प्रकाशन भी संग्रहणीय स्मारिका के रूप में प्रस्तावित है। दिव्य जी का अभिनन्दन ग्रन्थ प्रकाश्य है।

केदारनाथ अग्रवाल[संपादित करें]

श्री केदारनाथ अग्रवाल का जन्म १ अप्रैल १९११ ई. में बाँदा जनपद के कमासिन ग्राम में हुआ। व्यवसाय से आप कुशल अधिवक्ता तथा सरकारी वकील के रूप में भी पदस्थ थे। "देश देश की कविता' प्रथम काव्यानुवाद प्रकाशित हुआ। युग की गंगा, नींद के बादल, गुलमेंहदी, आग का आइना, हे मेरी तुम, कहे किदार खरी-खरी, जमुन जल, जो शिलाएं तोड़े हैं, अनहारी हरियाली, कूकी कोयल खड़ी पेड़ की देह, बसन्त में प्रसन्न हुयी धरती, --काव्य संग्रह—प्रकाशित हैं। पतिया --उपन्यास--, खिली बस्ती गुलाबों की --संस्मरण--, भी प्रमुख ग्रन्थ है। साहित्य अकादमी द्वारा "अपूर्वा' पुरस्कृत है। आप "मैथिलीशरण गुप्त' पुरस्कार से सम्मानित हुए तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा "विद्यावाचस्पति' के उपाधि से अलंकृत किये गये।

आपको जनवादी कवि के नाते सन् १९७३ ई. में सोवियत लैण्ड पुरस्कार प्रदान किया गया तथा रुस का यात्रा भी की। इनकी काव्यप्रेरणा स्वयं का जीवनदर्शन है। उन्होंने किसान एवं मजदूरों की पीड़ा तथा ग्रामीण जीवन के दु:ख दर्दों को ईमानदारी से व्यक्त किया है। माक्र्सवादी विचारधारा से प्रभावित होकर रचना करते हैं, किन्तु इनका व्यक्तित्व स्वछन्द व प्रगतिशील है। वे केवल कवि ही नहीं सूक्ष्म विचारक भी हैं जैसा उनके साहित्यिक लेखों से प्रगट होता है। वे नये मूल्यों की स्थापना करनेवाले विद्रोही कवि हैं। समाज में नये जीवन की नयी किरण का स्वागत करते हैं। संघर्ष और विद्रोह के प्रति उनका दृष्टिकोण स्वस्थ है। उनके बिम्ब नवीन तथा सारगर्भित होते हैं। उनकी भाषा सरल व चुभती हुई है। केदारनाथ अग्रवाल पुरस्कार समारोह बाद में प्रारम्भ हो गया है। बापू जी का देहान्त २२ जून सन् २००० को हो गया।