बिंदेश्वरी दुबे

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पंडित बिन्देश्वरी दूबे
मजदूर मसीहा

बिहार के २१वें मुख्य मंत्री
कार्यकाल
१२ मार्च १९८५ – १३ फ़रवरी १९८८
प्रधानमंत्री राजीव गांधी
राज्यपाल ए•आर• किदवई

पी• वैन्कट सुबईया

पूर्वा धिकारी चन्द्रशेखर सिंह
उत्तरा धिकारी भागवत झा आजाद
चुनाव-क्षेत्र शाहपुर

कानून एवं न्याय मंत्री
कार्यकाल
१४ फ़रवरी १९८८ – २६ जून १९८८
प्रधान मंत्री राजीव गाँधी
पूर्वा धिकारी पी० शिव शंकर
उत्तरा धिकारी बी० शंकरानन्द

श्रम एवं रोजगार मंत्री
कार्यकाल
२६ जून १९८८ – ०१ दिसम्बर १९८९
प्रधान मंत्री राजीव गाँधी
पूर्वा धिकारी रविन्द्र वर्मा
उत्तरा धिकारी राम विलास पासवान

अध्यक्ष, इंटक
कार्यकाल
मई १९८४ - मार्च १९८५
उत्तरा धिकारी गोपाल रामानुजम

अध्यक्ष, बिहार प्रदेश कांग्रेस कमीटि
कार्यकाल
सितम्बर १९८४ - मार्च १९८५
पूर्वा धिकारी राम शरण सिंह
उत्तरा धिकारी डुमर लाल बैठा

शिक्षा मंत्री, बिहार सरकार
कार्यकाल
(२८ मई १९७३– २४ जून १९७३)
मुख्य मंत्री केदार पांडेय
पूर्वा धिकारी राष्ट्रपति शासन

परिवहन मंत्री, बिहार सरकार
कार्यकाल
(२५ सितंबर १९७३ – २८ अप्रेल १९७४)
मुख्य मंत्री अब्दुल गफ़ूर
पूर्वा धिकारी शत्रुघ्न शरण सिंह

स्वास्थ मंत्री, बिहार सरकार
कार्यकाल
(११ अप्रेल १९७५ - ३० अप्रेल १९७७)
मुख्य मंत्री जगन्नाथ मिश्र
पूर्वा धिकारी केदार पांडेय
उत्तरा धिकारी राष्ट्रपति शासन

वित्त मंत्री, बिहार सरकार
कार्यकाल
(मार्च १९८५ - फ़रवरी १९८८)
मुख्य मंत्री बिन्देश्वरी दूबे
पूर्वा धिकारी जगन्नाथ मिश्र
उत्तरा धिकारी जगन्नाथ मिश्र
चुनाव-क्षेत्र शाहपुर

सांसद, लोक सभा
कार्यकाल
(१९८० - १९८४)
पूर्वा धिकारी रामदास सिंह
उत्तरा धिकारी सरफ़राज़ अहमद
चुनाव-क्षेत्र गिरिडीह

सांसद, राज्य सभा
कार्यकाल
(०३ अप्रेल १९८८ - २० जनवरी १९९३)

बिहार विधान सभा
कार्यकाल
(१९५२ - १९५७)
पूर्वा धिकारी कामख्या नारायण सिंह
चुनाव-क्षेत्र जरीडीह-पेटरवार
कार्यकाल
(१९६२ - १९६७, १९६७ - १९६९, १९६९ - १९७२, १९७२ - १९७७)
पूर्वा धिकारी ब्रजेश्वर प्रसाद सिंह
उत्तरा धिकारी मिथिलेश सिन्हा
चुनाव-क्षेत्र बेरमो
कार्यकाल
(मार्च १९८५ - ०३ अप्रेल १९८८)
पूर्वा धिकारी आनंद शर्मा
उत्तरा धिकारी धर्मपाल सिंह
चुनाव-क्षेत्र शाहपुर

जन्म १४ जनवरी १९२१
दूबे टोला, महुआँव, भोजपुर, बिहार
मृत्यु २० जनवरी १९९३
लेडी वेलिंगटन हॉस्पिटल, चेन्नई
समाधि स्थल राख वाराणसी के गंगा नदी में बहाया गया
राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
जीवन संगी शिव शक्ति देवी
बच्चे राजमणि चौबे
मनोरमा चौबे
प्रतिभा चौबे
आशा पांडेय
निवास बी-४, सिटी सेन्टर, सेक्टर-४, बोकारो स्टील सिटी, झारखंड
शैक्षिक सम्बद्धता संत माईकल हाई स्कूल, पटना
इंजीनियरिंग कॉलेज पटना
व्यवसाय राजनीति
धर्म सनातन
उपनाम मजदूर मसीहा, बाबा, दूबे जी

बिन्देश्वरी दूबे (१४ जनवरी, १९२१ - २० जनवरी, १९९३) एक भारतीय राजनेता, प्रशासक, स्वतंत्रता सेनानी एवं श्रमिक नेता थे जो बिहार के मुख्यमंत्री, केन्द्रीय काबीना मंत्री, इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष, बिहार कांग्रेस के अध्यक्ष आदि भी रहे। इससे पूर्व ये बिहार (अखंड) सरकारों में भी मंत्री रहे। १९८० से १९८४ तक सातवीं लोक सभा के सदस्य, १९८८ से १९९३ तक राज्य सभा के सदस्य तथा अनेकों बार विधान सभा के सदस्य रहे। इन्होंने देश की कोलियरियों के राष्ट्रीयकरण में अहम् भूमिका निभाई। लोग इन्हें श्रद्धा से 'बाबा' कहकर पुकारते थे तथा जीवनपर्यन्त मजदूरों के अधिकार की बड़ी-बड़ी लड़ाई लड़ने एवं उनको न्याय दिलवाने के कारण इन्हें 'मजदूर मसीहा' भी कहा जाता है।

अनुक्रम

व्यक्तित्व[संपादित करें]

चित्र:B.dubey(3).jpg
पटना हवाई अड्डे पर पं• बिन्देश्वरी दूबे

दूबे विलक्षण एवं बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी थे जिसके कारण उन्होंने कोलियरी के एक साधारण श्रमिक से देश के एक प्रमुख श्रमिक नेता और अंंतत: श्रम मंत्री बनने तक का लंबा सफ़र तय किया। सादगी, सरलता, संवेदनशीलता, सच्चाई, सेवा, देशभक्ति, ईमान्दारी, कर्मठता, दृढ़ संकल्प, परदुखकातरता, त्याग, विचारों की शालीनता, कर्तव्यों के प्रति निष्ठा एवं अधिकारों के प्रति निस्पृहता उनके व्यक्तित्व के प्रमुख अंग थे। राजनीति में रहते हुए भी दलोंं के दलदल से दूर रहे। इनकी सांगठनिक क्षमता भी अप्रतिम थी। दूबे एक मृदुभाषी, हृदय के कोमल और संवेदनशील इंसान थे। बच्चों से अत्यधिक लगाव के कारण उनके साथ वह अक्सर शिशुवत व्यवहार करने लगते थे। वह वैसे तो सादा जीवन शुद्ध विचार के पक्षधर थे पर मीठाइयाँ उन्हें बहुत पसन्द थीं। पूर्णतः गांधीवादी विचारधारा से ओतप्रोत दूबे अपने काल में भारतीय सभ्यता, संस्कृति और चरित्र के प्रतीक माने जाते थे। धोती, कुर्ता एवं गांधी टोपी उनका प्रमुख वस्त्र था। विचार, स्वरूप और आदर्श सभी दृष्टियों से उनमें भारतीयता की स्पष्ट प्रतिच्छाया देखी जा सकती थी। उन्होंने अपने कार्यकाल में ऐसी परम्पराओं और मान्यताओं की स्थापना की जिससे न केवल शाषण-सूत्र को ही वरन देश के प्रत्येक जनों को वर्षों तक बल, प्रेरणा और प्रकाश मिलता रहेगा।

ईमान्दारी[संपादित करें]

दूबे जब दो बार विधायक बन चुके थे तब भी उनके क्वाटर में पंखा नहीं था। एक बार उनकी धर्मपत्नी ने कहा कि जब उनके कार्यकर्ताओं के घर में पंखा है तो अपने घर में क्यों नहीं? इस पर उन्होंने कहा कि राजा अपनी प्रजा का जो जूठन बच जाता है, उसको खाता है। वो जीवन भर देश और समाज की भलाई के लिए अग्रसर रहे पर अपने लिए या अपने परिवार के लिए कुछ खास नहीं कर पाए। आज भी उनके परिवार के लोग बोकारो, पटना और राँची जैसी जगहों में साधारण जीवन जी रहे हैं। ऐसी ईमान्दारी कम ही देखने को मिलती है कि ऐसा नेता जो छह बार विधायक, एक बार लोक सभा सदस्य, एक बार राज्य सभा सदस्य, तीन बार राज्य का मंत्री, दो बार केन्द्रीय मंत्री, मुख्य मंत्री, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, एक दशक तक जिला कांग्रेस अध्यक्ष के अलावे भारतीय मजदूर कांग्रेस, राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ जैसे अनेकों मजदूर यूनियनों का अध्यक्ष लंबे समय तक रहा हो उसका परिवार साधारण ज़िंदगी जी रहा हो।

सेवा[संपादित करें]

परमपिता परमात्मा के प्रति उनकी अटूट आस्था थी। खाली वक्त में रुद्राक्ष की माला से मंत्रों जाप करना उनके जीवन का प्रमुख अंग था। पर वे अंधविश्वासी नहीं थे। "मानव-सेवा ही माधव (अर्थात ईश्वर) सेवा होती है", ऐसा उनका मानना था। यही वजह थी कि उन्होंने सदैव श्रमिक, दबे-कुचले, निर्धन, ग्रामीण, हरिजन, आदिवासियों की सेवा को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। वह अपने आदर्श श्रीराम चन्द्र की तरह सुशासन के पक्षधर थे जिसका अनुसरण इन्होंने जीवन भर किया। रामचरित मानस इन्हें कंठस्थ था और अक्सर लोगों को बात समझाने के लिए उनके सवालों का जवाब ये दोहों से दिया करते थे।

त्याग[संपादित करें]

दूबे का समस्त जीवन तो त्यागमय ज्योति से प्रकाशित होता रहा। उन्होंने,

  • दादा की सेवा के लिए अपने बचपन का त्याग किया
  • पढ़ाई के लिए अपने घर का त्याग किया
  • देश की आज़ादी के लिए अपनी पढ़ाई का त्याग किया
  • मजदूरों की सेवा के लिए अपनी नौकरी का त्याग किया
  • देश के प्रति निष्ठा के लिए अपने परिवार के सुखों का त्याग किया

व्यक्तिगत जीवन[संपादित करें]

चित्र:B.dubey.family(1).jpg
सन् 1964 में दूबे एवं उनके परिवार का उनके गाँव 'महुआँव', भोजपुर, बिहार में खींचा गया चित्र जब उनकी आयु 7 वर्ष की रही होगी। चित्र दूबे की द्वितिय पुत्री स्व• मनोरमा देवी की शादी के बाद खींचा गया था।

[1]

बिन्देश्वरी दूबे का जन्म बिहार के भोजपुर जिले के महुआँव नामक ग्राम के एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके माता-पिता के द्वारा ऐसा माना गया कि इनका जन्म विंद्याचल की माँ विंदेश्वरी के आशीर्वाद से हुआ, इसलिए इनका नाम बिन्देश्वरी प्रसाद दूबे रखा गया था, जिसका मतलब हुआ माँ बिन्देश्वरी का प्रसाद। चार भाईयों के बीच यह दूसरे स्थान पर थे। इनके पिता शिव नरेश दूबे इनको पढ़ाने में अक्षम थे। वह चाहते थे कि यह खेती-बाड़ी संभालें। पर पढ़ाई में अत्यधिक रुचि रखने वाले बिन्देश्वरी को यह नागवार गुज़रा और एक दिन अपने पिता के द्वारा विद्यालय जाने के कारण फ़टकार लगाए जाने की वजह से अपने घर से अपने मामा के घर भाग खड़े हुए। मामा ने कम आमदनी होने की वजह से पटना के संत माईकल स्कूल में उनका दाखिला तो करवा दिया पर हॉस्टल का शुल्क नहीं वहन कर पाए जिसके कारण बिन्देश्वरी को हॉस्टल के गार्ड के रुम में ही रहकर पढ़ाई जारी रखनी पड़ी। बाद में छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर तथा एक फैक्ट्री में काम कर के उन्हें अपना खर्च निकालना पड़ता था। साइंस कॉलेज में इंटर करने के बाद इन्हें पटना इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिला। पर महात्मा गाँधी पर आस्था एवं देशभक्ति की भावना कूट-कूट के भरे होने के कारण इन्होंने अंतिम साल में इंजिनियरिंग की पढ़ाई को तिलांजली दे कर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े।

परिवार[संपादित करें]

इनके पिता का नाम शिव नरेश दूबे एवं माता का नाम जानकी देवी था। दूबे चार भाइयों में दूसरे स्थान पर थे। अन्य तीन राजेन्द्र दूबे, नर्भदेश्वर दूबे एवं पद्म देव दूबे थे। इनका विवाह शिव शक्ति देवी से हुआ था तथा इनकी चार पुत्रियाँ थीं: राजमणी, मनोरमा, प्रतिभा एवं आशा देवी। इनमें से पहली तीन की इनके जीवन काल में ही असमायिक मृत्यू हो गई थी। इनकी द्वितीय पुत्री मनोरमा देवी के कनिष्ठ पुत्र ऋतेश चौबे 'बिन्देश्वरी दूबे फ़ाउंडेशन के नाम से समाजसेवी ट्रस्ट चलाते हैं।

स्वतंत्रता आंदोलन[संपादित करें]

देश्भक्ति की भावना कूट-कूट कर भरे होने के कारण २१ वर्षीय बिन्देश्वरी ने महात्मा गांधी के आवाह्न पर अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई को मध्य में ही छोड़ दिया और भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े। एक बार सचिवालय में तिरंगा फ़हराने के क्रम में अंग्रेज़ों ने बारी-बारी से चार लोगों को गोली से छलनी कर दिया। इस बार बारी युवा बिन्देश्वरी की थी। इस युवा ने आखिरकार सचिवालय में तिरंगा लहरा ही दिया। पर किस्मत से अंग्रेज़ों ने उसपर गोलियाँ नहीं चलाईं और उसे कारावास में डाल दिया। १९४२ से १९४४ तक कारावास में रहने के बाद दूबे ने फिर से आंदोलन शुरु कर दिया। वे जगह-जगह पर युवाओं से मिलकर उनको आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने के लिए प्रेरित करने लगे और उनकी टीम मज़बूत होने लगी। उनकी टीम के साथियों के अभिभावक दूबे के पिता से उसकी शिकायत करते थे। अंग्रेज़ों ने इन पर जिंदा या मुर्दा सुपुर्द करने वाले के लिए इनाम की घोषणा कर रखी थी। एक बार पटना रेलवे स्टेशन पर इनकी मुठभेड़ अंग्रेज़ों से हो गई और दूबे चलती ट्रेन में सवार हो भाग खड़े हुए फिर काफ़ी दूर चलने के बाद, एक अनजान कोलियरी क्षेत्र, दक्षिण बिहार के बेरमो स्टेशन पर उतर गए। केदार पांडे, अब्दुल गफूर, चंद्रशेखर सिंह, भागवत झा आजाद, सत्येन्द्र नारायण सिन्हा, (सभी बिहार के भविष्य मुख्य मंत्री) एवं सीताराम केसरी (भविष्य अध्यक्ष, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस) के अलावा बिन्देश्वरी दूबे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बिहार कांग्रेस के विख्यात युवा तुर्क स्वतंत्रता सेनानियों में से एक थे।

राजनीतिक जीवन[संपादित करें]

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस[संपादित करें]

हजारीबाग जिला कांग्रेस कमीटी[संपादित करें]

दूबे दो दशक से ज़्यादा समय तक बिहार का सबसे बड़े एवं अति महत्वपूर्ण जिला हजारीबाग के कांग्रेस कमीटी में रहे। उस समय के हज़ारीबाग जिले में अभी के हज़ारीबाग के अलावे, गिरिडीह, बोकारो, रामगढ़, कोडरमा और चतरा जिला भी शामिल था। १९४० और ५० के दशक में कमीटी के उपाध्यक्ष और महा सचिव रहने के बाद दूबे १९५८ से ७० तक अध्यक्ष भी रहे।

बिहार प्रदेश कांग्रेस कमीटी[संपादित करें]

१९७७ के चुनाव में पराजय के बाद कांग्रेस की स्थिति बहुत खराब थी। उसी दौरान दूबे ने इंदिरा गांधी को बिहार के बोकारो (अभी झारखंड) में १९७९ में बुलाकर उनका भव्य स्वागत करवाया। फिर १९८० और १९८४ में गिरीडीह और धनबाद में बुलाकर ऐतिहासिक भीड़ करवाई। इससे प्रसन्न होकर एवं तत्कालीन् मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के झगड़े के बीच कड़ी के रूप में बनाकर सितम्बर १९८४ में इंदिरा गांधी ने राम शरण सिंह को हटाकर बिन्देश्वरी दूबे को बिहार प्रदेश कांग्रेस कमीटी का अध्यक्ष बनाया था। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दूबे के कुशल नेतृत्व में कांग्रेस बिहार के १९८४ के लोकसभा चुनाव में ५४ में से ४८ सीट जीती, जो किसी भी पार्टी के लिए अभी तक का रेकॉर्ड है। लोकसभा चुनाव के बाद राजीव गांधी भारत के प्रधान मंत्री बने थे। उनके नेतृत्व में ही १९८५ में हुए बिहार विधान सभा के चुनाव में कांग्रेस ३२४ में से १९६ सीटें जीती। विधान सभा के चुनाव के बाद दूबे बिहार के मुख्य मंत्री बने और उन्होंने बिहार कांग्रेस के पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उनके बाद स्वर्गीय डुमर लाल बैठा प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे।

राज्य कार्यालय[संपादित करें]

विधान सभा[संपादित करें]

१९४०-५० के दशक में दक्षिण बिहार (अभी का झारखंड) में पद्मा महाराज कामख्या नारायण सिंह और उनकी पार्टी प्रजातांत्रिक सोसियलिस्ट पार्टी (पी•एस•पी•) का बड़ा दबदबा था। १९५१ में हुए पहले बिहार विधानसभा चुनाव में वे खुद पाँच सीटों से चुनाव लड़े और पाँचों से जीते भी थे, जिसमें से एक 'पेटरवार' सीट भी थी। वहाँ से उन्होंने कांग्रेस के काशीश्वर प्रसाद चौबे को हराया था। पाँच सीटों से विधायक निर्वाचित होने के कारण उन्हें चार सीटों से इस्तीफ़ा देना पड़ा। छोड़ी हुई चार सीटों में एक 'पेटरवार' भी थी। इसी बीच 'पेटरवार' सीट का नाम बदल कर 'जरीडीह पेटरवार' रख दिया गया। १९५२ में हुए 'बाई एलेक्शन' में कांग्रेस ने ३१ वर्षीय बिन्देश्वरी दूबे को स्वतंत्रता सेनानी और दिग्गज मजदूर नेता होने के नाते जरीडीह-पेटरवार से टिकट दिया गया। मिला। युवा दूबे ने पी•एस•पी• के अपने निकटतम् प्रतिद्वन्दी को परास्त कर दिया। पर १९५७ के अगले चुनाव के पहले परीसीमन् में जरीडीह-पेटरवार अब बेरमो हो गया और दूबे बहुत मामूली अन्तर से यह चुनाव राजा के संबन्धी पी•एस•पी• उम्मीदवार ठाकुर ब्रजेश्वर प्रसाद सिंह से हार गए। फिर दूबे ने बेरमो से ही १९६२ के चुनाव में ठाकुर ब्रजेश्वर प्रसाद सिंह को हराया, १९६७ में एन• पी• सिंह को, १९६९ में जमुना सिंह तथा १९७२ में रामदास सिंह को हराया। इमरजेंसी की वजह से कांग्रेस विरोधी लहर में १९७७ का चूनाव वह मिथिलेश सिन्हा से मामूली अन्तर से हार गए। हालाकि इस चुनाव में इन्हें हर बार से ज़्यादा वोट मिले थे। १९८४ में बिहार प्रदेश कांग्रेस कमीटी का अध्यक्ष बनने के बाद १९८५ के चुनाव उन्होंने अपने गृह क्षेत्र शाहपुर से लड़ा और शिवानंद तिवारी जैसे नेताओं को हराकर भारी अंतर से जीता।

शिक्षा तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री[संपादित करें]

श्रमिक नेता होने के कारण दूबे को अक्सर अपनी पार्टी की सरकार से ही लड़ने की वजह से उनका कोपभाजन भी बनना पड़ता था। इसी कारण उनके समकक्ष नेताओं को ज़्यादा तरजीह दी जाती थी। पर अंतत:, पाँचवीं बार विधायक बनने के बाद, २८ मई १९७३ को बिहार के तत्कालीन मुख्य मंत्री केदार पांडे ने उन्हें अपने कैबिनेट में शिक्षा तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री बनाया। पर अपनी ही पार्टी के नेताओं के विरोध के कारण कुछ दिन बाद ही पांडे की सरकार गिर गई और दूबे भी २४ जून १९७३ तक ही शिक्षा मंत्री के पद पर काबिज़ रह पाए।

परिवहन मंत्री[संपादित करें]

केदार पांडे की सरकार गिरने के बाद २ जुलाई १९७३ को अब्दुल गफूर बिहार के मुख्य मंत्री बनाए गए जिसमें कुछ दिन बाद २५ सितम्बर १९७३ को शत्रुघ्न शरण सिंह को हटाकर दूबे को परिवहन मंत्री बनाया गया। इस पद पर वह १८ अप्रेल १९७४ तक काबिज़ रहे। करीब ७ महीने के कार्यकाल में दूबे ने बिहार में सड़कों का जाल बिछा दिया।

स्वास्थ एवं परिवार कल्याण मंत्री[संपादित करें]

११ अप्रेल १९७५ को जगन्नाथ मिश्र को बिहार का नया मुख्य मंत्री बनाया गया। इसी दिन बिन्देश्वरी दूबे ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री के रूप में शपथ ग्रहण किया। स्वास्थ्य मंत्री के रूप में दूबे ने 'पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल' में बिहार का पहला 'आई सी यू' बनवाया। दूबे ने इस दौरान सरकारी डॉक्टरों की 'प्राईवेट प्रैक्टिस' बन्द कराई जिससे डॉक्टर इनसे बहुत नाराज़ हुए। दूबे ने अपने कार्यकाल में हर प्रखंड में 'रेफ़रल हॉस्पिटल' बनवाए ताकि ग्रामीणों को छोटे-मोटे इलाज के लिए शहर न जाना पड़े।

वित्त मंत्री[संपादित करें]

मुख्य मंत्री के कार्यकाल के दौरान दूबे मार्च १९८५ से फ़रवरी १९८८ तक वित्त मंत्री भी थे।[2]

मुख्य मंत्री[संपादित करें]

पं• बिन्देश्वरी दूबे १२ मार्च १९८५ से १३ फ़रवरी १९८८ तक बिहार के मुख्यमंत्री रहे।[3] जिस समय उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री का कार्यभार अंगीकृत किया था, उस समय बिहार देश के सर्वाधिक पिछड़े राज्यों में एक था। किन्तु, अपनी कुशाग्र बुद्धि और सुदक्ष प्रशासन-कौशल से उन्होंने बिहार को प्रगति के मार्ग पर ला खड़ा किया। राज्य के विकास के लिए उनके समर्थ मार्गदर्शन में अनेक योजनाएँ बनाई गईं तथा उन्हें सम्यकरीत्या कार्यान्वित भी किया गया। मुख्य मंत्री बनते ही सबसे पहले उन्होंने अपराध एवं भ्रष्टाचार पर काबू पाने के लिए कई सारे कदम उठाए। बिन्देश्वरी दूबे का नाम कृष्ण सिंह एवं नितीश कुमार के साथ बिहार के 'टॉप ३' मुख्य मंत्रियों में लिया जाता है।[4] उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि ऐसा बिरले ही किसी के साथ हुआ होगा कि केन्द्रीय नेतृत्व उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनाए और सूबे के विपक्षी दल के नेता कहे कि वे बिहार में ही मुख्य मंत्री बने रहें। पर बिन्देश्वरी दूबे के साथ ऐसा ही हुआ। जब तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गांधी ने उन्हें केन्द्र में मंत्री बनाया तो विपक्षी दल के नेता कर्पूरी ठाकुर चाहते थे कि दूबे मख्य मंत्री बने रहें। कर्पूरी राजीव से अनुरोध करने दिल्ली तक पहुँच गए थे।[5]

भ्रष्टाचार के विरुद्ध कदम[संपादित करें]

बिहार को अपराधी ठेकेदार माफ़ियाओं के चंगुल से निकालने के लिए दूबे ने बड़ी परियोजनाओं को, खासकर बिजली एवं सिंचाई के क्षेत्र, सार्वजनिक क्षेत्रों, एच•एस•सी•एल• एवं बी•सी•सी•, के द्वारा निष्पादित करवाने का काम किया था।[6]

अपराध के विरुद्ध कदम[संपादित करें]

  • चंपारण के डकैतों एवं खासकर बेगूसराय, रोहतास, गया, जहानाबाद, शिवहर आदि के अपहरणकर्ताओं से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने 'ऑपरेशन ब्लैक पैन्थर' चलाया।[7]
  • माओवादियों पर लगाम कसने के लिए 'एम सी सी' को बैन किया तथा 'ऑपरेशन सिद्धार्थ' चलाया।[8]
  • फिर धनबाद के कोयला माफ़ियाओं पर शिकंजा कसने के लिए 'माफ़िया ट्रायल' के द्वारा उनके पुराने 'केसेज़' को 'री ओपन' करवाया।[9]

कीर्तिमान[संपादित करें]

  • दूबे के कार्यकाल के दौरान राज्य के ऋण जमा अनुपात 35% की उच्चतम रेकॉर्ड दर्ज की गई थी और इस सीमा को नीतीश कुमार के कार्यकाल के दौरान बाद में पार किया गया।[10]
  • उनके कार्यकाल के दौरान बीस सूत्री कार्यक्रम को कार्यान्वित करने के मामले में बिहार चौथे स्थान पर रहा।[11]
  • खाद्य उत्पादन के मामले में बिहार पंजाब और हरियाणा को पीछे छोड़ा।[12]

राष्ट्रीय कार्यालय[संपादित करें]

लोक सभा[संपादित करें]

बिन्देश्वरी दूबे बिहार के गिरीडीह क्षेत्र से १९८० के लोक सभा चुनाव रामदास सिंह, विनोद बिहारी महतो, चपलेंदु भट्टाचार्य जैसे राजनैतिक दिग्गजों को पटखनी देकर जीते थे।

राज्य सभा[संपादित करें]

दूबे ३ अप्रेल १९८८ से २० जनवरी १९९३ तक आजीवन राज्य सभा के सदस्य रहे।

कानून एवं न्याय मंत्री[संपादित करें]

१४ जनवरी १९८८ की सुबह बिहार के मुख्य मंत्री पद से इस्तीफ़ा देते ही कुछ ही देर में उन्हें केन्द्रीय कानून एवं न्याय का काबीना मंत्री घोषित कर दिया गया। वह इस पद पर २६ जून १९८८ तक रहे। कानून मंत्री रहते हुए दूबे ने कई उल्लेखनीय काम किए।

श्रम एवं रोजगार मंत्री[संपादित करें]

कानून एवं न्याय मंत्री बिन्देश्वरी दूबे के आग्रह पर तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गाँधी ने उन्हें २६ जून १९८८ को केन्द्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री बनाया। वह इस पद पर १ दिसम्बर १९८९ तक काबिज़ रहे। वी•वी• गिरी के अलावे किसी मजदूर नेता को पहली बार श्रम मंत्री बनाया गया था। श्रम मंत्री रहते हुए दूबे ने मजदूर हित में लेबर लॉ में कई संशोधन किये जो आज भी मील के पत्थर हैं।

श्रमिक आंदोलन[संपादित करें]

बिन्देश्वरी दूबे ने स्वतंत्रता आंदोलन के ही दौरान १९४४ में जेल से छूटने के बाद अपनी आजीविका के लिए दक्षिण बिहार के बेरमो में चंचनी और थापर जैसी कोलियरियों में नौकरी कर ली। पर कोलियरियों में मजदूरों का शोषण उनसे देखा नहीं गया और वह उनकी आवाज़ प्रबंधन के समक्ष उठाने लगे। नौकरी करते हुए यह सब संभव न था इसलिए कुछ समय के पश्चात् उन्होंने अपनी नौकरी की भी तिलांजली दे दी। सर्वप्रथम् उन्होंने ट्रेड यूनियन ऐक्टिविटी एक ब्रिटिश मैनेजर द्वारा चलाई जा रही 'सर लिन्सन पैकिन्सन ऐन्ड कं•' से शुरु की। तत्पश्चात उन्हीं के हमनाम बिन्देश्वरी सिंह ने उन्हें कोलियरी मजदूर संघ की ढोरी शाखा का उपाध्यक्ष नियुक्त किया। इसी दौरान भारत को आज़ादी मिली। आज़ादी के बाद दूबे निरंतर ट्रेड यूनियन में मजबूत होते चले गए। १९५१ में उन्हें इंटक से संबद्ध कोलियरी मजदूर संघ का राष्ट्रीय संगठन मंत्री बनाया गया।

राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस (इंटक)[संपादित करें]

१९८४ में धनबाद में हुए कांग्रेस पार्टी से संबद्ध राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस के अधिवेशन में पं• बिन्देश्वरी दूबे को सर्वसम्मति से इंटक का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था। अधिवेशन का उद्घाटन तत्कालीन् प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने किया था। मार्च १९८५ में दूबे ने इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। प्रदेश इंटक के अध्यक्ष पद पर दूबे १९७५ से अंतिम साँस तक काबिज रहे। इसके अलावा इंटक से संबद्ध 'इंडियन नेश्नल माईनवर्कर्स फ़ेडेरेशन', 'राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ', 'इंडियन एलेक्ट्रिसिटी वर्कर्स फ़ेडेरेशन', 'माईन्स वर्कर्स एकाडेमी', पी•पी•सी•एल• वर्कर्स यूनियन', 'बोकारो स्टील वर्कर्स यूनियन', 'डी•वी•सी• वर्कर्स यूनियन', 'एच•ई•सी• वर्कर्स यूनियन', 'मेकॉन वर्कर्स यूनियन' इत्यादि अनेक यूनियनों के अध्यक्ष रहे।

राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ[संपादित करें]

इंटक से संबद्ध राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ, जो पहले कोलियरी मजदूर संघ कहलाता था, के दूबे निर्विवाद नेता थे। १९५० और ६० के दशक में संघ के संगठन मंत्री, मंत्री, उपाध्यक्ष और फिर प्रधानमंत्री बनने के बाद १९७० के दशक में अध्यक्ष भी बने और अंतिम साँस तक (२० जनवरी, १९९३) इस पद पर बने रहे। इनके देहांत के बाद कांति मेहता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।

२४ अक्तूबर, १९६२ को दूबे जी की अध्यक्ष्ता में डी•वी•सी• कोलियरी में केन्द्रीय श्रम विभाग के पार्लियामेन्ट्री सेक्रेटरी श्री आर• एल• मालवीय के हस्तक्षेप पर ठेकेदारी प्रथा पर रोक लगा दी गई। ऐसा किसी सरकारी कोलियरी में पहली बार हुआ था। १९६२-६३ में ही पद्मा महाराज की ढोरी कोलियरी में भी बिन्देश्वरी दूबे की पहल पर ठेकेदारी प्रथा को समाप्त कर दिया गया।

१७ जून १९६८ को राष्ट्रीय खान मजदूर फ़ेडरेशन के प्रधान मंत्री कांती मेहता और कोलियरी मजदूर संघ के प्रधान मंत्री बिन्देश्वरी दूबे की अपील पर वेतन मंडल की सिफ़ारिशों को सही ढंग से लागू कराने तथा १ रू• ४७ पैसे के रेट से महंगाई भत्ता दिलाने के लिए ऐतिहासिक हड़ताल हुई थी जिसमें तत्कालीन बिहार के धनबाद एवं हजारीबाग जिले के करीब डेढ़ लाख कोलियरी मजदूर घनघोर बारिश में हड़ताल पर रहे और प्राय: ७० हजार कोयले का उत्पादन ठप हुआ। चूंकि टाटा कं•, एन•सी•डी•सी• एवं डी•वी•सी• की कोलियरियों में महंगाई भत्ता का भुगतान कर दिया गया था इसलिए वहाँ हड़ताल नहीं करवाया गया। झरिया फ़ील्ड की प्राय: सभी कोलियरियाँ बंद रही क्योंकि वे समझौता करने को तैयार नहीं हो रहे थे। इसके अलावा बिहार, बंगाल, उड़ीसा आदि की करमचंद थापर, चंचनी, बर्ड, के• बोरा, टर्नर कोरिशन, न्यू तेतुलिया, बैजना, मधुबन, अमलाबाद, पुटकी, कनकनी, बागाडीगी, होहना, भौंरा और श्रीपुर, निंघागना, शिवडागा, वास्तकोला, रानीगंज जैसी कोलियरियों को भी भुगतान नहीं करने पर हड़ताल की नोटिस दी गई जिसके फलस्वरूप उनके साथ समझौता हो गया। हड़ताल अलग-अलग जगहों पर लंबे समय तक चलती रही। बाद में नवम्बर १९६९ में एन•सी•डी•सी• के साथ समझौता हुआ और बाकी की कोलियरियों को भी झुकना पड़ा। समझौते में एक अतिरिक्त सालाना बढ़ोत्तरी तथा मकान भाड़ा सिर्फ़ दो रुपया भी मंजूर हुआ। समझौते में संघ की ओर से प्रधानमंत्री बिन्देश्वरी दूबे, मंत्री एस•दासगुप्ता एवं संगठन मंत्री दामोदर पांडेय तथा एन•सी•डी•सी• की ओर से एरिया जेनेरल मैनेजर आर•जी• महेन्द्रु और चीफ़ पर्सनल अफ़सर आई•बी• सान्याल ने हस्ताक्षर किया।

राष्ट्रीय कोयला वेतन समझौता[संपादित करें]

१९५६ में चीज़ों के दाम में जिस तरह वृद्धि हुई थी, उसके फलस्वरूप मजदूरी में उन्हें जो वृद्धि दी गई थी, वह नगण्य साबित हुई। राष्ट्रीय खान मजदूर फ़ेडरेशन के तत्वावधान मजदूरी में वृद्धि के लिए मालिकों के समक्ष माँगें पेश की गई और सरकार से वेतन मंडल बैठाने की माँग की गई। २३-३० जनवरी, १९६२ तक फ़ेडरेशन के निर्णयानुसार कोलियरी मजदूर संघ की शाखाओं में माँग सप्ताह मनाया गया तथा अनुकूल वातावरण तैयार किया गया। आम हड़ताल की नोटिसें भी दी गईं, मगर सरकार द्वारा हस्तक्षेप करने पर हड़ताल की नौबत नहीं आई। अन्त में वेतन मंडल की घोषणा की गई जिसकी प्रथम बैठक कोलकाता में २५ और २६ अक्तूबर को हुई। अन्तरिम राहत के लिए वेतन मंडल की दूसरी बैठक कोलकाता में ६ दिसम्बर १९६२ तक हुई जिसमें कोलियरी मजदूर संघ के प्रधान मंत्री राम नारायण शर्मा, मंत्री एस• दासगुप्ता, उपाध्यक्ष बिन्देश्वरी दूबे एवं कांती मेहता उपस्थित थे। फलत: अन्तरिम राहत के रूप में हर कोयला खदान मजदूरों को महीने में पौने दस रू• की वृद्धि १ मार्च १९६३ से मिलने लगी। संघ के प्रयास से १ अप्रेल १९६३ से मजदूरों को दी जाने वाली महंगाई भत्ते में भी ३ आना रोजाना या ४ रू• १४ आने प्रति माह की बढ़त मिली। दूबे कोयला वेतन समझौता-१, २, ३, ४ और ५ के सदस्य रहे।

कोलियरियों का राष्ट्रीयकरण[संपादित करें]

दूबे ने कोयला मजदूरों की आवाज़ को तत्कालीन् प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी और तत्कालीन कोयला मंत्री कुमारमंगलम् तक पहुँचा कर भारत की कोलियरियों के राष्ट्रीयकरण में अहम् भूमिका निभाई। सर्वप्रथम् धनबाद के कोकिंग कोल कोलियरियों का राष्ट्रीयकरण हुआ था।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन[संपादित करें]

बिन्देश्वरी दूबे ने मजदूरों की समस्याओं को और करीब से समझने और उसके निदान के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के कई सारे कान्फ़रेनसों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई सारे देशों, जर्मनी, यू•के•, बेल्जियम, नीदरलैंड, फ़्रांस, युगोस्लाविया, स्वीट्ज़रलैंड जापान इत्यादि का दौरा किया।

विरासत[संपादित करें]

बिन्देश्वरी दूबे के सम्मान में ये प्रतिमाएँ, संस्थान एवं संस्थान बने हैं:

• कलेक्ट्री तालाब (आरा, भोजपुर, बिहार) के निकट इनकी प्रतिमा विराजमान है।

• बिन्देश्वरी दूबे आवासीय महाविद्यालय, पिछरी, पेटरवार, बोकारो

• बिन्देश्वरी दूबे इंटर कॉलेज, बिहियाँ, भोजपुर, बिहार

• बिन्देश्वरी दूबे ब्रिज, बक्सर

• बिन्देश्वरी दूबे फ़ाउंडेशन, बोकारो, झारखंड

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]