बुंदेलखंड का आर्थिक और औद्योगिक विकास

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आर्थिक पिछड़ेपन का दृष्टि से जो स्थान भारत के मानचित्र में उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश का है, वही स्थिति झांसी तथा सागर सम्भाग के जनपदों के दतिया-ग्वालियर सहित है। यहां पर विकास की एक सीढ़ी चढ़ना दुभर है। बुन्देलखण्ड का प्रत्येक ग्राम भूख और आत्महत्याओं की करुण कहानियों से भरा है। प्रतिदिन सम्भाग में १५ बुन्देलखण्डी स्री-पुरुषों सल्फास खाकर आत्महत्या कर लेते हैं। इनमें से झांसी तथा ललितपुर में ३५९ व्यक्ति प्रतिमास आत्महत्या कर लेते हैं। झांसी जनपद में इनमें से १६८ व्यक्तियों ने आत्महत्या की ७३ व्यक्तिभूख से पीड़ित होकर परलोकगामी बने। झांसी में १२० तथा ललितपुर में १३३ की आयु मात्र १५-१६ वर्ष थी। कुंठा, निराशा, अवसाद ने उनके संघर्ष की शक्ति क्षीण कर दी और वेभयंकर कदम उठा बैठै।

बुन्देलखण्ड के विकास पर पानी की कमी और भूमि अनुपजाऊ दो तरफा प्रहार करते हैं। औद्योगिक विकास शून्य है। नौकरी की प्राप्ति तो एक सपना है, फलतः देहातों से निगर्मन दर अत्यधिक ३९ प्रतिशत है जबकि सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में यह मात्र ११ प्रतिशत है। इस प्रदेश के निवासियों के पास ५-१० एकड़ जमीन है किन्तु दो वक्त का भोजन पाने में असमर्थ हैं। उद्योग विकसित हुए और सिमट गए- कताई मिलें बन्द हो रही हैं। विकास प्राधिकरण झांसी में स्थापित किया गया और सन् १९९७ में बन्द कर दी गई और ३००० श्रमिक जीविकाविहीन हो गए। बांदा जनपद में भी कताई मिल बन्द हो गई है और श्रमिक बेरोजगार हो गए हैं।

सड़कों का नितान्त अभाव है, विद्युत आपूर्ति सीमित होने के साथ'साथ व्यवधान-प्रधान भी है। १००००० व्यक्तियों में कारखानों में कार्यरत श्रमिकों की संख्या १.६ प्रतिशत है जबकि उत्तर प्रदेश में ८.३ प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की सरकार जन प्रतिनिधियों की अनाक्रमणता के कारण निष्क्रिय एवं उपेक्षा की नीति अपनाए हुए है। बुन्देलखण्ड के निवासी इसे अपनी नियति न मानकर अब संघर्षशील हो रहे हैं।

बुन्देलखण्ड का भौगोलिक क्षेत्र लगभग ७०००० वर्ग किलोमीटर है। जोकि सांस्कृतिक इकाई के रुप् में उकेरती है। यह वर्तमान हरियाणा पंजाब तथा हिमाचल से अधिक है। इसमें उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के १३ जनपद तथा समीपवर्ती भू-भाग है जो यमुना और नर्मदा नदी से आबद्ध हैं। बुन्देलखण्ड में इतने संसाधन है कि वह अपने बहुमुखी उत्थान की आर्थिक व्यवस्था स्वत- कर सकता है। आवश्यकता है तो केवल संसाधनों की उचित खोज व समुचित विकास की।

खनिज सम्पदा[संपादित करें]

बुन्देलखण्ड खनिज सम्पदा रहित है, यह एक उपेक्षाजनित मि धारणा है। सन् १९०६ ई. में ई. ब्रेडिनवर्ग के उपरांत सन् १९५० ई० में इस क्षेत्र का संवेक्षण कार्य प्रारम्भ हुआ जिसके परिणाम संतोषजनक प्राप्त हो रहे हैं।

लगभग ५००० वर्षों से पन्ना क्षेत्र हीरा उत्पादन के लिए विश्व-विख्यात है। अब यहां हिनौता, मझगवां तथा छतरपुर जनपद के अंगोर नामक स्थान में भी हीरा प्राप्त होने की संभावना है। उत्पादन क्षेत्र विस्तृत हुआ है। लगभग ४०००० कैरेट हीरा निकाला जा चुका है और १४००००० कैरेट के भण्डार शेष है। नई खदानों में से इतना ही प्राप्त होने की संभावना हैं। सन् १९६८ ई० में नेशनल मिनरल डेवलमेन्ट कॉर्पोरेशन पन्ना द्वारा यांत्रिक प्रक्रिया से ६२ मीटर गहरी खुदाइ की जा चुकी है। छिछली खदानें विस्तृत भूखण्ड में फैली हुई हैं। पन्ना में वार्षिक उत्पादन २६००० कैरेट हीरा है, जिससे २ करोड़ रुपये की रॉयल्टी प्रान्तीय सरकार को प्राप्त होती है। संभावित खदानों से आय-वृद्धि की संभावना अधिक है।

बुन्देलखण्ड में वास्तु पत्थर के अक्षय भण्डार हैं। बालू का पत्थर आदि काल से अपने सुहावने रंगों, एक समान कणों नियमित संस्करण, सुगम सुकरणीयता तथा चिरस्थायित्व के लिए समूचे उत्तर भारत में वास्तु पत्थर के रूप में प्रसिद्ध है। ग्रेनाइट पत्थर अपनी गठन, कठोरता, अक्षयता तथा सुन्दरता के कारण अलंकरण पत्थर के रूप में प्रसिद्ध है। विदेशों में जर्मनी, जापान, इटली में इसकी बड़ी मांग है। निर्माण कार्यों में प्रयुक्त होने वाली रेत के यहां असीम भण्डार हैं। कांच उद्योग में प्रयोग होने वाली बालू के निक्षेप इतने बड़े हैं कि सम्पूर्ण भारत की मांग ८० प्रतिशत यहीं से पूरी हो सकती है। अनेक स्थानों में सिलिका की मात्रा ९९.२ प्रतिशत है। कूड़ियों और प्यालियों के निर्माण में गोरा पत्थर कई स्थानों में प्रचुर मात्रा में मिलता है। इसका प्रयोग मृत्तिकाशिल्प तथा दुर्गलनीय ईटों के उद्योगों में होता है। इसके ज्ञात निक्षेपों का आंकलन ४३ लाख टन किया गया है। अन्य भण्डारों का सर्वेक्षण शेष है। बाहुल्यता में पाई जाने वाली ७० किलोमीटर से अधिक लम्बी उत्तर पूर्व-दक्षिण पश्चिम संरेखित स्फटिक शैल भित्तियों से इनका अनुवांशिक संबंध है। अभी हाल में बांदा जनपद और उनके समीपस्थ क्षेत्रों में एल्यूमीनियम अयस्क बॉक्साइट के बृहद भण्डार का पता चला है। यह निक्षेप प्रति वर्ष एक लाख टन एल्यूमीनियम उत्पादन की क्षमात वाले कारखाने को कम से कम ३५ वर्षों तक अयस्क प्रदान कर सकता है। छतरपुर जनपद में चूने के पत्थर प्रचुर भण्डार हैं, अन्य स्थानों में सर्वेक्षण शेष है। बांदा जनपद में झोंका भट्टी के उपयुक्त गालक श्रेणी के डोलोमाइट का आंकलित निकाय लगभग ६० करोड़ टन से अधिक है। मृतिका शिल्प की उपयुक्त सफेद चिकनी मिट्टी के बृहद भण्डार है। ज्ञातव्य निक्षेपों का आकलन ५ लाख टन से अधिक है। बांदा जनपद के लखनपुर खण्ड में यह २ लाख टन से अधिक है। बुन्देलखण्ड में पाए जाने वाले खनिजों में फोस्फोराइट, गैरिक जिप्सम, ग्लैकोनाइट, लौह अयस्क, अल्प मूल्य रत्न आदि हैं। संभावित खनिजों कीसूची में तांबा, सीसा, निकिल, टिन, टंगस्टन, चांदी, सोना आदि हैं। बुन्देलखण्ड के एक बड़े भू-भाग चौरई में ग्रेनाइट चट्टानें पाई जाती हैं। यह चट्टानें अधिकतर रेडियोधर्मी यूरेनियत युक्त होती हैं तथा इसकी मात्रा ३० ग्राम प्रति टन तक हो सकती है। ललितपुर में हुए सर्वेक्षण के द्वारा इस संभावना को बल मिला है।

सीसा अयस्क, - गैलिना - टीकमगढ़ जिले में बन्धा बहादुरपुर तथा दतिया जनपद में पए जाते हैं। टीकमगढ़ जिले में ग्रेनाइट पॉलिकिंशग का कारखाना स्थापित किया जा सकता है। विदेशों में मिरर पॉलिश हेतु बहुत मांग है। दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर जिले में पायरोंफायलाइट, - पोतनी माटी - औद्योगिक दृष्टि से उपयोगी है। एस्वेस्टेस तथा निकिल की प्राप्ति सागर जनपद में है। लौह अयस्क टीकमगढ़, छतरपुर, सागर जिले में प्राप्त हैं। ताम्र अयस्क के भण्डार छतरपुर, बॉक्साइट के भण्डार पन्ना, सागर तथा मणि पत्थर दतिया में प्राप्त हैं।

लौह अयस्क के भण्डार मानिकपुर - कर्बी-, बेरवार - बेरार - ललितपुर में अनुमानतः १० करोड़ टन खनिज के हैं। इसमें ३५ से ६७ प्रतिशत लौह प्राप्त हैं जो स्पंज आयरन हेतु उपयोगी है। सोनरई - ललितपुर - में ४०० मीटर से १००० मी. लम्बे तथा १ से ३ मीटर मोटे ताम्र अयस्क भण्डार हैं, जिनमें ०.५ प्रतिशत तांबा है। शीशे के बालू, बरगढ़ - कर्वी - में अनुमानतः ५ करोड़ टन है जो विभिन्न स्तरीय है। नरैनी - बांदा में स्वर्ण की प्राप्ति २ ग्राम प्रति टन है। बॉक्साइट भण्डार बांदा में ८३ टन अनुमानित है।

जल संसाधन[संपादित करें]

चम्बल, सिन्ध पहुज, बेतवा, केन, धसान, पयस्वनी आदि उद्गम स्रोत होते हुए भी विन्ध्य शैल समूह को जलविहीन माना० जाता है। जल आपूर्ति बुन्देलखण्ड की अत्यन्त जटिल समस्या हैं। वर्षा ॠतु में विप्लवी बाढ़, जान औश्र माल की भीषण हानि करती हैं। वही जल ग्रीष्म में विपत्ति का कारण बन जाता है। सूखा पड़ जाने पर दुर्भिक्ष मनुष्य और घरेलू पशुओं की मृत्यु का कारण बन जाता है। यह स्थिति दैवीय प्रकोप नहीं, मानवीय उपेक्षा का एक ज्वलन्त उदाहरण है। पर्यावरणीय निम्नीकरण द्वारा उत्पन्न पारिस्थितक असुतंलन तथा उपलब्ध जल संसाधन के विकास में उदासीनता ही वर्तमान जलाभाव का मुख्य कारण है। बुन्देलखण्ड में औसतन ७०००० लाख टन घन मीटर पानी प्रति वर्ष वृष्टि द्वारा उपलब्ध होता है। दुर्भाग्य का विषय है कि इसका अधिकांश भाग तेज प्रवाह के साथ निकल जाता है और जो भाग भूमिगत हो जाता है उसके बारे में किसान को जानकारी नहीं होती। बुन्देलखण्ड की भूमि की उर्वरता विलक्षण है, मौसम की अनियमितता ही प्रायः उत्वादन में अवरोध करके दुर्भिक्ष की स्थिति उत्पन्न करता है। सूखा एवं दुर्भिक्ष यहां के नियमित अतिथि है। यहां जल की कमी नहीं वरन् व्यवस्था की अनियमितता है जो मुख्यतः उपेक्षाजनित है।

केन्द्रीय सिंचाई एवं विद्युत मन्त्रालय के भौमजल सांख्यकी सन् १९८५ के अनुसार बुन्देलखण्ड में १३१०२१ लाख घन मीटर भौम जल प्रतिवर्ष उपलब्ध रहता है। इस विशाल भण्डार में केवल १४३५५ लाख घन मीटर जल का ही उपयोग किया जाता है। शेष ११६६६६ लाख घन मीटर प्रतिवर्ष अछूता ही रह जाता है। पूरी क्षमता का १०.९५ प्रतिशत ही उपयोग में लिया जाता है। विभिन्न जनपदों में ३.२ से ३१.१ ही भौम जल का उपयोग प्रतिवर्ष होता है। न्यूनतम उपयोग दमोह तथा बांदा जपनद में तथा अधिकतम टीकमगढ़ में ३१.१ प्रतिशत होता है। जलोढक का विस्तार बुन्देलखण्ड के उत्तरी भाग में है। इसका क्षेत्रफल लगभग १२९३१ वर्ग किलोमीटर है। गहराई में यह कुछ मीटर से लेकर दो सौ मीटर से अधिक है। यहां पर २ से ३५०० लीटर तक पानी देने वाले क्षमता के नलकूप अनेक स्थानों पर लगाए जा सकते हैं। बांदा, राठ, गोपालपुर, मऊ तथा अतर्रा आदि स्थान इसके उदाहरण है।

ग्रेनेटिक क्षेत्र का विस्तार १४६२८ वर्ग किलोमीटर है। भौम जल अधिकतर शैल संधियों तथा अपाक्षी शैल में रहता है। संधि नमन ८० डिग्री तक हो सकता है, यहां पर ७५० से ११०० ली. प्रति मिनट तक देने वाले क्षमता के कूप यानलकूप सुगमता से लगाए जा सकते हैं। कुछ स्थानों में इससे अधिक क्षमता वाले नलकूपों का निर्माण भी संभव है। भू भौतिकी सर्वेक्षण इसमें सहायक हो सकती हैं। पठारी क्षेत्र भी बुन्देलखण्ड में प्राप्त है। चित्रकूट क्षेत्र के इसी शैल समूह में गुप्त गोदावरी, हनुमानधारा कोटितीर्थ, देवांगना, बांके-सिद्ध आदि जलस्रोत है। अनुसुइया नामक स्रोत से ग्रीष्मकालीन जलप्रवाह ८४९५० ली. प्रति मिनट है। चित्रकूट जनपद के पाठा क्षेत्र में गत सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ कि १५० से लेकर २०० मीटर बालू की तह के नीचे चूने के शैल समूह में अटूट भौम जल का भण्डार है। यहां नलकूपों का निर्माण किया जा सकता है, परंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के ५० वर्ष उपरांत भी यह क्षेत्र उपेक्षित है। उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के क्षेत्रों में जल विवाद से बुन्देलखण्ड - उत्तर प्रदेश - की सिंचाई समस्याग्रस्त हो गई है। बुन्देलखण्ड - मध्य प्रदेश - के १५ बांधों में सिल्ट जमा होने से बांधों की जलक्षमता प्रभावित हुई है। बुन्देलखण्ड क्षेत्र तीस लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। इनमें से २४ लाख हेक्टेयर कृषि योग्य है। बुन्देलखण्ड - उ.प्र. - में १२ लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कमाण्ड करती है। दुर्भाग्यस्वरुप इनमें से मात्र चार लाख हेक्टेयर भूमि को ही सही अर्थ में सींच के लिए पानी दे पाता है। सिंचाई विभाग इसे छः लाख हेक्टेयर बनाने के लिए प्रयासरत है। बेतवा, धसान, केन, जामिनी नदियां मध्य प्रदेश से बहकर आती है। मध्य प्रदेश इन्हें प्रमुखतया अपने क्षेत्र में प्रयोग करना चाहता है। सिल्ट जमा होने के कारण रनगवां बांध के जल भण्डारण की क्षमता ५.४८ टी.एम.सी. से घटकर ३.४६ टी.एम.सी. रह गई है। बुन्देलखण्ड - उ.प्र. को स्वाभाविक रुप् से कम जल मिलेगा। विवादों को निपटाने के लिए मध्यप्रदेश क्षेत्र के परिषद का गठन किया गया, किन्तु २५ वर्षों से सभी मामले लम्बित ही पड़े हैं। मुख्यमंत्री स्तर की बैठकें लाभहीन रही हैं। मं.प्र. सरकार केन नदी पर ग्रेटरगंगऊ बांध का निर्माण करने जा रही है। इसमें २१४ टी.एम.सी. पानी भराव की क्षमता रहेगी। म.प्र. सरकार इसका आधा भाग पानी का मांग कर रही है। उ.प्र. सरकार का हिस्सा कितना होगा अभी भी अनिर्णीत है। आने वाले पांच वर्षो में बुन्देलखण्ड - उ.प्र. का सिंचित भाग ऋसोन्मुख होगा। तालाबों की संख्या एवं क्षेत्रफल में क्रमशः कमी हो रही है। नलकूपों की संख्या कागजी आंकड़ों में बढ़ती रहती है, यथार्थ में नहीं। नलकूपों एवं हैण्डपम्पों में अव्यवस्था का प्रभाव कुओं पर विपरीत पड़ता है, सिंचाई का क्षेत्रफल सिकुड़ रहा है। बोई हुई भूमि में सिंचाई का प्रतिशत बुन्देलखण्ड में ३४.५ प्रतिशत जबकि उ.प्र. में ८४.२ प्रतिशत है।

शक्ति विभव[संपादित करें]

बढ़ते हुए पानी का आयतन तथा वेग ऊर्जा विभव का घातांक है। बेतवा नदी का प्रभाव ठुकवां बांध पर वर्षा ॠतु में १६८०० घन मी. प्रति सेकेण्ड होता है जो ग्रीष्म में घटकर ०.५६ घनमी. प्रति सेकेण्ड सिकुड़ जाता है। पयस्वनी का प्रभाव वर्षा ॠतु में २१८४ घन मी. प्रति सेकेण्ड, ग्रीष्म में न्यूनतम प्रवाह ०.४२ घन मीटर रह जाता है। यह शक्ति यदि साधित संचित कर उपयोग में लाई जाए तो प्रदेश की भूमि तथा जन का कल्याण हो जाए। बांध, बंधियां तथा बंधी से मृदा अपरदन को रोका जा सकता है और विद्युत उत्पादन के प्रयोग में लाया जा सकता है। इस प्रदेश का विद्युत उत्पादन आन्तरिक उपभोग के लिए पर्याप्त है। राजघाट और घुरवारा बांध के पूरा हो जाने से २०० मेगावाट का उत्पादन होने के साथ लगभग पांच लाख एकड़ भूमिकी सिंचाई का लाभ प्राप्त होगा। इससे प्रदेश की गरीबी, पिछड़ापन हटाने में सहयोग प्राप्त होगा। केन एवं बेतवा नदी को छोड़कर अन्य नदियों का जल बिना उपयोग के यमुना नदी में प्रवाहित हो जाता है। मौदहा, उर्मिल, रोहिणी, जसनाम, सहजाद, सिजारा, बाघेन आदि योजनाओं पर बांध निर्माणाधीन है। बीना में ६०० मेगावाट विद्युत उत्पादन की परियोजना स्वीकृत है।

वन उत्पादन[संपादित करें]

वन के दो रूप हैं। १. रक्षण २. उत्पादन प्रथम पर्यावरण रक्षक है, बहाव अवरोधक है, मृदा अपरदनरोधक है, वृष्टि उत्प्रेरक तथा भूमि ताप नियंत्रक है। राष्ट्रीय वन्य नीति के अनुसार ३३ प्रतिशत भू-भाग में वन होना चाहिए। इसके प्रतिकूल बुन्देलखण्ड में केवल ९ प्रतिशत ही वन है। पन्ना दमोह सागर जनपदों में वनों का क्षेत्रफल ३२ प्रतिशत है। उच्च कोटि के सागौन तथा शीशम की लकड़ी की अत्यधिक मांग है। तेन्दू की पत्ती के कारण हजारों परिवारों का भरण-पोषण होता है। बुन्देलखण्ड विकास निगम लाखों रुपये की आय प्राप्त कर रहा है। खैर की लकड़ी से कत्था उद्योग चल रहा है। औषधि निर्माण के लिए कच्चे माल की कमी नहीं है। महुआ खाने तथा तेल निकालने के काम आता है। बेल, आंवला, बहेरा, अमलतास, अरुसा, सपंगंधा, उ गिलोय, गोखरु आदि प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। फलों में शरीफा, बेर, चिरौंजी, खजुरिया, करौंदा आदि होते हैं। कई स्थानों पर बबूल की गोंद बड़ी मात्रा में एकत्रित की जाती है, इनके माध्यम से टिम्बर फर्नीचर औषधि, कागज खिलौने, माचिस, सेन्ट आदि का कच्चा माल प्रदान करने में प्रदेश सक्षम है। वन्य प्राणी भी हमारी राष्ट्रीय सम्पदा है। उनकी सुरक्षा भी समय की पुकार है तथा पर्यटन आय में सहायक है। परोक्ष रूप से सूखा तथा बाढ़ को वन सम्बर्धन द्वारा यथासमय नियंत्रित किया जा सकता है। शहद एवं लाख - चपरा - उत्पादन भी लाभप्रद व्यवसाय है।

मत्स्य पालन[संपादित करें]

बुन्देलखण्ड में तालाबों और नदियों में मत्स्य पालन का व्यवसाय खूब चल रहा है। अपनी पूर्ण क्षमता से बहुत नीचे है, थोड़े सुधार से इनका पालन बढ़ाया जा सकता है। तालाबों में पुराव, विच्छेद के कारण संचय क्षमता कम हो रही है। वायुमण्डलीय तापमान ५० डिग्री से. तक तथा अधिक हो जाने से वाष्पन अधिक होता है। ८ फुट से कम गहरा पानी मत्स्य पालन के लिए प्रतिकूल है। मत्स्य व्यापार के लिए शीत पैकिंग तथा तीव्रगामी यातायात अत्यन्त आवश्यक है। बुन्देलखण्ड में भाकुर, रोहू, मृगाल, कठरोहू पडहिन, झींगा आदि प्रमुख है। माहसीर बहते पानी की मछली बहुतायत से पाई जाती हैं। यहां की झीलों में हिल्सा मत्स्य पालन भी संभव है। बुन्देलखण्ड के २० लाख हेक्टेयर कुल जल में से केवल आठ लाख हेक्टेयर का ही उपयोग किया जा रहा है। इसके समुचित विकास से कई गुना आय प्राप्त की जा सकती है।

पर्यटन[संपादित करें]

पर्यटन एक सुनियोजित उद्योग है। इसके विकास की बुन्देलखण्ड में अपरिमित संभावनाएं है। यहां अनेकों स्थानों में मिले, महल, भग्नावशेष तथा स्थापत्य कला की अनूठी छवियां हैं। देखें तो बुन्देलखण्ड ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक स्मारकों का एक कोषागार है। छतरपुर जनपद में मलहरा के निकट चारों ओर वन से घिरा भीमकुण्ड अत्यन्त रमणीक है। पन्ना के वृहस्पति तथा भैरव कुण्ड दर्शनीय है। महोवा के विजयसागर के अपनी छटा है। केन नदी के रनेह तथा पाण्डव प्रपात पर्यटकों को अकर्षित कर सकते हैं। ओरछा और चित्रकूट तपोभूमि है। कालीं का स्वर्गवाह कुण्ड और भैरव की मूर्ति पर्यटकों को आकर्षित करने में सक्षम है। जैनियों के महत्वपूर्ण तीर्थ सोनागिरि, द्रोणागिरि, देवगढ़ राष्ट्रीय तीर्थ हैं। शिल्प तथा स्थापत्य कला में खजुराहों अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक निधि है। २९ मार्च १९९८ से वर्ष पर्यन्त खजुराहों की सहस्राब्दी मनायी जा रही है। सन् १९८९ ई. में २०५८१५ पर्यटक आए। इनमें से ४२७४८ विदेशी थे। सन् १९९२ ई. में १२३५१७ पर्यटक आए, जिनमें से ३५३३३ विदेशी थे। पर्यटन व्यवसाय वृद्ध् के साथ मंदिरों का संरक्षण भी अत्यन्त आवश्यक है। मुम्बई, बनारस के साथ दिल्ली और कलकता से हवाई यात्र संभव होनी चाहिए। बुन्देलखण्ड में प्रत्येक रुचि के पर्यटक के लिए आकर्षक है। पर्यटन उद्योग को बढ़ाने के लिए प्रचुर सामग्री तथा विभव है। आवश्यक है इसे बहुमुखी बनाने हेतु यातायात, निवास की सुविधाएं अत्यधिक बढ़ाई जाए। झांसी'मिर्जापुर राजमार्ग तथा चित्रकूट-कलीं मार्ग के चौड़ीकरण से पर्यअन उद्योग को लाभ प्राप्त होगा। उपेक्षित ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक स्थानों को पर्यटन मानचित्र में उचित स्थान प्राप्त होना चाहिए। दतिया तथा छतरपुर आदि महलों का उपयोग उत्तम होटल के रूप में किया जा सकता है।

उद्योग[संपादित करें]

औद्योगिक दृष्टि से बुन्देलखण्ड में बड़े उद्योगों का नितांत अभाव है। डायमण्ड सीमेन्ट वक्र्स नरसिंहगढ़ - दमोह- भारत हैवी इलेक्ट्रिक लिमिटेड झांसी, वैद्यनाथ औषधि निर्माण आदि उल्लेखनीय हैं। मध्यम एवं लघु उद्योग भी अत्यल्प संख्या में है। रानीपुर का टेरीकॉट - वस्र उद्योग - बीड़ी उद्योग आदि रोजगार प्राप्ति के लघु प्रयास हैं। बीना तेल शोधक परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त हो गई है, जिसमें ६४०० करोड़ की पूजीं लगेगी। ६० लाख टन ली. क्षमता का तेल शोधक संयन्त्र भारत तथा ओमान सरकार के सहयोग से स्थापित होगा। गुजरात के बाड़ीमार्ग से ९४३ किलोमीटर दूर से कच्चा तेल पाइप लाइन से यहां आएगा। जुलाई २००१ ई. तक यह परियोजना चालू हो जाएगी। चमड़ा शोधन कारखाना वृहद स्तर पर स्थापित हो रहा है। नेप्था उत्पादन का कारखाना भी समीप में स्थापित हो रहा है। ललितपुर में सतना तथा महोबा से खजुराहों रेल लाइन की परियोजना को स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। इसके निर्माण से अनेक उद्योग स्थापित हो सकेंगे। बुन्देलखण्ड की खनिज सम्पत्ति यथा कांच उद्योग तथा अनेक उद्योगों को स्थापित करने में यह प्रदेश समर्थ है।

मण्डीद्वीप - भोपाल - के औद्योगिक अवशिष्ट, डिस्टिलरी तथा चर्म उद्योग का अवशिष्ट बेतवा नदी के जल में प्रवाहित किया जा रहा है। जिसका दुष्प्रभाव करवई एवं समीपस्थ ग्रामों की जनता एवं उनके पशुओं को भोगना पड़ रहा है। १९.५ करोड़ रु. की सफाई योजना अपार्यप्त सिद्ध हो रही है।

कृषि[संपादित करें]

खेंती परिवार के सदस्यों की उदर पूर्ति तक सीमित न होकर उद्योग का स्वरुप प्राप्त कर रही है। समुचित सिंचाई से दो या तीन फसलों तथा नकदी फसलों - सोयाबीन, गन्ना, पटसन, तिलहन - प्राप्ति के माध्यम बन सकती है। फल तथा मसालों का उत्पादन भी किया जा सकता है। बुन्देलखण - उ.प्र. में प्रति हेक्टेयर २२७ किग्रा. खाद्य का उपयोग किया जाता है, जबकि उ.प्र. में इसकी मात्रा ५६८ किग्रा. है। बुन्देलखण्ड पान के उत्पादन के लिए प्राचीन काल से विख्यात है। देशावरी पान लगभग ५-६ करोड़ रु. का निर्यात होता है, सरकारी आकड़ा दो करोड़ रुपये का है। ललितपुर तथा छतरपुर - म.प्र. जनपद भी पान के उत्पादन के लिए ख्याति प्राप्त है। महोबा में पान प्रयोग और प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित है। २८ कतारों के बारजा का ब्यय रु. ७००००/- आता है। उचित संरक्षण से पान निर्यात में वृद्धि हो सकती है।

बुन्देलखण्ड का पिछड़ापन कुछ सीमा तक उ.प्र. और म.प्र. की संयुक्त नीतियों के अभाव के कारण वर्तमान है। प्रसिद्ध तीर्थ चित्रकूट पयस्विनी नदी के इस पार और उस पार के उ.प्र., म.प्र. के विभाजन से अविकसित है। इसी प्रकार ओरछा झांसी के अत्यन्त सन्निकट है। कालीं और खजुराहो भी दोनों सरकारों के संयुक्त नीतियों के अभाव में दुष्प्रभावित है। डाकुओं की समस्या को दोनों सरकारों की सीमा सन्निकटता से प्रश्रय प्राप्त होता है और उनका दमन दुष्कर हो जाता है। औद्योगिक दृष्टि से इसके पिछड़ेपन का उदाहरण जनपद - उ.प्र. - जिलाख्यक्षों के दिसम्बर १९९८ मास की बैठक में स्पष्ट हुआ। हमीरपुर के जिलाध्यक्ष ने बयान दिया कि ५०० एकड़ उद्योग क्षेत्र में २० लघु उद्योग चल रहे हैं, शेष बीमार हैं। इस सम्मेलन में चमड़ा, सीमेन्ट, पॉटरी तथा चित्रकूट में फिल्म इण्डस्ट्री की संभावनाओं पर विचार किया गया तथा तीस करोड़ रुपये उ.प्र. शासन द्वारा विकास हेतु स्वीकृत किए गए।

बुन्देलखण्ड विकासशील प्रदेश है और विकास की असीमित संभावनाओं को कोख में संजोए हुए है। जीवन की मूलभूत आवश्यकता जल प्राप्ति के संघर्षों में जूझ रहा है। पाठा - चित्रकूट - ऐसा प्रदेश है, जहां समाज अपनी बेटियों को व्याहने में संकोच करता है। जहां नारी अपीन अस्मिता को खोकर गाती है या रोती हैं- "भौरां तेारा पानी गजब करा जाए। गगरी न फूटे खसम मर जाए।' उसे परिवार की प्यास बुझाने हेतु तपती चट्टानों पर चलते हुए एक किलोमीटर से अधिक दूरी से जल लाना होता है। डॉ॰ सुरेश चन्द्र अवस्थी के अनुसार पाठा क्षेत्र के भूगर्भ में १२ किलोमीटर चौड़ी तथा ११० किलोमीटर लम्बी नदी बहती है, जिसमें से ४०००० गैलन प्रति घण्टे के हिसाब से प्राप्त किया जा सकता है। प्रतिवर्ष पेयजल हेतु ६०-७० करोड़ रुपये का बजट बनता है पर प्रतिफल कुछ नहीं - यह दुर्भाग्य ही है या जीवन के साथ खिलवाड़।

डॉ॰ भारतेन्दु प्रकाश ने "जल बिच मीन प्यासी' पुस्तिका में जल सम्भरण के आधार पर जनपद सतना को भी विशेषकर मझगवां विकास खण्ड को बुन्देलखण्ड का महत्वपूर्ण अंश माना है जो भाषाई और सांस्कृतिक संबंधों से ही नहीं जल प्रवाह व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। कुंवर महावीर सिंह - एम.एल.ए. के अनुसार बुन्देलखण्ड - उ.प्र. का दूसरा नाम सूखा और अकाल क्षेत्र है। सन् १९०६-५१ के बीच २० वर्ष सूखा पड़ा। सन् १९५६-५८ के बीच सिंचित क्षमता मात्र २३.३५ प्रतिशत है। १०० वर्ष पूर्व पारिवारिक सदस्य अपने पुत्र-पुत्रियों को अकाल के समय २-४ जून भोजन के प्राप्ति के बदले बेच देते थे और असहाय होकर आत्महत्या स्वयं कर लेते थे।

आवश्यकता है कि दीर्घावधि की योजनाएं बनाई जाएं, नदियों और नालों में बांध-बन्ध्यिा बनाई जाएं तथा वृक्षारोपण अभियान दृढ़तापूर्वक चलाए जाएं। एक इकाई के रूप में बुन्देलखण्ड अपने वृहद संसाधनों का अपने अनुरुप पूर्णरुपेण विकास करने में सर्वसमर्थ है।

बुन्देलखण्ड - क्षेत्रफल एवं जनसंख्या[संपादित करें]

१. बांदा - चित्रकूट ७३२४ वर्ग किलोमीटर १८.७४ लाख २. हमीरपुर - महोबा ७१६५ वर्ग किलोमीटर १४.६५ लाख ३. झांसी ५०२४ वर्ग किलोमीटर १४.२६ लाख ४. ललितपुर ५०३९ वर्ग किलोमीटर ७.४५ लाख ५. जालौन ५५६५ वर्ग किलोमीटर १२.१७ लाख ६. पन्ना ७१३५ वर्ग किलोमीटर ५.९५ लाख ७. छतरपुर ८६८७ वर्ग किलोमीटर ९.३५ लाख ८. टीकमगढ़ ५०४८ वर्ग किलोमीटर ७.८१ लाख ९. दतिया २०३८ वर्ग किलोमीटर ३.०७ लाख १०. दमोह ७३०६ वर्ग किलोमीटर ७.३४ लाख ११. सागर १०२५२ वर्ग किलोमीटर ११.६५ लाख संलग्न क्षेत्र लहर - दतिया

तथा अन्य योग २२०० वर्ग किलोमीटर १२.५६ लाख सन् २००० ई. में जनसंख्या अनुमानतः औद्योगीकरण विकास के उपरान्त दो करोड़ होने की संभावना है।