प्रताप (पत्र)
प्रताप हिन्दी का समाचार-पत्र था जिसने भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभायी। इसे गणेश शंकर 'विद्यार्थी' ने ९ नवम्बर सन् १९१३ से कानपुर से निकालना आरम्भ किया। प्रताप के जरिये जहाँ न जाने कितने क्रान्तिकारी स्वाधीनता आन्दोलन से रूबरू हुए, वहीं समय-समय पर यह अखबार क्रान्तिकारियों हेतु सुरक्षा की ढाल भी बना। [1]
इस समाचार पत्र के पहले ही अंक के अपनी संपादकीय में गणेश शंकर विद्यार्थी ने स्पष्ट कर दिया कि, “यह पत्र राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, सामाजिक-आर्थिक क्रांति, जातीय गौरव, साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत के लिए संघर्ष करेगा।” विद्यार्थी जी ने अपने इस संकल्प को ‘प्रताप’ में लिखे अग्रलेखों में लगातार अभिव्यक्त किया जिसके कारण अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें कई बार जेल भेजा और उनके समाचार-पत्र पर दण्ड लगाया। लेकिन गणेश शंकर विद्यार्थी इन कार्रवाइयों से जरा सा भी नहीं घबराए। अंग्रेज़ सरकार से उनकी लड़ाई अनवरत चलती रही। ‘प्रताप’ के माध्यम से उन्होंने देश के किसानों, मिल मजदूरों और दबे-कुचले लोगों के दुखों को उजागर किया। आगे चलकर ‘प्रताप’ देश के स्वतन्त्रता संग्राम का मुख-पत्र साबित हुआ।
विद्यार्थी जी को प्रताप में माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे सहयोगी मिल गये, इनके कारण प्रताप की यात्रा निर्वाध रही। विद्यार्थी जी के आन्दोलन में जाने अथवा जेल जाने का प्रताप पर कोई अंतर न पड़ता था। सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी भगतसिंह ने अपने अज्ञातवास का ढाई वर्ष का काल-खंड विद्यार्थी जी के सानिंध्य में ही गुजारा। वे "बलवंतसिंह" के नाम से प्रताप में काम करने लगे और इसी नाम से लेख लिखते। यह समाचार पत्र "प्रताप" की क्राँतिकारी आवाज थी कि तब कलकत्ता और पंजाब के बाद कानपुर ही क्रांतिकारी गतिविधियों का केन्द्र बन गया। प्रताप में भगतसिंह ही नहीं, राम दुलारे त्रिपाठी ने भी काम किया। इन्हें भी काकोरी कांड में सजा हुई थी । गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने ही अपने कार्यालय में क्राँतिकारी चंद्र शेखर आजाद और भगतसिंह की भेंट कराई थी। विद्यार्थी जी की प्रेरणा से ही श्यामलाल गुप्त ने "विश्व विजयी तिरंगा प्यारा" झंडा गीत लिखा और यहीं माखन लाल चतुर्वेदी जी ने अपना कालजयी गीत 'पुष्प की अभिलाषा' लिखा और ये दोनों गीत सबसे पहले प्रताप में प्रकाशित हुये। विद्यार्थी जी के प्रयत्न से ही झंडा गीत कानपुर में काँग्रेस अधिवेशन में गाया गया । विद्यार्थी जी के प्रयत्न से ही क्राँतिकारी अशफाक उल्ला खान की कब्र बन सकी । बलिदानी अशफाक उल्ला को 1927 में फैजाबाद जेल में फाँसी दी गयी थी।[2]
यह समाचार-पत्र क्रान्तिकारी विचारों व देश के स्वतंत्रता वीरों की अभिव्यक्ति का माध्यम भी था। भगत सिंह की कई क्रांतिकारी रचनाएं ‘प्रताप’ में ही प्रकाशित हुईं। एक और बड़े क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा भी ‘प्रताप’ में ही छपी थी। आलम यह था कि एक समय बालकृष्ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, प्रताप नारायण मिश्र जैसे तमाम देशभक्त लेखक, कवि ‘प्रताप’ से ही जुड़े थे।
अपने क्रांतिकारी तेवरों के कारण ‘प्रताप’ को अंग्रेज़ी हुकूमत का पहला ग़ुस्सा 22 अगस्त, 1918 को झेलना पड़ा। नानक सिंह की ‘सौदा-ए-वतन’ नामक कविता से अंग्रेज़ सरकार इतनी नाराज हो गई कि उसने गणेश शंकर विद्यार्थी पर राजद्रोह का आरोप लगाते हुए, पहली बार ‘प्रताप’ पर पाबंदी लगा दी। इस दमन से गणेश शंकर विद्यार्थी और भी अधिक मजबूत होकर निकले।
विद्यार्थी जी ने सरकार की दमनपूर्ण नीति का ऐसा सबल विरोध किया कि देशवासी ‘प्रताप’ की मदद के लिए उनके कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए। देशवासियों के सहयोग से एक बार जब आर्थिक संकट हल हुआ, तो ‘प्रताप’ का प्रकाशन साप्ताहिक से दैनिक हो गया। 23 नवम्बर, 1920 से ‘प्रताप’ दैनिक समाचार पत्र के तौर पर निकलने लगा। अंग्रेज़ हुकूमत और उसकी नीतियों के लगातार विरोध में लिखने से ‘प्रताप’ की पहचान सरकार विरोधी बन गई।
तत्कालीन मजिस्ट्रेट स्ट्राइफ़ ने अपने हुक्मनामे में ‘प्रताप’ को ‘बदनाम पत्र’ की संज्ञा देते हुए, इस समाचार-पत्र की जमानत राशि ज़ब्त कर ली। अपनी पत्रकारिता के दौरान गणेश शंकर विद्यार्थी कई बार अंग्रेज़ी हुकूमत के निशाने पर आए और उन्हें जेल जाना पड़ा। लेकिन अंग्रेज़ सरकार की सज़ा भी विद्यार्थी के हौसलों को पस्त नहीं कर पाई। जेल से वापस आकर वे फिर उसी जज़्बे से अपने काम में लग जाते थे।
स्वतन्त्रता आन्दोलन में सहायता
[संपादित करें]कानपुर में विद्यार्थी जी ने १९१३ से साप्ताहिक ‘प्रताप’ के माध्यम से न केवल क्रान्ति का नया प्राण फूँका बल्कि इसे एक ऐसा समाचार पत्र बना दिया जो सारी हिन्दी पत्रकारिता की आस्था और शक्ति का प्रतीक बन गया। प्रताप प्रेस में कम्पोजिंग के अक्षरों के खाने में नीचे बारूद रखा जाता था एवं उसके ऊपर टाइप के अक्षर। ब्लाक बनाने के स्थान पर नाना प्रकार के बम बनाने का सामान भी रहता था। पर तलाशी में कभी भी पुलिस को ये चीजें हाथ नहीं लगीं। विद्यार्थी जी को १९२१ से १९३१ तक पाँच बार जेल जाना पड़ा और यह प्राय: ‘प्रताप‘ में प्रकाशित किसी समाचार के कारण ही होता था। विद्यार्थी जी ने सदैव निर्भीक एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की। उनके पास पैसा और समुचित संसाधन नहीं थे, पर एक ऐसी असीम ऊर्जा थी, जिसका संचरण स्वतंत्रता प्राप्ति के निमित्त होता था। ‘प्रताप‘ प्रेस के निकट तहखाने में ही एक पुस्तकालय भी बनाया गया, जिसमें सभी जब्तशुदा क्रान्तिकारी साहित्य एवं पत्र-पत्रिकाएं उपलब्ध थी। यह ‘प्रताप’ ही था जिसने दक्षिण अफ्रीका से विजयी होकर लौटे तथा भारत के लिये उस समय तक अनजान महात्मा गाँधी की महत्ता को समझा और चम्पारण-सत्याग्रह की नियमित रिपोर्टिंग कर राष्ट्र को गाँधी जी जैसे व्यक्तित्व से परिचित कराया। चौरी-चौरा तथा काकोरी काण्ड के दौरान भी विद्यार्थी जी ‘प्रताप’ के माध्यम से प्रतिनिधियों के बारे में नियमित लिखते रहे। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित सुप्रसिद्ध देशभक्ति कविता पुष्प की अभिलाषा प्रताप अखबार में ही मई १९२२ में प्रकाशित हुई। बालकृष्ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, सनेही जी इत्यादि ने प्रताप के माध्यम से अपनी देशभक्ति को मुखर आवाज दी।
वस्तुतः प्रताप प्रेस की बनावट ही कुछ ऐसी थी कि जिसमें छिपकर रहा जा सकता था तथा फिर सघन बस्ती में तलाशी होने पर एक मकान से दूसरे मकान की छत पर आसानी से जाया जा सकता था। बनारस षडयंत्र से भागे सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य प्रताप अखबार में उपसम्पादक थे। बाद में भट्टाचार्य और प्रताप अखबार से ही जुड़े पं0 राम दुलारे त्रिपाठी को काकोरी काण्ड में सजा मिली। भगत सिंह ने तो ‘प्रताप‘ अखबार में बलवन्त सिंह के छद्म नाम से लगभग ढाई वर्ष तक कार्य किया। सर्वप्रथम दरियागंज, दिल्ली में हुये दंगे का समाचार एकत्र करने के लिए भगत सिंह ने दिल्ली की यात्रा की और लौटकर ‘प्रताप’ के लिए सचिन दा के सहयोग से दो कालम का समाचार तैयार किया। चन्द्रशेखर आजाद से भगत सिंह की मुलाकात विद्यार्थी जी ने ही कानपुर में करायी थी, फिर तो शिव वर्मा सहित तमाम क्रान्तिकारी जुड़ते गये। यह विद्यार्थी जी ही थे कि जेल में भेंट करके क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा छिपाकर लाये तथा उसे ‘प्रताप‘ प्रेस के माध्यम से प्रकाशित करवाया। जरूरत पड़ने पर विद्यार्थी जी ने राम प्रसाद बिस्मिल की माँ की मदद की और रोशन सिंह की कन्या का कन्यादान भी किया। यही नहीं अशफाकउल्ला खान की कब्र भी विद्यार्थी जी ने ही बनवाई।
विद्यार्थी जी का ‘प्रताप‘ तमाम महापुरूषों को भी आकृष्ट करता था। १९१६ में लखनऊ कांग्रेस के बाद महात्मा गाँधी और लोकमान्य तिलक इक्के पर बैठकर प्रताप प्रेस आये एवं वहाँ दो दिन रहे।
किसानों, मजदूरों और क्रांतिकारियों की आवाज बना 'प्रताप'
[संपादित करें]'प्रताप' ने केवल समाचार नहीं छापे, उसने आवाजों को दिशा दी। विद्यार्थी जी किसानों, मजदूरों और आम जनता की पीड़ा के पक्षधर बने। उन्होंने प्रताप के माध्यम से तालुकेदारों और जमींदारों के अत्याचारों का खुला विरोध किया। बिहार के चम्पारण और रायबरेली के मुंशीगंज जैसे आंदोलनों में 'प्रताप' ने अंग्रेजी सरकार की क्रूरता उजागर की। यही नहीं, विद्यार्थी जी ने भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों के लेख गुप्त नामों से प्रकाशित किए। उनकी निर्भीक पत्रकारिता से अंग्रेजी शासन हिल गया था। उन्होंने सिद्ध किया कि पत्रकारिता सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि क्रांति की चेतना भी है।
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "संग्रहीत प्रति". मूल से से 22 दिसंबर 2015 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 13 दिसंबर 2015.
- ↑ क्रांतिकारी, पत्रकार और लेखक गणेश शंकर विद्यार्थी की जयंती