बशीर बद्र
डॉ॰ बशीर बद्र (जन्म: 12 फ़रवरी 1935 - 28 मई 2026) भारतीय कवि थे। इनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर है। साहित्य और नाटक आकेदमी में किए गये योगदानों के लिए उन्हें १९९९ में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
| बशीर बद्र | |
|---|---|
| जन्म |
सैयद मोहम्मद बशीर 15 फ़रवरी 1935 हंसवर, अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश, भारत[1] |
| मौत |
28 मई 2026 (उम्र 91 वर्ष) भोपाल, मध्यप्रदेश |
| पेशा | भारतीय कवि,शायर |
| कार्यकाल | 1989–2026 |
बशीर बद्र का जन्म उत्तर प्रदेश के अम्बेडकर नगर ज़िले के हंसवर के निकट स्थित बुकिया गाँव में हुआ था, अपने पिता के साथ उत्तर प्रदेश के इटावा आ गए थे जहाँ इनकी शिक्षा हाफिज मोहम्मद सिद्दकी इंटर कॉलेज से हुई।
डॉ॰ बशीर बद्र 56 साल से हिन्दी और उर्दू में देश के सबसे मशहूर शायर हैं। दुनिया के दो दर्जन से ज्यादा मुल्कों में मुशायरे में शिरकत कर चुके हैं। बशीर बद्र आम आदमी के शायर हैं। ज़िंदगी की आम बातों को बेहद ख़ूबसूरती और सलीके से अपनी ग़ज़लों में कह जाना बशीर बद्र साहब की ख़ासियत है। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को एक नया लहजा दिया। यही वजह है कि उन्होंने श्रोता और पाठकों के दिलों में अपनी ख़ास जगह बनाई है।
कविता
[संपादित करें]सँवार नोक-पलक अबरुओं में ख़म कर दे,
गिरे पड़े हुए लफ़्ज़ों को मोहतरम कर दे.!!
ग़ुरूर उस पे बहुत सजता है मगर कह दो,
इसी में उस का भला है ग़ुरूर कम कर दे.!!
चमकने वाली है तहरीर मेरी क़िस्मत की,
कोई चराग़ की लौ को ज़रा सा कम कर दे.!!
यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं,
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे.!!
किसी ने चूम के आँखों को ये दुआ दी थी,
ज़मीन तेरी ख़ुदा मोतियों से नम कर दे.!!
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "बशीर बद्र: मोहब्बत और उदासी के शायर जिन्होंने ग़ज़ल को आम लोगों तक पहुंचाया". BBC News हिन्दी. अभिगमन तिथि: 2026-05-29.