बिभा चौधुरी
| बिभा चौधुरी | |
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| जन्म |
3 जुलाई 1913 कोलकाता |
| मृत्यु |
2 जून 1991 (उम्र 77 वर्ष) कोलकाता |
| क्षेत्र | कण भौतिकी, ब्रह्माण्ड किरणें |
| संस्थान | |
| शिक्षा | |
| डॉक्टरी सलाहकार | सर पैत्रिक ब्लैकेट |
| अन्य अकादमी सलाहकार | देवेन्द्र मोहन बसु |
| प्रसिद्धि |
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बिभा चौधरी (1913 - 2 जून 1991) भारत की एक भौतिक विज्ञानी थीं जिन्होने कण भौतिकी और ब्रह्माण्डीय किरणों पर काम किया। उन्होंने देवेन्द्र मोहन बसु के साथ काम किया और मेसॉन की खोज करने वाली तथा हिकेदी-युकावा मेसॉन सिद्धान्त का प्रतिपादन करने वाली प्रथम वैज्ञानिक थीं।
बिभा चौधरी ने नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिकशास्त्री पी.एम.एस. ब्लैकेट के साथ भी काम किया था। ब्लैकेट स्वतंत्र भारत में वैज्ञानिक अनुसंधान की शुरुआत करने से संबंधित मामलों पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के सलाहकार थे। वे एम.जी.के. मेनन के नेतृत्व में कोलार गोल्ड फील्ड (केजीएफ) में प्रोटॉन क्षय परीक्षण में भी चौधरी शामिल थीं। भौतिकी के क्षेत्र में अपने कई दशक लंबे कॅरियर के दौरान चौधरी ने प्रतिष्ठित जर्नल नेचर समेत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में कई शोध पत्र प्रकाशित किए। वह जीवनभर एक शोधकर्ता के रूप में ही कार्य करती रहीं। उनका अंतिम शोध पत्र सह-लेखक के रूप में वर्ष 1990 में उनकी मृत्यु से एक वर्ष पहले इंडियन जर्नल ऑफ फिजिक्स में प्रकाशित किया गया।
देश और विदेश में भौतिक विज्ञान से जुड़ी बिरादरी के नामचीन लोगों के साथ काम करने के बावजूद चौधरी भारतीय विज्ञान क्षेत्र का एक गुमनाम नायक ही बनी रहीं। उन्हें भारत की तीन प्रमुख अकादमियों से न तो कोई फेलोशिप मिली और न ही किसी पुरस्कार के लिए उन्हें चुना गया।[5]

जीवनी
[संपादित करें]विभा चौधरी का जन्म कोलकाता में एक जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पिता, बांकू बिहारी चौधरी, एक चिकित्सक थे।[6] उनकी माता, उर्मिला देवी, ब्राह्म समाज से जुड़ी हुईं थीं जिनका मानना था कि युवतियों को स्कूल जाने की अनुमति दी जानी चाहिए। उर्मिला से विवाह करने के बाद, बांकू भी ब्रह्म समाज से जुड़ गये थे जिसके कारण वे हिंदू समाज से बहिष्कृत हो गए। चौधरी परिवार के कई बच्चे (दूसरी बेटी को छोड़कर, जिसकी कम उम्र में ही मृत्यु हो गई थी, उच्च शिक्षित हुए। विभा चौधरी अपने पाँच भाई-बहनों में वे मध्य की संतान थीं। उनका एक भाई था। उनकी बहन, रोमा चौधरी, ब्रह्म बालिका शिक्षालय में शिक्षिका रहीं।
कलकत्ता विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में 1934-36 के एमएससी (भौतिकी) के 24 छात्रों के बैच में वे एकमात्र छात्रा थीं। पोस्ट ग्रेजुएट करने के बाद वह उसी भौतिकी विभाग में प्रोफेसर देवेन्द्र मोहन बसु की देखरेख में शोध करने के लिए जुड़ गईं। कुछ समय बाद बोस संस्थान का निदेशक बनने के बाद देव्न्द्र मोहन बसु बिभा चौधरी समेत अपने कुछेक शोध छात्रों को अपने साथ बोस संस्थान ले गए।
बोस संस्थान में, वर्ष 1938 और 1942 के बीच के साथ मिलकर बिभा चौधरी ने फोटोग्राफिक प्लेटों का उपयोग करके मेसॉन की खोज पर काम किया और इससे संबंधित लगातार तीन शोधपत्र नेचर पत्रिका में प्रकाशित किए। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय संवेदनशील इमल्शन प्लेटों की कमी के चलते वे आगे काम जारी नहीं रख सकीं। शायद इसी कारन उन्होंने पीएचडी के लिए मैनचेस्टर विश्वविद्यालय जाने का निर्णय लिया। वर्ष 1945 में वह पी.एम.एस. ब्लैकेट की ब्रह्मांडीय किरणों की शोध प्रयोगशाला से जुड़ गईं। इसके लगभग चार वर्ष बाद ब्लैकेट को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। बिभा चौधुरी की डॉक्टरेट थीसिस "एक्सटेंसिव एयर शॉवर्स एसोसिएटेड विद पेनिट्रेटिंग पार्टिकल्स" पर थी।

भाभा ब्रह्मांडीय किरणों के क्षेत्र में ही काम कर रहे थे, इसलिए उन्होंने बिभा चौधरी के थीसिस परीक्षकों से उनके बारे में पूछताछ की और अंततः उन्हें टीआईएफआर में सम्मिलित होने के लिए भर्ती कराया। वर्ष 1949 में वह टीआईएफआर से जुड़ने वाली पहली महिला शोधकर्ता थीं, जो 1957 तक वहां रहीं। एम.जी.के. मेनन और यशपाल टीआईएफआर में उनके समकालीन थे। उन्होंने टीआईएफआर के सहयोगियों के साथ वर्ष 1955 में इटली में पीसा में आयोजित मूल अणुओं पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भी भाग लिया।
1960 के आरम्भ से ही बिभा चौधुरी केजीएफ परियोजना में शामिल थीं, और भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला जाने के बाद उन्होंने राजस्थान के आबू पर्वत में एक और प्रयोग का प्रस्ताव दिया। वह व्यापक वायु बौछार से जुड़ी रेडियो आवृत्ति के उत्सर्जन का अध्ययन करना चाहती थीं। पीआरएल के निदेशक साराभाई की मृत्यु के बाद शोध कार्यक्रम की दिशा ही बदल गई और पीआरएल ने उन्हें प्रयोग को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद, उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली और कलकत्ता में अकादमिक और शोध कार्य में वापस लौट गईं।
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "A star and its planet get Indian names after a global contest". The Hindu (Indian English भाषा में). India Science Wire. 2019-12-18. आईएसएसएन 0971-751X. अभिगमन तिथि: 2019-12-22.
- ↑ "Book Title: A Jewel Unearthed: Bibha Chowdhuri (The Story of an Indian Woman Scientist who deserves to be called Marie Curie of India). Review of book by HS Virk" – via ResearchGate.
- ↑ "The invisible women in science". The Telegraph (अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 2019-12-22.
- ↑ "Praman". Journal of Physics. भारतीय विज्ञान अकादमी. अभिगमन तिथि: 2020-02-03.
- ↑ भारतीय भौतिक विज्ञान का एक गुमनाम सितारा : बिभा चौधरी
- ↑ विभा चौधरी के बारे में, जिनका विज्ञान के क्षेत्र में रहा महत्वपूर्ण योगदान
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]- कादम्बिनी गांगुली -- सन १८८६ में कोलकाता मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा में स्नातक होने वाली प्रथम स्त्री
- आनन्दीबाई जोशी -- सन १८८६ में एम०डी० की उपाधि प्राप्त करने वाली प्रथम भारतीय स्त्री