प्रयोगवाद

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प्रयोगवाद हिंदी साहित्य खासकर कविता की उस प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है जिसकी तरफ अज्ञेय ने दूसरा सप्तक की भूमिका में संकेत किया था। प्रयोग अपने आप में इष्ट नहीं है बल्कि वह साधन और दोहरा साधन है। वह एक ओर तो सत्य को जानने का साधन है दूसरी तरफ वह उस साधन को भी जानने का साधन है। यह स्पष्टीकरण तार सप्तक की कविताओं को प्रयोगवादी कहे जाने पर दिया गया था। प्रयोगवाद में कविता में शिल्प और संवेदना के स्तर पर सर्वथा नवीन प्रयोग मिलते हैं। प्रयोगवाद ने साहित्य में पहली बार व्यक्तिक अस्मिता, निजी व्यक्तित्व और निजता को बहुत महत्व दिया। इसमें क्षण को महत्व देकर जीवन को भरपूर ढंग से जीने की चाह है। प्रयोगवादी कवि व्यक्तिक प्रेम की सहज स्वीकृति पर बल देता है। वह अपने यौन संबंध की भी सहज स्वीकृति करता है।