बल्लभ रसिक

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बल्लभ रसिक

बल्लभ रसिक गौड़ीय सम्प्रदाय के भक्त कवि हैं।[1]गदाधर भट्ट के वंशजों के अनुसार वल्लभ रसिक,गदाधर भट्ट के द्वितीय पुत्र थे।[1] इनके बड़े भाई का नाम रसिकोत्तंस था। भट्ट जी अपने दोनों पुत्रों को स्वयं शिक्षा और दीक्षा दी। इस आधार पर वल्लभ रसिक का कविताकाल वि ० सं ० १६५० के आस पास स्वीकार किया जा सकता है। क्योंकि गदाधर भट्ट का समय वि ० सं ० १६०० से कुछ पूर्व का अनुमानित किया गया है। भट्ट जी के पुत्र होने के कारण ये भी दक्षिणात्य ब्राह्मण हैं। किन्तु इन सभी तथ्यों ~~ समय,वंश सम्प्रदाय आदि के विषय में वल्लभ रसिक ने स्वयं कुछ नहीं लिखा। अपनी वाणी में तो महाप्रभु चैतन्य अथवा षट्गोस्वामियों की उन्होंने वन्दना भी नहीं की।

रचनाएँ[संपादित करें]

  • वल्लभ रसिक की वाणी
  • कुछ पद ,सवैया आदि पवित्रा ,वर्षगांठ ,दशहरा ,दीपावली आदि पर भी हैं। [1]

माधुर्य भक्ति का वर्णन[संपादित करें]

वल्लभ रसिक के विचार में संसार के सभी नाते झूठे हैं। अतः इन सम्बन्धों तो तोड़कर हमें राधा-कृष्ण युगलवर से ही अपना सम्बन्ध छोड़ना चाहिए। ये उपास्य-युगल रस के सागर हैं इसलिए इनसे नाता हो जाने पर भक्त भी सदा रस-सिंधु में मग्न होकर आनन्द प्राप्त करते हैं। उनकी रूप माधुरी अपूर्व है जिसे देखकर उपासक के नेत्र कभी तृप्त नहीं होते। इसीलिए उन्होंने कहा है ~~

हम तो युगल रूप रस माते नाते के माने।
देही नाते नेक न माने ह्यांते हैं अलसाने।।
श्याम सनेही हिये सुहाते नाते तिन सों ठाने।
वल्ल्भ रसिक फिरें इतराते चितराते उमदाने।।[1]

वल्लभ रसिक ने प्रेम क्षेत्र में राधा को भी उच्च स्थान दिया है।

यद्यपि दोउन की लगन सब मिलि कहें समान।
पै प्यारी महबूब है आशिक प्यारो जान।।

राधा-कृष्ण की विविध मधुर-लीलाओं का ध्यान करना ही वल्लभ रसिक की उपासना है राधा-कृष्ण का यह प्रेम जनित है। अतः इसमें आदि अन्त नहीं है। वह निजी सुख कामना से रहित है। इसीलिए उसे उज्जवल कहा गया है:

अहर पहर रस खेलत बीतें।
खेलनि में हारनि को जीतें।।
रसिकन चश्मो का चश्मा।
उज्जवल रस का जिन पर बसमा।।

वल्लभ रसिक ने राधा-कृष्ण की संयोग और वियोग सूचक दोनों प्रकार की लीलाओं का वर्णन अपनी वाणी में किया है। इनमें वियोग की अपेक्षा संयोग परक लीला के पदों,सवैयों की संख्या अधिक है। संयोग की लीलायें सभी प्रकार की हैं ~~ झूलन, रास,होरी, द्युत-क्रीड़ा, रथयात्रा ,जल-क्रीड़ा ,सूरत,विहार आदि। इन सभी का वर्णन कवि ने बहुत सुंदर दंग से किया है। झूलन के इस वर्णन में भक्त की भावुकता ,अलंकार तथा लाक्षणिक प्रयोग के कारण कवि की कव्य-प्रतिभा लक्षित होती है :

आज दोऊ झूलत रति रस साने।
ठाढ़े मचकें लचकि तरुनि के गहि फल फूलन आने।।
सूहे पट पहरें द्वै पटुली बैठे सामल गोरी।
अलिनु रंगीली तिय पद अंगुली पिय डोरी सों जोरी।।
श्याम काम बस झूल झूल पग मूलनि झूलिनि बढाहीं।
कामिनि चरण तामरस छुटि अलि काम लूटि मचि जाहीं।।
जोबन मधि जोवन मद झूलये झूलनि फंदनि जाने।
वल्लभ रसिक सखी के नैना एही झुलानि झुलाने।।[1]

बाह्य स्रोत[संपादित करें]

  • ब्रजभाषा के कृष्ण-काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७

सन्दर्भ[संपादित करें]