बीना

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बीना सागर जिला की एक तहसील और विधानसभा क्षेत्र है। यह पश्चिम मध्य रेल्वे का बड़ा जंक्शन है। इस क्षेत्र से दो प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक ३ एवं क्रमांक २६ गुजरते है। यह इलाका मुख्यत: मध्‍यप्रदेश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में स्थित मालवा के पठार पर स्थित है।

Bina
Bina
Bina की मध्य प्रदेश के मानचित्र पर अवस्थिति
Bina
Bina
Location in Madhya Pradesh, India
निर्देशांक: 24°10′48″N 78°12′0″E / 24.18000°N 78.20000°E / 24.18000; 78.20000निर्देशांक: 24°10′48″N 78°12′0″E / 24.18000°N 78.20000°E / 24.18000; 78.20000
CountryFlag of India.svg भारत
StateMadhya Pradesh
DistrictSagar
क्षेत्रफल
 • कुल42 किमी2 (16 वर्गमील)
ऊँचाई413 मी (1,355 फीट)
जनसंख्या (2011)
 • कुल175[1]
Languages
 • OfficialHindi
समय मण्डलIST (यूटीसी+5:30)
PIN470113
वाहन पंजीकरणM.P-15

1. History of bina

दर्शनीय स्थल खिमलासा, बीना मध्यप्रदेश .INDIA

                                               -  संकलित लेख

प्राचीन नाम क्षेमोल्लास !!संस्कृत नाम!! विशुद्ध संस्कृत नाम है ! काल क्रम में कमलासा हो गया ! वर्तमान में खिमलासा नाम से जाना जाता है ! प्राचीनकाल में यह शिक्षा का केन्द्र था !

  • खिमलासा को सन 1490 ई. में बसाया गया ! जो शिला लेखों में उल्लेख है ! शिलालेख हिंदी और अरबी में मिलते हैं !
  • यहाँ अचलोबाई नाम की एक प्रसिद्ध विदूषी महिला हुई हैं ! जो हाथ से संस्कृत के पत्रे लिखती थी ! संस्कृत शिक्षा प्रसार के लिए कार्य किये ! दूर दूर से यहाँ विद्वान आते रहते थे ! संस्कृत शिक्षा के कई गुरुकुल थे !

संस्कृत के पठन पाठन का बडा प्रसार था !

  • प्राचीन काल में खिमलासा को काशी का टुकडा कहा जाता था !
  • इस नगर की संरचना कमल के समान है ! उस समय यहाँ कमल की खेती बहुतायत में होती थी ! नगर ऊचाई से देखने से कमल के फूल के समान प्रतीत होता है !
  • खिमलासा गढ मंडला की महारानी दुर्गावती के स्वसुर संग्राम सिंह के 52 गढों /किलों में से एक था !
  • सन् 1541 ई. में संग्राम सिंह की मृत्यु हुई थी !
  • 14 वी, से 16 वी सदी में यह क्षेत्र मुगलों के अधीन रहा !
  • बाद में महाराज छत्रसाल ने गढाकोटा, धामोनी, खिमलासा को मुगलों को परास्त कर अपना राज्य स्थापित किया !
  • सन् 1695 ई. में पन्ना के राजा अनूप सिंह का शासन रहा ! अनूप सिंह ने ही नगर के चारों ओर 20 फीट ऊची रक्षा दीवार /चार दीवारी, बुर्जे बनवायी !
  • शीश महल का निर्माणराजपूतों ने कराया था ! उस समय शीश महल में शीशे आयने लगे होते थे !
  • प्राचीन बाजार भवन व्यवस्था उच्चस्तरीय थी !
  • सन् 1746 ई. में खिमलासा बुंदेलों के पास से पेशवा के पास चला गया !

पेशवा ने 1818 में खिमलासा को अग्रेजों को सौप दिया !

  • 1818 के पश्चात यह क्षेत्र ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो गया ! सन् 1834 ई. में खुरई से जोड दिया गया !
  • सन् 1857 में बानपुर के राजा ने खिमलासा खुरई को अपने अधिकार में ले लिया !
  • सन् 1861 में प्रशासनिक व्यवस्था के लिए नागपुर क्षेत्र में मिला लिया गया !
  • यह व्यवस्था 1956 तक नये मध्यप्रदेश राज्य के गठन तक बनी रही !
  1. समृद्ध इतिहास, पुरातात्विक साक्ष्यों को सहेजे मूक किले दरवाजे, प्राचीन तोप, इमारतें शिलालेख, कलाकृतिया, चाहरदीवारी, बुर्जे, बावडी, कुंड, शीश महल/ नगीना महल, बारहदरी,डोयला,पुरातात्विक स्मृतियां खंडहर रुप में आज भी संरक्षण की राह देख रहीं हैं !
  • पूर्ण संरक्षण नहीं मिल पाने के कारण और सरकार द्वारा स्थानीय स्तर पर संग्रहालय स्थापित नहीं होने के कारण कई ऐतिहासिक पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं, कलाकृती, नगर वास्तु, मूर्ती व शिल्पकला अब जीर्णशीर्ण स्थिति, खंडहर स्थिति में हैं !

संदर्भ स्रोत - गजेटियर सागर रायबहादुर हीरालाल 1922 सागर सरोज 1922

  • दर्शनीय स्थल खिमलासा बीना म.प्र. INDIA

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संकलन - संकलित आलेख: उदयभान कुशवाहा बीना 470113


2. History of bina एरण बीना मध्यप्रदेश INDIA

  1. एरण ऐतिहासिक ताम्रपाषण कालीन संस्कृति

- संकलित लेख

  1. एरण बीना मध्यप्रदेश का ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल है ! यह म.प्र. के सागर जिले की बीना तहसील में बीना नदी से लगा हुआ समृद्ध नगर था ! वर्तमान नाम एरन जो अब गांव के रुप में है ! यह बीना जंक्शन से 25 कि.मी. और सागर से 90 कि.मी. दूरी पर है ! एरण नाम रखे जाने का एक कारण बीना नदी और बेतवा नदी के संगम पर अत्याधिक मात्रा में उगने वाली "एराका" नामक घास के कारण रखा गया ! यह घास प्रदाह प्रशामक तथा मंदक गुणधर्म वाली होती है !

एक अन्य कारण एरण से प्राप्त सिक्कों पर नाग चित्र हैं ! अत: इस स्थान का नामकरण "एरिका" अर्थात नाग से हुआ ! प्राचीन काल में ऐरण पर नागवंश के शासकों का अधिकार था ! एरण के प्राचीन काल के इतिहास के बारे में मिले पुरातात्वीय अवशेष हालाकि गुप्तकाल के हैं ! लेकिन यहाँ मिले सिक्कों से ज्ञात होता है कि ईसा पूर्वकाल में भी यह स्थान आबाद था ! एरण के बारे में माना जाता है कि यह नगर गुप्तकाल में एक महत्वपूर्ण नगर था ! प्राचीन संदर्भ ग्रंथों के अनुसार *जनरल कनिंघम ने सर्वप्रथम प्राचीन एरिकिण नगर की पहचान एरण से की ! एरण को स्वभोग नगर कहा जाता था ! कुछ विद्वानों के अनुसार एरण जेजक भुक्ति की राजधानी रहा है ! विष्णु स्तंभ पर उत्कीर्ण लेख में गुप्त संवत 165 , ( 464 ईस्वी ) अंकित है ! इस लेख के अनुसार गुप्त सम्राट बुद्धगुप्त के राज्यकाल में नर्मदा और यमुना नदियों के बीच वाले प्रदेश के शासक सुरश्मिचंद्र थे ! एरण के प्रादेशिक शासक मातृविष्णु थे ! मातृविष्णु और उनके भाई धन्यविष्णु द्वारा 47 फीट ऊचे एक ही पत्थर के बने, *विष्णु स्तंभ" का निर्माण कराया गया ! उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं, सिक्कों आदि से पता चलता है कि एरण स्वतंत्र राज्य के रुप में स्थापित था ! एरण में ईसापूर्व सभ्यता के अवशेष व मूर्ति शिल्प प्राप्त हुए हैं ! एरन में भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की मूर्ति प्राप्त हुई है ! इससे प्रमाणित होता है ! कि भगवान विष्णु के अनुयायी का लम्बे समय तक एरण क्षेत्र में शासन रहा !

  • एरण की स्थिति भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही है ! यह एक ओर बुंदेलखंड का प्रवेश द्वार है दूसरी ओर मालवा का प्रवेश द्वार है ! पूर्वी मालवा सीमा पर स्थित होने के कारण यह दशार्ण को चेदी जनपद से जोडता था ! सैनिक नियंत्रण की दृष्टि से भी एरण को गुप्त वंश के शासकों ने अच्छा माना ! एरण प्राचीन महापथ जो कि उज्जैन से साँची तक जाता था के समीप मार्ग पर स्थित है !
  • ऐतिहासिक महत्व को इस स्थान के उत्खनन में यहाँ के टीलों से प्राप्त सामग्री, मृदभांड एवं #स्तरविन्यास के आधार पर ज्ञात संस्कृतियां #ताम्रयुग से लेकर #उत्तरमध्यकाल तक का #क्रमिकइतिहास बनाती है ! पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि एक समय में एरण एक वैभवशाली नगर हुआ करता था ! यहाँ की वास्तुकला तथा मूर्तिकला को हमेशा एक विशेष मान्यता दी गयी है ! कनिंघम ने यहाँ से प्राप्त मुद्राओं को तीन भागों में वर्गीकृत किया है ! आहत मुद्रायें, ठप्पाकिंत मुद्रायें, तथा सांचे द्वारा निर्मित मुद्रायें ! इन मुद्राओं में हाथी, घोडा, वेदिका, वृक्ष, इन्द्रध्वज, वज्र, उज्जैन चिंह्र, मत्स्य, कच्छप आदि चिंह्र प्रमुख हैं ! प्राचीन काल में एरण में मुद्रा टकसाल थे ! एरण में पुराअवशेषों का विशाल संकलन है ! खंडहर रुप में डांगी शासकों द्वारा बनवाये गये किले के अवशेष मौजूद हैं !
  • एरण के पास स्थित पहलेजपुर गांव में अष्टकोणीय स्तंभ है ! इसका शीर्ष भाग गोलाकार है ! जिस पर सती प्रथा के सम्बन्ध में भारत में ज्ञात सबसे प्राचीनतम लेख उत्कीर्ण है !
  • एरण से प्राप्त अभिलेखों में प्रमुख अभिलेख है -
  • शक शासक श्रीधर वर्मन अभिलेख
  • गुप्त सम्राट समुद्रगुप्त का अभिलेख
  • गुप्त सम्राट बुद्धगुप्त का अभिलेख
  • हूण शासक तोरभाण का अभिलेख
  • गुप्त सम्राट भानुगुप्त का समकालीन अभिलेख (गोपराज सती स्तंभ अभिलेख)
  • एरण में मूर्ति शिल्प -
  • 1. वाराह मूर्ति - एरण में विष्णु अवतार महावाराह प्रतिमा जो #भारत में प्राचीन सबसे विशाल बडी प्रतिमा है ! जिसकी ऊचाई लगभग 10 फीट है ! इसका निर्माण एक मीटर ऊचे पत्थर के चबूतरे पर किया गया है ! उसके गले में चारों ओर एक पट्टे पर उत्कीर्ण छोटी छोटी मानव आकृतियों की एक माला है ! शरीर छोटी छोटी वर्तुलाकार अलंकरणों से आच्छादित है ! नारी के रुप में प्रस्तुत की गयी पृथ्वी को दाहिने दांत से सहारा देकर ऊपर उठाया हुआ दर्शाया गया है ! पृथ्वी प्रतिमा का कंधे वाला भाग खंडित है ! स्त्री रुप स्पष्ट दिखाई देता है ! वाराह के पीठ और कंधों और चारों पैरों पर सामने की ओर कमंडल लिए हुए ऋषियों / देव आकृतियां उत्कीर्ण हैं और राशियों का चित्रण है ! दक्षिण दिशा की ओर से देखने पर एक दांत स्पष्ट रुप से दिखाई देता है !
  • वाराह के वक्ष के सामने भाग पर #धन्यविष्णु का आठ पक्तियों का एक लेख ब्रम्ही लिपी में लिखा

है ! जिसमें एरण के प्रादेशिक शासक #मातृविष्णु द्वारा मंदिर बनवाये जाने का उल्लेख है !

  • 2. विष्णु प्रतिमा - पूर्व मुखी भगवान विष्णु की आदम कद प्रतिमा जिसकी ऊचाई लगभग 8 फीट है ! इसका निर्माण एक मीटर ऊचे पत्थर के चबूतर पर किया गया है ! उक्त मूर्ति वाराह प्रतिमा के समान्तर है ! एरण की गुप्तयुगीन विष्णु प्रतिमा में गोलाकार प्रभा मंडल शैल के विकसित स्वरुप का प्रतीक है !
  • 3. विष्णु मंदिर - विष्णु प्रतिमा के सामने ही चार स्तंभों पर खंडित मंदिर स्थित है ! इसके दोनो ओर गंगा यमुना की खंडित मूर्तियां हैं ! नाग पाश की आकृतियां अंकित हैं ! मंदिर के तीनों स्तंभों पर नाग पाश की आकृति उत्कीर्ण हैं ! मंदिर के मध्य भाग में गरुण की खंडित प्रतिमा है !
  • 4. नरसिंह प्रतिमा - पूर्व मुखी नरसिंह की आदमकद प्रतिमा जिसकी ऊचाई लगभग आठ फीट है ! एक मीटर ऊचे पत्थर के चबूतरे वाराह और विष्णु प्रतिमा के समानान्तर लेटी हुई अवस्था में रखा गया है ! उक्त प्रतिमा वर्तमान में खंडित अवस्था में है !
  • 5. विष्णु स्तंभ - यह एक ही पत्थर का बना 47 फीट ऊचा स्तंभ है ! स्तंभ का निचला भाग बीस फीट जो वर्गाकार है ! चौडाई दो फीट गुणित 10.25 है ! बीस फीट के ऊपर का भाग अष्टकोणीय है ! इसके ऊपर झालरदार घंटाकृति है ! जिसके ऊपर स्तंभ शीर्ष एक वर्गाकार तराशे हुए पत्थर पर रखा है ! शीर्ष पर पूर्व और पश्चिम मुखी एक दूसरे के विपरीत दिशा में सर्प पकडे हुए गरुण की मानव आकृति की प्रतिमा विद्यमान है ! शीर्ष वर्गाकार पत्थर पर चारों कोनों पर चार शेर की आकृति हैं ! जो देखने में आठ शेर होना प्रतीत होते हैं ! स्तंभ के पश्चिम दिशा में उत्कीर्ण लेख में गुप्त संवत 165,

(464 ईसवी)अंकित है ! इस लेख के अनुसार गुप्त सम्राट बद्धगुप्त के राज्यकाल में यमुना और नर्मदा के बीच वाले प्रदेश के शासक सुरश्मिचंद थे ! एरण के प्रादेशिक शासक मातृविष्णु थे ! उनके छोटे भाई धन्यविष्णु द्वारा विष्णुस्तंभ का निर्माण कराया गया !

  • 6. द्वीप स्तंभ - विष्णुस्तंभ के समान्तर एक पत्थर के चबूतरे पर गोलाई में लगभग 15 फीट ऊचाई का स्तंभ स्थित है ! जिसका ऊपरी हिस्सा वर्गाकार है ! जिस पर स्तंभशीर्ष उपलब्ध नहीं है !
  • 7. अन्य स्तंभ - विष्णु स्तंभ या गरुड स्तंभ के समीप ही दक्षिण दिशा में ध्वस्त मंदिर के भग्नावेश मंदिर निर्माण के स्तंभों को एक जगती पर खडा किया गया है ! इन स्तंभों पर मंगल घट, कीर्तिमुख, पत्रावली आदि का चित्रण है ! इन स्तंभों के नीचे जो आधार है ! उन पर अनेक पौराणिक दृश्य जिनमे कृष्णलीला से संबंधित दृश्य उत्कीर्ण हैं !
  • 8. अष्टकोणीय स्तंभ - ऐरण के समीप आधामील दूरी पर पहलेजपुर में एक दूसरा अष्टकोणीय स्तंभ है ! इसका शीर्ष भाग गोलाकार है ! जिस पर #भारत में प्रथम ज्ञात सती लेख उत्कीर्ण है !
  • 9. विष्णु वाराह प्रतिमा - एरण के समीप बीना नदी के तट पर विष्णु की वाराह प्रतिमा प्राप्त हुई है ! प्रतिमा का मुख वाराह का नीचे का शेष शरीर मानव का है ! उक्त प्रतिमा पर अंकित ब्रह्मी लिपी लेख से ज्ञात होता है कि महेश्वरदत्त तथा वाराहदत्त के द्वारा मूर्ति की स्थापना चौथी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में करायी गयी थी ! वर्तमान में यह मूर्ति डाँ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर के संग्रहालय में संरक्षित है !
  • 10. महिषामर्दिनी देवी प्रतिमा, गुप्तकाल - एरण के उत्खनन में गुप्तकालीन महिषामर्दिनी देवी की प्रतिमा प्राप्त हुई है ! जो वर्तमान में डाँ हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय में सुरक्षित है !

मातृविष्णु तथा धन्यविष्णु नामक भाईयों ने विष्णु का ध्वजस्तंभ बनवाया था ! उनकी एक पीढी के बाद हूणों ने एरण पर आक्रमण किया ! उस बडे युद्ध में गुप्त राजा भानुगुप्त की पराजय हूई ! उनके सेनापति गोपराजा वीरगति को प्राप्त हुए ! हूण राजा तोरमाण ने भानुगुप्त को पराजित किया ! नृवाराह की मूर्ति प्रारंभिक गुप्तकाल के बाद की है ! जिससे प्रतीत होता है कि हूण राजा तोरमाण के बाद पुन: गुप्तवंश के राजाओ द्वारा पुन: एरण को वापस जीत लिया था ! समुद्रगुप्त के एरण अभिलेख में लिखा है - "स्वभोग नगर ऐरिकरण प्रदेश !" अर्थात स्वभोग के लिए समुद्रगुप्त ऐरिकिण जाता रहता था !

संदर्भ स्त्रोत -

  • मोहन लाल एरण की ताम्रपाषण संस्कृति सागर, 2009
  • नागेश दुबे, मोहन लाल एरण एक परिचय अरकंटक 2016
  • मोहन लाल एरण एक सांस्कृतिक धरोहर 2016
  • ऐतिहासिक एरण

नोट - यह संकलित लेख जनसामान्य को एरण की महान विरासत के प्रति जोडने जागरुक बनाने के उद्देश्य से साभार संकलित है ! ऐतिहासिक तथ्यात्मक जानकारी हेतू विषय विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं की जानकारी को ही आधार बनाया जाये !

संकलित लेख साभार - संकलन - उदयभान कुशवाहा बीना 470113


3. History of bina


कंजिया बीना ऐतिहासिक स्थल संदर्भ स्रोत - गजेटियर सागर, रायबहादुर हीरालाल, सागर सरोज 1922,

  • प्राचीन नाम करंजिया वर्तमान नाम कंजिया अर्थात कंजी वृक्ष वाला क्षेत्र ! कंजिया को बुंदेला सरदारों ने बसाया था ! उनके वंशज शाहजू का बनवाया किला कंजिया गाँव के दक्षिण में खंडहर स्थित में विद्यमान है ! इस किले के चारों कोनों पर चार मीनार हैं ! किले का भीतरी भाग जीर्ण अवस्था में है !
  • यहाँ एक ईदगाह है जो शाहजहाँ के समय में सन् 1640 में बनवायी गयी थी ! उस समय कंजिया का जागीरदार सफदार खां था ! यहाँ कई मस्जिदें भी हैं !
  • सन् 1702 में कंजिया के जागीरदार सोहकरन ने एक मस्जिद बनवायी थी !
  • बुंदेलों को कंजिया इलाका खास मुगल बादशाह के यहाँ से मिला था !
  • सन 1725 ई. में कंजिया के जागीरदार विक्रमजीत थे ! उन्होने कई इमारतों का निर्माण कराया ! विक्रमजीत के कुरवाई के नवाब से युद्ध हुए !

पन्ना के महाराजा छत्रसाल ने कंजिया दो बार युद्ध किया ! कंजिया को उजाड दिया ! पहली बार उसने सैयद बहादुर से युद्ध किया ! दूसरी बार तहबर खां से युद्ध किया ! लोक कथाओ में कहा जाता है - लूट ग्वालियर मुलक उजारयो, बहाते दौरि कंजिया मारयो, कुम्भराज कंजिया उजारयो, कटूकन कचरि कुंवरपुर डरयो !

  • मराठों ने कंजिया परगना नवाब से लेकर अपने सरदार खंडेराव त्रिंवक को दे दिया !
  • जब सन् 1818 ई. में पेशवा ने सागर जिला अग्रेजों को सौपा तब कंजिया परगना अदल बदल में सिंधिया सरकार को चला गया ! तब खंडेराव त्रिंवक के पुत्र रामभाऊ को इटावा परगना दिया !
  • सन् 1857 ई. में बुंदेलों ने सिधिया की फौज को हराकर विक्रमजीत के वंशज को कंजिया परगना की गद्दी पर बिठाया !
  • सन् 1860 ई. में फिर अदल बदल की गयी ! जिसमें कंजिया अग्रेजी राज्य में आ गया !

कंजिया में कई युद्ध हुए ! यहाँ गज शहीद है ! इसमें कई युद्धरत वीर गढे हैं ! इस क्षेत्र में बहुत से सती चीरे हैं ! कंजिया परगना में 105 गाँव लगते थे !

  • सिंधिया द्वारा स्थापित सहस्त्र शिवलिंग वेतवा नदी घाट पर वर्तमान में भी स्थापित है !

साभार संकलन - उदयभान कुशवाहा बीना 470113

भौगोलिक स्थिति[संपादित करें]

बीना सागर जिला की एक तहसील और विधानसभा क्षेत्र है। यह पश्चिम मध्य रेल्वे का बड़ा जंक्शन है। इस क्षेत्र से दो प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक ३ एवं क्रमांक २६ गुजरते है। यह इलाका मुख्यत: मध्‍यप्रदेश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में स्थित मालवा के पठार पर स्थित है। इसके भौतिक स्वरूप की विशेषता धसान, बेबस, सुनार, कोपरा और बामनेर नदियों की पांच समानांतर घाटियां है। यह समुद्र तल से ६८३.४ मीटर की ऊचाई पर स्थित है। यह क्षेत्र गंगा-यमुना के जलग्रहण क्षेत्र में स्थित है। मुख्यत: गेहूं, धान, ज्वार, मक्का, चना, तुअर, सोयाबीन एवं तिल का उत्पादन होता है। अन्य फसले सब्जियां फल आदि की भी पैदावार होती है।

बीना तेल रिफाइनरी[संपादित करें]

ीना

बीना तेल रिफायनरी[संपादित करें]

बीना के निकट आगासौद में भारत ओमान तेल रिफायनरी की स्थापना के अतिरिक्त बिजली उत्पादन केंद्र बनाए जा रहे है। रिफायनरी के लिए कच्चा तेल गुजरात से प्राप्त होगा। उद्योगों के उप उत्पादों से अन्य सहयोगी अनुशंसी उद्योगों को कच्चा माल उपलब्ध होगा जिससे रोजगार के अवसर बनेंगे और इस इलाके का आर्थिक एवं सामाजिक विकास होगा।

मध्यप्रदेश नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम 1973 की धारा 4 के अंतर्गत मध्यप्रदेश शासन के आवास एवं पर्यावरण विभाग की अधिसूचना क्रमांक एफ-3/32 दिनांक 13 मई 1999 से तीन जिले (सागर, विदिशा, गुना) को मिलाकर बीना पेट्रोकेमिकल औद्योगिक रीजन घोषित किया गया है। पेट्रोलियम रिफायनरी की स्थापना का उद्देश्य इस क्षेत्र के आस-पास के क्षेत्रों में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, भौतिक एवं पर्यावरणीय विकास में संरक्षित समन्वय स्थापित करना, क्षेत्रीय असंतुलन, पिछड़ापन, बेरोजगारी दूर करना एवं पलायन को रोकना है। इसके साथ ही साथ ऊर्जा, यातायात एवं परिवहन, आर्थिक एवं सामाजिक सेक्टर में उच्च स्तरीय अधोसंरचनाओं को विकसित करना है।[2]

बाह्य कडियां[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "Bina- Etawa Population". Census 2011. census2011.co.in. अभिगमन तिथि 13 April 2017.
  2. [1]