बीजक

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बीजक भगत कबीर की मुख्य प्रामाणिक कृति है, इस कृति को कबीर पंथ की पवित्र पुस्तक मानी जाती है। मसि कागद छुवों नहीं, कलम गहों नहिं हाथ (साखी १८७) इसको पढ़ कर कितने लोग इस भ्रम में पड़ जाते हैं कि कबीर साहेब ने तो कलम-कागज छुआ ही नहीं। अतः बीजक उनकी रचना नहीं, किन्तु परिवर्तियों की है। परन्तु यह धारणा सर्वथा भ्रमपूर्ण है। उन्होंने यदि 'मसि-कागद' नहीं छुआ तो मुख से तो जनाया | अर्थात आप समय-समय पर बीजक के पद्ध मुख से कहते गये और उनको शिश्यजन लिपिबद्ध करते गये। अपनी प्रिय पुस्तक का 'बीजक' नाम आप स्वयं रखे हैं, इसी प्रकार ग्यारहों प्रकरणों के नामकरण भी आप ही द्वारा हुए हैं।

  • रमैनी
  • शब्द
  • ज्ञान चौतीसा
  • विप्रमतिसी
  • कहरा
  • बसन्त
  • चाचर
  • बेलि
  • बिरहुली
  • हिण्डोला
  • साखी

रमैनी[संपादित करें]

मूलबीह्ज पहला प्रकरण है। इसमें 'रमैनी' नामक चौरासी पद्ध हैं। २८,३२,४२,५६,६२,७०,८०,८१, रामैनियों को छोड़कर शेष सभी के निचे एक-एक साखी है। रमैनी की गति चौपाई जैसी है तथा साखी की गति दोहा जैसी | कहा जाता है इस विराट संसार में चौरासी लाख योनियाँ हैं; उनमें यह अविनाशी जीव अनादिकाल से भटकता आया है। हो सकता है योनिया चौरासी लाख से कुछ कम या विशेष हों | इनकी ठीक-ठीक गणना करना कठिन है। अतः पारख सिद्धान्त में चौरासी से चौराशी अर्थात चार राशी (मनुष्य, पिणडज, अणडज और उष्मज) लिये गये हैं। अथवा चौरासी अंगुल के मानव शरीर में यह जीव आसक्त होकर नाना खानियों में भटकता है। मनुष्य शारीर कर्मों की भूमिका होने के कारण यहीं से शरिरासक्ति पूर्वक सकाम शुभाशुभ कर्म उत्पन्न होते हैं, उन्ही के अधीन हुआ जीव जन्म-मृत्यु के प्रवाह में बहता है। अतएव जीवों को इस चौरासी के अपार दु:खों से छुड़ाने के लिये सद्गुरु ने चौरासी रमैनियाँ कही हैं।

शब्द[संपादित करें]

यह दूसरा प्रकरण है। इसमें 'शब्द' नामक ११५ पद्ध हैं। जीव अनादिकाल से खानी और वाणी के शब्द जाल में उलझा हुआ है। अतएव इस उल्झन को मिटाने के लिये आपने दुसरे प्रकरण का नाम 'शब्द-प्रकरण' तथा उसमें आये हुए पदों का भी नाम शब्द रखा है। निर्णय शब्दों-द्वारा ही समस्त भा्न्तियाँ कटती हैं।

ज्ञान चौंतीसा[संपादित करें]

यह तीसरा प्रकरण है। इसमें चौंतीस चौंपाइयाँ हैं। पहली ॐकार की व्याख्या करने वाली को जोड़ लेने से पैंतीस हो जाती हैं। पहली चौपाई में यह बताया गया है कि 'ॐ' यह शब्द मनुष्य जीव की कल्पना है। ॐ को लिखकर और काट देने में जो समर्थ है, वह मनुष्य जीव सर्वतन्त्र-स्वतन्त्र है। अन्य चौंतीसों चौपाइयों में क से ह तक के वर्णों पर सुन्दर उपदेश हैं। उपर्युक्त चौंतीस अक्षरों में ही ही खाणी-वाणी के समस्त शब्द-जाल हैं। उनसे निवृत्ति प्राप्त करने के लिये निर्णय शब्दों को लेना चाहिये। मनुष्य को स्वतन्त्र विवेक करना चाहिये। केवल शब्द-प्रमाण की ही दोहाई नहीं खींचते रहना चाहिये। इस पर सद्गुरु ने २४ वीं रमैनी में कहा है :- चौंतीस अक्षर से निकले जोई ! पाप पुण्य जानेगा सोई ! अर्थात जो चौंतीस अक्षरों (शब्द-प्रमाण के जालों) से निकल कर स्वतन्त्र विवेक-विचार करेगा, वाही यथार्थ पाप-पुण्य तथा सत्यासत्य समझ सकेगा।

विप्रमतीसी[संपादित करें]

यह चौथा प्रकरण है। यह विप्र + मति +तीसी है। अर्थात तीस चौपाइयों में ब्राहम्णों की मति का वर्णन है। इन तीस चौपाइयों के साथ अन्त में एक साखी है। इसमें सद्गुरु के जीवन काल के तात्कालिक ब्राहम्णों के चरित्रों का सुन्दर चित्रण है। इसमें ब्राहम्णों के सिद्धान्त की मुख्य-मुख्य बातों पर कोई आलोचना नहीं प्रस्तुत की गयी है; प्रत्युत उनके सिद्धांन्त के अनुकूल ही चर्चा करते हुए, उनमें आये हुए स्वार्थ, दम्भ, पाखण्ड, दुष्ट-आचरण, हीन-भावना तथा दोष-पक्षों पर ही उपालम्भ पूर्वक आलोचनायें की गयी है। उन्हें अपने आप में सम्हलकर पूर्ण मानवता को विकसित करने को प्रोत्साहित किया गया है।
इसमें यह बताया गया है कि संसार में जड़ और चेतन दो पदार्थ हैं। उन दोनों के, जड़-चेतन छोड़कर अन्य कोई जाति-वर्ण नहीं हैं। अर्थात पृथ्वी, जल, तेज, वायु से बने हुए शरीर भी सबके एक समान हैं और चेतन हंस भी सबमें एक समान है। जीव के नाते प्राणिमात्र सजाति हैं और दैहिक-दृष्टी से मानवमात्र सजाति हैं। पवित्र आचरण वाला ही श्रेष्ठ है तथा हीन आचरण वाला ही बुरा है, परन्तु उस हीन व्यक्ति के साथ भी हमें सौहार्द्र एवं मैत्री का बर्ताव इसलिये करना है कि जिससे वह हीन-आचरण छोड़कर ऊपर उठे |

कहरा[संपादित करें]

यह पाँचवाँ प्रकरण है। इसमें कहरा नामक बारह पद्ध हैं। उत्तरी भारत में एक जाति 'कहार' है। इस जाति के लोग प्राय: मछली मारते, भुत्यापन करते तथा नाचते-गाते हैं। इनके रूपों का इसमें आध्यात्मिक वर्णन है। इस जाति का एक गीत होता है जिसका नाम 'कहरवा' है, इस गीत से मिलती-जुलती हुई ध्वनि इस प्रकरण के पद्दों में पाये जाते हैं।
कहरा का अभिप्राय दुखी जीव भी हैं। 'कहर' कहते हैं 'दुःख' को। दुःख दो प्रकार के हैं, एक खानी-मोती माया की आसक्ति तथा दूसरा वाणी-झीनी माया का राग | इन दोनों से जीव व्यथित हैं। इन दुःखों अर्थात 'कहर' से छूटने के संकेत में 'कहरा' प्रकरण कहा गया है। इसमें बड़े सुन्दर-सुन्दर उपदेश हैं। पहला ही 'कहरा' में स्वरुप-स्थिति का सुन्दर विवेचन है।

बसन्त[संपादित करें]

यह छठवाँ प्रकरण है। इसमें भी 'बसन्त' नामक बारह पद्ध हैं। छह ॠतुओं में 'बसन्त' एक श्रेष्ठ ऋतु मानी जाती है। यह चैत-वैशाख पूरे दो महीने तक रहती है। इसमें पेड़-पौधों के पुराने छाल तथा पत्तियाँ गिरते और नये छाल एवं पत्तियाँ आते हैं। अठारह भार वनस्पत्तियाँ इसी समय प्रफुल्लित होती हैं। सद्गुरु ने इस प्रकरण में बतलाया है कि प्राणि-जगत में तो बारहों महीने बसन्त लगे रहते हैं। हर समय पुराने-पुराने प्राणियों का मरना तथा नये-नये का जन्म लेना और बारहों महीने विषय-वासन्ती-परिधान पहन कर माया या काम-भोग में मनुष्यों का निमग्न रहना एवं इस प्रकार माया में विमोहित होकर स्वरुपज्ञान तथा मानवता से पतित होना हर समय लगा रहता है। इस जन्म-मरण तथा विषय बसन्त से मुक्त होकर स्वरूप-ज्ञान में प्रतिष्ठित होने के लिये सद्गुरु ने 'बसन्त' प्रकरण निबद्ध किया है।

चाचर[संपादित करें]

यह सातवाँ प्रकरण हैं। इसमें चाचर नामक दो पद्ध हैं। चाचर एक गीत होता है। जो होली में गाया जाता है। होली में चाचर या फाग गाकर तथा पिचकारी में रंग भरकर एक-को-एक मारते हैं। माया किस प्रकार अपना अदभुत रूप बनाकर तथा मोह कि पिचकारी में विषय-रंग भर कर लोगों को मार रही हैं और किस प्रकार विद्वान-अविद्वान उस का क्रीड़ा मृग हो रहे हैं- इसका विचित्र चित्रण इस प्रकरण में हुआ है। इस माया के मोह से निवृत्त होने के लिये प्रेरणा दी गयी है और माया से वही उबर सकता है जिसके मन में उसका मोह नहीं समायेगा-यह बात बतायी गयी है। माया से मुक्ति-अर्थ उसकी निस्सारता बतलायी गयी है तथा माया के मद पर चोटें कि गयी हैं। किस प्रकार भोगों के लोभ में पड़कर हाथी, बन्दर तथा सुग्गा बन्दी तथा व्ज़्सफ़्ग़्फ़्बःफ़ॅफ़दीन होते हैं और उसी प्रकार विषयों के मोह में पड़कर मनुष्य भी विवश होता है इसका सोदाहरण सुरम्य वर्णन किया गया है।

बेलि[संपादित करें]

यह आठवां प्रकरण है। इसमें 'बेलि' नामक दो पद्ध हैं। बेलि कहते हैं लता को। मोह ही वह लता है जिसमें दुःख के फल फलते हैं, उनको चख कर जीव जन्म-जन्मान्तरों तक पीड़ा-पर-पीड़ा भोगते हैं। यह मोह लता ही जीवों को बाँधती है। यह लता तथा इसके दुःखपूर्ण फल से निवृत्यर्थ इस प्रकरण में प्रकाश डाला गया है।

बिरहुली[संपादित करें]

यह नवाँ प्रकरण है। इसमें केवल एक ही पद है जिसका नाम बिरहुली है। जो किसी प्रिय के वियोग से व्याकुल हो उसे बिरही कहते हैं। इस प्रकरण में बिरहुली शब्द विरही जीवों के सम्बोधन में रखा है। अपने चेतन स्वरुप का यथार्थ ज्ञान न होने से जीव अपने से ईश्वर, ब्रह्म की कल्पना करता है।और उसका वियोग मानकर दुखी रहता है। इसी प्रकार विषय में सुख मानकर और उसके वियोग में अर्थात सुख का नित्य संग न होने से यह जीव विरही है। इस विरह-व्यथा की निवृत्ति के लिये यह प्रकरण कहा गया है। इसमें सात बिजों का सविस्तृत वर्णन है तथा खानी-वाणी की विरह-व्यथा से मुक्त होने के लिये उत्तम उपदेश है।

हिंडोला[संपादित करें]

यह दशवाँ प्रकरण है। इसमें 'हिंडोला' नामक तीन पद्य हैं। भ्रम का हींडोला है। इसमें पाप-पुण्य के दो खम्बे हैं, माया मेरु है,लोभ भँवरकड़ी है, विषय का मरुआ है, काम की कील ठोंकी है; हाथ में पकड़कर झूलने के लिये शुभ और अशुभ के दो डण्डे हैं तथा कर्म की पटरी है, इस पर बैठकर कौन नहीं झूला ? खानी और वाणी के अध्यासी सभी जीव इस झूले में झूल रहे हैं। यह झूला जीव को कभी ऊपर ले जाता है और कभी नीचे; अर्थात-ऊँची-नीची योनियों में भटकाता है। यह माया का हिंडोला आपातरमणीय है, अतएव इस पर झूलने की इच्छा न हो -- ऐसी बुद्धि विरले विवेकी को है। अनादिकाल का समय बीत गया, परंतु जीव का मन इस जगुले से उतरने को नहीं कहता और आज भी इस झूले से हार नहीं मानता। जिनको सत्संग तथा ज्ञान प्राप्त हुआ, वे सुज्ञ जीव ही इस झूले से उतर कर अपनी पारख (ज्ञान) भूमिका अर्थात चेतन स्वरूप में स्थित हूए। प्रकृत प्रकरण में इस दुःख रूप झूले से उतरने का ही उपदेश है। सद्गूरू कबीर ने ' हिंडोला ' के रूपक का बड़ा ही सटीक वर्णन किया है।

==साखी== साखी आंखी ज्ञान की इसमें ज्ञान के विषय में बताया गया है