फ़ुस्सिलत

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सूरा फ़ुस्सिलात (इंग्लिश: Fussilat, उर्दू: حم السجدہ"हा. मीम. अस्-सज्दा") इस्लाम के पवित्र ग्रन्थ कुरआन का 41 वां सूरा या अध्याय है। इसमें 54 आयतें हैं।

नाम[संपादित करें]

सूरा 'हा. मीम. अस्-सज्दा[1]का दूसरा नाम सूरा  फ़ुस्सिलत[2] भी है, इस सूरा का नाम दो शब्दों से मिलाकर बना है। एक हा. मीम., दूसरे अस-सजदा। मतलब यह है कि वह सूरा जिसका आरम्भ हा. मीम. से होता है और इसमें एक स्थान पर सजदा की आयत आई है।


सूरए हा मीम अस सजदह मक्का में नाजि़ल हुआ और इसमें चव्वन (54) आयतें और (6) रूकूउ हैं

ख़ुदा के नाम से (शुरू करता हूँ) जो बड़ा मेहरबान निहायत रहम वाला है

हा मीम (1)

(ये किताब) रहमान व रहीम ख़़ुदा की तरफ़ से नाजि़ल हुयी है ये (वह) किताब अरबी क़ुरआन है (2)

जिसकी आयतें समझदार लोगें के वास्ते तफ़सील से बयान कर दी गयीं हैं (3)

(नेकों कारों को) ख़़ुशख़बरी देने वाली और (बदकारों को) डराने वाली है इस पर भी उनमें से अक्सर ने मुँह फेर लिया और वह सुनते ही नहीं (4)

और कहने लगे जिस चीज़ की तरफ़ तुम हमें बुलाते हो उससे तो हमारे दिल पर्दों में हैं (कि दिल को नहीं लगती) और हमारे कानों में गिर्दानी (बहरापन है) कि कुछ सुनायी नहीं देता और हमारे तुम्हारे दरम्यिान एक पर्दा (हायल) है तो तुम (अपना) काम करो हम (अपना) काम करते हैं (5)

(ऐ रसूल) कह दो कि मैं भी बस तुम्हारा ही सा आदमी हूँ (मगर फ़र्क ये है कि) मुझ पर ‘वही’ आती है कि तुम्हारा माबूद बस (वही) यकता ख़़ुदा है तो सीधे उसकी तरफ़ मुतावज्जे रहो और उसी से बख़शिश की दुआ माँगो, और मुशरेकों पर अफ़सोस है (6)

जो ज़कात नहीं देते और आख़ेरत के भी क़ायल नहीं (7)

बेशक जो लोग ईमान लाए और अच्छे अच्छे काम करते रहे और उनके लिए वह सवाब है जो कभी ख़त्म होने वाला नहीं (8)

(ऐ रसूल) तुम कह दो कि क्या तुम उस (ख़़ुदा) से इन्कार करते हो जिसने ज़मीन को दो दिन में पैदा किया और तुम (औरों को) उसका हमसर बनाते हो, यही तो सारे जहाँ का सरपरस्त है (9)

और उसी ने ज़मीन में उसके ऊपर से पहाड़ पैदा किए और उसी ने इसमें बरकत अता की और उसी ने एक मुनासिब अन्दाज़ पर इसमें सामाने माईश्त का बन्दोबस्त किया (ये सब कुछ) चार दिन में और तमाम तलबगारों के लिए बराबर है (10)

फिर आसमान की तरफ मुतावज्जे हुआ और (उस वक़्त) धुएँ (का सा) था उसने उससे और ज़मीन से फ़रमाया कि तुम दोनों आओ ख़ुशी से ख़्वाह कराहत से, दोनों ने अर्ज़ की हम ख़ुशी ख़ुशी हाजि़र हैं (11)

(और हुक्म के पाबन्द हैं) फिर उसने दोनों में उस (धुएँ) के सात आसमान बनाए और हर आसमान में उसके (इन्तेज़ाम) का हुक्म (कार कुनान कज़ा व क़दर के पास) भेज दिया और हमने नीचे वाले आसमान को (सितारों के) चिराग़ों से मुज़य्यन किया और (शैतानों से महफूज़) रखा ये वाकि़फ़कार ग़ालिब ख़ुदा के (मुक़र्रर किए हुए) अन्दाज़ हैं (12)

फिर अगर हम पर भी ये कुफ्फार मुँह फेरें तो कह दो कि मैं तुम को ऐसी बिजली गिरने (के अज़ाब से) डराता हूँ जैसी क़ौम आद व समूद की बिजली की कड़क (13)

जब उनके पास उनके आगे से और पीछे से पैग़म्बर (ये ख़बर लेकर) आए कि ख़़ुदा के सिवा किसी की इबादत न करो तो कहने लगे कि अगर हमारा परवरदिगार चाहता तो फ़रिश्ते नाजि़ल करता और जो (बातें) देकर तुम लोग भेजे गए हो हम तो उसे नहीं मानते (14)

तो आद नाहक़ रूए ज़मीन में ग़़ुरूर करने लगे और कहने लगे कि हम से बढ़ के क़ूवत में कौन है, क्या उन लोगों ने इतना भी ग़ौर न किया कि ख़ुदा जिसने उनको पैदा किया है वह उनसे क़ूवत में कहीं बढ़ के है, ग़रज़ वह लोग हमारी आयतों से इन्कार ही करते रहे (15)

तो हमने भी (तो उनके) नहूसत के दिनों में उन पर बड़ी ज़ोरों की आँधी चलाई ताकि दुनिया की जि़न्दगी में भी उनको रूसवाई के अज़ाब का मज़ा चखा दें और आख़ेरत का अज़ाब तो और ज़्यादा रूसवा करने वाला ही होगा और (फिर) उनको कहीं से मदद भी न मिलेगी (16)

और रहे समूद तो हमने उनको सीधा रास्ता दिखाया, मगर उन लोगों ने हिदायत के मुक़ाबले में गुमराही को पसन्द किया तो उन की करतूतों की बदौलत जि़ल्लत के अज़ाब की बिजली ने उनको ले डाला (17)

और जो लोग ईमान लाए और परहेज़गारी करते थे उनको हमने (इस) मुसीबत से बचा लिया (18)

और जिस दिन ख़़ुदा के दुशमन दोज़ख़ की तरफ़ हकाए जाएँगे तो ये लोग तरतीब वार खड़े किए जाएँगे (19)

यहाँ तक की जब सब के सब जहन्नुम के पास जाएँगे तो उनके कान और उनकी आँखें और उनके (गोश्त पोस्त) उनके खि़लाफ उनके मुक़ाबले में उनकी कारस्तानियों की गवाही देगें (20)

और ये लोग अपने आज़ा से कहेंगे कि तुमने हमारे खि़लाफ क्यों गवाही दी तो वह जवाब देंगे कि जिस ख़़ुदा ने हर चीज़ को गोया किया उसने हमको भी (अपनी क़ुदरत से) गोया किया और उसी ने तुमको पहली बार पैदा किया था और (आखि़र) उसी की तरफ़ लौट कर जाओगे (21)

और (तुम्हारी तो ये हालत थी कि) तुम लोग इस ख़्याल से (अपने गुनाहों की) पर्दा दारी भी तो नहीं करते थे कि तुम्हारे कान और तुम्हारी आँखे और तुम्हारे आज़ा तुम्हारे बरखि़लाफ गवाही देंगे बल्कि तुम इस ख़्याल मे (भूले हुए) थे कि ख़़ुदा को तुम्हारे बहुत से कामों की ख़बर ही नहीं (22)

और तुम्हारी इस बदख़्याली ने जो तुम अपने परवरदिगार के बारे में रखते थे तुम्हें तबाह कर छोड़ा आखि़र तुम घाटे में रहे (23)

फिर अगर ये लोग सब्र भी करें तो भी इनका ठिकाना दोज़ख़ ही है और अगर तौबा करें तो भी इनकी तौबा क़़ुबूल न की जाएगी (24)

और हमने (गोया ख़ुद शैतान को) उनका हमनशीन मुक़र्रर कर दिया था तो उन्होने उनके अगले पिछले तमाम उमूर उनकी नज़रों में भले कर दिखाए तो जिन्नात और इन्सानो की उम्मतें जो उनसे पहले गुज़र चुकी थीं उनके शुमूल {साथ} में (अज़ाब का) वायदा उनके हक़ में भी पूरा हो कर रहा बेशक ये लोग अपने घाटे के दरपै थे (25)

और कुफ़्फ़ार कहने लगे कि इस क़़ुरआन को सुनो ही नहीं और जब पढ़ें (तो) इसके (बीच) में ग़ुल मचा दिया करो ताकि (इस तरकीब से) तुम ग़ालिब आ जाओ (26)

तो हम भी काफि़रों को सख़्त अज़ाब के मज़े चखाएँगे और इनकी कारस्तानियों की बहुत बड़ी सज़ा ये दोज़ख़ है (27)

ख़़ुदा के दुशमनों का बदला है कि वह जो हमरी आयतों से इन्कार करते थे उसकी सज़ा में उनके लिए उसमें हमेशा (रहने) का घर है, (28)

और (क़यामत के दिन) कुफ़्फ़ार कहेंगे कि ऐ हमारे परवरदिगार जिनों और इन्सानों में से जिन लोगों ने हमको गुमराह किया था (एक नज़र) उनको हमें दिखा दे कि हम उनको पाँव तले (रौन्द) डालें ताकि वह ख़ूब ज़लील हों (29)

और जिन लोगों ने (सच्चे दिल से) कहा कि हमारा परवरदिगार तो (बस) ख़ुदा है, फिर वह उसी पर भी क़ायम भी रहे उन पर मौत के वक़्त (रहमत के) फ़रिश्ते नाजि़ल होंगे (और कहेंगे) कि कुछ ख़ौफ न करो और न ग़म खाओ और जिस बेहिष्त का तुमसे वायदा किया गया था उसकी खुशियाँ मनाओ (30)

हम दुनिया की जि़न्दगी में तुम्हारे दोस्त थे और आख़ेरत में भी तुम्हारे (रफ़ीक़) हैं और जिस चीज़ का भी तुम्हार जी चाहे बेहिष्त में तुम्हारे वास्ते मौजूद है और जो चीज़ तलब करोगे वहाँ तुम्हारे लिए (हाजि़र) होगी (31)

(ये) बख्शने वाले मेहरबान (ख़़ुदा) की तरफ़ से (तुम्हारी मेहमानी है) (32)

और इस से बेहतर किसकी बात हो सकती है जो (लोगों को) ख़़ुदा की तरफ़ बुलाए और अच्छे अच्छे काम करे और कहे कि मैं भी यक़ीनन (ख़ुदा के) फ़रमाबरदार बन्दों में हूँ (33)

और भलाई बुराई (कभी) बराबर नहीं हो सकती तो (सख़्त कलामी का) ऐसे तरीके से जवाब दो जो निहायत अच्छा हो (ऐसा करोगे) तो (तुम देखोगे जिस में और तुममें दुशमनी थी गोया वह तुम्हारा दिल सोज़ दोस्त है (34)

ये बात बस उन्हीं लोगों को हासिल हुई है जो सब्र करने वाले हैं और उन्हीं लोगों को हासिल होती है जो बड़े नसीबवर हैं (35)

और अगर तुम्हें शैतान की तरफ़ से वसवसा पैदा हो तो ख़ुदा की पनाह माँग लिया करो बेशक वह (सबकी) सुनता जानता है (36)

और उसकी (कुदरत की) निशानियों में से रात और दिन और सूरज और चाँद हैं तो तुम लोग न सूरज को सजदा करो और न चाँद को, और अगर तुम ख़़ुदा ही की इबादत करनी मंज़ूर रहे तो बस उसी को सजदा करो जिसने इन चीज़ों को पैदा किया है (37)

पस अगर ये लोग सरकशी करें तो (ख़़ुदा को भी उनकी परवाह नहीं) वो लोग (फ़रिश्ते) तुम्हारे परवरदिगार की बारगाह में हैं वह रात दिन उसकी तसबीह करते रहते हैं और वह लोग उकताते भी नहीं (38)

उसकी क़ुदरत की निशानियों में से एक ये भी है कि तुम ज़मीन को ख़ुश्क और बेगयाह देखते हो फिर जब हम उस पर पानी बरसा देते हैं तो लहलहाने लगती है और फूल जाती है जिस ख़ुदा ने (मुर्दा) ज़मीन को जि़न्दा किया वह यक़ीनन मुर्दों को भी जिलाएगा बेशक वह हर चीज़ पर क़ादिर है (39)

जो लोग हमारी आयतों में हेर फेर पैदा करते हैं वह हरगिज़ हमसे पोशीदा नहीं हैं भला जो शख़्स दोज़ख़ में डाला जाएगा वह बेहतर है या वह शख़्स जो क़यामत के दिन बेख़ौफ व ख़तर आएगा (ख़ैर) जो चाहो सो करो (मगर) जो कुछ तुम करते हो वह (ख़़ुदा) उसको देख रहा है (40)

जिन लोगों ने नसीहत को जब वह उनके पास आयी न माना (वह अपना नतीजा देख लेंगे) और ये क़़ुरआन तो यक़ीनी एक आली मरतबा किताब है (41)

कि झूठ न तो उसके आगे फटक सकता है और न उसके पीछे से और खूबियों वाले दाना (ख़ुदा) की बारगाह से नाजि़ल हुयी है (42)

(ऐ रसूल) तुमसे भी बस वही बातें कहीं जाती हैं जो तुमसे और रसूलों से कही जा चुकी हैं बेशक तुम्हारा परवरदिगार बख्शने वाला भी है और दर्दनाक अज़ाब वाला भी है (43)

और अगर हम इस क़ु़रआन को अरबी ज़बान के सिवा दूसरी ज़बान में नाजि़ल करते तो ये लोग ज़रूर कह न बैठते कि इसकी आयतें (हमारी) ज़बान में क्यों तफ़सीलदार बयान नहीं की गयी क्या (खू़ब क़़ुरान तो) अजमी और (मुख़ातिब) अरबी (ऐ रसूल) तुम कह दो कि इमानदारों के लिए तो ये (कु़रआन अज़सरतापा) हिदायत और (हर मर्ज़ की) शिफ़ा है और जो लोग ईमान नहीं रखते उनके कानों (के हक़) में गिरानी (बहरापन) है और वह (कु़रआन) उनके हक़ में नाबीनाई (का सबब) है तो गिरानी की वजह से गोया वह लोग बड़ी दूर की जगह से पुकारे जाते है (44)

(और नहीं सुनते) और हम ही ने मूसा को भी किताब (तौरैत) अता की थी तो उसमें भी इसमें एख़्तेलाफ किया गया और अगर तुम्हारे परवरदिगार की तरफ़ से एक बात पहले न हो चुकी होती तो उनमें कब का फैसला कर दिया गया होता, और ये लोग ऐसे शक में पड़े हुए हैं जिसने उन्हें बेचैन कर दिया है (45)

जिसने अच्छे अच्छे काम किये तो अपने नफे़ के लिए और जो बुरा काम करे उसका बवाल भी उसी पर है और तुम्हारा परवरदिगार तो बन्दों पर (कभी) ज़ुल्म करने वाला नहीं (46)

क़यामत के इल्म का हवाला उसी की तरफ़ है (यानि वही जानता है) और बगै़र उसके इल्म व (इरादे) के न तो फल अपने पौरों से निकलते हैं और न किसी औरत को हमल रखता है और न वह बच्चा जनती है और जिस दिन (ख़़ुदा) उन (मुशरेकीन) को पुकारेगा और पूछेगा कि मेरे शरीक कहाँ हैं- वह कहेंगे हम तो तुझ से अर्ज़ कर चूके हैं कि हम में से कोई (उनसे) वाकिफ़ ही नहीं (47)

और इससे पहले जिन माबूदों की परसतिश करते थे वह ग़ायब हो गये और ये लोग समझ जाएगें कि उनके लिए अब मुख़लिसी नहीं (48)

इन्सान भलाई की दुआए मांगने से तो कभी उकताता नहीं और अगर उसको कोई तकलीफ़ पहुँच जाए तो (फौरन) न उम्मीद और बेआस हो जाता है (49)

और अगर उसको कोई तकलीफ़ पहुँच जाने के बाद हम उसको अपनी रहमत का मज़ा चखाएँ तो यक़ीनी कहने लगता है कि ये तो मेरे लिए ही है और मैं नहीं ख़याल करता कि कभी क़यामत बरपा होगी और अगर (क़यामत हो भी और) मैं अपने परवरदिगार की तरफ़ लौटाया भी जाऊँ तो भी मेरे लिए यक़ीनन उसके यहाँ भलाई ही तो है जो आमाल करते रहे हम उनको (क़यामत में) ज़रूर बता देंगें और उनको सख़्त अज़ाब का मज़ा चख़ाएगें (50)

(वह अलग) और जब हम इन्सान पर एहसान करते हैं तो (हमारी तरफ़ से) मुँह फेर लेता है और मुँह बदलकर चल देता है और जब उसे तकलीफ़ पहुँचती है तो लम्बी चैड़ी दुआएँ करने लगता है (51)

(ऐ रसूल) तुम कहो कि भला देखो तो सही कि अगर ये (क़़ुरआन) ख़ुदा की बारगाह से (आया) हो और फिर तुम उससे इन्कार करो तो जो (ऐसे) परले दर्जे की मुख़ालेफ़त में (पड़ा) हो उससे बढ़कर और कौन गुमराह हो सकता है (52)

हम अनक़रीब ही अपनी (क़ु़दरत) की निशानियाँ अतराफ़ (आलम) में और ख़़ुद उनमें भी दिखा देगें यहाँ तक कि उन पर ज़ाहिर हो जाएगा कि वही यक़ीनन हक़ है क्या तुम्हारा परवरदिगार इसके लिए काफ़ी नहीं कि वह हर चीज़ पर क़ाबू रखता है (53)

देखो ये लोग अपने परवरदिगार के रूबरू हाजि़र होने से शक में (पड़े) हैं सुन रखो वह हर चीज़ पर हावी है (54)

सूरए हा मीम अस सजदह ख़त्म

अवतरणकाल[संपादित करें]

मक्कन सूरा अर्थात पैग़म्बर मुहम्मद के मक्का के निवास के समय अवतरित हुई।

मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि विश्वस्त उल्लेखों के अनुसार इसका अवतरणकाल हज़रत हमज़ा (रजि.) के ईमान लाने के बाद और हज़रत उमर (रजि.) के ईमान लाने से पहले है। प्रसिद्ध ताबई मुहम्मद बिन काब अल-फ़र्जी (से उल्लिखित है कि ) एक बार कुरैश के कुछ सरदार मस्जिदे हराम में महफ़िल जमाए बैठे थे और मस्जिद के एक दूसरे गोशे में के रसूल (सल्ल.) अकेले मौजूद थे। उतबा बिन रबीआ ने क़ुरैश के सरदारों (के परामर्श से नबी (सल्ल.) के पास जाकर) कहा, "भतीजे, यह काम जो तुमने शुरू किया है , इससे यदि तुम्हारा उद्दश्य धन प्राप्त करना है तो हम सब मिलकर तुम को इतना कुछ दे देते हैं कि तुम हममें सबसे अधिक धनवान हो जाओ। यदि इससे अपनी बड़ाई चाहते हो तो हम तुम्हें अपना सरदार बना लेते हैं। यदि बादशाही चाहते हो तो हम तुम्हे अपना बादशाह बना लेते हैं और यदि तुमपर कोई जिन्न आता है तो हम अपने ख़र्च पर तुम्हारा इलाज कराते हैं। " उतबा यह बाते करता रहा और नबी (सल्ल.) चुपचाप सुनते रहे। फिर आपने कहा, “ऐ अबुल वलीद! आपको जो कुछ कहना था कह चुके? ”उसने कहा , “ हाँ।" आप (सल्ल.) ने कहा , “अच्छा, अब मेरी सुनो।' इसके बाद आपने बिसमिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम (अल्लाह के नाम से जो अत्यन्त कृपाशील और दयावान् है) पढ़कर इसी सूरा को पढ़ना शुरू किया और उतबा अपने दोनों हाथ पीछे ज़मीन पर टेके ध्यान से सुनता रहा। सजदा की आयत 38 पर पहुँचकर आपने सजदा किया और सिर उठाकर कहा , “ऐ अबुल वलीद! मेरा जवाब आपने सुन लिया; अब आप जाने और आपका काम । ” उतबा उठकर कुरैश के सरदारों के पास वापस आया और उनसे उसने कहा : “ अल्लाह की क़सम , मैंने ऐसी वाणी सुनी कि कभी इससे पहले नहीं सुनी थी। ईश्वर की सौगन्ध , न यह काव्य है , न जादू है , न कहानत (भविष्य-वक्ताओं की वाणी)। ऐ कुरैश के सरदारो! मेरी बात मानो और इस व्यक्ति को इसके हाल पर छोड़ दो। मैं समझता हूँ कि यह वाणी कुछ रंग लाकर रहेगी। कुरैश के सरदार उसकी -ये बात सुनते ही बोल उठे , “वलीद के पिता , आख़िर उसका जादू तुमपर भी चल गया । ” ( इब्नेहिशाम भाग -1 , पृ . 313-314 )

विषय और वार्ता[संपादित करें]

मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी लिखते हैं कि उतबा की इस बातचीत के जवाब जो अभिभाषण अल्लाह की ओर से अवतरित हुआ उसमें उन अनर्गल बातों की ओर सिरे से कोई ध्यान नहीं दिया गया, जो उसने नबी (सल्ल.) से कही थीं और केवल उस विरोध को वार्ता का विषय बनाया गया है जो कुरआन मजीद के आमंत्रण को नीचा दिखाने के लिए मक्का के काफ़िरों की ओर से उस समय अत्यन्त हठधर्मी और दुराचार के साथ किया जा रहा था। इस अन्धे और बहरे विरोध के उत्तर में जो कुछ कहा गया है उसका सारांश यह है :

(1) यह अल्लाह की अवतरित की हुई वाणी है और अरबी भाषा में है । अज्ञानी लोग इसमें ज्ञान या कोई प्रकाश नहीं पाते , किन्तु समझ-बूझ रखनेवाले उस प्रकाश को देख भी रहे हैं और उससे लाभ भी उठा रहे हैं।

(2) तुमने यदि अपने दिलों पर आवरण डाल रखें हैं और अपने कान बहरे कर लिए हैं तो नबी को यह काम नहीं सौंपा गया है कि (वह ज़बरदस्ती तुम्हें अपनी बात सुन। वह तो) सुनने वालों ही को सुना सकता है और समझनेवालों ही को समझा सकता है।

(3) तुम चाहे अपनी आँखें और कान बन्द कर लो और अपने दिलों पर परदा डाल लो , किन्तु सत्य तो यही है कि तुम्हारा ईश्वर बस एक ही है। और तुम के बन्दे नहीं हो।

(4) तुम्हें कुछ एहसास भी है कि ये बहुदेववाद और इनकार की नीति तुम किसके साथ अपना रहे हो? उस ईश्वर के साथ जो तुम्हारा और सारे जगत् का सृष्टा , मालिक और दाता है। उसका साझीदार तुम उसकी तुच्छ सृष्ट वस्तुओं को बनाते हो ?

(5) अच्छा, नहीं मानते हो तो सावधान हो जाओ कि तुमपर उसी तरह यातना सहसा टूट पड़ने के लिए तैयार है जैसा कि आद और समूद जातियों पर आई थी।

(6) बड़ा ही अभागा है वह मनुष्य जिसके साथ जिन्नों और मानवों में से ऐसे शैतान लग जाएँ जो उसकी मूर्खताओं को उसके समक्ष सुन्दर बनाकर प्रस्तुत करें। इस तरह के नादान लोग आज तो यहाँ एक-दूसरे को बढ़ावे-चढ़ावे दे रहे हैं किन्तु क़ियामत के दिन इनमें से हरेक कहेगा : जिन लोगों ने मुझे बहकाया था, वह मेरे हाथ लग जाएँ तो उन्हें पाँव तले रौंद डालूँ।

(7) यह क़ुरआन एक अटल किताब है । इसे तुम अपनी घटिया चालों और झूठ के हथियारों से पराजित नहीं कर सकते।

(8) तुम कहते हो कि यह कुरआन किसी गैर-अरबी भाषा में आना चाहिए था । किन्तु अगर गैर-अरबी भाषा में इसे भेजते तो तुम्हीं लोग कहते कि यह भी विचित्र हास्य है , अरब जाति के मार्गदर्शन के लिए गैर-अरबी भाषा में वार्तालाप किया जा रहा है। इसका अर्थ यह है कि तुम्हें वास्तव में मार्गदर्शन अभीष्ट ही नहीं है।

(9) कभी तुमने यह भी सोचा कि यदि वास्तव में सत्य ही सिद्ध हुआ कि यह कुरआन अल्लाह की ओर से है तो इसका इनकार करके तुम किस परिणाम को पहुँचोगे।

(10) आज तुम नहीं मान रहे हो , किन्तु शीघ्र ही तुम अपनी आँखों से देख लोगे कि इस क़ुरआन का आह्वान सम्पूर्ण विश्व पर छा गया है और तुम स्वयं उससे पराजित हो चुके हो।

विरोधियों को यह उत्तर देने के साथ उन समस्याओं की ओर भी ध्यान दिया गया है जो उस कठिन रुकावटों के वातावरण में ईमानवालों और स्वयं नबी (सल्ल.) समक्ष थीं। ईमानवालों को यह कहकर हिम्मत बँधाई गई कि तुम वास्तव में बेयार और बे-मददगार के नहीं हो, बल्कि जो व्यक्ति ईमान की राह पर जम जाता है , अल्लाह के फ़रिश्ते उसपर अवतरित होते हैं और दुनिया से लेकर आख़िरत (परलोक) तक उसका साथ देते हैं । नबी (सल्ल.) को बताया गया कि (आह्वान की राह में आड़े आनेवाली) चट्टानें देखने में बड़ी कठोर दिखाई देती है, किन्तु सुशीलता का हथियार है जो उन्हें तोड़कर और पिघलाकर रख देगा। धैर्य के साथ उससे काम लो और जब कभी शैतान उत्तेजित करके किसी दूसरे हथियार से काम लेने पर उकसाए तो अल्लाह से पनाह माँगो।

सुरह "हा. मीम. अस्-सज्दा" या फुस्सीलत का अनुवाद[संपादित करें]

अल्लाह के नाम से जो दयालु और कृपाशील है।

इस सूरा का प्रमुख अनुवाद:

क़ुरआन की मूल भाषा अरबी से उर्दू अनुवाद "मौलाना मुहम्मद फ़ारूक़ खान", उर्दू से हिंदी "मुहम्मद अहमद" [3]ने किया।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

पिछला सूरा:
ग़ाफिर
क़ुरआन अगला सूरा:
अश-शूरा
सूरा 41

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सन्दर्भ:[संपादित करें]

  1. अनुवादक: मौलाना फारूक़ खाँ, भाष्य: मौलाना मौदूदी. अनुदित क़ुरआन संक्षिप्त टीका सहित. पृ॰ 680 से.
  2. "सूरा  फ़ुस्सिलत'". https://quranenc.com. मूल से 23 जून 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 11 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)
  3. "Fussilat सूरा का अनुवाद". https://tanzil.net. मूल से 25 अप्रैल 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 11 जुलाई 2020. |website= में बाहरी कड़ी (मदद)

बाहरी कडियाँ[संपादित करें]

इस सूरह का दूसरे अनुवादकों द्वारा किया अनुवाद क़ुरआन प्रोजेक्ट पर देखें Fussilat 41:1