फोर्मलिस्म

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नियम निष्ठता [2] एक साहित्यक आलोचना और साहित्यिक बाद है जो किसी भी लिखित मूल पाठ के ढाते और आकार के उद्धेश्य को समझने की कोशिश करते है। यह पाठ को बाहरी प्रभान से अलग देखता है। नियम निष्ठता पाठ को सन्स्क्रिति और समाजिक भेद-भाव और प्रभाव से अलग देखती है। और साहित्यक साध्न्, शैली, प्रवचन, और प्रपत्र पर ज़्यादा केन्द्रित है। साहित्यक आलोचना में, नियम निष्ठता उन चीज़ो पर केन्द्रित है जो पाठ से समालिचनातमक दृष्टिकोण से विश्रेषण या व्याख्या कार्ती हो पाठ के भागो का। इन भागो मे शामिल है, व्याकरण, वाक्य विन्यास, साहित्यिक उपकरण जैसे की छ्न्द और खीस्तयाग। नियम निष्टता के द्रिश्तीकोण मे पाठ एतिहासिक जीवनी या सान्स्क्रितिक प्रसंग का मूल बहुत कम है। रूसी नियम निष्ठता मे रहस्यवादी विचार को अस्वीकार किय गया है। उनका मानना है कि साहित्य सिर्फ भाषा और साहित्यिक उपकरण से बना है, उन्होने साहित्य के सामग्री को महत्वपूर्ण नही सम्झा, उनका मानना है कि सामग्री सिर्फ भाषा और उप्करन को उपयोग करने के लिये एक बहाना है, और कुछ नही। इन्होने छ्न्द्रशास्त्र को भाशा वैग्यान से जोडन चहा, यह साबित करने के लिये कि एक को समझने के लिये दूसरा महत्वपूर्ण है। वे भाषा के विशिष्ठ गुण्वत्ता को पहचनना चाहते थे, जो साहित्यिक को असाहित्यिक से अलग करता है। नियम निष्ठ व्यक्तियो के द्रिष्टिकोण मे रूप, सामग्री से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। उन्होने वैग्यानिक तक नीति से भाषा के साहित्यिक उपयोग को भाषा के सामान्य उपयोग मे अन्तर को गुणातमक रूप से देखा जिस वे 'लिटरेटर नास्ट'- साहित्य के साहित्यता कहते थे। इसे वह मात्रात्मक रूप मे देखना चाहते थे। वह इसे सजाना चाहते थे 'ओस्त्रानेनी' के सिद्धैअन्त से, जिस्का मतलब है अनबन। इस प्रकार उनका विश्वास कि यह एक प्रक्रिय है जिससे परिचित भाषा अपरिचित लगती है, जो इन्सान की अनुभूति को जग देता है।

फर्डिनेंड डि सिस्योर नियम निष्ठ व्यक्ति ने अपनी कलपना को, फर्डिनेंड दि सिस्योर की भाषा विद-सिद्धांत और प्रतीकिवादी विचार जो पाठ के स्वायत्त्तना और साहित्य और भाषा के अलग-अलग उपियोग के अनिरंतरता के बारे में थी। नियम णिष्ठ व्यक्ति अपनी महत्वपूर्ण प्रवचन को प्रतीकवादी आलोचना से ज़्यादा निष्पक्श, वस्तुगत और वैग्यानिक बनाना चाहते थे। एय वक्त में चह रूसि भाविष्यवादी से जुडे हुए थे और स्माजशस्त्रिय आलिचना के विकद्ध थे। नियम निष्ठ व्यक्ति ने माध्यम पर ज़्यादा जोर डाला, वह माध्यम को ज़्यादा ऊँची समझते थे,वह यह देखना चाहते थे कि साहित्य, ज्यादातार कवित में कैसा, सहित्य एय कलांक्रित रूप से सामान्य भाषा को एक अनोखे रूप में प्रस्तुत करता है, इस कारण ह्मारी रोज की दुनिया ह्मारे लिये अपरिचित हि जाती है, इस नियम निष्ठ व्यक्ति 'डिफेमिलियरैज़ेशन'कहते है। उन्होने पहले से ही साहित्य के रूप और साहित्यिक तक्नीक के महत्व पर ज़्यादा ज़ोर डाला और वे हमेशा साहित्य के विशेष्त को एक स्वायत्त मौखिक कला के रूप में देखा है। उन्होने साहित्य के अलग-अलग कार्यो को समझने की कोशिश की है ताकी वे कविता और काल्पनिक कथा को दूसरे तरह के प्रवचनो से अलग देख सके। हालांकि नियम निष्ठता मार्क्स्वादी आलोचना के लिये अभिषाप था, नियम निष्ठता सेवित संघ मे १९२९ तक प्रचलित था। इसके बाद नियम निष्ठता की आलोचना हुए क्योंकि लोगों को इसमें राज्नैतिक प्रिपेक्श्य की कमी नज़र आई। लेकिन इसके बाद रोमन जेकबसन जो एय स्ंरचनवादी भाषाविद थे, इनका काम बहुत सर्हाया गया। और पस्चिम में इनका काम बहुत प्रभावित बना, विशेष्कर एंगलो-अमेरिकन नई आलोचन जो कई बार फार्मलिस्म भी कहलाई है। मगर आज, एक नियम निष्ठत द्रिष्तिकोण विलक्शण रूप से किसी शुद्ध महत्वपूर्ण विधि में नही देखने मिलता है। विश्वविध्यलयों मे हर अंग्रेज़ी विभाग में छात्रो जो पाठ के रचना और कला को बारीकि से समझना, कला को समझने क महत्वपूर्ण तरीका माना गया है।

नियम निष्ठता अनुस्ंधान में छात्रो के लिये गये पाठ के ढ्ंग और आचरण को परखा जाता है। नियम निष्ठ में भाषा सर्वोपरी है। किसी नियम निष्ठता, सैसायती फाँर दी स्तदी आँफ पोएटिक लैंगुयएज जो सेंत पितर्सबर्ग में बोरिस इकनबाम, विक्ट्रार श्क्लॉव्स्की और चूरी टन्यनोव द्वारा निर्मित की गई थी- इन्क कामो क उल्लखन है। ईक्न्बाम ने १९२६ निबंध 'द् थिओरी आँफ फाँर्मल् मेतोड, ह्मे एक किकयति द्रिश्य देता है नियम निष्ठता के द्रिश्टीकोण कि। इनका लक्श्य एय ऍसा साहित्यिक विग्यान का निर्मान करना ता जो स्वतंत्र और वास्तविक हो। चह बात आरस्टोट्ल ने भी अपने किताब 'पोएटिक्स' [1][2] मे कही है। क्योंकि भाषा साहित्य में सब्से कीमती है, भाषा को ही इस विग्यान का मूल होना चाहिये। साहित्य स्वायत्त है बाहरी वातावरण से। सहित्यिक भाषा वार्तालापी भाषा से अलग है। सहित्य क अपना खुद का इतिहास है, भाषिक आविष्कारो का ओतोहास जो बाहरी दुनिया के इतिहास से अलग है। डिफैमिलियरैज़ेशन, नियम निष्ठत के अनुसार साबसे महत्त्व पूर्ण तरीका है जिससे साहित्यिक भाषा, ह्मारे रोज के वार्तालाप से अलग होना है। और यह एक ढंग है जिससे कला काम कारता है। साहित्यिक इतिहास मे अविश्कार कुछ ढंग है जिससे कला काम करता है। साहित्यिक इतिहास मे अविश्कार कुछ ढंग से डिफेमिलियरैज़ेशन की वजह से हुआ है- श्क्लोव्स्की के अनुसार। इसिलिये नियम निष्ठता पर यह आरोप है, कि यह राज्नैतिक रूप से प्रातीक्वादी थे।

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  1. http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%85%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A5%81
  2. https://en.wikipedia.org/wiki/Poetics_(Aristotle)
  3. https://en.wikipedia.org/wiki/Formalism_(literature)