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बीजाणुद्भिद

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बीजाणुद्भिद (Sporophyte) पादपों और शैवालों के जीवन चक्र में पाई जाने वाली एक बहुकोशिकीय, द्विगुणित (Diploid, 2n) अवस्था है। यह पीढ़ियों के एकांतरण (Alternation of generations) प्रदर्शित करने वाले जीवों के जीवन चक्र का वह चरण है जो अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा बीजाणु उत्पन्न करता है। बीजाणुद्भिद की प्रत्येक कोशिका में गुणसूत्रों के दो समुच्चय (Two sets of chromosomes) उपस्थित होते हैं।

बीजाणुद्भिद का विकास एक द्विगुणित युग्मनज (Zygote) से होता है, जो नर और मादा युग्मकों के संलयन (निषेचन) से बनता है। समय के साथ, पादप जगत के विकासक्रम में बीजाणुद्भिद अवस्था अधिक प्रभावी और जटिल होती गई है।[1]

जीवन चक्र में भूमिका

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बीजाणुद्भिद पीढ़ी का प्रमुख जैविक कार्य अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) द्वारा अगुणित बीजाणुओं का निर्माण करना है, जिसके परिणामस्वरूप आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है:

  1. उत्पत्ति: इसका निर्माण सदैव एक द्विगुणित युग्मनज (2n) से समसूत्री विभाजन (Mitosis) द्वारा होता है।
  2. बीजाणु निर्माण: परिपक्व होने पर, बीजाणुद्भिद की विशेष कोशिकाओं (बीजाणु मातृ कोशिकाओं) में 'अर्धसूत्री विभाजन' होता है, जिससे अगुणित बीजाणु (Haploid Spores) बनते हैं। ये बीजाणु अंकुरित होकर युग्मकोद्भिद (Gametophyte) पीढ़ी को जन्म देते हैं।[2]== विकासीय प्रवृत्ति (Evolutionary Trend) ==

स्थलीय पादपों (Land Plants) के विकास में बीजाणुद्भिद का महत्त्व बढ़ता गया है। जहाँ शैवालों में यह अवस्था गौण थी, वहीं संवहनी पादपों में यह मुख्य शरीर बन गई। द्विगुणित अवस्था (Diploidy) ने पादपों को हानिकारक उत्परिवर्तनों को छिपाने (Masking mutations) और स्थलीय वातावरण के अनुकूल जटिल ऊतक (जैसे जाइलम और फ्लोएम) विकसित करने की क्षमता प्रदान की।[3]

विकासीय प्रवृत्ति (Evolutionary Trend)

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स्थलीय पादपों (Land Plants) के विकास में बीजाणुद्भिद का महत्त्व बढ़ता गया है। जहाँ शैवालों में यह अवस्था गौण थी, वहीं संवहनी पादपों में यह मुख्य शरीर बन गई। द्विगुणित अवस्था (Diploidy) ने पादपों को हानिकारक उत्परिवर्तनों को छिपाने (Masking mutations) और स्थलीय वातावरण के अनुकूल जटिल ऊतक (जैसे जाइलम और फ्लोएम) विकसित करने की क्षमता प्रदान की।[3]

विभिन्न पादप समूहों में विविधता

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शैवाल (Algae)

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अधिकांश शैवालों (जैसे वॉल्वॉक्स) में बीजाणुद्भिद अवस्था अनुपस्थित या केवल एककोशिकीय युग्मनज (Zygote) तक सीमित होती है। हालाँकि, कुछ शैवालों (जैसे केलप और लैमिनेरिया) में बीजाणुद्भिद विशाल और प्रभावी होता है।

ब्रायोफाइटा (Bryophytes)

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मॉस (Moss) और लिवरवर्ट्स में बीजाणउद्भिद, युग्मकोद्भिद की तुलना में छोटा और अल्पकालिक होता है। यह प्रकाश-संश्लेषण के लिए और भौतिक आधार के लिए मुख्य पौधे (युग्मकोद्भिद) पर आश्रित रहता है। इसमें तीन मुख्य भाग होते हैं: पाद (Foot), सीटा (Seta) और कैप्सूल (Capsule)।[2]

यह आरेख एक फर्न के पौधे को दर्शाता है, जो एक स्वतंत्र और प्रभावी बीजाणुद्भिद है। इसमें वास्तविक जड़ें, भूमिगत तना (Rhizome) और पत्तियां दिखाई गई हैं, साथ ही बीजाणुओं के निर्माण का स्थान (Sporangia) भी चिह्नित है।
टेरिडोफाइटा (फर्न) के प्रभावी बीजाणुद्भिद (2n) की संरचना।

टेरिडोफाइटा (Pteridophytes)

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फर्न (Fern) में बीजाणुद्भिद मुख्य, प्रभावी और स्वतंत्र पादप शरीर होता है। इसमें वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं। यह संवहनी ऊतकों से युक्त होता है और प्रकाश-संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाता है।[1]

अनावृतबीजी और आवृतबीजी (Seed Plants)

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सभी बीज वाले पौधों (जिम्नोस्पर्म और एंजियोस्पर्म) में, बीजाणुद्भिद ही वह मुख्य पौधा है जिसे हम देखते हैं (जैसे आम का पेड़ या गुलाब का पौधा)। यहाँ युग्मकोद्भिद अत्यंत सूक्ष्म हो जाता है और बीजाणुद्भिद के भीतर ही विकसित होता है। इनमें दो प्रकार के बीजाणु बनते हैं (विषमबीजाणुता या Heterospory):

  • लघुबीजाणु (Microspores): जो नर युग्मकोद्भिद (परागकण) बनाते हैं।
  • गुरुबीजाणु (Megaspores): जो मादा युग्मकोद्भिद (भ्रूणकोष) बनाते हैं।[2]

जनन संरचनाएँ

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बीजाणुद्भिद पर विशेष संरचनाएँ पाई जाती हैं जहाँ बीजाणु बनते हैं:[1]

  • बीजाणुधानी (Sporangium): वह थैलीनुमा संरचना जिसके भीतर अर्धसूत्री विभाजन होता है।
  • बीजाणु पर्ण (Sporophyll): वे पत्तियाँ जिन पर बीजाणुधानियाँ लगी होती हैं (जैसे फर्न में)।
  • शंकु (Strobili/Cones): जिम्नोस्पर्म में बीजाणुधानियाँ सघन होकर शंकु का निर्माण करती हैं।== आनुवंशिक महत्त्व ==
  1. उत्परिवर्तन से सुरक्षा: द्विगुणित (2n) होने के कारण, बीजाणुद्भिद में प्रत्येक जीन की दो प्रतियाँ होती हैं। यदि एक प्रति में हानिकारक उत्परिवर्तन हो जाए, तो दूसरी स्वस्थ प्रति उसे छिपा लेती है (Masking effect)। यह जीवों को जटिल और बड़ा होने की अनुमति देता है।
  2. आनुवंशिक पुनर्संयोजन: बीजाणुद्भिद में होने वाला अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) 'क्रॉसिंग ओवर' (Crossing over) की प्रक्रिया द्वारा नए जीन संयोजन बनाता है, जो विकास और अनुकूलन के लिए आवश्यक है।

आनुवंशिक महत्त्व

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  1. उत्परिवर्तन से सुरक्षा: द्विगुणित (2n) होने के कारण, बीजाणुद्भिद में प्रत्येक जीन की दो प्रतियाँ होती हैं। यदि एक प्रति में हानिकारक उत्परिवर्तन हो जाए, तो दूसरी स्वस्थ प्रति उसे छिपा लेती है (Masking effect)। यह जीवों को जटिल और बड़ा होने की अनुमति देता है।
  2. आनुवंशिक पुनर्संयोजन: बीजाणुद्भिद में होने वाला अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis) 'क्रॉसिंग ओवर' (Crossing over) की प्रक्रिया द्वारा नए जीन संयोजन बनाता है, जो विकास और अनुकूलन के लिए आवश्यक है।

सन्दर्भ

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  1. 1 2 3 Urry, Lisa A.; et al. (2020). Campbell Biology (12th ed.). Pearson. pp. 628–640. ISBN 978-0135188743.
  2. 1 2 3 Evert, Susan E.; Eichhorn (2013). Raven Biology of Plants (8th ed.). W. H. Freeman. pp. 350–360. ISBN 978-1429219617.
  3. 1 2 Niklas, Ulrich; Kutschera (2010). "The evolution of the land plant life cycle". New Phytologist. 185 (1): 27–41. डीओआई:10.1111/j.1469-8137.2009.03054.x.