प्राचीन केरल

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पुराने बंदरगाह[संपादित करें]

प्राचीन काल से केरल में बंदरगाह थे जो यहाँ की नाविक परंपरा को सूचित करते हैं। इन्हीं बंदरगाहों के कारण विदेशी व्यापार समृद्ध हुआ। प्राचीन यायावरों ने मुसरिस (कोडुन्गल्लूर), तिण्डीस, बराक्के, नेलक्किण्डा आदि कुछ प्राचीन बंदरगाहों उल्लेख किया है। मुसरिस के अतिरिक्त दूसरे बंदरगाह कहाँ-कहाँ स्थित थे इसकी सही जानकारी इतिहासविदों को नहीं है। मुसरिस प्राचीन भारत के सर्वप्रमुख बंदरगाहों में एक था। उपर्युक्त बंदरगाहों के अतिरिक्त अनेक छोटे-छोटे बंदरगाह केरल में अवश्य रहे होंगे। बाद में कोल्लम, कोष़िक्कोड़, कोच्चिन आदि प्रमुख बंदरगाह बने।

आदिचेर[संपादित करें]

आदिचेर नाम से प्रख्यात चेर प्रदेश के प्रमुख चेर राजा थे - उतियन चेरल आतन, नेटुम चेरल आतन, पलयनै चेल केष़ुकुट्टुवन, नरमुटि चेरल, वेलकेष़ुकुट्टुवन, आडुकोट पाट्ट चेरल आतन, चेलवकुटुम कोवाष़ि आतन, पेरुम चेरल इरुम्पोरै, इलम चेरल इरुम्पोरै इत्यादि।

कुलशेखर साम्राज्य[संपादित करें]

संघमकाल के पश्चात् ईस्वीं सन् नौवीं शती तक के केरल के इतिहास की कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती है। तीन सौ वर्षों के इस कालखण्ड को काली रात के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इस काल के सामाजिक जीवन और राजनैतिक गतिविधियों या सांस्कृतिक विकास का कोई स्पष्ट चित्र उपलब्ध नहीं है। लगभग आठवीं शती में उस लम्बे अज्ञात कालखण्ड को समाप्त करते हुए कुलशेखर नामक राजा के आधिपत्य में एक चेर साम्राज्य का उदय हुआ। इसे इतिहासकार दूसरे चेर साम्राज्य, कुलशेखर साम्राज्य आदि नामों से अभिव्यक्त करते हैं, यह 12 वीं शती तक कायम रहा। सन् 800 - 1102 तक का कालखण्ड कुलशेखर काल माना जाता है।

कुलशेखर साम्राज्य ने आधुनिक केरल की नींव डाली। कुलशेखर राजाओं की राजधानी महोदयपुरम थी, जिसके संबन्ध में आम धारण है कि वह वर्तमान कुटुंगल्लूर और तिरुवंचिकुलम क्षेत्रों के अंतर्गत आता था। इस साम्राज्य का शासन तेरह सम्राटों ने चलाया - कुलशेखर आलवार (800 - 820), राजशेखर वर्मा (820 - 844), स्थाणु रविवर्मा (844 - 885), रामवर्मा कुलशेखरन (885 - 917), गोदारविवर्मा (917 - 944), इन्दुक्कोता वर्मा (944 - 962), भास्कर रविवर्मा प्रथम (962 - 1019), भास्कर रविवर्मा (1019 - 1021), वीरकेलन (1022 - 1028), राजसिंहन (1028 - 1043), भास्कर रविवर्मा तृतीय (1043 - 1082), रवि रामवर्मा (1082 - 1090) और रामवर्मा कुलशेखरन (1090 - 1102)

चोल राजाओं ने द्वितीय चेरसाम्राज्य को ध्वस्त कर दिया। कहा जाता है कि कुलोत्तु नामक चोल सम्राट के सैनिकों ने राजधानी महोदयपुरम को जला डाला। जनश्रुति है कि अंतिम चेर सम्राट (चेरमान पेरुमाल) ने राज्य को बाँट दिया और इस्लाम धर्म में दीक्षा लेकर अरब देश गये। प्रस्तुत घटना को प्रमाणित करनेवाली कोई प्रामाणिक या लिखित सामग्री नहीं मिलती। प्राचीन अथवा मध्ययुग के किसी भी यायावर ने अपने यात्रावृत्त में उपर्युक्त घटना का उल्लेख नहीं किया है।

महाप्रस्तर युगीन स्मारक[संपादित करें]

केरल के प्राचीन जीवन की जानकारी के लिए विभिन्न स्थानों से खोज निकाले पत्थर के औजारों को प्रामाणिक माना जा सकता है। विभिन्न स्थान जैसे वयनाटु के एडाक्कल, तोवरि, इटुक्की के मरायूर के पास के कुटक्काट नामक वनक्षेत्र, कोल्लम जिले के तेन्मला के पास के चन्तरुणि आदि की गुफाएँ केरल के प्राचीन लोक जीवन के जीवन्त प्रमाण हैं। प्राचीन खण्डहरों के अतिरिक्त केरल के लोकजीवन के बारे में महाप्रस्तर युगीन स्मारक से प्रामाणिक जानकारी मिलती है।

इन स्मारकों का युग 500 वर्ष ईसा पूर्व से लेकर 300 ईं तक माना जाता है। महाप्रस्तर से तात्पर्य उन कोठरियों या स्तंभों से है जो बडे पत्थरों से निर्मित कब्रिस्तान है या मृतकों के स्मृतिचिह्न है। दक्षिण भारत में जो महाप्रस्तर अभियान हुआ था वह प्रेत पूजा से संबन्धित था। महाप्रस्तर युगीन स्मारक भी विभिन्न प्रकार के हैं जैसे कि पत्थरों से बना विशाल कोठरियाँ, पयुतराक्कल्लु (रस्सी नुमा शिलाएँ), नडुक्कल्लुकल (पत्थर के स्तंभ), कुटक्कल्लुकल (छतरीनुमा शिलाएँ), तोप्पिक्कल्लुकल (टोपी नुमा शिलाएँ), पत्थर की गुफाएँ आदि। ये गुफाएँ कई नामों से जानी जाती हैं जैसे - नडुक्कल्लु, तोप्पिक्कल्लु, पडाक्कल्लु, पुलच्चिक्कल्लु, पांडिक्कुष़ि (पुरानी कब्र), नन्नन्ङाडी, पतुमक्कताष़ि आदि। उन दिनों शव को मिट्टी से बने बहुत बडे पात्र में रखकर गाड़ दिया जाता था। इसमें कोई संदेह नहीं कि महाप्रस्तर युगीन खण्डहरों से प्राचीन जीवन की झाँकी भी मिलती है। परन्तु उन्हें स्थायी निवास के विकास का सूचक नहीं माना जा सकता।

धर्म[संपादित करें]

प्राचीन केरल में द्रविड आचारों एवं अनुष्ठानों का पालन किया जाता था किन्तु उसमें संगठित धर्म की कोई विशेषता नहीं थी। वे कुलदैवों, प्राकृतिक शक्तियों और कोट्टवै नामक युद्ध देवता की उपासना करते थे। उन दिनों पितरों की पूजा का रिवाज़ भी था। पहली सदी तक जैन, बौद्ध यहाँ तक पहुँच गये। कुछ सदियाँ बीतने पर इन धर्मों ने द्रविड आचारों को मिटा कर केरल में अपना प्रभाव जमाया। इसके उपरान्त केरल में ब्राह्मण पहुँचे जो आर्यवंशज थे। किन्तु ब्राह्मणों का पूर्णतया आगमन 8 वीं सदी में हुआ। परिणामतः यहाँ हिन्दु धर्म का विकास हुआ। जिस ब्राह्मण हिन्दु धर्म ने जैन और बौद्ध धर्मों के प्रभाव को कम किया था वहीं द्रविड विचारों एवं देवताओं को आत्मसात किया।

सम्राट कुलशेखर के राज्य काल में हिन्दू धर्म का अभूतपूर्व विकास हुआ। शंकराचार्य (788 - 820) के प्रयास ने हिन्दू धर्म को केरल में ही नहीं भारत भर में संगठित स्वरूप प्रदान किया। शंकराचार्य ने भारतीय दर्शन के लिए महान योगदान दिया। हिन्दू धर्म के विकास का स्वाभाविक परिणाम था मंदिरों का निर्माण। नौवीं सदी के उपरान्त केरल में असंख्य मंदिर निर्मित हुए। द्रविड देवताओं के साथ हिन्दू देवताओं को भी मंदिरों में स्थान मिला। इसके उपरान्त मंदिर प्रशासन के लिए अनेक समितियों की स्थापना हुई। इन समितियों को कच्चम कहा जाता था। कच्चम का शाब्दिक अर्थ है - वह स्थान जहाँ सार्वजनिक बैठक होती है। इसी तरह की एक समिति थी मूष़िक्कुळम कच्चम जो एरणाकुलम जिले में परवूर के निकट स्थित मूष़िक्कुळम नामक स्थान पर थी जिसमें मंदिर प्रशासन के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रशासन के लिए निर्णय लिया जाता था।

धर्म और मंदिर ने कला तथा ज्ञान प्रसारण को बढाव दिया। कूत्तु, कूटियाट्टम् आदि कलारूपों का आविर्भाव 9 वीं सदी में हुआ। शिल्पकला एवं वास्तुकला का भी विकास हुआ। कुलशेखर कालीन केरल में अनेक विद्याकेन्द्र खुले जिसमें मूष़िक्कुळम शाला और तिरुवल्ला शाला प्रसिद्ध हैं। मंदिर में वेदपाठ हुआ करता था और धार्मिक संहिताओं की परीक्षाएँ भी होती थीं। कटवल्लूर अन्योन्यम एक आदर्श संस्था थी जहाँ ऋग्वेद वैदग्ध्य की परीक्षा ली जाती थी। इस काल में यद्यपि बैद्ध एवं जैन धर्म लुप्तप्रायः हो गए तथापि यहूदी तथा ईसाई धर्म को बल मिला।

कुलशेखर कालीन केरल[संपादित करें]

कुलशेखर शासन काल की नौवीं और दसवीं सदियाँ केरलीय इतिहास का सुवर्णकाल माना जाता है। कुलशेखर शासकों ने शासन को सुचारू रूप के लिए चलाने राज्यों में विभाजित कर दिया और कई प्रदेशों में बाँटा। प्रदेश की सबसे छोटी इकाई को करा कहलाता था। उन दिनों कई प्रकार के कर वसूल किये जाते थे। जिन्हें पतवरम नाम से जाना जाता था। इसी काल में वाणिज्य, विज्ञान, कला, साहित्य आदि विभिन्न क्षेत्रों में भी केरल ने प्रगति की। महोदयपुरम में ज्योतिषविद शंकर नारायणन के नेतृत्व में एक प्लानेटोरियम स्थापित की गयी थी।

कान्तल्लूर, कोल्लम, विष़िन्जम, कोटुंगल्लूर इत्यादि बंदरगाह कुलशेखर कालीन विदेश व्यापार केन्द्र थे। सर्वाधिक व्यापार चीन के साथ ही होता था। सुलेमान, मसूद आदि अरब यात्रियों ने केरल के साथ व्यापार का उल्लेख किया है। उन दिनों व्यापारियों के संगठन भी होते थे। सर्व प्रमुख वाणिज्य संगठन थे अंचुवण्णम्, मणिग्रामम्, वलंचियर नानादेशिकल।

संघमयुग[संपादित करें]

प्रख्यात इतिहासविद् ए. श्रीधर मेनन का विचार है कि केरल के निर्माण का इतिहास पाँचवीं सदी तक का रहा होगा। यह वह युग है जो तमिल साहित्य में संघमकाल नाम से प्रसिद्ध है। उन दिनों केरल तमिलनाडु के अंतर्गत था।

पष़न्तमिल पाट्टुकल' (पुराने तमिलगीत) नाम से अभिहित संघ साहित्य से इस युग के बारे में जानकारी मिलती हैं। प्रायः सभी इतिहासकार यह मानते हैं कि ईसा पूर्व पहली शताब्दी से लेकर छठी शताब्दी के बीच का काल संघमकाल है। डॉ॰ एस. कृष्णस्वामी अय्यंकार, नीलकण्ठ शास्त्री, कनकसभा शेषय्यर, पी. के. गोपालकृष्णन जैसे इतिहासकार एवं 'कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इन्डिया' का अभिमत है कि पहली ईस्वीं से लेकर तीसरी ईस्वीं तक का काल संघमकाल है। किन्तु श्रीधर मेनन ने प्रमाण देकर लिखा है कि पहली से पाँचवीं ई. तक संघमकाल रहा है। इलमकुलम कुंञन पिळ्ळै के अनुसार पाँचवीं और छठी ई. तक संघम युग रहा होगा।

संघमकालीन तमिल क्षेत्र के शक्तिशाली राज्य थे तोण्डैमण्डलम, चोलम्, पांड्यम्, चेरम्, कोंगुनाटु जिनमें से चेरम बाद में केरलम कहलाने लगा, जिसकी राजधानी का नाम वंचि था। संघमकालीन केरल के प्रमुख राजा थे : - दक्षिणी भाग के आयवंश के राजा, एष़िमला (पूष़िनाटु) को राजधानी बनानेवाले नन्नवंश के शासक और दोनों के बीच के क्षेत्र के शासक तथा चेरवंश के शासक।

संघमकालीन रचनाओं में तत्कालीन केरल की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दशा का विस्तृत विवरण मिलता है। उन दिनों समाज विभिन्न कबीलों में बंटा हुआ था। परिवार ही सामाजिक जीवन का मूल था। सामाजिक समस्याओं का समाधान 'मन्रम' द्वारा होता था जो ग्राम मुखियों द्वारा से गठित होता था। कई इतिहासकारों के अनुसार यह ऐसा संक्रान्ति काल था जिसमें शासन व्यवस्था कबीलों से निकल कर राजाओं के हाथ में आ गयी।

केरल में संघमकाल में ही कृषि प्रधान आर्थिक व्यवस्था का उदय होना शुरू हुआ था। ज़मीन को पाँच तिणा (भूभाग) में बाँटा गया था। पहला पहाडी क्षेत्र था जिसका नाम कुरिंञि तिणा था, यहाँ कुरवर, कनवर आदि गोत्रवर्ग के लोग रहते थे। दूसरा पाल तिण नाम से जाना जाता था जो मरुस्थल जैसा मिट्टी का जंगल था जहाँ मरवर, वेटर आदि रहते थे। तीसरा मुल्लतिणा कहलाता था, जो वन प्रदेश था और यहाँ चरवाहे और आयर रहते थे। मरुता क्षेत्र नामक ग्रामांचल में उष़वर (खेतीहर किसान) रहते थे। समुद्रतटीय क्षेत्र को नेयतल कहा जाता था जहाँ रहने वाले थे : - परतवर, नुलैयर और अलवर। इन दिनों कृषि के साथ-साथ व्यापार भी समृद्ध होने लगा। मुसिरिस (मुयिरि), नौरा, तिण्डिस, नेल्किन्दा, बकरे, कोट्टनारा आदि संघमकालीन केरल के प्रमुख बंदरगाह थे। अकनान्नूर नामक संघमकालीन गीतों में बताया गया है कि यवनों के बडे-बडे जहाज़ चुल्लि (पेरियार) की लहरों को चीरते हुए मुयिरि नामक शहरों में पहुँचते थे और स्वर्ण देकर कालीमिर्च खरीदते थे। मुयिरि नामक मुसिरिस कोडुन्ङल्लूर का ही दूसरा नाम है।

इस काल में कृषि और व्यापार में उन्नति हुई। परिणामतः केरल राज्य को समृद्धि का आस्वादन मिला और समाज में एक उच्च वर्ग का उदय हुआ जो मेलोर नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस वर्ग में उष़वर (खेतीहर किसान), चान्टोर (मद्योत्पादक) और वणिक (व्यापारी) तीनों विभाग सम्मिलित थे। इनमें उष़वर अधिक संपन्न थे। उन दिनों नर-नारी दोनों में मद्य पीने की परंपरा थी। इसलिए चान्टोर की ज़िम्मेदारी थी उनकी सुरक्षा की व्यवस्था करना (चान्टोर मेरम्मैर पतिट्टु VI, 8 राजा)। पुलवर, परवर, पाणर, पोरुनर आदि का भी समाज में सम्मान था। विनैझर (श्रमिक) और अटियोर (दास) वर्ग के लोगों को निम्न वर्ग का माना जाता था जो कीष़ोर कहलाते थे। किन्तु विभिन्न वर्गों के बीच बिना भेदभाव के विवाह संबन्ध होता था। संघमकाल में जाति प्रथा नहीं थी, ब्राह्मण के आगमन के बाद उनके प्रभाव से यह प्रथा आरंभ हुई।

आय राज्य[संपादित करें]

दक्षिण केरल के 'आय' शासकों के आविर्भाव के बारे में कोई प्रमाणित जानकारी नहीं मिलती है। संघमकालीन प्रमुख आय राजा थे अण्टिरान, तितियन और अतियन। इनके बारे में संघमकालीन साहित्य में जिक्र है। ईसा की आठवीं शती के बाद करुनन्तन, करुनन्तनटक्कन, विक्रमादित्य वरगुणन आदि शासक 'आय राजवंश' में पैदा हुए। विक्रमादित्य वरगुणन के पश्चात् आय राजवंश की पृथक पहचान खो गयी। बाद में आय राजवंश मिट गये।

भाषा और साहित्य[संपादित करें]

मलयालम भाषा का उदय और विकास कुलशेखर काल में हुआ। मलयालम भाषा के उद्रम के संबन्ध में आम विश्वास यह है कि उस युग में केरल में प्रचलित 'कोटुम तमिल' (शुद्ध तमिल) नामक भाषा भेद से मलयालम उत्पन्न हुई। क्यों कि कुलशेखर काल में ही मलयालम भाषा की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए उस काल में कोई साहित्य रचना नहीं हुई। केरल के लेखक तमिल और संस्कृत में लिखा करते थे। कहा जाता है कि कुलशेखर आलवार नामक प्रथम कुलशेखर राजा ने 'पेरुमाल तिरुमोष़ि' नामक तमिल ग्रंथ तथा 'मुकुन्दमाला' नामक संस्कृत काव्य की रचना की। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि 'तपतीसम्वरणम्', 'सुभद्राधनंजयम्', 'विच्छिन्नाभिषेकम्' आदि संस्कृत नाटक तथा 'आश्चर्यमंजरी' नाम के गद्य ग्रंथ के रचयिता कोई कुलशेखर राजा थे। 'युधिष्ठिर विजय' नामक संस्कृत महाकाव्य के रचयिता वासुदेवन कुलशेखर काल के कवि माने जाता है।

इस काल में अनेक दार्शनिक एवं वैज्ञानिक ग्रंथ भी लिखे गये। कुलशेखर काल में साहित्यकारों की लम्बी सूची मिलती है - अद्वैतवादी शंकराचार्य, कवि तोलन, 'आश्चर्यचूडामणि' नामक नाटक के रचयिता शक्ति भद्रन, 'शंकर नारायणीयम्' नामक ज्योतिष ग्रंथ के लेखक शंकर नारायणन, 'चिलप्पतिकारम्' के लेखक इलम्को अटिकल आदि अनेक प्रतिभाशाली सृजक कलाकार कुलशेखर कालीन केरल के प्रकाश स्तंभ थे।

विदेशी संबन्ध[संपादित करें]

केरल का विदेशी राज्यों के साथ युगों पुराना संबन्ध रहा है। यह संबन्ध मुख्यतः व्यापारिक था। किन्तु यही केरल की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को रूपायित करने में सहायक सिद्ध हुआ। विदेशों के साथ हुए संबन्ध के कारण यहाँ यहूदी, ईसाई और इस्लाम धर्म प्रचलित हुए।

केरल के सुगंधित मसालों ने विदेशियों को इस प्रदेश की ओर आकृष्ट किया। ईसा पूर्व 3000 वर्षों से ही केरल में विदेशियों का आवागमन आरंभ हो गया था। इन दिनों असीरिया और बाबिलोन के निवासी केरल पहुँचे थे जिन्होंने प्राचीन सुमेरियन (मेसोपोट्टोमिया दुनिया) संस्कृति को विकसित किया था, वे इलायची, लौंग आदि अपने साथ ले गये। केरल के साथ मसालों का सर्वप्रथम व्यापार करने वाले अरब और फिनीशिया के लोग थे।

समुद्र से यहाँ प्रथमतः पहुँचनेवाले ओमान तथा परशियन खाडी क्षेत्र के अरब भाषी रहे होंगे। केरल के मसाले उत्तर भारत से होते भी मध्य एशिया पहुँचे। ग्रीस और रोम के साथ केरल का व्यापार ईसा पूर्व था। दियोस्रोरदीस नामक प्राचीन ग्रीक वैद्य के 'मेटीरिया मेडिका' नामक वैद्यक ग्रंथ में हल्दी, अदरक, लोंग इत्यादि के औषधीय गुणों का वर्णन है।

ईसा पूर्व पहली सदी में जब रोम ने मिस्र पर आक्रमण किया तब केरल के साथ मसाले व्यापार में अरबों का एकाधिकार टूट गया। उनका स्थान रोम ने लिया। केरल में प्रभूत मात्रा में रोम के सिक्के प्राप्त हुए हैं। 45 ईं में जब मिस्री नाविक हिप्पालस ने भारतीय महासमुद्री हवा की गतिविधियों की जानकारी प्राप्त कर ली तब उनके लिए समुद्री यात्रा आसान हो गयी। उन दिनों सबसे महत्वपूर्ण और कीमती मसाला काली मिर्च थी।

केरल के साथ व्यापार संबन्ध रखने वाले दूसरे देशों में एक था चीन। हो सकता है कि ग्रीक तथा रोम की पोतों के पहुँचने से पहले ही चीनी पोत केरल के बंदरगाहों में पहूँची हों। केरल में प्राचीन चीनी सिक्के प्राप्त हुए हैं। चीनी मिट्टी के बर्तनों के टुकडे भी यहाँ मिले हैं। चीनाचट्टि (चीनी फ्राई स्पैन) और चीनावला (मछली पकडने का चीनी जाल) का प्रचार भी चीन के साथ रहे, केरल के व्यापारिक संबन्ध के प्रमाण हैं।

युगान्त[संपादित करें]

चोल राजाओं एवं कुलशेखर राजाओं के बीच जो युद्ध हुआ था उससे अन्ततः कुलशेखर साम्राज्य का ही पतन हुआ था। प्रस्तुत युद्धों से केरल के नम्पूतिरि ब्राह्मणों की शक्ति बढी। मंदिरों को मिली विपुल सम्पत्ति के अधीशाधिकार प्राप्त ब्राह्मणों की आर्थिक स्थिति बहुत ही उन्नत हो गई। ब्राह्मण वर्ग आर्थिक शक्ति का केन्द्र हो गया। इसी काल में सांमती व्यवस्था का उदय हुआ तथा 'मक्कत्तायम' (संपत्ति पर संतानों का अधिकार - पितृसत्तात्मक उत्तराधिकार) का अस्त एवं 'मरुमक्कत्तायम' (मामा को सम्पत्ति पर अधिकार) प्राप्त हो गया। दूसरे शब्दों में पितृसत्तात्मक अर्थ-व्यवस्था के स्थान पर मातृ सत्तात्मक अर्थ-व्यवस्था का उद्गम भी इस काल में हुआ। ब्राह्मणों का अधीशत्व जब बढ गया तब वे सामाजिक सम्बन्ध एवं राजनैतिक दृढता टूट गई जो कुलशेखर साम्राज्य को कायम रखे हुए थी।