प्रतिमान (पत्रिका)

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प्रतिमान विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) की ओर से प्रकाशित होने वाली समाज-विज्ञान और मानविकी की पूर्व-समीक्षित अर्धवार्षिक पत्रिका है। इसका पूरा नाम 'प्रतिमान समय समाज संस्कृति' है। इसके प्रधान संपादक अभय कुमार दुबे एवं संपादक आदित्य निगम, रविकांत तथा राकेश पाण्डेय हैं।

प्रकाशन एवं उद्देश्य[संपादित करें]

'प्रतिमान' का प्रवेशांक (वर्ष 1, खण्ड 1, अंक 1, जनवरी-जून, 2013) सन् 2013 ईस्वी में विकासशील समाज अध्ययन पीठ सीएसडीएस के एक उद्यम के रूप में प्रकाशित हुआ था।

इसके उद्देश्य के सम्बन्ध में पत्रिका के प्रवेशांक के संपादकीय में लिखा गया था कि "पिछले कुछ वर्षों में अध्ययन-पीठ में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी लेखन करने वाले विद्वानों की संख्या बढ़ी है। साथ ही भारतीय भाषा कार्यक्रम के इर्द-गिर्द कुछ युवा और सम्भावनापूर्ण अनुसंधानकर्त्ता भी जमा हुए हैं। प्रतिमान का मक़सद इस जमात की ज़रूरतें पूरी करते हुए हिंदी की विशाल मुफ़स्सिल दुनिया में फैले हुए अनगिनत शोधकर्त्ताओं तक पहुँचना है। समाज-चिंतन की दुनिया में चलने वाली सैद्धांतिक बहसों और समसामयिक राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श का केंद्र बनने के अलावा यह मंच अन्य भारतीय भाषाओं की बौद्धिकता के साथ जुड़ने के हर मौक़े का लाभ उठाने की फ़िराक़ में भी रहेगा।... हिंदी के वैचारिक संसार में हस्तक्षेप करने के साथ-साथ हमारा एक प्रमुख सरोकार समाज-विज्ञान (राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, मानवशास्त्र और अर्थशास्त्र आदि) और मानविकी (दर्शनशास्त्र, इतिहास, साहित्य और साहित्यालोचना) के अनुसंधानपरक और पद्धतिमूलक प्रतिमानों का अंतर्गुम्फन भी है। इसमें कई स्थापित प्रतिमानों को अस्थिर करने की दूरस्थ संभावना है। अगर यह कोशिश हम लम्बे अरसे तक चला पाये तो धीरे-धीरे प्रत्यक्षवाद (पॉज़िटिविज़म) द्वारा उठायी गयी उस दीवार के दरकने की एक उम्मीद है जिसने सोच-विचार की दुनिया को संस्थागत पैमाने पर बाँट रखा है। इस लिहाज़ से इस पत्रिका के साथ समाज-विज्ञान और मानविकी के बँटवारे से परे जाकर समाज-चिंतन के समग्र और एकीकृत दायरे की नुमाइंदगी करने वाले भविष्य की कल्पना के सूत्र भी जुड़े हैं।"[1]

सामग्री-संयोजन[संपादित करें]

समीक्षकों की दृष्टि में[संपादित करें]

'प्रतिमान' के प्रकाशन के पाँच वर्ष पूरे होने पर इसके विगत नौ अंकों के आधार पर अपेक्षाकृत संतुलित दृष्टि से विचार करते हुए दर्शनशास्त्र की विदुषी सुधा चौधरी ने लिखा था :

"पिछले पाँच वर्षों में प्रतिमान में प्रकाशित आलेखों की गम्भीरता, उनकी विषय-वस्तु एवं विचार-दृष्टि ने हिंदी जगत के पाठकों के वैचारिक-वृत्त को बहुत समृद्ध किया है। एक ही स्थान पर इतनी उच्च कोटि की अध्ययन सामग्री प्राप्त होना हिंदी में लिखने-पढ़ने वाले पाठकों के लिए अनुसंधानपरक सामग्री की कमी को पूरा करता है।"[2]

इसके साथ ही उन्होंने विमर्श केवल विमर्श के लिए और ज्ञान केवल ज्ञान के लिए रहने से पत्रिका व्यवस्था-निरपेक्ष न होती जाय, ऐसा ध्यान रखने की सलाह दी। अक्षय मुकुल ने इस पत्रिका के अंकों की सामग्री पर दृष्टि डालते हुए लिखा था :

"मेरे एक विद्वान मित्र प्रतिमान को हिंदी का इकोनामिक एंड पॉलिटिकल वीकली बताते हैं। लेकिन मैं उनकी राय से इत्तेफाक नहीं रखता। और, मेरी राय उनसे इसलिए अलग नहीं है कि मुझे प्रतिमान की पाँच दशक पुराने ईपीडब्ल्यू से तुलना करना अनुचित लगता है। दरअसल, मेरी नज़र में प्रतिमान ईपीडब्ल्यू से एक कदम आगे है! मैं यह इस आधार पर कह रहा हूँ क्योंकि प्रतिमान न केवल ईपीडब्ल्यू के कड़े मानकों के समकक्ष ठहरता है, बल्कि उसने अपने इब्तिदाई दौर में ही एक खास रास्ता चुन लिया है। प्रतिमान के अब तक प्रकाशित नौ अंकों से यह ज़ाहिर हो जाता है कि वह किसी एक विचारधारा या समाज विज्ञान की किसी एक पीठ का प्रवक्ता नहीं है। उसके वैचारिक वितान का बुनियादी मूल्य इस उदारतावादी यक़ीन से अनुप्राणित है कि विचारों की दुनिया में किसी किस्म की पहरेदारी नहीं होनी चाहिए।"[3]

इन विशेषताओं के उल्लेख के साथ ही उन्होंने प्रतिमान के अधिकाधिक पाठकों तक पहुँचने की अनिवार्यता को रेखांकित किया।[4]

'भाषा-शैली पर कुछ बातें' करते हुए संत समीर ने लिखा था कि "समाज-विज्ञान की चिंतनधारा को अंग्रेज़ियत की मानसिकता से बाहर निकालकर भारतीय भाषाओं के सामर्थ्य से जोड़ने का प्रतिमान का उद्यम फलीभूत होता हुआ दिख भी रहा है। यह काम भविष्य के लिए मील का पत्थर साबित होगा, उम्मीद की जा सकती है"[5]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. प्रतिमान : समय समाज संस्कृति, प्रवेशांक : जनवरी-जून, 2013 (वर्ष 1, खण्ड 1, अंक 1), संपादक- अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ-v-vii.
  2. प्रतिमान : समय समाज संस्कृति, जुलाई-दिसम्बर, 2017 (वर्ष 5, अंक 10), संपादक- अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ-63-66.
  3. प्रतिमान : समय समाज संस्कृति, जुलाई-दिसम्बर, 2017 (वर्ष 5, अंक 10), संपादक- अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ-61.
  4. प्रतिमान : समय समाज संस्कृति, जुलाई-दिसम्बर, 2017 (वर्ष 5, अंक 10), संपादक- अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ-63.
  5. प्रतिमान : समय समाज संस्कृति, जुलाई-दिसम्बर, 2017 (वर्ष 5, अंक 10), संपादक- अभय कुमार दुबे, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृष्ठ-72.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]