बदन सिंह

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भरतपुर जाट राज्य के संस्थापक राजा बदनसिंह (1723-1756 ई०) शाही सेनापति सवाई जयसिंह ने 18 नवम्बर 1722 ई० को थून गढ़ी पर अधिकार अवश्य कर लिया परन्तु वास्तव में उसने फौलादी जाट जमींदार, मजदूर-किसान संघ के सामने घुटने टेक दिये थे। वह जनवादी जाटप्रधान प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था तथा राजस्व प्रबन्ध को अपने हाथों में नहीं सम्भाल सका और न इस भूखण्ड को अपनी जागीर अथवा आगरा प्रान्त का स्थायी अंग बनाने में ही सफल रहा। इसका मुख्य कारण देश की राजनैतिक परिस्थितियां तथा जाट एकता थी, जिन्होंने उसको बाध्य कर दिया कि वह जाट सरदारों को कतिपय राजनैतिक तथा आन्तरिक शक्तियां सौंपकर अपनी प्रगाढ़ मित्रता वरण करे।

मोहकमसिंह के पलायन के बाद समस्त सिनसिनवार गांवों के सरदार तथा अन्य जाति के पाल सरदार (प्रमुख पंच) तथा काठेड़ परगने की जनता ने जाटों के उदीयमान नक्षत्र बदनसिंह को अपना डूंग (खाप) सरदार निर्वाचित कर लिया। इस तरह से बदनसिंह को चूड़ामन की जमींदारी और जाटों का नेतृत्व प्राप्त हुआ।

23 नवम्बर, 1722 ई० के दिन थून छावनी में सवाई जयसिंह ने बदनसिंह के साथ एक समझौता किया। जयसिंह ने उसके सिर पर पगड़ी बांधी और उसको पुरस्कृत किया। इसी समय उसने मुगल सम्राट् की ओर से बदनसिंह को टीका किया और उसको एक निशान, नक्कारा तथा पंचरंगी झण्डा प्रदान करके ‘ब्रजराज’ कीर्ति से सम्मानित किया।

18 मार्च, 1723 ई० को जयसिंह ने, जो उस समय आगरा का भी सूबेदार था, डीग शिविर में बदनसिंह को क्षेत्रीय प्रशासन व्यवस्था के लिए ‘ठाकुर’ पद से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उसे मथुरा, वृन्दावन, महावन, सहार, छाता, कोसी व होडल इत्यादि परगने, जिनकी कुल आय 50-60 लाख रुपये थी, जागीर में दिए गये। 19 जून 1725 ई० को सम्पन्न समझौते के अनुसार बदनसिंह ने जयसिंह को 83 हजार रुपये पेशकश (कर) देना स्वीकार किया।

इस प्रकार बदनसिंह का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य मुगलों से मान्यता प्राप्त शान्तिप्रिय जाट राज्य की स्थापना करना था। दीर्घकाल के पश्चात् इस क्षेत्र में संघर्ष एवं अराजकता का दौर समाप्त हुआ और किसान शान्तिपूर्वक कृषिकार्य की ओर प्रवृत्त हुए। बदनसिंह की दूरदर्शिता ने न केवल नवोदित जाट राज्य को पूर्ण विनाश से बचाया, बल्कि अब तक विकसित जाट शक्ति को कानूनी जामा पहनाकर उसे पूर्ण सुरक्षा प्रदान की।

ठाकुर बदनसिंह का कार्य अपने पूर्वजों द्वारा अधिकृत क्षेत्र को एक वैध शासन के साथ व्यवस्थित राज्य में परिणत करने का था। यह कार्य आसान नहीं था, फिर भी वह इस कार्य में वर्षों के धैर्यपूर्वक परिश्रम एवं युक्तिपूर्ण प्रशासन के बाद मुख्य रूप से सफल रहा। वह विजयों की अपेक्षा राज्य के शान्तिपूर्ण विस्तार एवं सुदृढ़ीकरण नीति में अधिक विश्वास रखता था। बदली हुई परिस्थितियों में बदनसिंह की नई नीति जाट राज्य के लिए हितकर सिद्ध हुई। मोहकमसिंह के हठीले स्वभाव से उत्पन्न जाट फूट को उसने अपने उदार व्यवहार से जाट एकता में बदल दिया। अपनी विनम्रता, सदाशयता एवं निष्ठा द्वारा उसने सवाई जयसिंह के दिल को जीत लिया।

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-655

बदनसिंह ने धीरे-धीरे जयसिंह का पूर्ण विश्वास प्राप्त कर लिया और जयसिंह ने इस जाट सरदार को बाकायदा आगरा, दिल्ली और जयपुर जानेवाले राजमार्ग पर गश्त करने और इन राजमार्गों का उपयोग करने वालों से पथ-कर उगाहने का कार्य सौंप दिया। इस प्रकार बदनसिंह को प्रभुत्व, उपाधि और राज्य क्षेत्र तीनों चीजें प्राप्त हो गयीं, जो अन्य किसी जाट सरदार के पास नहीं थी। यह चतुर सिनसिनवार जाट बहुत समझदारी के साथ ‘राजा’ की उपाधि धारण करने के लोभ का संवरण किए रहा। उसकी दृष्टि वास्तविक शक्ति पर थी, न कि थोथे दिखावे पर।

सवाई जयसिंह द्वारा बदनसिंह को जयपुर नगर के समीप ही लक्ष्मण डूंगरी की उपत्यका में भूमि आवंटित की गई। यहां पर बदनसिंह ने अपने लिए एक हवेली, बाग, सैनिक आवास बनवाये और अपने नाम पर बदनपुरा नामक गांव बसाया। कछवाहा राजधानी में यह जाटों की सैनिक छावनी थी जहां ठाकुर बदनसिंह जाकर रुकता था। राजा जयसिंह मुगल दरबार में आते जाते वक्त बदनसिंह से मिलने अवश्य जाता था। किन्तु वैण्डल के अनुसार जब कभी मुगल सम्राट् बदनसिंह को अपने दरबार में बुलाता था, तब वह यह कहकर क्षमा मांग लिया करता था कि मैं तो साधारण किसान हूँ। 1 मार्च 1731 ई० को जयसिंह ने मथुरा में बदनसिंह को ‘राव’ का खिताब प्रदान किया। ठाकुर बदनसिंह ने अपनी शान्ति, अथक धैर्य तथा कूटनीति से आगरा जिले के अन्य कई परगने पट्टे पर प्राप्त कर लिये थे।

सैनिक दृष्टि से बदनसिंह एक निष्प्राण शासक था, किन्तु जाटों के सौभाग्य से उनकी सैनिक कमान उसके ज्येष्ठ एवं योग्यतम पुत्र सूरजमल के हाथों में रही, जिसने अपने पिता के शासनकाल में और बाद में जाटों के स्वतन्त्र राज्य की स्थापना तक सैनिक गतिविधियों का सफल संचालन किया। वस्तुतः बदनसिंह के राजकार्य से निवृत्ति के बहुत पहले ही शासन की बागडोर अप्रत्यक्ष रूप से सूरजमल के हाथों में पहुंच चुकी थी।

मेवात पर अधिकार

मुगल एवं आमेर राज्य से घिरे जाटों को अपने विस्तार के लिए मेवात उपयुक्त भूभाग दिखाई दिया। मेव विद्रोहियों से परेशान कछवाहा राजा ने अपनी जागीर की सुरक्षार्थ जाट सेना की मदद चाही, तो इस क्षेत्र में जाटों का हस्तक्षेप आसान हो गया। मेवात के विद्रोह ने सवाई जयसिंह को बाध्य कर दिया था कि वह बयाना, भुसावर तथा रूपवास परगनों के मध्य भूभाग को ठाकुर बदनसिंह को सौंपकर व्यवस्था में योग दे। सूरजमल ने अपने कठिन प्रयास से मेवात के विद्रोहियों पर विजय प्राप्त की।

इस सफलता पर जयसिंह ने बदनसिंह को खिलअत भेजकर सम्मानित किया। अब सम्राट् मुहम्मदशाह ने बाध्य होकर परगना खोह, नगर तथा कठूमर आदि मेवाती परगने 2,40,000 रुपया सालाना इजारे (ठेका) पर बदनसिंह को सौंप दिये थे। इस प्रकार बदनसिंह ने असीम धैर्य, दृढ़ता तथा अपनी सैनिक नीतियों की सफलता से चार वर्ष की अल्पावधि में धीरे-धीरे 18 लाख रुपया वार्षिक आय की मेवात में जागीर पर अधिकार कर लिया था।

चूड़ामन के पुत्र मोहकमसिंह द्वारा अपनी जागीर की वापिसी के प्रयासों तथा खेमा जाट (खेमकरण सोगरिया)

जाट वीरों का इतिहास: दलीप सिंह अहलावत, पृष्ठान्त-656

का निरन्तर विरोध, बदनसिंह के लिए अभी भी खतरा बना हुआ था। 17 नवम्बर, 1722 ई० की रात्रि को थूनगढ़ी से भागकर मोहकमसिंह ने सीधे मारवाड़ के राठौड़ राजा (अपने पिता के मित्र) अजीतसिंह के यहां शरण ली थी। बाद में वह दक्षिण में जाकर होल्कर की सेना में शामिल हो गया था। दिसम्बर 1753 ई० में उसने शाही राजधानी में वजीर इमाद से मित्रता की और उसे सूरजमल से अपनी जागीर की वापसी के बदले दो करोड़ रुपया देने का वायदा करके मुग़ल सम्राट् अहमदशाह (1748-1754 ई०) से भेंट की। बाद में इमाद के साथ वह कुम्हेर पहुंचा और सूरजमल के विरुद्ध मराठा आक्रमण में सम्मिलित हो गया। किन्तु घेरे की विफलता के बाद असहाय अवस्था में वह सूरजमल के पास आया। सूरजमल ने पूरे सम्मान के साथ उसका स्वागत किया और अपने राज्य के सभी तालुकों से प्रति गांव एक रुपया उसे देना निश्चित किया। (देखें लेटर मुगल्स, 11, पृ० 124; फ्रैंज गोटलियब, पृ० 19-ब; तारीख-ए-अहमदशाही (सरकार प्रतिलिपि), पृ० 94-ब एवं 103-अ)।

खेमकरणसिंह की सोगरिया गढ़ी पर सूरजमल की विजय (सन् 1733)

सूरजमल का सैनिक जीवन मेवात और माण्डू के युद्धों से शुरु हुआ था, किन्तु उसकी प्रथम उच्चकोटि की सैनिक सफलता अपने पिता के शक्तिशाली विरोधी खेमकरण जाट के विरुद्ध थी। इस सफलता ने उसे अत्यधिक प्रसिद्धि दिलाई। वर्तमान भरतपुर दुर्ग जो कच्ची गढ़ी थी, उसकी स्थापना 1700 ई० के लगभग रुस्तम सोगरिया ने की थी। रुस्तम का पुत्र खेमा जाट, जो कि चूड़ामन का अभिन्न साथी था, बदनसिंह के लिए गम्भीर चुनौति बना हुआ था। इसलिए बदनसिंह ने सन् 1733 ई० में अपने 25 वर्षीय पुत्र सूरजमल को सोगर गढ़ी पर आक्रमण करने के लिए भेजा। सूरजमल ने विद्युत वेग से आक्रमण करके सोगर को जीत लिया। इस स्थान से खेमा जाट को बेदखल करके अपना अधिकार कर लिया। किन्तु खेमा जाट का विरोध जारी रहा।

फ्रैंज गोटलियब लिखता है कि खेमा जाट कुश्ती द्वारा शेरों को पराजित करने में निपुण (दक्ष) था। दिल्ली में सम्राट् के सम्मुख दो-तीन शेर अपने हाथों से मारकर जब उसने अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया तो सम्राट् ने प्रसन्न होकर उसे खिलअत एवं इनाम दिया। एरिंग निवासी भूण्डाराम ने षड्यन्त्र द्वारा खेमा जाट को अपने घर बुलाकर उसे भोजन में विष खिला दिया जिससे इस प्रचण्ड वीर योद्धा की मृत्यु हो गई। (पर्शियन हिस्ट्री ऑफ जाट्स, पृ० 21-अ)। परन्तु ठाकुर देशराज के अनुसार - “खेमा जाट को अड़ींग के खूंटेल (कुन्तल) शासक फोदासिंह ने भोजन में विष खिला दिया जिससे उसकी मृत्यु हो गई।” (जाट इतिहास पृ० 554)।

सीमित अधिकार क्षेत्र या जाट देश और सीमित आर्थिक साध्न जुटाने के बाद बदनसिंह ने नवीन नगर, दुर्ग तथा जन-हितकारी बांध एवं नहरों का निर्माण कार्य प्रारम्भ किया। शाही सेना के अनेक आक्रमणों के बाद सिनसिनी, थून, जाटौली आदि की कच्ची गढ़ियां पूर्णतः बरबाद हो चुकी थीं और उनकी मरम्मत कराना सामयिक नहीं था। आमेर राज्य के जागीरदारों के विरोध के बावजूद भी बदनसिंह ने 1725 ई० में डीग, 1726 ई० में कुम्हेर और वैर में पक्के दुर्गों का निर्माण कार्य प्रारम्भ किया। इसी समय बदनसिंह के भाई भतीजे, पुत्र तथा नातेदारों ने क्रमशः गोपालगढ़ (मेवात), अखैगढ़, पथैना और बल्लभगढ़ के साधारण सीमान्त किलों का निर्माण कराया। इन नवीन

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गढों में दूरस्थ नागरिक तथा व्यापारियों ने आकर आबादी बढ़ाई। इस प्रकार जाट संगठन एक स्थायी जाटराज्य भरतपुर में बदल गया।

राजा बदनसिंह के हरम में अनेक रानियां थीं और उसके 26 पुत्र थे। उसके पुत्रों में सूरजमल और प्रतापसिंह अत्यधिक योग्य एवं ख्यातिप्राप्त थे। यद्यपि सूरजमल ज्येष्ठ तथा अनेक गुणों से सम्पन्न था, किन्तु बदनसिंह का अपने दूसरे पुत्र प्रतापसिंह पर अधिक स्नेह था। भावी गृहकलह की आशंका को निर्मूल करने के उद्देश्य से ही उसने कुम्हेर में सूरजमल के लिए तथा वैर में प्रतापसिंह के लिए पृथक्-पृथक् सुदृढ़ दुर्गों एवं महलों का निर्माण करवाया। अपने गिरते हुए स्वास्थ्य ने बदनसिंह को विवश कर दिया था कि उत्तराधिकार के प्रश्न पर वह अनिश्चयात्मक स्थिति को शीघ्र समाप्त करे। सूरजमल की ज्येष्ठता, योग्यता एवं जाट सेना के बीच उसकी लोकप्रियता की उपेक्षा करना कठिन था, इसलिए अनुमान है कि 1738-40 ई० के लगभग बदनसिंह ने वैर का राज्य प्रतापसिंह को प्रदान कर दिया और सूरजमल को युवराज घोषित कर, शेष जाट राज्य का शासन प्रबन्ध उसे सौंप दिया। (सुजान विलास पा० लि० पृ० 134-ब)।

राज्य के इस बंटवारे के बावजूद अगले कुछ वर्ष तक बदनसिंह डीग में राजसभा की अध्यक्षता करता रहा। किन्तु नवम्बर 2, 1745 ई० को अपने प्रियपुत्र प्रतापसिंह की असामयिक मृत्यु से विक्षुब्ध एवं नेत्ररोग की भयंकरता से पीड़ित बदनसिंह ने तत्काल राजकार्यों से पूरी तरह निवृत्त होने का निश्चय किया। इस प्रकार नवम्बर 1745 ई० में युवराज सूरजमल शासन संचालन के पूरे अधिकारों के साथ जाटराज्य का वास्तविक शासक बन गया था। (सुजान चरित्र, पृ० 7-8)।

जदुनाथ सरकार भी लिखते हैं कि बदनसिंह के पिछले वर्षों में भरतपुर का इतिहास वास्तव में सूरजमल का इतिहास है।

भरतपुर की स्थापना

अठारहवीं शताब्दी के शुरु में ठाकुर खेमकरणसिंह सोगरिया ने सोगर तथा आस-पास के गांवों पर अधिकार जमा लिया था। उसने सबसे ऊँची जगह पर एक किला बनवाया और उसका नाम फतहगढ़ रखा। यह पिछले पृष्ठों पर लिख दिया गया है कि सूरजमल ने आक्रमण करके खेमकरण से सोगरिया किले को जीत लिया था। कहते हैं कि सोगर पर अधिकार करने के बाद एक दिन शाम के समय सूरजमल घोड़े पर सवार होकर आस-पास के जंगलों में निकला। वह एक झील पर जा पहुंचा। वहां एक सिंह और एक गाय बिलकुल पास खड़े पानी पी रहे थे। इस अद्भुत दृश्य का उस पर गहरा प्रभाव पड़ा। निकट ही एक नागा साधु (महात्मा प्रीतमदास) का डेरा था। सूरजमल ने उस महात्मा के पास जाकर उसे प्रणाम किया। महात्मा ने सूरजमल को आशीर्वाद दिया और अपनी राजधानी सोगर में बनाने की सलाह दी, जो वहीं पर बनाई गई*।

इस किले को बनाने का काम सन् 1732 ई० में आरम्भ हुआ। एक बार शुरु हो जाने के बाद निर्माण कार्य 60 वर्ष तक रुका ही नहीं। मुख्य किलेबंदियां आठ वर्षों में पूरी हो गयीं। इसमें दो खाइयां भी सम्मिलित थीं, एक तो शहर की बाहर वाली चारदीवारी के पास थी और दूसरी कम चौड़ी, पर ज्यादा गहरी खाई किले को घेरे हुई थी। परिवर्धन, परिवर्तन, रूपान्तर और विस्तार का

(*) - भरतपुर राज्य की पताका तथा चिह्न में “शेर व गऊ” का अङ्क इसी लोक वार्ता का प्रचलित प्रतीक है।

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कार्य सूरजमल से नौवीं पीढ़ी में उसके वंशज राजा जसवंतसिंह (1853-1893 ई०) के राज्य-काल तक चलता रहा।

भरतपुर किले की बनावट - इस किले की बाहर वाली खाई लगभग 250 फुट चौड़ी और 20 फुट गहरी थी। इस खाई की खुदाई से जो मलबा निकला, उसमें 25 फुट उंची और 30 फुट चौड़ी दीवार बनवाई गई जिसने शहर को पूरी तरह घेरा हुआ था। इसमें दस बड़े-बड़े दरवाजे थे, जिनसे आवागमन पर नियन्त्रण रहता था। इनमें से किसी भी दरवाजे से घुसने पर रास्ता एक पक्की सड़क पर जा पहुंचता था, जिसके परे भीतरी खाई थी, जो 175 फुट चौड़ी और 40 फुट गहरी थी। इस खाई में पत्थर और चूने का फर्श किया गया था।

दोनों ओर दो पुल थे, जिन पर होकर किले के मुख्य द्वारों तक पहुंचना होता था। पूर्वी दरवाजे के किवाड़ आठ धातुओं के मिश्रण से बने थे, इसीलिए इसे ‘अष्टधातु द्वार’ कहा जाता है। महाराजा जवाहरसिंह इसे दिल्ली से विजय चिह्न के रूप में लाये थे1। मुख्य किले की दीवार 100 फुट ऊंची थी और उसकी चौड़ाई 30 फुट थी। इसका सामनेवाला भाग तो पत्थर, ईंट और चूने का बना था, बाकी हिस्सा केवल मिट्टी का था, जिस पर तोपखाने की गोलीबारी का कोई असर नहीं होता था। किले के अन्दर की इमारतें दोनों प्रकार की थीं, शोभा की भी और काम आने वाली भी। आठ बुर्ज बनाये गये थे। इनमें सबसे ऊंचा जवाहर बुर्ज था। सभी बुर्जों पर बहुत बड़ी-बड़ी तोपें लगीं थीं बड़ी तोपें सूरजमल ने स्वयं ढ़लवायीं थीं। इन सब तोपों को चलाना या प्रयोग में लाना भी आसान काम नहीं था। 48 पौंड का गोला फेंकने वाली एक तोप ऐसी थी, जिसे खींचने के लिए 40 जोड़ी बैल लगते थे। लूटकर या खरीदकर प्राप्त की गयी अनगिनत छोटी तोपें भी लगीं थीं।

अन्य दुर्ग तथा भवनों का निर्माण

बदनसिंह के पास जन, धन और साधन सभी कुछ था। अपने विशाल भवन-निर्माण कार्यक्रम की देखरेख के लिए उसने जीवनराम बनचारी को अपना निर्माण-मंत्री नियुक्त किया। बांसी, पहाड़पुर से संगमरमर और बरेठा से लाल पत्थर डीग, भरतपुर, कुम्हेर और वैर तक पहुंचाने के लिए 1000 बैल गाड़ियां, 200 घोड़ा गाड़ियां, 1500 ऊंट गाड़ियां और 500 खच्चरों को लगाया गया था। इन चार स्थानों पर भवनों तथा वृन्दावन, गोवर्धन और बल्लभगढ़ में छोटे-छोटे निर्माण कार्यों को पूरा करने में 20,000 स्त्री पुरुष लगभग एक चौथाई शताब्दी तक दिन-रात जुटे रहे। वृन्दावन में सूरजमल की दो बड़ी रानियों रानी किशोरी और रानी लक्ष्मी के लिए दो सुन्दर हवेलियां बनवाईं गईं। दो अन्य रानियों, गंगा और मोहिनी ने पानी गांव में सुन्दर मंदिर बनवाये। अलीगढ़ का किला सूरजमल ने बनवाया। डीग से 15 मील पूर्व में सहार में बदनसिंह ने एक ‘सुन्दर भवन’ बनवाया, जो बाद में उसका निवास स्थान बन गया।

डीग का मुख्य महल ‘गोपाल भवन’ सन् 1745 ई० तक पूरा बन चुका था। कल्पना की

1. महाराजा सूरजमल जीवन और इतिहास, पृ० 46, लेखक कुंवर नटवरसिंह। नोट - प्रारम्भ में यह अष्टधातु फाटक चित्तौड़ दुर्ग पर था, जहाँ से अलाउद्दीन खिलजी उसे विजय स्मारक के रूप में उतारकर दिल्ली ले गया था। (जाटों का नवीन इतिहास, पृ० 332, लेखक उपेन्द्रनाथ शर्मा)।

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विशालता और बारीकियों के सौन्दर्य की दृष्टि से इसका जोड़ मिलना मुश्किल है। ‘गोपाल भवन’ लाल पत्थर का बना हुआ है। ‘गोपाल भवन’ के सामने एक अत्यन्त सुन्दर संगमरमर का झूला है। इसकी संगमरमर की चौकी पर पत्थर की पच्चीकारी की गयी है और उस पर सन् 1630-31 का एक फारसी लेख है। अपने महलों की शोभा बढ़ाने के लिए इतनी सुकुमार, चटकदार और परिमार्जित वस्तु की इच्छा केवल सम्राट् शाहजहां जैसे किसी महान् भवननिर्माता को ही हो सकती थी। इस हिंडोले1 (झूला) को सूरजमल दिल्ली से बैलगाड़ियों पर लदवाकर लाया था। इसके संगमरमर का कहीं से एक टुकड़ा भी नहीं टूटा। यहां तक कि जिस चौकी पर यह झूला बना है, उसके चारों ओर लगा बहुत ही नाजुक संगमरमर का पर्दा भी कहीं से नहीं टूटने पाया।

भारत के ‘गजेटियर’ में ‘थोर्नटन’ ने लिखा है “अपने चरम उत्कर्ष के दिनों में सूरजमल ने वे निर्झर प्रासाद बनवाये, जिन्हें ‘भवन’ कहा जाता है। भारत में सौन्दर्य तथा कारीगरी की दृष्टि से केवल आगरा का ताजमहल ही इनसे बढ़कर है।” जेम्स फर्ग्युसन भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचा है कि ये महल अप्सरालोक की कृतियां हैं। (जेम्स फर्ग्युसन, हिस्ट्री ऑफ इंडियन आर्किटेक्चर, पृ० 256)।

राजा बदनसिंह का अन्तिम समय

राजा बदनसिंह के जीवन के अन्तिम दिन अधिकांशतः डीग अथवा सहार (मथुरा से 18 मील उ० पू० में) व्यतीत हुए थे। साहित्य एवं स्थापत्य के प्रति बदनसिंह की प्रारम्भ से ही रुचि रही थी। उसने डीग दुर्ग का सौन्दर्यीकरण किया और उसके बनवाए हुए महल अब ‘पुराने महल’ कहलाते हैं। सहार में, जो उसके जीवन की सन्ध्या में उसकी रुचि का निवास स्थान था, उसने सुन्दर इमारतें बनवाईं एवं वाटिका लगवाई। बदनसिंह स्वयं कवि और कवियों का आश्रयदाता था। उसके रचे हुए कुछ स्फुट छन्द मिलते हैं, जिनमें ‘बदन’ अथवा ‘बदनेश’ लिखा हुआ मिलता है। प्रसिद्ध कवि सोमनाथ को बदनसिंह मथुरा से लाया था और उसे दरबार में सम्मानजनक स्थान देकर सूरजमल का शिक्षक नियुक्त किया था।

बदनसिंह ने नेत्ररोग की भयंकरता से पीड़ित होने के कारण 2 नवम्बर, 1745 ई० को अपने सुयोग्य ज्येष्ठपुत्र सूरजमल को युवराज घोषित कर दिया था जो शासन संचालन के पूरे अधिकारों के साथ जाटराज्य का वास्तविक शासक बन गया था। सूरजमल ने भरतपुर को अपनी राजधानी बनाया। भरतपुर जाटराज्य का संस्थापक राजा बदनसिंह लगभग 11 वर्ष तक नेत्रहीन रहा। उसका 7 जून, 1756 को डीग में स्वर्गवास हो गया।

1. महाराजा सूरजमल जीवन और इतिहास, पृ० 44, लेखक कुंवर नटवरसिंह। आधार पुस्तकें - 1. जाटों का नवीन इतिहास, पृ० 319-338, लेखक उपेन्द्रनाथ शर्मा। 2. जाट इतिहास, पृ० 32-34, लेखक कालिकारंजन कानूनगो। 3. महाराजा सूरजमल, पृ० 39-48, लेखक कुंवर नटवरसिंह। 4. महाराजा सूरजमल और उनका युग, पृ० 44-54, लेखक डा० प्रकाशचन्द्र चान्दावत। 5. क्षत्रियों का इतिहास प्रथम भाग, पृ० 130-132, लेखक परमेश शर्मा तथा राजपालसिंह शास्त्री।

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