फ्रेडरिक द्वितीय (पवित्र रोमन सम्राट)
| फ्रेडरिक द्वितीय | |
|---|---|
| पवित्र रोमन सम्राट; इटली के राजा; जर्मनी के राजा; सिसिली के राजा; यरूशलेम के राजा | |
फ्रेडरिक द्वितीय का एक समकालीन चित्रण (उनकी पुस्तक 'डे आर्टे वेनांडी कम एविबस' की पांडुलिपि से) | |
| पवित्र रोमन सम्राट | |
| शासनावधि | 22 नवंबर 1220 – 13 दिसंबर 1250 |
| राज्याभिषेक | 22 नवंबर 1220 (रोम) |
| पूर्ववर्ती | ओटो चतुर्थ |
| उत्तरवर्ती | हेनरी सातवां |
| सिसिली के राजा | |
| शासन | 3 सितंबर 1198 – 13 दिसंबर 1250 |
| राज्याभिषेक | 17 मई 1198 (पलेर्मो) |
| पूर्ववर्ती | हेनरी छठा और कॉन्स्टेंस प्रथम |
| उत्तरवर्ती | कॉनराड प्रथम |
| जर्मनी के राजा | |
| शासन | 23 अप्रैल 1220 – 13 दिसंबर 1250 |
| राज्याभिषेक | 9 दिसंबर 1212 (मेन्ज़); 25 जुलाई 1215 (आचेन) |
| पूर्ववर्ती | ओटो चतुर्थ |
| उत्तरवर्ती | कॉनराड चतुर्थ |
| यरूशलेम के राजा | |
| शासन | 9 नवंबर 1225 – 25 अप्रैल 1228 |
| राज्याभिषेक | 18 मार्च 1229 (यरूशलेम) |
| पूर्ववर्ती | इसाबेला द्वितीय (योलान्डा) |
| उत्तरवर्ती | कॉनराड द्वितीय |
| जन्म | 26 दिसंबर 1194 जेसी (Iesi), एंकोना का मार्च, पवित्र रोमन साम्राज्य |
| निधन | 13 दिसंबर 1250 (उम्र 55) कास्टेल फियोरेंटीनो (Castel Fiorentino), अपुलिया, सिसिली का राज्य |
| समाधि | पलेर्मो कैथेड्रल, सिसिली |
| जीवनसंगी |
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| घराना | होहेनस्टौफेन राजवंश (Hohenstaufen) |
| पिता | हेनरी छठा |
| माता | कॉन्स्टेंस प्रथम |
| धर्म | रोमन कैथोलिक |
फ्रेडरिक द्वितीय (अंग्रेज़ी: Frederick II; 26 दिसंबर 1194 – 13 दिसंबर 1250) मध्य युग के दौरान होहेनस्टौफेन (Hohenstaufen) राजवंश के सबसे शक्तिशाली, प्रबुद्ध और विवादास्पद शासकों में से एक थे। वे 1220 से अपनी मृत्यु तक पवित्र रोमन सम्राट रहे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सिसिली के राजा (1198-1250), जर्मनी तथा इटली के राजा (1212-1250) और अपनी असाधारण कूटनीति के परिणामस्वरूप यरूशलेम के राजा (1225-1228) के रूप में भी शासन किया।
सार्वभौमिक सत्ता का उनका स्वप्न उन्हें प्राचीन शास्त्रीय काल के एक सम्राट और ऑगस्टस (Augustus) के सीधे उत्तराधिकारी के रूप में देखने के लिए प्रेरित करता था।[1] उनके समकालीनों और बाद के इतिहासकारों द्वारा उन्हें अक्सर स्टूपर मुंडी (Stupor mundi - दुनिया का अजूबा) और पुएर अपुलिया (Puer Apuliae - अपुलिया का पुत्र) कहा जाता था। फ्रेडरिक मध्यकालीन यूरोप के सबसे बहुआयामी शासकों में से एक थे, जो छह भाषाएं (लैटिन, सिसिलियन, मध्य उच्च जर्मन, प्राचीन फ्रांसीसी, ग्रीक और अरबी) बोलना जानते थे।
उनका पूरा जीवनकाल रोमन कैथोलिक चर्च (पपसी) के साथ एक निरंतर और भीषण सत्ता-संघर्ष का साक्षी रहा। पोपों ने उनके बढ़ते साम्राज्य को अपने लिए एक गंभीर राजनीतिक और वैचारिक खतरा माना, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें तीन बार कैथोलिक चर्च से निष्कासित (excommunicate) किया गया। 1245 में ल्योन की परिषद द्वारा पोप इनोसेंट चतुर्थ ने उन्हें सम्राट के पद से अपदस्थ घोषित कर दिया। इन भयंकर संघर्षों के बावजूद, उन्होंने प्रशासनिक, कानूनी और सांस्कृतिक क्षेत्रों में ऐसे सुधार किए जो आधुनिक राज्य-व्यवस्था के अग्रदूत माने जाते हैं।
प्रारंभिक जीवन, वंश और जन्म की किंवदंतियाँ
[संपादित करें]फ्रेडरिक का जन्म 26 दिसंबर 1194 को मध्य इटली के जेसी (Iesi) नामक नगर में हुआ था। वे पवित्र रोमन सम्राट हेनरी छठे (Henry VI) और सिसिली की रानी कॉन्स्टेंस (Constance of Sicily) की एकमात्र संतान थे। पैतृक पक्ष से वे महान सम्राट फ्रेडरिक बारबरोसा (Frederick Barbarossa) के पौत्र थे, जबकि मातृ पक्ष से उनका संबंध सिसिली के शक्तिशाली नॉर्मन राजा रोजर द्वितीय (Roger II) से था। इस प्रकार, फ्रेडरिक की रगों में जर्मन और नॉर्मन दोनों राजवंशों का कुलीन रक्त बह रहा था।
जब फ्रेडरिक का जन्म हुआ, तब उनकी माता कॉन्स्टेंस की आयु 40 वर्ष थी, जो उस समय के चिकित्सा मानकों के अनुसार मातृत्व के लिए काफी अधिक थी। उनके राजनीतिक विरोधियों और जर्मन सरदारों ने यह अफवाह फैलानी शुरू कर दी कि महारानी गर्भवती नहीं हैं, बल्कि एक कसाई के बेटे को गुप्त रूप से शाही उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस संदेह को हमेशा के लिए समाप्त करने के लिए, महारानी कॉन्स्टेंस ने जेसी के मुख्य चौराहे पर एक सार्वजनिक और खुले तंबू (pavilion) में फ्रेडरिक को जन्म दिया।[2] इस दौरान उन्होंने नगर की सभी प्रमुख और कुलीन महिलाओं को तंबू में प्रवेश करने की अनुमति दी, ताकि वे इस शाही जन्म की प्रत्यक्ष गवाह बन सकें। कुछ वृत्तांतों के अनुसार, जन्म के पश्चात रानी ने नगर के चौक पर सार्वजनिक रूप से शिशु को स्तनपान भी कराया ताकि कोई भी अफवाह शेष न रहे।
अनाथ अवस्था और पलेर्मो का बहुसांस्कृतिक प्रभाव
[संपादित करें]फ्रेडरिक के जन्म के मात्र तीन वर्ष बाद, 1197 में उनके पिता सम्राट हेनरी छठे की मलेरिया (कुछ ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार जहर) से अचानक मृत्यु हो गई। अगले ही वर्ष 1198 में फ्रेडरिक की माता कॉन्स्टेंस की भी मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से ठीक पहले, कॉन्स्टेंस ने एक दूरदर्शी कूटनीतिक कदम उठाते हुए अपने चार वर्षीय अनाथ पुत्र फ्रेडरिक को तत्कालीन शक्तिशाली पोप इनोसेंट तृतीय (Pope Innocent III) के संरक्षण (wardship) में सौंप दिया। रानी भली-भांति जानती थीं कि जर्मन सरदार और क्षेत्रीय कुलीन सिसिली की अकूत संपत्ति पर नज़र गड़ाए हुए हैं, और केवल पोप का सर्वोच्च धार्मिक अधिकार ही बच्चे के जीवन और राज्याधिकार की रक्षा कर सकता है।[3]
फ्रेडरिक का बचपन और किशोरावस्था सिसिली की राजधानी पलेर्मो (Palermo) में बीता। 13वीं सदी का पलेर्मो यूरोप और भूमध्यसागरीय क्षेत्र का सबसे अनोखा, समृद्ध और बहुसांस्कृतिक शहर था। इसके जीवंत बाजारों और महलों में यूनानी (ग्रीक), अरब (मुस्लिम), नॉर्मन और यहूदी एक साथ शांतिपूर्वक रहते थे।[4]
युवा फ्रेडरिक को महलों की बंद चारदीवारी और औपचारिक ट्यूटर्स से अधिक पलेर्मो की सड़कों, बंदरगाहों और बाजारों में समय बिताना पसंद था। यहीं उन्होंने स्थानीय विद्वानों और व्यापारियों से अरबी और ग्रीक भाषाएं सीखीं। इस बहुसांस्कृतिक वातावरण ने फ्रेडरिक के मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ी और उनमें विभिन्न धर्मों, विशेषकर इस्लामी दर्शन और प्राचीन यूनानी विज्ञान के प्रति एक असाधारण सहिष्णुता और बौद्धिक जिज्ञासा विकसित की, जो उनके समकालीन कट्टरपंथी यूरोपीय राजाओं के लिए सर्वथा अकल्पनीय थी।[5]
साम्राज्य के लिए महासंग्राम और जर्मनी पर अधिकार
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फ्रेडरिक के बचपन के दौरान, पवित्र रोमन साम्राज्य में जर्मन सिंहासन के लिए एक भयंकर और लंबा गृहयुद्ध छिड़ गया। यह संघर्ष मुख्य रूप से वेल्फ (Welf) राजवंश के ओटो चतुर्थ (Otto IV) और होहेनस्टौफेन राजवंश के फिलिप (फ्रेडरिक के चाचा) के बीच था।
शुरुआत में पोप इनोसेंट तृतीय ने ओटो का समर्थन किया। लेकिन जब ओटो चतुर्थ 1209 में विधिवत सम्राट बना, तो उसने अपनी सीमाएं पार कर लीं और इटली तथा फ्रेडरिक के राज्य सिसिली पर सैन्य आक्रमण करने की योजना बनाई। पोप को अपनी क्षेत्रीय और धार्मिक सत्ता के लिए गंभीर खतरा महसूस हुआ; उन्होंने तुरंत ओटो को चर्च से बहिष्कृत कर दिया और जर्मनी के सरदारों को युवा फ्रेडरिक का समर्थन करने के लिए प्रेरित किया।
पोप के आशीर्वाद और फ्रांसीसी राजा फिलिप द्वितीय ऑगस्टस की मजबूत वित्तीय और कूटनीतिक सहायता से, 17 वर्षीय फ्रेडरिक ने 1212 में मुट्ठी भर समर्थकों के साथ आल्प्स पर्वत पार किया और जर्मनी में प्रवेश किया। यह यात्रा अत्यंत जोखिम भरी थी, लेकिन अपनी कूटनीति और वाक्पटुता से उन्होंने कई जर्मन सरदारों को अपने पक्ष में कर लिया। दिसंबर 1212 में उन्हें मेन्ज़ (Mainz) में 'रोमनों का राजा' (King of the Romans) चुना गया।
सत्ता का अंतिम निर्णय 1214 में बोविंस की लड़ाई (Battle of Bouvines) में हुआ, जहाँ फ्रेडरिक के फ्रांसीसी सहयोगियों ने ओटो चतुर्थ और उसके अंग्रेजी समर्थकों को बुरी तरह पराजित किया। 25 जुलाई 1215 को आचेन (Aachen) के ऐतिहासिक गिरजाघर में फ्रेडरिक का भव्य राज्याभिषेक हुआ, जहाँ उन्होंने पोप को खुश करने और अपना धार्मिक समर्पण सिद्ध करने के लिए यरूशलेम को मुक्त कराने हेतु धर्मयुद्ध (Crusade) पर जाने की सार्वजनिक शपथ ली।[6]
पवित्र रोमन सम्राट के रूप में राज्याभिषेक और सिसिली का प्रशासन
[संपादित करें]जर्मनी में अपनी स्थिति मजबूत करने के बाद, फ्रेडरिक इटली लौट आए। 22 नवंबर 1220 को रोम के सेंट पीटर बेसिलिका में एक भव्य समारोह में, पोप होनोरियस तृतीय (Honorius III) ने फ्रेडरिक को पवित्र रोमन सम्राट का ताज पहनाया। इसके बदले में, फ्रेडरिक ने पोप को आश्वासन दिया कि वे सिसिली के राज्य को पवित्र रोमन साम्राज्य से कानूनी रूप से अलग रखेंगे, क्योंकि पोप को भय था कि दोनों के एक होने से पपसी चारों ओर से घिर जाएगी।
सम्राट बनने के बाद फ्रेडरिक ने सिसिली में शाही सत्ता को बहाल करने का क्रूर लेकिन अत्यंत प्रभावी अभियान शुरू किया। उनकी लंबी अनुपस्थिति में सिसिली के सामंतों (Barons) और मुस्लिम विद्रोहियों (सारासेन) ने बहुत स्वायत्तता प्राप्त कर ली थी। फ्रेडरिक ने विद्रोही सामंतों के महल नष्ट कर दिए और उनकी भूमि जब्त कर ली।
1222 से 1225 के बीच उन्होंने सिसिली के पश्चिमी पहाड़ों में छिपे मुस्लिम विद्रोहियों को पराजित करने के लिए एक निर्मम सैन्य अभियान चलाया। विद्रोह को पूरी तरह कुचलने के बाद, उन्होंने एक अभूतपूर्व कूटनीतिक कदम उठाया। उन्होंने बचे हुए लगभग 20,000 सिसिलियन मुसलमानों को बंदी बनाकर इटली की मुख्य भूमि पर ल्यूसेरा (Lucera) नामक शहर में बसाया।
आश्चर्यजनक रूप से, उन्होंने इन मुसलमानों को उनके धर्म का पालन करने, मस्जिदें बनाने और अपने शरिया कानून के अनुसार जीने की पूरी स्वतंत्रता दी।[7] बदले में, ये मुस्लिम सैनिक फ्रेडरिक के सबसे वफादार अंगरक्षक, तीरंदाज और शाही खजाने के रक्षक बने। यह फ्रेडरिक की मास्टरस्ट्रोक थी, क्योंकि इन मुस्लिम सैनिकों पर पोप के 'धर्म-बहिष्कार' या नर्क के डर का कोई असर नहीं होता था।
छठा धर्मयुद्ध (Sixth Crusade) और यरूशलेम की रक्तहीन विजय
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फ्रेडरिक ने 1215 में क्रूसेड पर जाने की शपथ ली थी, लेकिन वे इसे अपने साम्राज्य के एकीकरण के कार्यों के कारण लगातार टालते रहे। पोप ग्रेगरी नौवें (Gregory IX), जो 1227 में गद्दी पर बैठे, इस विलंब से अत्यधिक क्रोधित थे। 1227 में जब फ्रेडरिक अंततः एक विशाल बेड़े के साथ यरूशलेम के लिए रवाना हुए, तो उनके शिविर में भयंकर महामारी (संभवतः हैजा) फैल गई। फ्रेडरिक स्वयं गंभीर रूप से बीमार पड़ गए और उन्हें बीच रास्ते से लौटना पड़ा। इसे एक जानबूझकर किया गया बहाना मानकर पोप ग्रेगरी नौवें ने तुरंत फ्रेडरिक को कैथोलिक चर्च से निष्कासित (Excommunicate) कर दिया और उन्हें ईसाई समुदाय से बाहर निकाल दिया।[8]
चर्च द्वारा बहिष्कृत होने के इस भारी अपमान के बावजूद, 1228 में फ्रेडरिक ने एक बहुत छोटी सेना के साथ छठे धर्मयुद्ध (Sixth Crusade) की शुरुआत की। फ्रेडरिक का यह धर्मयुद्ध मध्यकालीन इतिहास का सबसे अनोखा और आधुनिक सैन्य अभियान था, क्योंकि इसमें एक भी युद्ध नहीं लड़ा गया।
फ्रेडरिक अरबी भाषा, इस्लामी दर्शन और संस्कृति के गहरे जानकार और प्रशंसक थे। उन्होंने सैन्य संघर्ष के बजाय मिस्र के अय्युबिद सुल्तान अल-कामिल (Al-Kamil) के साथ सीधे कूटनीतिक पत्राचार और शांति वार्ता शुरू की। दोनों शासकों के बीच एक बौद्धिक और सम्मानजनक रिश्ता कायम हो गया, जिसमें वे दर्शन, ज्यामिति, और शिकार के तरीकों पर विचार साझा करते थे।
फरवरी 1229 में, फ्रेडरिक और अल-कामिल के बीच 'जाफ़ा की ऐतिहासिक संधि' (Treaty of Jaffa) पर हस्ताक्षर हुए। बिना कोई खून बहाए, फ्रेडरिक ने यरूशलेम, बेथलहम और नासरत का नियंत्रण ईसाइयों के लिए प्राप्त कर लिया। समझौते के अनुसार, अल-अक्सा मस्जिद और डोम ऑफ द रॉक (हरम अल-शरीफ) मुसलमानों के नियंत्रण में रहे, और उन्हें वहां बिना रोकटोक इबादत करने की अनुमति दी गई।
18 मार्च 1229 को, चर्च द्वारा बहिष्कृत होने के बावजूद, फ्रेडरिक ने यरूशलेम के 'पवित्र सेपल्चर के चर्च' (Church of the Holy Sepulchre) में स्वयं अपने हाथों से यरूशलेम के राजा का ताज पहना। उनकी इस कूटनीतिक सफलता ने पूरे ईसाई जगत को स्तब्ध कर दिया। जहाँ आम लोगों ने रक्तहीन विजय का जश्न मनाया, वहीं पोप इससे इतने क्रुद्ध हुए कि उन्होंने पूरे यरूशलेम शहर पर ही धार्मिक प्रतिबंध (Interdict) लगा दिया।[9]
'कुंजियों का युद्ध' और इटली में संघर्ष
[संपादित करें]जब फ्रेडरिक यरूशलेम में शांति स्थापित कर रहे थे, पोप ग्रेगरी नौवें ने उनकी अनुपस्थिति का लाभ उठाते हुए उनके खिलाफ "कुंजियों का युद्ध" (War of the Keys) छेड़ दिया। पोप ने सिसिली पर आक्रमण करने के लिए एक पपैल सेना (Papal army) भेजी, जिसका नेतृत्व फ्रेडरिक के ससुर जॉन ऑफ ब्रिएन (John of Brienne) कर रहे थे।
स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए फ्रेडरिक तुरंत इटली लौट आए। उनके ल्यूसेरा के मुस्लिम सैनिकों और जर्मन शूरवीरों ने पोप की सेना को बुरी तरह खदेड़ दिया। युद्ध में फ्रेडरिक की स्पष्ट सैन्य श्रेष्ठता को देखकर, पोप को झुकना पड़ा। अंततः 1230 में सैन जर्मानो की संधि (Treaty of San Germano) हुई, जिसके तहत विवश होकर पोप को फ्रेडरिक का निष्कासन रद्द करना पड़ा।
प्रशासनिक सुधार: मेलफी का संविधान (लिबर ऑगस्टालिस)
[संपादित करें]1231 में, फ्रेडरिक ने अपने साम्राज्य सिसिली के लिए एक व्यापक, प्रगतिशील और दूरदर्शी कानूनी संहिता लागू की, जिसे मेलफी का संविधान (Constitutions of Melfi) या लिबर ऑगस्टालिस (Liber Augustalis) कहा जाता है। यह मध्य युग के सबसे महत्वपूर्ण कानूनी दस्तावेजों में से एक था।[10]
इस संविधान के द्वारा फ्रेडरिक ने सिसिली को एक अत्यंत केंद्रीकृत, नौकरशाही राज्य (centralized bureaucratic state) में बदल दिया। सामंतों (Barons) के पारंपरिक अधिकार पूरी तरह छीन लिए गए, निजी युद्धों और प्रतिशोध (Vendetta) पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और सभी नागरिकों—चाहे वे ईसाई हों, मुस्लिम हों या यहूदी—को समान रूप से राजा के न्याय के अधीन कर दिया गया। फ्रेडरिक ने शाही अदालतों का निर्माण किया और कुलीनता के बजाय योग्यता के आधार पर न्यायाधीशों की नियुक्ति की।
आर्थिक क्षेत्र में, उन्होंने राज्य के एकाधिकार (State monopolies) स्थापित किए, रेशम उत्पादन को बढ़ावा दिया, और 1231 में ऑगस्टेल (Augustale) नामक एक शानदार और उत्कृष्ट सोने का सिक्का जारी किया। यह सिक्का रोमन सम्राट ऑगस्टस की याद दिलाता था और यूरोपीय अर्थव्यवस्था में एक मील का पत्थर साबित हुआ। इस प्रकार सिसिली राज्य यूरोप का पहला आधुनिक, प्रशासनिक राज्य बन गया।[11]
जर्मनी की नीतियां और पारिवारिक विद्रोह
[संपादित करें]इटली में अपने केंद्रीकरण के बिल्कुल विपरीत, फ्रेडरिक को जर्मनी में वहां के शक्तिशाली राजकुमारों (Princes) को भारी रियायतें देनी पड़ीं ताकि वे इटली में अपना ध्यान और संसाधन केंद्रित कर सकें। 1220 में उन्होंने जर्मन बिशपों को और 1232 में जर्मन राजकुमारों को (Statutum in favorem principum) ऐसे अभूतपूर्व विशेषाधिकार दिए जिन्होंने वस्तुतः जर्मन साम्राज्य को स्वतंत्र रियासतों के एक ढीले परिसंघ में बदल दिया। उन्होंने राजकुमारों को अपने सिक्के ढालने, सीमा शुल्क वसूलने और न्याय करने का स्वतंत्र अधिकार दे दिया।[12]
फ्रेडरिक के सबसे बड़े पुत्र, हेनरी (सातवें) ने इन रियायतों का कड़ा विरोध किया। उसे लगा कि पिता जर्मन राजशाही की शक्ति को नष्ट कर रहे हैं। शहरों का समर्थन लेकर 1234 में हेनरी ने अपने पिता के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया। फ्रेडरिक ने 1235 में जर्मनी की यात्रा की, और अपने विशाल प्रभाव के कारण बिना किसी बड़ी लड़ाई के विद्रोह को कुचल दिया। फ्रेडरिक ने अपने ही बेटे हेनरी को जीवन भर के लिए जेल में डाल दिया, जहाँ कुछ वर्षों बाद उसकी मृत्यु हो गई।
लोम्बार्ड लीग के खिलाफ युद्ध
[संपादित करें]फ्रेडरिक का प्रमुख राजनीतिक लक्ष्य उत्तरी इटली के समृद्ध और स्वायत्त शहरों (जिन्हें लोम्बार्ड लीग कहा जाता था) को अपने सीधे नियंत्रण में लाना था। मिलान (Milan) के नेतृत्व में इन शहरों ने फ्रेडरिक की शाही सत्ता और करों को मानने से इनकार कर दिया।
1237 में, फ्रेडरिक ने कोर्टेनुओवा की लड़ाई (Battle of Cortenuova) में लोम्बार्ड लीग की सेनाओं को एक करारी शिकस्त दी। यह फ्रेडरिक की सबसे महान सैन्य जीतों में से एक थी। सम्राट ने मिलान का कैरोशियो (Carroccio - एक पवित्र युद्ध रथ, जो इटालवी शहरों के गौरव का प्रतीक था) छीन लिया और उसे एक हाथी पर रखकर जीत के भव्य जुलूस के साथ रोम भेज दिया।
इस भारी जीत के बाद फ्रेडरिक बहुत महत्वाकांक्षी हो गए और उन्होंने मिलान के बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग की। इससे लोम्बार्ड शहरों ने डरकर समर्पण करने के बजाय प्रतिरोध जारी रखा। पोप ग्रेगरी नौवें को लगा कि फ्रेडरिक इटली और रोम को पूरी तरह निगल जाएंगे। नतीजतन, 1239 में पोप ने फ्रेडरिक को दूसरी बार चर्च से बहिष्कृत कर दिया और उनके खिलाफ एक व्यापक दुष्प्रचार अभियान शुरू किया, जिसमें फ्रेडरिक को 'ईसा मसीह का शत्रु' (Antichrist) और 'रहस्योद्घाटन का दरिंदा' (Beast of Revelation) घोषित कर दिया गया।[13]
मंगोल आक्रमण का संकट (1241)
[संपादित करें]उसी समय जब फ्रेडरिक पोप के साथ भीषण संघर्ष में उलझे हुए थे, यूरोप पर पूर्व से एक नया और भयानक खतरा मंडरा रहा था: बट्टू खान और सुबुतेई के नेतृत्व में मंगोल साम्राज्य का आक्रमण। 1241 में मंगोलों ने पोलैंड, हंगरी और सिलेसिया को रौंद दिया, और लिग्निट्ज़ (Liegnitz) तथा मोही (Mohi) के युद्धों में ईसाई सेनाओं को बुरी तरह नष्ट कर दिया।
सम्राट फ्रेडरिक ने इस खतरे को अत्यंत गंभीरता से लिया। उन्होंने इंग्लैंड के हेनरी तृतीय, फ्रांस के लुइस नौवें और अन्य यूरोपीय राजाओं को पत्र लिखे, जिसमें उन्होंने मंगोलों की रणनीति, उनकी गति, उनके हथियारों और उनकी क्रूरता का विस्तृत विवरण दिया। फ्रेडरिक ने यूरोपीय शासकों से अपने आपसी वैमनस्य को भुलाकर मंगोलों के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान किया। उन्होंने अपनी सीमाओं (जर्मनी और ऑस्ट्रिया) पर बचाव और किलेबंदी के सख्त निर्देश दिए। हालाँकि, मंगोल साम्राज्य के महान खान (ओगदेई खान) की मृत्यु के कारण मंगोल सेनाएं अचानक यूरोप से वापस लौट गईं, जिससे पश्चिमी यूरोप एक बड़े विनाश से बच गया।[14]
ल्योन की परिषद और ऐतिहासिक पतन (1245)
[संपादित करें]ग्रेगरी नौवें की मृत्यु के बाद, नया पोप इनोसेंट चतुर्थ (Innocent IV) चुना गया। शुरुआत में फ्रेडरिक ने शांति वार्ता की कोशिश की, लेकिन इनोसेंट चतुर्थ गुप्त रूप से इटली से भागकर फ्रांस के शहर ल्योन (Lyon) पहुँच गए। वहां 1245 में पोप ने 'ल्योन की पहली परिषद' बुलाई।
इस परिषद में फ्रेडरिक पर विधर्म (heresy), चर्च की संपत्तियों को लूटने, ईशनिंदा करने और क्रूसेड के वादों को तोड़ने के गंभीर आरोप लगाए गए। पोप इनोसेंट चतुर्थ ने फ्रेडरिक को पवित्र रोमन सम्राट के पद से अपदस्थ (deposed) करने की घोषणा कर दी और उनके सभी विषयों को उनकी वफादारी की शपथ से मुक्त कर दिया।[15] यह मध्यकालीन इतिहास का एक अभूतपूर्व क्षण था। पोप ने जर्मनी में फ्रेडरिक के खिलाफ 'एंटी-किंग' (Anti-kings) खड़े कर दिए, जिनमें हेनरी रास्प और हॉलैंड के विलियम शामिल थे। इससे जर्मनी में एक लंबा और विनाशकारी गृहयुद्ध छिड़ गया।
'स्टूपर मुंडी' (Stupor Mundi): विज्ञान, कला और बौद्धिक संरक्षण
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राजनीति और युद्ध से परे, फ्रेडरिक द्वितीय का दरबार 13वीं सदी के यूरोप का सबसे चमचमाता, प्रबुद्ध और सहिष्णु बौद्धिक केंद्र था।
- नेपल्स विश्वविद्यालय (University of Naples): 1224 में फ्रेडरिक ने नेपल्स विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह यूरोप का पहला राज्य-संचालित (State-run) विश्वविद्यालय था, जिसका उद्देश्य साम्राज्य के लिए कुशल प्रशासक और वकील तैयार करना था।[16]
- चिकित्सा कानून: फ्रेडरिक ने चिकित्सा के अभ्यास को विनियमित करने वाले पहले आधुनिक कानून पारित किए। उनके कानूनों के तहत किसी भी चिकित्सक को भ्रष्टाचार रोकने के लिए अपनी स्वयं की दवाइयां बेचने की अनुमति नहीं थी।
- बाज पालन और प्राकृतिक विज्ञान: फ्रेडरिक प्राकृतिक विज्ञान और जीव विज्ञान के प्रति अत्यधिक जुनूनी थे। उन्होंने बाज पालन (Falconry) पर लैटिन में एक असाधारण ग्रंथ लिखा, जिसका नाम डे आर्टे वेनांडी कम एविबस (De arte venandi cum avibus - द आर्ट ऑफ फाल्कनरी) है। यह पुस्तक केवल शिकार के बारे में नहीं थी, बल्कि यह पक्षियों के शरीर रचना विज्ञान (anatomy) और उनके प्रवास (migration) पर एक विशुद्ध वैज्ञानिक और अवलोकन-आधारित अध्ययन था, जो अरस्तू के कई सिद्धांतों को चुनौती देता था।[17]
- अरब विद्वानों से पत्राचार: फ्रेडरिक ने गणित, प्रकाशिकी (optics) और दर्शनशास्त्र से संबंधित प्रश्नों की एक सूची (जिन्हें 'सिसिलियन प्रश्न' कहा जाता है) मिस्र, सीरिया और यमन के मुस्लिम विद्वानों को भेजी थी। वे विशेष रूप से आत्मा की अमरता और प्रकाश के अपवर्तन के बारे में जानना चाहते थे।
- सिसिलियन स्कूल ऑफ पोएट्री: उनके दरबार के कवियों, विशेषकर गियाकोमो दा लेंटिनी (Giacomo da Lentini) ने 'सॉनेट' (Sonnet) का आविष्कार किया, जिसे बाद में दांते और पेट्रार्क ने अमर कर दिया।[18]

अंतिम वर्ष, विपत्तियाँ और मृत्यु
[संपादित करें]अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, फ्रेडरिक इटली में अपने सिकुड़ते साम्राज्य को बचाने के लिए निरंतर युद्ध लड़ते रहे। 1248 में परमा (Parma) की घेराबंदी के दौरान उनकी सेना को एक विनाशकारी हार का सामना करना पड़ा। उनका प्रिय पुत्र और सेनापति, एंज़ियो (Enzio of Sardinia), 1249 में बोलोग्ना के सैनिकों द्वारा पकड़ लिया गया और उसे अपना शेष जीवन एक कैद में बिताना पड़ा। फ्रेडरिक के सबसे भरोसेमंद मंत्री और सलाहकार, पिएत्रो डेला विग्ना (Pietro della Vigna) पर हत्या की साजिश का आरोप लगा, जिसे फ्रेडरिक ने अंधा कर दिया और बाद में उसने जेल में आत्महत्या कर ली।
इन लगातार राजनीतिक और व्यक्तिगत झटकों के बीच, 13 दिसंबर 1250 को अपुलिया के कास्टेल फियोरेंटीनो (Castel Fiorentino) में फ्रेडरिक द्वितीय का 55 वर्ष की आयु में पेचिश (Dysentery) से निधन हो गया। अपनी मृत्यु से ठीक पहले, उन्होंने एक सिस्टर्सियन भिक्षु के कपड़े पहने थे और उन्हें पादरी द्वारा अंतिम संस्कार दिए गए थे। उनके पार्थिव शरीर को पलेर्मो कैथेड्रल ले जाया गया, जहां उन्हें लाल पोर्फिरी (Red Porphyry) के एक भव्य मकबरे में दफनाया गया।
ऐतिहासिक विरासत
[संपादित करें]फ्रेडरिक द्वितीय का मूल्यांकन इतिहास में हमेशा ध्रुवीकृत रहा है। उनके समकालीन कैथोलिक लेखकों ने उन्हें "ईसा मसीह का दुश्मन" और एक क्रूर नास्तिक माना। इसके विपरीत, 19वीं सदी के स्विस इतिहासकार जैकब बर्कहार्ट (Jacob Burckhardt) ने उन्हें अपनी बुद्धिमत्ता और प्रशासनिक सुधारों के कारण "सिंहासन पर बैठा पहला आधुनिक मनुष्य" (the first modern man on the throne) करार दिया, जो अपने युग की धार्मिक कट्टरता से कोसों दूर था। 20वीं सदी में जर्मन इतिहासकार अर्नस्ट कैंटोरोविट्ज़ (Ernst Kantorowicz) ने अपनी प्रसिद्ध जीवनी में फ्रेडरिक को एक रहस्यमय और मसीहाई व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है।[19]
चाहे उन्हें जिस भी नजरिए से देखा जाए, फ्रेडरिक द्वितीय मध्ययुगीन इतिहास के एक निर्विवाद रूप से विशाल और प्रभावशाली व्यक्तित्व थे। उनके निधन के कुछ दशकों बाद ही इटली और जर्मनी में होहेनस्टौफेन राजवंश का पूरी तरह पतन हो गया, और उनके साथ ही एक सार्वभौमिक 'पवित्र रोमन साम्राज्य' (Universal Empire) का स्वप्न भी हमेशा के लिए समाप्त हो गया।[20]
सन्दर्भ
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