बसिश्वर सेन

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बसिश्वर "बोशी" सेन की तस्वीर

बसिश्वर सेन, जिन्हें अक्सर बोसी सेन के उपनाम से जाना जाता था,[1] एक प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक थे, जिन्हें विशेषतः भारत में हरित क्रांति में अपने अग्रणी किरदार के लिए जाना जाता है, जिसने भारत के कृषि और खाद्यपूर्ती के मानचित्र को हमेशा के लिए बदल दिया, तथा भारत को खाद्यसम्पन्न एवं भीषण अकाल से सदा के लिए मुक्त कर दिया। वे अपने समकालीन, अनेक विख्यात लोगों के करीबी सहकार्यकर्ता थे। वे लंबे समय तक जगदीश चंद्र बोस के करीबी सहयोगी रहे, तथा स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण मिशन के बहुत बड़े अनुयायी भी थे।[2] उन्होंने विवेकानंद प्रयोगशाला की स्थापना की थी, तथा कृषि उत्पादकता और संकर बीज विकसित करने के क्षेत्र में काम किया। उन्हें, कृषि और विज्ञान के क्षेत्र में अपने काम के लिए १९५७ में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।[3]

जीवनी[संपादित करें]

प्राथमिक जीवन[संपादित करें]

बसिश्वर सेन का जन्म बंगाल के बिष्णुपुर में १८८७ में हुआ था, जोकि बाँकुड़ा ज़िले का हिस्सा था। उनके पिता, रामेश्वर सेन, बाँकुड़ा ज़िले के पहले कलकत्ता यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएट थे, जोकि उस समय के लिए बहुत बड़ी बात थी। उनकी माता का नाम था प्रसन्नमयी देवी। उनके भाई, सुरेश्वर सेन, शारदा देवी के बहुत निष्ठ भक्त थे।[4] अपने पिता की अकस्मात मृत्यु और साथ आई आर्थिक संकट के कारण, उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा राँची में अपनी बहन के घर रहकर पूरी की। उन्होंने विज्ञान स्नातक की पढ़ाई कलकत्ता के संत ज़ेवियर कॉलेज से पूरी की। उनके एक मित्र, बिभूति भूषण घोष ने उनका परिचय रामकृष्ण मिशन से करवाया। वहां से उनका परिचय सिस्टर निवेदिता से हुआ, जिन्होंने उनका परिचय विख्यात वैज्ञानिक आचार्य जगदीश चंद्र बोस से करवाया। उन्होंने उनके साथ बोस संस्थान में बहुत करीब से कई सालों तक काम किया, और बल्कि वे बोस के साथ उनकी इंग्लैंड यात्रा पर भी सहायक बन कर गए। तत्पश्चात उन्हें १९२३ में अमेरिका भी बुलाया गया। एरिक से वापसी के बाद, वे स्वतंत्र रूप से काम करना चाहते थे, इसीलिए, उन्होंने कलकत्ता के बघबज़ार में अपनी के स्वयं की प्रयोगशाला खोले, जिसका नाम उन्होंने स्वामी विवेकानंद के नाम पर दिया। तत्पश्चात वे अल्बर्ट आइंस्टीन से १९३० में बर्लिन में मिले।[2][5]

१९२४ में सिस्टर क्रिस्टीन, जोकि स्वामी विवेकानंद की शिष्या थीं, भारत आईं, और उनकी मुलाकात सेन बोशी से हुई। उन्होंने साथ मिलकर भी कई सालों तक काम किया, तथा उनके अंतिम दिनों में उनके साथ रहे, और उनके साथ न्यूयॉर्क भी गए, जहाँ क्रिस्टीन ने अपनी अंतिम साँसें ली। बसिश्वर सेन ने अपने काम को अल्मोड़ा स्थानांतरित कर लिया और वहां अपनी प्रयोगशाला की नई शाखा खोली।[6]

शोधकार्य[संपादित करें]

उन्होंने अपने लंबे वैज्ञानिक जीवन में, विख्यात जीव और भौतिक वैज्ञानिक, जगदीश चंद्र बोस के साथ काम किया था। हालाँकि उन्होंने अपने शोधकार्य की शुरुआत वनस्पति कोषाणु पर अनुसंधान से किया था, मगर १९४३ की बंगाल की भीषण अकाल के बाद, उन्होंने अपना ध्यान कृषि उत्पादकता और संकर बीज (हाइब्रिड बीज) विकसित करने की ओर मोड़ लिया।[2][7] उन्होंने कृषि उत्पादकता बढ़ाने तथा भुट्टा, ज्वार, बाजरा और प्याज़ के संकर बीज विकसित करने पर शोध किया। उन्होंने कलकत्ता तथा तत्पश्चात अल्मोड़ा में विवेकानंद प्रयोगशाला की स्थापना की। उनकी प्रयोगशाला, भुट्टा और प्याज़ के संकर बीजों का उत्पादन करने में सफल रही, और उनकी यही सफलता, कृषि के क्षेत्र में क्रांति की सूत्रधार बनी। अपने शोधकार्य के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने उनके प्रयोगशाला को ज़मीन आवंटित किया। १९५९ में उनकी प्रयोगशाला को उत्तर प्रदेश सरकार के अंतर्गत ले आया गया और वैज्ञानिक शोध हेतु २३५ एकर भूमि प्रदान किया गया।[8]

निजी जीवन[संपादित करें]

अपने निजी जीवन में, वे स्वामी विवेकानंद से बहुत ज़्यादा प्रभावित थे, तथा उनके बहुत बड़े अनुयायी थे। वे रामकृष्ण मिशन के साथ बहुत करीबी से जुड़े हुए थे, तथा सिस्टर निवेदिता को भी करीब से जानते थे। अपने समय के अनेक विख्यात व्यक्तित्वों के साथ उनके काफी करीबी संबंध थे, जिनमें आचार्य जगदीश चंद्र बोस और सिस्टर निवेदिता के अलावा, पण्डित नेहरू, रबिन्द्रनाथ ठाकुर, जूलियन हक्सले और डेविड लॉरेंस शामिल हैं। उन्होंने १९३२ में भूवैज्ञानिक, लेखक और खोजकर्ता, जरट्रूड एमर्सन के साथ विवाह कर लिया, जिनके साथ वे अल्मोड़ा में मिले थे।

निधन[संपादित करें]

३१ अगस्त १९७१ को रानीखेत सेना अस्पताल में उनका निधन हुआ। उनके निधन के बाद, उनके प्रयोगशाला को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद में एक स्वतंत्र इकाई के तौरपर सम्मिलित कर लिया गया, और इसने हरित क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पुरस्कार व सम्मान[संपादित करें]

कृषि, विज्ञान एवं अभियांत्रिकी के क्षेत्र में अपने असामान्य योगदान के लिए सन १९५७ में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया, तथा १९६२ उन्हें वॉटमल अवार्ड से भी सम्मानित किया गया।[1]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. "संग्रहीत प्रति". Archived from the original on 10 नवंबर 2018. Retrieved 10 नवंबर 2018. Check date values in: |access-date=, |archive-date= (help)
  2. Boshi Sen—Scientist and Karmayogi, by Hironmoy Mukherjee, Bulletin 2009, Ramakrishna Mission Institute of Culture
  3. "Padma Awards" (PDF). Ministry of Home Affairs, Government of India. 2015. Archived from the original (PDF) on 15 November 2014. Retrieved July 21, 2015.
  4. "Sri Sri Matri Mandir::". www.rkmjoyrambati.org. Archived from the original on 24 नवंबर 2018. Retrieved 2018-09-15. Check date values in: |archive-date= (help)
  5. Prophets of New India, by Romain Rolland, page 453
  6. "Two Almora Lives - Indian Express". www.indianexpress.com (in अंग्रेज़ी). Retrieved 2018-09-15.
  7. "Swami Brahmananda, a Spiritual Dynamo" (PDF). Archived from the original (PDF) on 29 मई 2014. Retrieved 10 नवंबर 2018. Check date values in: |access-date=, |archive-date= (help)
  8. "History: Vivekananda Laboratory". Archived from the original on 4 मार्च 2016. Retrieved 10 नवंबर 2018. Check date values in: |access-date=, |archive-date= (help)

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  • [1]
  • Nearer Heaven Than Earth: The Life and Times of Boshi Sen and Gertrude Emerson Sen, by Girish N Mehra, ISBN 9788129110923