बकुची

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बकुची

बकुची (Psoralea corylifolia) औषधी के काम में प्रयुक्त होने वाला एक पौधा है।

यह पौधा हाथ, सवा हाथ ऊँचा होता है। इसकी पत्तियाँ एक अँगुल चौड़ी होती हैं और डालियाँ पृथ्वी से अधिक ऊँची नहीं होतीं तथा इधर उधर दूर तक फैलती हैं। इसका फूल गुलाबी रंग का होता है। फूलों के झड़ने पर छोटी छोटी फलियाँ घोद में लगती हैं जिनमें दो से चार तक गोल गोल चौड़े और कुछ लंबाई लिए दाने निकलते हैं। दानों का छिलका काले रंग का, मोटा और ऊपर से खुरदार होता है। छिलके के भीतर सफेद रंग की दो दालें होती हैं जो बहुत कड़ी होती हैं और बड़ी कठिनाई से टूटती हैं। बीज से एक प्रकार की सुगंध भी आती है। यह औषधी में काम आता है। वैद्यक में इसका स्वाद मीठापन और चरपरापन लिए कड़वा बताया गया है और इसे ठंढ़ा, रुचिकर, सारक, त्रिदोषध्न और रसायन माना है। इसे कुष्टनाशक और त्वग्रोग की औषधि भी बतलाया है। कहीं कहीं काले फूल की भी बहुत होती है।

यह प्रायः सब प्रांतों के जंगली झाडियों में तथा खादर अथवा कंकरीली भूमि में उत्पन्न होता है एवं सिलोन्में भी प्राप्त होता है। अमेरिका में भी इसकी कई उपजातियां होती हैं जिनके गुण भी इसी के समान हैं।

इसका क्षुप १ - ४ फीट तक ऊंचा, वर्षायु एवं स्वावलम्बी होता है। पत्ते १ - ३ इंच के घेरे में छोटी अरणी के पत्तों के समान गोलाकार होते हैं। ये नालयुक्त, कडे, चिकने, लहरदार दंतुर एवं इनके दोनों पृष्ठों पर काले धब्बे होते हैं। इन ग्रंथियों के चिन्ह शाखाओं में भी होते हैं। १० - ३० छोटे, नीले बैगनी रंग के पुष्प - १ से २ इंच लम्बे पुष्पदण्ड पर आते हैं। फली - छोटी, गोल, काली, चिकनी, एक बीज युक्त, अस्फोटी एवं फलभित्ति बीजावरण से चिपकी रहती है। यह अण्डाकार, आयताकार, कुछ चिपटे, चिकने, अग्र की तरफ नुकीलें, काले रंंग के एवं महीन गढों से युक्त होते हैं तथा तालद्वारा बडा करके देखने पर नहाने स्पंज की तरह दिखाई देता है। इसको चवाने पर तीव्र गंध आती है तथा इनका स्वाद कडवा, तीता एवं दाहजनक होता है। औषधि कार्य में इनका तथा इनसे निकले तेल का व्यवहार किया जाता है।

अन्य नाम[संपादित करें]

इसे सोमराजी, कृष्णफल, वाकुची, पूतिफला, बेजानी, कालमेषिका, अबल्गुजा, ऐंदवी, शूलोत्था, कांबोजी, सुपर्णिका आदि नामों से भी जाना जाता है।

रासायनिक संगठन[संपादित करें]

बाकुची के फलों में राल, उडंशील तेल, तारपीन की तरह तेल, स्थिर तेल, एवं सोरलेन (Psoralen) तथा आइसो-सोरलेन (Iso-Psoralen) नामक दो रवेदार पदार्थ पाये जाते हैं। बाकुची के कृमिघ्न तथा त्वच्य गुण इन्ही रवेदार पदार्थों के मिश्रण से हैं। यह तेल में घुलने वाले (फ्युरोकाउमरिंस-Furocoumarins) हैं। प्रथम सोरलेन अंजीर से प्राप्त होने वाले फिक्युसिन (Ficusin) के समान होता है। इसकी फलभित्ति (Perlcarp-पेरीकार्प) से सोरलिडिन (Psoralidin) नामक एक अन्य रवेदार द्रव भी प्राप्त होता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]