पृथ्वीराज-रासो का काव्य सौन्दर्य

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

पृथ्वीराज-रासो[1][2] का काव्य सौन्दर्य के सम्बन्ध में आज तक कोई ठोस विचार -विमर्श नहीं हुआ केवल रासो की ऐतिहासिकता पर ही विचार -विमर्श हुआ। रासो के सम्यक काव्यात्मक मूल्यांकन के लिए हमें निम्न शीर्षकों पर विचार करना होगा।

कथा का विस्तार[संपादित करें]

यदि हम ऐतिहासिक दृष्टि को त्याग कर काव्यत्व की दृष्टि से रासो की इतिवृत्ति का मूल्यांकन करें ,तो हमें कवि की अपूर्व कल्पना -शक्ति की महत्ता स्वीकार करनी होगी। .जिन प्रसंगों की उद्भावना को लेकर इतिहासकार रासो पर छींटाकशी करते हैं ,वस्तुतः वे ही कवि की काव्य -कुशलता के परिचायक हैं। पृथ्वीराज और जयचंद के विरोध का कारण संयुक्ता का अपहरण चाहे न हो ,किन्तु कवि ने रसराज (शृंगार )की अभिव्यक्ति के लिए इस बहाने सुन्दर प्रसंग ढूंढ निकाला है। युद्धों के कारण के रूप में किसी प्रेम प्रसंग की कल्पना करके उन्हें विशुद्ध द्वेष की अभिव्यक्ति होने से बचा लिया गया है। पृथ्वीराज का बार -बार छमा कर देना भले ही ऐतिहासिक तथ्य न हो, किन्तु इससे नायक के चरित्र की उदारता का प्रभाव पाठकों के ह्रदय पर अंकित हो जाता है। जब गोरी इस छमादान का बदला पृथ्वीराज को लौह -शृंखलाओं में जकड़ कर चुकाता है ,तो पाठक की आत्मा तिलमिला उठती है और उसकी सारी सहानुभूति विजेता गोरी के साथ न रह कर पराजित पृथ्वीराज के साथ हो जाती है। इसी प्रकार पृथ्वीराज का शब्द वेधी बाण द्वारा गोरी का बध करके आत्मोत्सर्ग कर देना नायक के चरित्र को बहुत ऊँचा उठा देता है ,जो भारतीय महाकाव्य -परम्परा के लिये आवश्यक। है।

वर्णात्मकता[संपादित करें]

रासो के रचयिता ने नगर ,उपवन, वन ,सरोवर ,दुर्ग ,सेना ,युद्ध आदि वर्णन में कवि -हृदय का परिचय दिया है। युद्ध क्षेत्र का प्रत्यक्ष चित्रण:

न को हार नह जित्त ,रहे रहहिं सूर बर। धर उप्पर भर परत करत ,अति जुद्ध महा भर।।
कहौं कमध ,कहौं मत्थ,कहौं कर चरन अंतरूरी। कहौं कंध वह तेग ,कहौं सिर जुट्टी फुट्टि उर।।

यहाँ केवल स्थिर दृश्य का अंकन हुआ है ,किन्तु रासो में गतिशील चित्रों का भी अभाव नहीं है:

मचै कुह कूह बहै सार -सारं। चमक्कै चमक्कै करारं सुधारं।।
भभक्के,भभक्के बहै रक्तधारं। सनक्कै सनक्कै बहै बान भारं।।
हबक्कै हबक्कै बहै सेल मेलं। हलक्कै हलक्कै मची ठेल मेलं।।

यहाँ युद्ध का दृष्टिगोचर रूप ही नहीं ,उसका श्रुतिगोचर रूप भी स्पष्ट हो जाता है :

बज्जिय घोर निसाँन रांन चौहान चहुँ दिसि। सकल सूर सामंत समर बल जंत्र मंत्र तिसि।।

भाव व्यंजना[संपादित करें]

रासो में मुख्यतः वीर एवं श्रृंगार रस की व्यंजना प्रसंगानुसार हुई है। वीर रस के स्थायी भाव उत्साह की अभिव्यक्ति ओजपूर्ण शैली में की गई है। यथा :

उठ्ठिराज पृथ्वीराज वाग लग्ग मनी वीर नट। कढ़त तेग मनोवेग लगत बीज भट्ट घट्ट।।

इसी प्रकार श्रृंगार रस के आलम्बन—पद्मावती के सौन्दर्य चित्रण में माधुर्य पूर्ण शैली का प्रयोग हुआ है:

मनहुँ कला ससभान कला सोलह बन्निय। बाल बैस ससि ता समीप अमृत रस पिन्नय।।
विगसि कमल स्रिंग भ्रमर बेनु खंजर स्रिंग लुट्टिय। हीर कीर अरु बिम्ब ,मोती नख -सिख अहि घुट्टिय।।
छप्पति गयंद हरि हंस गति ,बिह बनास संचै सँचिय। पद्मिनिय रूप पद्मावतिय ,मनहुँ काम -कामिनि रचिय। .

यहाँ कवि नायिका चंद्र की सोलह कलाओं से सुसज्जित करके ही संतुष्ट नहीं हो गया है,अपितु बाल्यावस्था में चन्द्रमा द्वारा इसी चंद्रमुखी के समीप बैठ कर रसपान करने की कल्पना ने उसके महत्व को और भी बढ़ा दिया है। नायिका के विभिन्न अंगों के संगठन के लिए विधि को न केवल विभिन्न उपादानों को एकत्रित करना पड़ा ,अपितु उसे एक खास सांचे का भी प्रयोग करना पड़ा। महाकवि चन्द ने नारी -सौन्दर्य के अतिरिक्त शृंगार रस के अन्य अंगों --वय ,संधि ,यौवनागम ,अनुराग, प्रथम मिलन संयोगकालीन लज्जा आदि का भी वर्णन पूर्ण तल्लीनता के साथ किया है। संयोगकालीन चेष्टाओं के निरूपण में उन्होंने जैसी सफलता प्राप्त की है ,वैसी ही उन्होंने वियोगानुभतियों की अभिव्यक्ति में की है। एक उदाहरण द्रष्टव्य है ;

बढ़ी वियोग बहु बाल ,छंदविय पूर्ण मानं। बढ़ी वियोग बहु बाल, वृद्ध जोवन सनमानं।।
बढ़ी वियोग बहु बाल ,दीन पावस रिति बढ़ै। बढ़ी वियोग बहु बाल, लज्जिकुल वधु दिन चढ़ै।।

यहाँ "बढ़ी वियोग बहु बाल" की आवृत्ति इस ढंग से की गई है कि उससे वियोगानुभतियों की क्रमिक वृद्धि का बोध स्वतः ही हो जाता है। अंतिम पंक्ति में वियोग की वृद्धि की तुलना दिन चढ़ने पर कुल -वधु की लज्जा से की गई है। एक सूक्ष्म भाव की तुलना अन्य सूक्ष्म भाव से करके कवि ने अपनी पैनी दृष्टि का परिचय दिया है। इसी प्रकार सब सुख साधनों के विद्यमान होते हुए भी वियोग में उनका स्वाद किस प्रकार परिवर्तित हो जाता है ,इसका अनुभव कवि चैन की नायिका के मुख से सुनिए--

बेई आवास जुग्गनि पुरई ,बेई सहचर मंडलिय। संजोग ययंपति कंत बिन,मुहि न कछु लग्गत रलिय।।

"वे ही महल हैं ,वे ही योगिनीपुर हैं,वे ही सहचरियों के झुण्ड हैं ,किन्तु एक प्रिय पति के संयोग के अभाव में मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता। " वीर और श्रृंगार रस के अतिरिक्त अन्य रसों की भी व्यंजना रासो में प्रसंगानुसार हुई है। विशेषतः हास्य ,भयानक और रौद्र का चित्रण तो स्थान -स्थान पर हुआ

  • यहाँ व्यंग्यात्मकता का एक उदाहरण है। एक बार जयचन्द ने व्यंग्यपूर्वक महाकवि चन्दवरदायी से प्रश्न किया --
मुँह दरिद्र अरु तुच्छ तन ,जंगल राव सुह्द। बन उजार पशु तन चरन ,क्यों दूबरो बरद्द।।

"मुँह दरिद्री ,तुच्छ शरीर पाने वाला और जंगल की हद में रहने वाला पशु बरद्द (श्लेष :बैल या बरदाई )दुबला क्यों हो गया?" इसका उत्तर चन्दबरदाई ने बड़े व्यंगात्मक ढंग से देते हुए कहा --

चढ़ि तुरंग चहुआन,आन फेरीत परद्धर। तास जुद्ध मंड़यो,जस जान्यो सबर बर।।
केइक तकि गहि पात ,केई गहि डारि मूर तरु। केइक दन्त तुछ भिन्न ,गए दस दिसि निभाजि डर।।
भुज लोकत दिन अचिर रिन,गए दस दिसिनि भाजि डर.पृथिराज खलन खदधौ जुखर ,मान सबर बर भरद्दौ पर।

इस छंद का तात्पर्य यह है कि महाराजा पृथ्वीराज के भय से उनके शत्रुओं ने इते तृण मुँह में लिए कि बेचारे बरद के खाने के लिए कुछ नहीं बचा। ऐसी स्थिति में उसका दुबला हो जाना स्वाभाविक है। कहना न होगा कि कवि ने इस मनोरंजक प्रसंग की उद्भावना करके हास्य का निरूपण सफलतापूर्वक कर दिया है। वस्तुतः रासोकार में सर्वत्र एक महाकवि की -सी प्रतिभा के दर्शन होते हैं।

उपसंहार[संपादित करें]

इस प्रकार हम देखते हैं की भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से पृथ्वीराज रासो एक प्रौढ़ रचना है। कला पक्ष की दृष्टि से भी उसमें अलंकारों का प्रयोग ,भावानुरूप भाषा ,छंदों की विविधता आदि विशेषताएं मिलती हैं। भाषा की एकरूपता का अभाव उसमें अवश्य है,किन्तु दोष इतना बड़ा नहीं है कि वह उसके महत्व को न्यून कर दे। कुछ अभाव रासो में खटकने वाले हैं। एक तो कवि ने वीर रस के मूल भाव को व्यक्तिगत राग -द्वेष पर ही आधारित किया है। ,अतः उसमे महाकाव्य की -सी व्यापकता नहीं आ पाई। उस समय राष्ट्र को जातीय संगठन और एकता की बड़ी आवश्यकता थी ,कवि का काम होता है कि अपने युग के वातावरण से ऊपर उठ कर भविष्य के लिए कोई सन्देश दे ,किन्तु रासोकार ऐसा नहीं कर पाया। इसी प्रकार शृंगार रस में भी प्रेम भाव की गंभीरता नहीं आ पाई ,नित्य नये विवाह रचाने वाले सामंतों से इसकी आशा भी नहीं की जा सकती। कवि ने भी सामन्तवादी दृष्टिकोण अपनाते हुई नारी को मात्र भोग की ही वस्तु मात्र माना है; वह उसके हृदय के सूक्ष्म सौन्दर्य के दर्शन नहीं कर सका। इन सब दोषों के होते हुए भी पृथ्वीराज रासो एक महाकाव्य है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]