प्रतापगढ़ (राजस्थान) का इतिहास

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

स्थापना और राज्य-विस्तार[संपादित करें]

सुविख्यात इतिहासकार महामहोपाध्याय पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा (1863–1947) के अनुसार "प्रतापगढ़ का सूर्यवंशीय राजपूत राजपरिवार मेवाड़ के गुहिल वंश की सिसोदिया शाखा से सम्बद्ध रहा है".[1] महाराणा कुम्भा (१४३३-१४६८ ईस्वी) चित्तौडगढ़ और महाराणा प्रताप भी इसी वंश के प्रतापी शासक थे, कहा जाता है कि उनके चचेरे भाई क्षेम सिंह/क्षेमकर्ण से उनका संपत्ति संबंधी कोई पारिवारिक विवाद कुछ इतना बढ़ा कि नाराज़ महाराणा कुम्भा ने उन्हें अपने राज्य चित्तौडगढ़ से ही निर्वासित कर दिया। कुछ का मानना है कि भाई-भाई में तलवारें न खिंचें, इसलिए क्षेमकर्ण स्वयं घरेलू-युद्ध टालने की गरज से चित्तोड़गढ़ को अलविदा कह आये। उन का परिवार मेवाड के दक्षिणी पर्वतीय इलाकों में कुछ समय तक तो लगभग विस्थापित सा रहा, बाद में क्षेमकर्ण ने सन १४३७ ईस्वी में मेवाड के दक्षिणी भूभाग, देवलिया आदि गांवों को तलवार के बल पर 'जीत कर' अपना नया राज्य स्थापित किया।

क्षेमकर्ण के पुत्र (और महाराणा कुम्भा के भतीजे) महाराणा सूरजमल ने १५१४ ईस्वी में देवगढ़ (या देवलिया) ग्राम में अपना स्थाई ठिकाना बनाते हुए 'नए राज्य' का विस्तार किया। बाद में सूरजमल के वंशज महारावत प्रतापसिंह ने १६८९-१६९९ में देवगढ़ से थोड़ी दूर, एक नया नगर 'प्रतापगढ़' बसाया।

देवगढ़ या देवलिया, जो जिला-मुख्यालय से लगभग १२ किलोमीटर की दूरी पर आज प्रतापगढ़ की उप-तहसील है, प्राचीनतर गांव के रूप में अपने भीतर इतिहास और पुरातत्व के कई रहस्य समेटे हुए है।

देवगढ़ में पुराना राजमहल :छाया : हे. शे.

यहाँ देवलिया में आज भी एक पुराना राजमहल, भूतपूर्व-राजघराने के स्मारक (छतरियां), तालाब, बावड़ियाँ, मंदिर और कई अन्य ऐतिहासिक अवशेष विद्यमान हैं। देवगढ़ में ही मातृशक्ति के एक रूप 'बीजमाता' का एक पुराना मंदिर तो है ही, जैनियों का भगवान मल्लिनाथ मंदिर और राम-दरबार मंदिर (रघुनाथद्वारा) भी हैं, जहाँ राम और लक्ष्मण को मूर्तिकार ने बड़ी-बड़ी राजस्थानी मूंछों में दिखाया है। (मूंछ वाले राम-लक्ष्मण की मूर्तियां कम हैं, कौन जाने शायद सिर्फ यहीं हों!) इसी मंदिर की छत पर सूर्य के प्रकाश की सहायता से समय बताने वाली संगमरमर की धूप घड़ी भी है।

प्रतापगढ़ के भूतपूर्व शासकों का वंशवृक्ष[संपादित करें]

कालक्रमानुसार प्रतापगढ़ के भूतपूर्व शासकों का वंशवृक्ष कुछ इस तरह मिलता है: क्षेमकर्ण (1437-1473) सूरजमल (1473-1530) बाघ सिंह (1530-1535) राय सिंह (1535-1552) विक्रम सिंह (1552-1563) तेज सिंह (1563-1593) भानु सिंह (1593-1597) सिंहा (1597-1628) जसवंत सिंह (1628) हरि सिंह (1628-1673) महारावत प्रताप सिंह (1673-1708) पृथ्वी सिंह (1708-1718) संग्राम सिंह (1718-1719) उम्मेद सिंह (1719-1721) गोपाल सिंह (1721-1756) सालिम सिंह (1756-1774) सामंत सिंह (1774-1844) दलपत सिंह (1844-1864) उदय सिंह (1864-1890) रघुनाथ सिंह (1890-1929) (सर) रामसिंह (1929-1940) और अंत में, अम्बिकाप्रसाद सिंह (1940-1948)

इतिहास की किताबों में 'परताबगढ़-राज' की पंद्रहवीं सदी से प्रायः अगले सौ सालों तक का कोई लंबा-चौड़ा विवरण नहीं मिलता, पर [महारावत प्रताप सिंह, जिन्होंने प्रतापगढ़ की स्थापना कान्ठल राज की नयी राजधानी के रूप में की, के वक्त से यहां के इतिहास पर थोड़ी बहुत रोशनी ज़रूर डाली जा सकती है! (सालों तक इस का नाम प्रतापगढ़ नहीं, आदिवासी ढब ढंग से 'परताबगढ़' ही लिखा और बोला जाता था।)

प्रताप सिंह के बाद पृथ्वी सिंह (१७०८-१७१८) संग्राम सिंह (१७१८-१७१९) उम्मेद सिंह (१७१९-१७२१) और गोपाल सिंह के सन १७२१ से १७५६ तक शासन के बारे में ज्यादा सामग्री इतिहास के स्रोतों में अंकित नहीं है। हाँ, इतना संकेत तो ज़रूर मिलता है कि एक शाही फरमान द्वारा महारावत प्रताप सिंह के उत्तराधिकारी पृथ्वी सिंह को शाह आलम (प्रथम) ने "बसाड के परगने की आय के अलावा अपनी प्रजा के लिए खुद अपने सिक्के ढाल सकने का अधिकार" दिया था।

यह भी उल्लेख इतिहास के दस्तावेजों में मिलता है कि गोपाल सिंह के शासन-काल में मराठे हर तरफ़ सर उठाने लगे थे और वे बाहुबल के आधार पर देसी रियासतों पर बकायदा संगठित हमले करते थे, पर गोपाल सिंह ने मेवाड से अपने अच्छे संबंधों के चलते उदयपुर के महाराणा से न केवल धरियावद परगने का शासन प्राप्त किया था, बल्कि वह मराठों की लूट से भी अपने राज्य को बहुत कुछ महफूज़ रख सके थे।[2]

प्रतापगढ़ राज्य मुग़ल और ब्रिटिश काल में[संपादित करें]

मुग़ल और ब्रिटिश काल में प्रतापगढ़ राज्य 'बाहरी' हस्तक्षेपों से बहुत कुछ अछूता रहा, कुछ इसलिए भी कि न केवल यहाँ के तत्कालीन राजाओं ने दिल्ली के शासकों को १५,००० रुपये की सालाना 'खिराज' देने का निश्चय किया, बल्कि सालिम सिंह (1756-1774) ने मुग़ल-शासक शाह आलम (द्वितीय) से अपने राज्य के लिए नए 'सालिमशाही सिक्के' प्रचलित करने की लिखित स्वीकृति का नवीनीकरण करवाया, जो 'परताबगढ़' की स्थानीय-टकसाल में में ही ढाले जाने वाले थे। १७६१ में मल्हार राव होलकर के सेनापति तुकोजी राव ने प्रतापगढ़ की घेराबन्दी की, पर वह यहां से कोई धनराशि वसूल कर पाने में नाकामयाब रहा. हाँ, दो साल बाद १९६३ में मल्हार राव होल्कर ने उदयपुर जाते वक़्त सालिम सिंह से (सालिमशाही रुपयों की) वसूली ज़रूर की. तब सब तरफ मराठों का उत्पात बड़ा प्रबल था।

सालिम सिंह, जिन्होंने प्रतापगढ़ के पास 'सालमगढ' बसाया था, के पुत्र सामंत सिंह के राजकाल में मराठों ने तो प्रतापगढ़ पर हमला और लूटपाट न करने की एवज में ७२,७२०/- सालिमशाही रुपयों की सालाना 'खिराज' तक बंधवा ली. मराठों के आतंक से आजिज आ कर सामंत सिंह ने १८०४ में अंग्रेजों से संधि की और जो वसूली मराठा किया करते थे, वही राशि अंग्रेजों को दिए जाने का करार किया गया; पर लॉर्ड कॉर्नवालिस की नयी राज्य-नीतियों के चलते ये करार भी बहुत समय तक लागू न रह सका और प्रतापगढ़ अंततः अँगरेज़ हुकूमत के सीधे नियंत्रण में आ गया। १८१८ में एक दफा फिर प्रतापगढ़ की अंग्रेज़ी सरकार से १२ सूत्रीय संधि हुई, जिसके अनुसार पहले साल में, ३५,००० रुपये और पांचवें साल में ७२,७००/- रुपये अंग्रेजों को 'खिराज' में देने का इकरार किया गया।

चित्र:State Emblem Erstwhile Pratapgarh State in Rajasthan.jpg
प्रतापगढ़ राज्य का राजचिन्ह (एम्ब्लेम).

सामंत सिंह ने प्रतापगढ़ का शासन अपने पुत्र दीप सिंह को सौंप दिया, जिसने कुछ समय तक तो ठीकठाक काम चलाया, पर उसके ही राज्य के कुछ विरोधियों को स्थानीय स्तर पर दीप सिंह का शासन घोर असंतोषजनक जान पड़ा और शासन के प्रति विद्रोह की घटनाएँ तेज होने लगीं, लिहाज़ा सर उठाने वाले विद्रोहियों को कुचलने की गरज से दीप सिंह ने कुछ की हत्या तक करवा दी. अंग्रेज़ी आकाओं को दीप सिंह की यह कार्यवाही नागवार गुज़री और उन्होंने दीप सिंह को (प्रतापगढ़ से निष्कासित करते हुए) उसे देवगढ़ चले जाने और वहीं रहने का हुक्म दे डाला. कुछ वक्त तक तो देवगढ़ में दीप सिंह लगभग नज़रबंद रहा, पर अंग्रेज़ी राज का हुकुम टालते हुए वह थोड़े ही वक्त बाद प्रतापगढ़ लौट आया। अंग्रेज़ी राज को ये हुकुमउदूली सहन न हुई, लिहाज़ा अँगरेज़ फौज की एक टुकड़ी ने आमने-सामने की एक लड़ाई में दीप सिंह को हरा कर बंदी बना लिया और (अरनोद के पास) अचनेरा-किले में भेज दिया, जहाँ १८२६ में एक कैदी के रूप में इस राजा ने अंतिम साँस ली. भले दीप सिंह के जीवन के पन्ने राजनैतिक-ऊहापोह और उथल-पुथल की घटनाओं से भरे हों, उसकी प्रसिद्धि प्रतापगढ़ शहर में बनवाए गए दीपेश्वर मंदिर और दीपेश्वर तालाब के निर्माता होने की वजह से आज भी है।

दीप सिंह की अचनेरा कैद (अरनोद में) हुई मृत्यु के बाद सामंत सिंह ने (दीप सिंह के पुत्र) और अपने पोते दलपत सिंह को राज्य का शासन सोंपा, जो १८४४ में उन का उत्तराधिकारी बना, पर अगले ही साल १८२५ में खुद दलपत सिंह डूंगरपुर राजा के गोद चले गए, जिन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के निर्णय के आलोक में अपने दत्तक पुत्र उदय सिंह को तो अपनी जगह डूंगरपुर महारावल घोषित किया और खुद प्रतापढ़ के राजा बने. १८६२ में उन्हें भी अंग्रेज़ी हुकूमत से इस मंशा की सनद मिल गयी कि उन्हें तथा उनके उत्तराधिकारियों को (खुद के कोई पुत्र न होने की दशा में) दत्तक-पुत्र गोद लेने का अधिकार रहेगा.

सुधारों की बयार[संपादित करें]

१८६५ में जब उदय सिंह गद्दीनशीन हुए तो प्रतापगढ़ के दिन सचमुच बहुत कुछ फिरे. उदय सिंह ने राजकाज में कई सुधार किए, दीवानी अदालतें कायम कीं, कुछ कर माफ किये गए, उचित मूल्य की सरकारी दुकानें खोलीं और १८७६-१८७८ के कुख्यात दुर्भिक्ष 'छप्पनिया-काल' के दौरान प्रजा के लिए कई राहत कार्य शुरू किये. उदय सिंह ने प्रतापगढ़ में अपने लिए कुछ ब्रिटिश तर्ज़ पर एक अलग महल भी बनवाया और राज्य में प्रशासनिक सुधारों पर गंभीरता से ध्यान केंद्रित किया।

१८६७ में यहां पहली आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी खोली गयी और मुफ्त आदिवासी शिक्षार्थ १८७५ में स्टेट प्राइमरी स्कूल समेत कुछ पाठशालाएं. १८७५ ईस्वी में ही 'बंदोबस्त महकमे' का गठन हुआ। दो अनुभवी हाकिमों के अलावा बंदोबस्त के नए महकमे में सदर-मुंसरिम, पटवारी, बंदोबस्त-अमीन नियुक्त किये गए। पहले-पहल साकथली, हथूनिया और मगरा गांवों समेत ११४ गांवों का बंदोबस्त किया गया था।

१८८४ में अंग्रेजों की कृपा से डाक व तार विभाग अस्तित्व में आया। १८९० में उदय सिंह का देहांत हुआ, पर चूंकि उनका स्वयं का कोई पुत्र न था, उनकी विधवा रानी ने अपने पति के चचेरे भाई (अरनोद ठिकाने के) रघुनाथ सिंह को गोद ले लिया, जिन्हें १८९१ में अंग्रेज़ी शासन ने (१८६२ की सनद के अनुरूप) दिवंगत उदयसिंह का उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया।

इसी साल १८९३-९४ में 'सदर अस्पताल' बना, चुंगी-महकमे (कस्टम ऑफिस) के अलावा कुछ एक डाकघर भी खुले और सबसे उपयोगी निर्माण कार्य- ग्राम राजपुरिया से होते हुए एक पक्का सड़क मार्ग, प्रतापगढ़ से मंदसौर बनाया गया, जो रेल से प्रतापगढ़ के बाशिंदों का पहला संपर्क-मार्ग भी था।

१८९४ ईस्वी में 'महकमा खास' का गठन हुआ। इस विभाग जो प्रमुख लिखित 'कर्तव्य' निर्धारित किये गए, वे थे- भू-राजस्व (लगान) की वसूलियाँ करना, दीवानी और फौजदारी मामलात का फैसला, राज्य के राजस्व रेकोर्ड का संधारण, 'बंदोबस्त-हाकिम' की गैर मौजूदगी में उसके सारे कामकाज देखना, जन-सुनवाई, दौरे और निरीक्षण करना और गांवों में लम्बरदार और पटवारियों की नियुक्ति करना वगैरह. तब इसी महकमे के अधीन हाकिम-माल नाम का तहसीलदार की तरह का कोई पद भी हुआ करता था, जिसके अधीन नायब-तहसीलदार, सदर कानूनगो, पटवारी, माफीदार, अहलमद, अहलकार, जमा-खर्च-नवीस, नायब अहलकार जैसे कई पद होते थे।

सन १९०४ में पहली मोटर कार[संपादित करें]

राज्य के आधुनिकीकरण की शुरुआत भी तभी से हुई. १९०१ में प्रतापगढ़ में म्युनिस्पल कमेटी या 'नगरपालिका' का गठन किया गया, १९०३ में 'पिन्हे नोबल्स स्कूल' खोला गया, १९०४ में लोगों को, एक आश्चर्य की तरह सड़क पर घोडे या हाथी की चिर-परिचित सवारी की जगह पहली बार पहली मोटर कार देखने को मिली.

रघुनाथ सिंह के कार्यकाल में १९०४ में शाही-टकसाल बंद कर दी गयी, क्योंकि 'सालिमशाही' सिक्के की बजाय अंग्रेज़ी-मुद्रा को ही प्रतापगढ़ राज्य में 'राज्य-मुद्रा' के रूप में स्वीकार कर लिया गया। रघुनाथ सिंह के शासन में ही १९१२ में 'डिस्ट्रिक्ट-पुलिस-कप्तान' (एस पी) का नया पद बनाया गया। स्टेट पुलिस-महकमे का पुनर्गठन हुआ और 'खालसा गांवों' में भी भू-प्रबंध लागू किया गया।

उस वक्त कुलमी, कुम्हार, आंजना और माली प्रमुख कृषक जातियों में शुमार थे, जिनके पास औसतन २४ बीघा कृषि-भूमि हुआ करती थी। तब भी अफीम की धतूरिया किस्म बेहद मशकूर थी। सिंचाई, कुओं से चरस द्वारा पानी खींच कर होती थी। प्रतापगढ़ शहर में, जिसे 'परताबगढ़ ' लिखा और बोला जाता था, कृषि-व्यापार के लिए बड़ी मंडी लगा करती थी। इसी तरह की कई स्थानीय कृषि मंडियां अरनोद, कनोरा, मोतडी, रायपुर और सालमगढ में भी थीं। 'परताबगढ़' राज्य की वार्षिक आमदनी १९०७ में करीब ६ लाख थी। आज जिले का भू-राजस्व २० लाख और सिंचाई-कर ३० लाख है- जो राज्यकोष को जाता है।

१९३६ में अलग १५ रोगी शैयाओं वाला अलग 'ज़नाना अस्पताल' निर्मित किया गया, १९३८ में ग्राम पंचायतों का गठन किया गया और नगरपालिका, प्रतापगढ़ में नामांकित सदस्यों के अलावा चुन कर कुछ प्रतिनिधि (निर्वाचित) मेम्बर भी आने लगे.

महारावत रघुनाथ सिंह का उत्तराधिकार राम सिंह (1929-1940) ने ग्रहण किया। उनके शासन काल में शिक्षा, चिकित्सा, स्थानीय शासन अदि कई क्षेत्रों में काम हुआ। सबसे उल्लेखनीय था- प्रतापगढ़ में १९३८ में हाईकोर्ट की स्थापना. राम सिंह को अंग्रेजों ने 'सर' की मानद सनद (उपाधि) भी दी थी।

तब का प्रतापगढ़[संपादित करें]

प्रताप सिंह महारावत ने सन १६९९ में जिस गाँव के आगे जा कर प्रतापगढ़ का निर्माण करवाया था, उस गाँव का नाम था- डोडेरिया का खेडा जो आज भी विद्यमान है। तब यहां अरनोद, धमोत्तर, बरडिया, कनोरा, बजरंगगढ़, सकथली, सुहागपुरा, पुनिया खेड़ी, जांजली, कुलथाना, पारसोला, मूंगाना(श्री चामुण्डा माता निमड़ा गांव भल्ला का खेड़ा छोटीसादडी) जैसे कई बड़े गांव थे। यहां का दूसरा महत्वपूर्ण क़स्बा या ठिकाना- था धरियावद, महाराणा प्रताप के पोते सहसमल ने १६वीं शताब्दी के मध्य बसाया था। (२००८ से पहले तक धरियावद, उदयपुर जिले की तहसील थी, बाद में प्रतापगढ़ का भाग बनी)। कहते हैं, पुराने ज़माने में देवगढ़-प्रतापगढ़ का साम्राज्य करीब ८८९ वर्गमील की परिधि में फैला हुआ था। तब इसे "कान्ठल-राज" के रूप में जाना जाता था।[3] 'कांठल' का शाब्दिक मायना है- 'कंठ-प्रदेश' या किनारे का भूभाग!

सालिम सिंह ने अपने शहर की सुरक्षा के लिए चारों ओर एक परकोटा भी निर्मित करवाया था, जिसके दो छोटे द्वार- 'तालाब बारी' और 'किला बारी' और ६ बड़े प्रवेश द्वार 'सूरजपोल', 'भाटपुरा बारी', 'देवलिया दरवाज़ा' और 'धमोत्तर दरवाजा' थे। सूरज डूबने के साथ ही ये सब नगर-द्वार बंद कर दिए जाते थे, बाहर से आने वालों को सूर्योदय तक शहर के बाहर ही रात बितानी पड़ती थी।

अब का प्रतापगढ़[संपादित करें]

वह पुराना परताबगढ़ अब कहाँ ? समय-चक्र की रफ़्तार सचमुच आश्चर्यजनक है ! अब न परकोटा है, न पुरानी शक्लोसूरत के वे नगरद्वार! राजाशाही के दिनों का सारा पुराना वैभव उजड़ चला है। प्रतापगढ़ और देवगढ़ के दोनों महल किसी अनाम कबाड़ी ने औने-पौने दामों में खरीद लिये थे, उसी एक कबाड़ी से खरीद कर जोधपुर के एक प्राइवेट व्यवसाई, ऐतिहासिक देवगढ़ महल के मालिक हैं। प्रतापगढ़ का महल अब भी उसी कबाड़ी के पास है, न भूतपूर्व राजपरिवार वाले इस तरफ़ झांकते हैं, न पर्यटन विभाग के आका! महाराजा उदय सिंह का महल अब उनके चौकीदारों का आशियाना है। आज जनता द्वारा निर्वाचित लोकतंत्र के जन-प्रतिनिधि, बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य के नए 'राजा' हैं, जिनका न प्रतापगढ़ के इतिहास से कोई सरोकार है, न परंपरा की रक्षा से! सहसमल के वर्तमान वंशजों के पास पांच सदी पुराना गढ़ अब भी है, पर गांव धरियावाद के 'रावले' को मरम्मत और नयी साजसज्जा के बाद आजकल 'धरियावद हेरिटेज होटल' का रूप दे दिया गया है! धरियावद ठिकाने की वर्तमान पीढ़ी अब पर्यटन, प्राइमरी स्कूल चलाने और राजनीति में लग गयी है। प्रतापगढ़ का पुराना राजपरिवार पुणे में स्थाई तौर पर निवास कर रहा है, यहां की भूतपूर्व राजकन्या श्रीमती रत्ना सिंह प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) से आजकल लोकसभा-सांसद हैं।

कुछ प्राचीन गांव और पुरा-महत्व के उपेक्षित स्थल[संपादित करें]

जानागढ़, खप्रदक (खैरोट) अवलेश्वर, बसाड, शैवना, धमोत्तर, घोटावर्षिका (घोटारसी), सिधेरिया, गंधर्वपुर (गंधेर), रेतम नदी के किनारे बसा कनोरा गाव और कनोरा की बावड़ी, प्राचीन चारभुजा मन्दिर, गड़ी, 'माद-हुकलो' सहित प्रतापगढ़ जिले में कई स्थानों पर फैले ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के अवशेष, अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाते आज भी देखे जा सकते हैं। लगता ये है राज्य के पुरातत्व और संग्रहालय विभाग ने इस प्राचीन क्षेत्र का कोई विस्तृत या गंभीर सर्वेक्षण नहीं करवाया है, इसलिए दुर्भाग्य से यहाँ की ऐतिहासिक-संपदा में से एक भी स्थल 'संरक्षित स्मारक' श्रेणी में वर्गीकृत नहीं है, यद्यपि लंबे अरसे से इसकी मांग स्थानीय प्रशासन के अलावा कई इतिहासप्रेमी भी बराबर उठाते आ रहे हैं!

कुछ जानदार, किन्तु अब कचराघर बन चुकीं १४ पुरानी बावडियों के जीर्णोद्धार के प्रस्ताव जिला प्रशासन ने भेजे हैं। पर कोई नहीं जानता, प्राचीन संपदा की रक्षा और संरक्षण का सपना क्या धनाभाव में कभी पूरा होगा? गौतमैश्वर महादेव का परसिध्द मन्दिर अरनोद । आठिनेरा ,जाजली

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. ५. 'महामहोपाध्याय रायबहादुर पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा संग्रह सूची': प्रधान संपादक: धर्मपाल शर्मा : प्रकाशक-'प्रताप शोध संस्थान, उदयपुर,२००८
  2. ६. 'इम्पीरिअल गजेटियर ऑफ इंडिया : प्रोविंशियल सीरीज़; राजपूताना
  3. ७.'''गौरीशंकर हीराचंद ओझा'':'राजपूताना का इतिहास' सीरीज़ : "प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास " प्रकाशक : राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, 2000. ISBN 81-87720-02-6