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बीजाणुउद्भिद

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बीजाणुद्भिद
(Sporophyte)

बीजाणुद्भिद (Sporophyte) की मूल अवधारणा को दर्शाने वाला आरेख।
पूर्ववर्ती अवस्था युग्मनज (Zygote)
गुणसूत्र अवस्था द्विगुणित (Diploid, 2n)
कोशिका विभाजन अर्धसूत्री विभाजन (Meiosis)
मुख्य कार्य बीजाणु (Spores) का निर्माण
परवर्ती अवस्था युग्मकोद्भिद (Gametophyte)
प्रमुख पादप समूह टेरिडोफाइट्स (फर्न), बीजीय पौधे
विकिडाटा आईडी Q647173

बीजाणुद्भिद (Sporophyte) पादपों और शैवालों के जीवन चक्र में पाई जाने वाली एक बहुकोशिकीय, द्विगुणित (Diploid, 2n) अवस्था है। यह पीढ़ियों के एकांतरण वाले जीवों का वह महत्त्वपूर्ण चरण है, जो अर्धसूत्री विभाजन द्वारा बीजाणु उत्पन्न करता है। इसका विकास एक द्विगुणित युग्मनज (Zygote) से होता है, जो युग्मकों के संलयन (निषेचन) से बनता है। पादप विकासक्रम में यह अवस्था निरंतर अधिक प्रभावी और जटिल होती गई है।[1]

भूमिका एवं विकास

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बीजाणुद्भिद का प्रमुख कार्य अर्धसूत्री विभाजन द्वारा अगुणित बीजाणुओं (Haploid Spores) का निर्माण करना है। ये बीजाणु अंकुरित होकर युग्मकोद्भिद (Gametophyte) को जन्म देते हैं।[2] स्थलीय पादपों के विकास में बीजाणुद्भिद का महत्त्व काफी बढ़ा है। जहाँ शैवालों में यह अवस्था गौण थी, वहीं संवहनी पादपों में यह मुख्य शरीर बन गई। द्विगुणित अवस्था ने पादपों को हानिकारक उत्परिवर्तनों को छिपाने और जटिल ऊतक विकसित करने की क्षमता प्रदान की।[3]

पादप समूहों में विविधता

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  • शैवाल: इनमें यह प्रायः अनुपस्थित या केवल एककोशिकीय युग्मनज तक सीमित होता है।
मॉस (ब्रायोफाइट) में युग्मकोद्भिद और बीजाणुद्भिद।
  • ब्रायोफाइटा: मॉस में बीजाणुद्भिद छोटा और अल्पकालिक होता है, जो पोषण हेतु मुख्य पौधे (युग्मकोद्भिद) पर आश्रित रहता है।[4]
टेरिडोफाइटा (फर्न) के प्रभावी बीजाणुद्भिद (2n) की संरचना।
  • टेरिडोफाइटा (फर्न): यहाँ बीजाणुद्भिद एक स्वतंत्र, प्रकाश-संश्लेषक और प्रभावी पादप शरीर है, जिसमें वास्तविक जड़, तना और पत्तियाँ होती हैं।
  • बीजीय पौधे: अनावृतबीजी और आवृतबीजी पौधों में बीजाणुद्भिद ही मुख्य पौधा (जैसे विशाल पेड़) होता है। इनमें दो प्रकार के बीजाणु (लघु और गुरु) बनते हैं, और युग्मकोद्भिद सूक्ष्म होकर इसी में सुरक्षित रहता है।[5]

संरचना एवं महत्त्व

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बीजाणुद्भिद पर बीजाणुधानी, बीजाणु पर्ण या शंकु जैसी विशेष जनन संरचनाएँ होती हैं। द्विगुणित (2n) होने के कारण, इसमें प्रत्येक जीन की दो प्रतियाँ होती हैं, जिससे हानिकारक उत्परिवर्तन का प्रभाव छिप जाता है। इसके अतिरिक्त, अर्धसूत्री विभाजन में होने वाले आनुवंशिक पुनर्संयोजन (Genetic recombination) से नए जीन संयोजन बनते हैं, जो प्राकृतिक अनुकूलन और विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।[6]

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. QIU, Yin‐Long; TAYLOR, Alexander B.; McMANUS, Hilary A. (16 March 2012). "Evolution of the life cycle in land plants". Journal of Systematics and Evolution. 50 (3): 171–194. डीओआई:10.1111/j.1759-6831.2012.00188.x. आईएसएसएन 1674-4918.
  2. Niklas, Ulrich; Kutschera (2010). "The evolution of the land plant life cycle". न्यू पायतोलोजिस्ट. 185 (1): 27–41. डीओआई:10.1111/j.1469-8137.2009.03054.x. पीएमआईडी 19863728.
  3. केनरिक, पी; क्रेन, पीआर (सितम्बर 1997). "The origin and early evolution of plants on land". नैचर. 389 (6646): 33–39. डीओआई:10.1038/37918.
  4. Reski, R. (February 1998). "Development, genetics and molecular biology of mosses". Botanica Acta. 111 (1): 1–5. डीओआई:10.1111/j.1438-8677.1998.tb00670.x.
  5. बाटेमान, आरएम; डिमिचेले, ड्ब्ल्यूए (1994). "Heterospory - the most iterative key innovation in the evolutionary history of the plant kingdom". बायोलोजिकल रिव्यूज़ ऑफ़ द कैम्ब्रिज फिलोसोफिकल सोसाइटी. 69 (3): 345–417. डीओआई:10.1111/j.1469-185x.1994.tb01276.x.
  6. Hörandl, E. (June 2024). "Apomixis and the paradox of sex in plants". Annals of Botany. 134 (1): 1–18. डीओआई:10.1093/aob/mcae044. पीएमसी 11161571. पीएमआईडी 38497809.