बालंदशाह

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राजा बालंदशाह रियासत[संपादित करें]

कुदरगढ़ के संबंध मे एक मान्यता प्रचलित है कि मध्य प्रदेश के सिधी जिला के मड़वास का खैरवार क्षत्रिय राजा बालंदशाह कुदरगढ़ी माता बालंद देवी का प्रथम सेवक था इसका राज्य काफी फैला था राजा बालंद अन्य राजाओ से युद्ध मे पराजित होकर शहडोल जिला के बिछी नामक स्थान रहता था राजा बालंद ने शहडोल से सरगुजा अंचल के कोरिया जिले के चांगभखार,पटना और सूरजपुर जिले के कुदरगढ़ क्षेत्र मे अपना अधिकार फैलाया था। कोरिया जिले के पटना क्षेत्र मे बालम पोखरा बालम तालाब आज भी है। सूरजपुर के ओडिगी विकासखंड के कुदलगढ़ पहाड़ पर बालमगढ़ तमोर पिंगला अभ्यारण क्षेत्र पुतकी गाव के बालमगढ़ पहाड़ी पर गढ़ के अवशेष, चांदनी बिहारपुर क्षेत्र के महोली गाव की गढ़वतिया पहाड़ी पर बालमगढ़ के अवशेष बिखरे पड़े है।

राजा बालंद दुर्गा जी का भक्त था,और शक्ति कि उपासना करता था लोक मान्यता प्रचलित है कि राजा बालंद आल्हा उदल के समय मे था। वह भी शक्ति का उपासक था राजा बालंद पहाड़ी पर मां बागेश्वर देवी कि आराधना करता था। राजा बालंद अपनी ईष्ट देवी बागेश्वरी माता कुदरगढ़ी को मानता था माता के आज्ञा के बिना कोई कार्य नही करता था

श्री भुमिनाथ चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक मे लिखा है कि राजा बालंद बहादुरी से राज्य की सीमा बढ़ाना चाहता था। इसके लिए वह कभी- कभी आतंक मचाता था, जिससे लोगो मे चिंता बनी रही थी। राजा के निवास के बारे मे किसी को पता नहीं रहता था। इसी आयाम में चौहान वंश के राजपूत तीर्थ यात्रा हेतु सरगुजा पहुचे अपनी बहादुरी से भैया बहादुर की उपाधि प्राप्त की तथा वर्तमान शासन (लगभग 17 वी शताब्दी)ब्यवस्था को ना मानने वालो को भी तथा आतंक फैलाने वाले को बहादुर को उन्होने परास्त किया। साथ ही बालंद को भी हरा कर के क्षेत्र को प्राप्त कर लिया। राजा बालंद की चौहान वंश से युद्ध की बात भैया महावीर चांगभखार ने भैया बहादुर सिंह को पत्र लिखकर बताया था की कि राजा बालम को हराकर के उसे राज्य को लेकर लिया गया है।

संदर्भ[संपादित करें]