प्रत्यक्षवाद (विधिक)

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

विधिक प्रत्यक्षवाद (Legal positivism) विधि एवं विधिशास्त्र के दर्शन से सम्बन्धित एक विचारधारा (school of thought) है। इसका विकास अधिकांशतः अट्ठारहवीं एवं उन्नीसवीं शताब्दी के विधि-चिन्तकों द्वारा हुआ जिनमें जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham) तथा जॉन ऑस्टिन (John Austin) का नाम प्रमुख है। किन्तु विधिक प्रत्यक्षवाद के इतिहास में सबसे उल्लेखनीय नाम एच एल ए हार्ट (H.L.A. Hart) का है जिनकी 'द कॉसेप्ट ऑफ लॉ' (The Concept of Law) नामक पुस्तक ने इस विषय में गहराई से विचार करने को मजबूर कर दिया। हाल के वर्षों में रोनाल्द डोर्किन (Ronald Dworkin) ने विधिक प्रत्यक्षवाद के कुछ केन्द्रीय विचारों पर गम्भीर सवाल उठाये हैं।

विधिक प्रत्यक्षवाद को सार रूप में कहना कठिन है किन्तु प्रायः माना जाता है कि विधिक प्रत्यक्षवाद का केन्द्रीय विचार यह है:

किसी विधिक प्रणाली में, कोई विचार (norm) वैध है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसका स्रोत क्या है न कि उसके गुणदोष (merits) क्या हैं?
(the validity of a legal norm depends not on the moral value attached thereto, but from the sources determined by a social community's rules and conventions[1])

परिचय[संपादित करें]

विश्लेषणात्मक चिन्तन का प्रारंभ मुख्यतः बेंथम द्वारा अठारहवीं शताब्दी के अन्त में किया गया जिसका विकास आगे चलकर आस्टिन के हाथों हुआ। इसे प्रमाणवादी विचारधारा (Positivist School) भी कहा जाता है। सामण्ड इसे व्यवस्थित विधिशास्त्र (Systematic Jurisprudence) तथा सी0के0 एलन आदेशात्मक सिद्धान्त (Imperative Theory) कहते हैं। इस विचारधारा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जिस प्रकार भौतिक-विज्ञान विश्लेषण के बल पर आगे बढ़ता है ठीक उसी प्रकार यह किसी चीज को बिना विश्लेषण के यथावत स्वीकार नहीं कर लेती। प्राकृतिक विचारधारा की तरह यह विधि को दैवीय (ईश्वरीय) या दैव जात या प्राप्त नहीं मानती, बल्कि इसका उद्भव सम्प्रभु राज्य से हुआ मानती है। यह विचारधारा विधिक नियमों का विश्लेषण करती है। इसलिए यह ऐतिहासिक या समाजशास्त्रीय विचारधारा से भिन्न हो जाती है। यह विचारधारा नागरिक विधि तथा अन्य विधियों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन विश्लेषणात्मक ढंग से करना चाहती है तथा विधि को प्राप्त नहीं अपितु निर्मित मानती है। विधि की ऐतिहासिक प्रगति का मूल क्या है, इससे इस विचारधारा का कोई मतलब नहीं। जूलियस स्टोन ने ठीक ही कहा है ‘‘इसकी प्रमुख दिलचस्पी विधिक भावार्थों के विश्लेषण और विधिक तर्क वाक्यों के तार्किक अन्तः सम्बन्धों के बारे में खोजबीन करना है। सामण्ड ने इस विचारधारा के प्रयोजन को इन शब्दों में व्यक्त किया है-

विश्लेषणात्मक विधिशास्त्र का प्रयोजन, विधि के प्राथमिक सिद्धान्तों का, बिना उनके ऐतिहासिक उद्भव और विकास के उनके नीतिशास्त्रीय (Ethical) या वैधता के सन्दर्भ में विश्लेषण करना है। दूसरे शब्दों में यह वर्तमान वास्तविक विधि के ढाँचे का तार्किक और वैज्ञानिक ढंग से परीक्षित करने के प्रयास का एक ढंग है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि आदर्श और नैतिक तत्वों पर निर्भर न रहने वाले अधिकारिक नियम क्या हैं?

मुनरो स्मिथ के अनुसार यह विचारधारा राज्य की सचेतन मुहर विधि के लिए आवश्यक मानती है। इस अर्थ में विधि सचेतन और निश्चित मानव इच्छा की अभिव्यक्ति है। प्रमाणवाद एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान करता है जिससे अनुभव से परे परिकल्पनाओं को अस्वीकार कर आँकड़ों द्वारा प्रस्तुत अनुभव तक ही सीमित रहा जा सके। यह दृष्टिकोण दिए हुए तथ्यों के विश्लेषण तक सीमित रहता है तथा अनुभूति की परिघटनाओं से दूर नहीं जाता है। अतीत तथा भविष्य की परिकल्पनाओं से दूर रहकर ‘विधि जैसी है’ के तथ्यात्मक अध्ययन के कारण इसे प्रमाणवादी दृष्टिकोण नाम दिया गया है। इंग्लैण्ड में मुख्य रूप से प्रचलित होने तथा आस्टिन से जुड़े होने के नाते इसे इंग्लिश या आस्टीनियन स्कूल भी कहते हैं। इसे विधि को सम्प्रभु का समादेश मानने और उसे माने जाने की बाध्यता के कारण आज्ञात्मक सिद्धान्त (Imperative theory of Law) भी कहा जाता है। हार्ट इसे ‘‘समादेश, अनुशास्ति एवं सम्प्रभु की त्रिवेणी’’ मानते हैं। इस विचारधारा में मनुष्य द्वारा विधि के निर्माणात्मक तत्वों पर विशेष बल दिया जाता है।

विश्लेषणात्मक प्रमाणवादी विचारधारा की उत्पत्ति के कारण[संपादित करें]

अठारहवीं शताब्दी के अन्त तथा उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ होते-होते इस विचारधारा का जन्म निम्नलिखित कारणों से हुआ।

1. अठारहवीं शताब्दी प्राकृतिक विधि विचारकों की थी जिसमें विधिक दर्शन पर नीति, विवेक तथा न्याय के सिद्धान्त हावी थे। यह ‘विधि जैसी होनी चाहिए’ का युग था। परन्तु यह बहुत समय तक संगत नहीं रहा। बेंथम ने स्वयं को इस प्रकार की विचारधारा से अलग कर लिया तथा व्याख्यात्मक विधिशास्त्र (Expository Jurisprudence) अर्थात ‘विधि जो है’ पर बल दिया। तात्पर्य है कि विश्लेषणात्मक विचारधारा का जन्म प्राकृतिक विधि विचारधारा के विरोध स्वरूप हुआ।

2. उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भौतिक विज्ञान में हुई प्रगति का प्रभाव निश्चित रूप से विधिक विज्ञान के सिद्धान्तों पर भी पड़ा। विधि के अध्ययन के लिए साक्ष्य, तर्क, परीक्षण तथा दिए गये तथ्यों के विश्लेषण के तरीकों को अपनाया गया। विधि के अध्ययन के लिए वैज्ञानिक, क्रमबद्ध अनुभवजन्य या अनुभव सापेक्ष पद्धति अपनायी गयी।

3. ऐसा प्रतीत होता है कि विश्लेषणवादी विचारधारा के द्वारा इंग्लैण्ड में सामंतों तथा पोप आदि पर सम्प्रभु शासक की श्रेष्ठता सिद्ध की गई। इस विचारधारा के साथ ही विधि के क्षेत्र में आध्यात्मिक दखलंदाजी कम हो गई।

विधिक प्रमाणवाद का विभिन्न अर्थों में प्रयोग[संपादित करें]

विधिक प्रमाणवाद को राज्य सम्प्रभु के रूप में तथा विधि को सम्प्रभु के समादेश के रूप में और विधि के अनुपालन में अनुशास्ति के तत्व की व्याख्या के कारण विधि का आज्ञात्मक (Imperative) सिद्धान्त भी कहा गया है। विधिक प्रमाणवाद का प्रयोग विभिन्न अर्थों में किया गया है। आधुनिक विश्लेषणात्मक प्रमाणवादी विचारक प्रो॰ एच॰एल॰ए॰ हार्ट ने स्वयं इसका प्रयोग पाँच अर्थों में स्वीकार किया है। [2]

  • 1. विधियाँ मानवप्राणियों का समादेश हैं।
  • 2. विधि और नैतिकता या ‘‘विधि जो है’’ और ‘‘विधि जो होनी चाहिए’’ में कोई आवश्यक सम्बन्ध नहीं है।
  • 3. विधिक संकल्पनाओं का विश्लेषण या उनके अर्थों का अध्ययन एक महत्वपूर्ण अध्ययन होने के कारण इसे ऐतिहासिक और सामाजिक खोजबीन और नैतिक सामाजिक उद्देश्यों, कार्यो आदि के संदर्भ में विधि के आलोचनात्मक मूल्यांकन से अलग किया जाना चाहिए।
  • 4. विधिक व्याख्या एक बन्द तार्किक व्यवस्था (Closed logical system) है जिसमें पूर्वनिर्धारित विधिक नियमों के केवल तार्किक माध्यम से ही सही निर्णय लिये जा सकते हैं।
  • 5. नैतिक निर्णय तथ्यों के कथन की तरह युक्तिपरक, दलील, साक्ष्य और सबूत के द्वारा साबित नहीं किये जा सकते हैं।

हार्ट ने इन पाँच अर्थों में किए गये प्रयोग की वास्तविक पृष्ठभूमि में व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया है कि बेन्थम और ऑस्टिन (1) से लेकर (3) तक दिए गये सिद्धान्तों को मानते हैं परन्तु (4) और (5) वाले सिद्धान्तों को नहीं। इसी तरह केल्सन ने (2), (3) और (5) में व्यक्त सिद्धान्तों को माना है परन्तु (1) और (4) में दिये गये सिद्धान्तों को नहीं। हार्ट के अनुसार (4) में वर्णित सिद्धान्त को बेन्थम, ऑस्टिन और केल्सन में से किसी ने नहीं माना है। फिर भी यह सिद्धान्त प्रत्यक्षतः बिना पर्याप्त कारणों के विश्लेषणात्मक विधिशास्त्रियों के साथ अक्सर जोड़ दिया जाता है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Curzon, Peter (1998). Jurisprudence Lecture Notes. Cavendish Publishing. p. 82.
  2. H. L. A. Hart, "Positivism and the Separation of Law and Morals" (1958) 71 Harvard Law Review 593, 601-2.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]