पोवार

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पोवार यह एक क्षत्रिय जनजाति है। चार अग्निकुल या अग्नि जनित जनजातियों में से एक पोवार भी मानी जाती है। पोवारों को पँवार, पंवार, पुआर और परमार भी कहाँ जाता है। पोवार मूलतः पोवारी बोलते है। [1] पोवार शब्द प्रमार का अपभ्रंश है। यह मुख्य रूप से उज्जैन से रेवाड़ी के पास, बनारस के पास तथा महाराष्ट्र के गोंदिया , भण्डारा , मध्यप्रदेश के बालाघाट, सिवनी क्षेत्र में बसे हुये पाए जाते हैं । इनके मूल पूर्वज युध्द करते थे । आबु पर्वत इनका उदय स्थान है । यह युद्ध में ब्राह्मण आदि सबकी सहायता और रक्षा करते थे । ऐतिहासिक दस्तावेजो , काव्यो , लोकोक्तियों के अनुसार उज्जयनी के सम्राट विक्रमादित्य पोवार थें । [2] सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी उज्जयनी थी ! उज्जयनी लम्बे समय तक पोवार राजवंश की राजधानी बनी रही ! करीब ग्यारहवी शताब्दी में इस पोवार वंश के राजा भोज द्वारा राजधानी उज्जयनी से धारानगर स्थलांतरित की गयी ! इस धारानगर से सन 1700 के बाद यानी अठारहवी सदी में पोवारो के करीब ३६ कुल मध्य भारत में परिवारों सहित रामटेक के समीप नगरधन पहुचे और वहां से वे वैनगंगा क्षेत्र में जाकर बसे ![3] यह सभी ३६ कुल पोवार समुदाय के नाम से जाने जाते हैं । मध्य भारत में पोवार क्षत्रिय जाती की करीब जनसंख्या १० लक्ष होने की बात कही जाती है ! पंवार(परमार/पोवार) राजा भोज को अपने कुल का राजा मानते है। माॅ गढ़कालिका को वे अपनी कुलदेवी मानते है।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Anthropometric Measurements of Maharashtra (iravati karve(Mrs).Vishnu Mahadev Dandekar) S.M.katre ,1951.anthropometry.p.37
  2. "संग्रहीत प्रति". मूल से 2 अक्तूबर 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 6 जून 2020.
  3. "भारतीय जनगणना१८७२ ,पृष्ठ क्रमांक ३८ अनुक्रमांक ७१".

[1][2] [3]

  1. "संग्रहीत प्रति". मूल से 17 जून 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 6 जून 2020.
  2. "संग्रहीत प्रति". मूल से 27 मार्च 2019 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 6 जून 2020.
  3. "भारतीय जनगणना१८७२ ,पृष्ठ क्रमांक ३८ अनुक्रमांक ७१".