पुस्तकालय अधिनियम

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इकाई - 2 पुस्तकालय अधिनियम (Library Legislation)

इकाई की रूपरेखा

1.0      विषय प्रवेश (Introduction)

1.1      उद्देश्य (Objectives)

1.2      परिभाषा (Definition)

1.3      पुस्तकालय अधिनियम: आवश्यकता एवं आवश्यक विशेषताएं (Library Legislation: Need and Essential Features)

1.3.1  पुस्तकालय अधिनियम की आवश्यकता (Need of Library Legislation)

1.3.2  पुस्तकालय अधिनियम की आवश्यक विशेषताएं (Essential Features of Library Legislation)

1.3.3  पुस्तकालय अधिनियम की संरचना (Structiure of Library Legislation)

1.3.4 पुस्तकालय अधिनियम के कारक (Factors of Library Legislation)

1.4      भारत में पुस्तकालय अधिनियम (Library Legislation in India)

1.5      सारांश (Summary)

1.0  विषय प्रवेश (Introcuction)

           अधिनियम (legislation/Act) केन्द्र में संसद या राज्य में विधानसभा द्वारा पारित किसी विधान को कहते हैं। जब संसद या विधानसभा में किसी विषय को प्रस्तावित करते हैं तो उसे विधेयक या बिल कहते हैं। संसद या विधानसभा से पारित  होने के बाद उस बिल या विधेयक को अधिनियम का दर्जा मिल जाता है। अधिनियम का तात्पर्य उस नियम/कानून से होता है जिसे सरकार द्वारा बनाया एवं लागू किया जाता है I पुस्तकालय अधिनियम के माध्यम से सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए वित्तीय प्रबंध (Financial management) के साथ साथ ढांचागत (Structural) सुविधा  को विकसित किया जाता है । इसके अलावा इसके माध्यम से करों या उपकरों का प्रावधान किया जाता है, ताकि इस राशि से सार्वजनिक पुस्तकालयों (Public Libraries) का उचित प्रबंधन किया जासके। सार्वजनिक पुस्तकालय सेवा द्वारा ही जन-जन को शिक्षित बनाकर उसमें शैक्षणिक चेतना विकसित की जा सकती है और बिना पुस्तकालय अधिनियम के सार्वजनिक पुस्तकालयों का समुचित विकास संभव नहीं है ।

    सार्वजनिक पुस्तकालय का प्रमुख उद्देश्य पाठकों के खाली समय का सदुपयोग करने, उनकी आजीविका या व्यवसाय को समुन्नत बनाने या अन्य उद्देश्यों के लिए उनके ज्ञान का संवर्धन करने हेतु प्रलेखों (Documents) का उपयोग करने में उनकी सहायता करना है। संभवतः पुस्तकालय अधिनियम  ही एक प्रजातांत्रिक एवं स्वतन्त्र समाज में सार्वजनिक पुस्तकालय सेवा उपलब्ध कराने का सर्वोत्तम और विश्वसनीय तरीका है। नागरिकों को प्रभावी सेवा उपलब्ध कराने के लिए पुस्तकालयों को सक्षम बनाने में सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियमों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

    सर्वप्रथम ब्रिटेन में सन् 1850 में पुस्तकालय अधिनियम पारित किया गया और इसके बाद अन्य देशों में इसके लिए प्रयास शुरू  किये गए। भारत में पुस्तकालय अधिनियम तैयार करने की दिशा में सर्वप्रथम प्रयास डॉ. रंगनाथन द्वारा किया गया। उन्होंने सन् 1930 में वाराणसी में आयोजित अखिल एशिया शैक्षणिक सम्मलेन(All Asia Education Conference) में “आदर्श पुस्तकालय अधिनियम का प्रारूप” प्रस्तुत किया।

1.1  उद्देश्य (Objectives)

           इस इकाई का मुख्य उद्देश्य पुस्तकालय अधिनियम के महत्वपूर्ण पहलुओं का अध्ययन करना जिनके आधर पर राज्य में सार्वजनिक पुस्तकालयों का नेटवर्क (Public Library Networks) स्थापित करने की रूपरेखा बनाई जा सकती है। इस इकाई को पढ़ने के बाद आप:

क.             पुस्तकालय अधिनियम की आवश्यकता की व्याख्या कर सकेंगे।

ख.             पुस्तकालय अधिनियम की क्या महत्वपूर्ण विशेषताएं होनी चाहिए ? यह   जान सकेंगे.

ग.              किसी आदर्श पुस्तकालय अधिनियम के आवश्यक घटकों को सुनिश्चित कर सकेंगे,  तथा

घ.              भारत में पुस्तकालय अधिनियमों की विशेषताओ का उल्लेख और वर्णन कर सकेंगे।

1.2      परिभाषा(Definition)

           पुस्तकालय अधिनियम द्वारा पुस्तकालय सेवा के आवश्यक तत्व संरचना, व्यवस्थापन तथा वित्त- तीनों तत्व सुरक्षित रहते है। एस. दासगुप्ता के शब्दों में अधिनियम संरचना निर्धारित करता है तथा एक आदर्श ढाँचे के अन्तर्गत विकास सुनिश्चित कर देता है। अधिनियम पुस्तकालयों के शासन अथवा व्यवस्था के लिए उपयुक्त सत्ता निर्धरित कर देता है तथा यह सुनिश्चित कर देता है कि पुस्तकालय सत्ता का गठन इस प्रकार किया जाये कि वह विधि (Law) को प्रभावशील करने के लिए तो उत्तरदायी हो ही, साथ ही विधानमण्डल एवं जनप्रतिनिधियों  (Public representatives) के प्रति भी उत्तरदायी हो।

           पुस्तकालय अधिनियम का आशय ‘‘राष्ट्रीय, प्रान्तीय अथवा स्थानीय स्वशासन स्तर पर सक्षम सत्ता द्वारा बनाए गए ऐसे कानूनी मान्यता प्राप्त नियम-विनियमों से है जिसका उद्देश्य अधीनस्थ पुस्तकालयों में संग्रहीत-सामग्री का उपयोग तथा उसकी सुरक्षा करना, पुस्तकालयों का विकास करना तथा सेवाओं की निरन्तरता बनाये रखना है” ।

1.3      पुस्तकालय अधिनियम: आवश्यकता एवं विशेषताएं (Library Legislation: Need and Essential Features)

           सार्वजनिक पुस्तकालय को अपने देश के नागरिकों को बिना किसी भेद-भाव के निःशुल्क ग्रंथ सेवा प्रदान करना चाहिए। सार्वजनिक पुस्तकालय को नव-शिक्षितों, अर्ध-शिक्षितों तथा पुस्तकालय का उपयोग नहीं करने वालों को भी अपना पाठक बनाना चाहिए तथा ज्ञान एंव सूचना उपलब्ध कराकर अपने देश के नागरिकों की सेवा करनी चाहिए।

           यह एक स्वीकृत तथ्य है कि किसी समाज तथा उसमें रहने वाले व्यक्तियों की स्वतन्त्रता, समृद्धि तथा विकास मौलिक मानवीय मूल्य हैं। सार्वजनिक पुस्तकालयों का उपयोग करके देश के नागरिक ज्ञान एवं सूचना-सम्पन्न बनते हैं तथा इस प्रकार वे मौलिक मानवीय मूल्यों की प्राप्ति सुनिश्चित कराते हैं। सम्पूर्ण विश्व की यह मान्यता है कि राष्ट्रीय, राज्य तथा स्थानीय सरकारों का यह  दायित्व है कि वे अपने- अपने  क्षेत्रों  में शिक्षा तथा निःशुल्क सार्वजनिक पुस्तकालय सेवा की व्यवस्था करें। सार्वजनिक पुस्तकालय (Public Libraries) वस्तुतः लोक विश्वविद्यालय (Public universities) भी होते हैं।

           हमारे देश में कई सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना हुई है। इनमें से अनेक पुस्तकालय स्थानीय निकायों (Local Bodies/government) तथा स्वैच्छिक संस्थाओं (Autonomous Bodies) द्वारा चलाये जा रहै  है तथा कुछ अन्य पुस्तकालय सशुल्क पुस्तकालय के रूप में कार्य कर रहै  है। परन्तु निम्नलिखित कारणों से इन पुस्तकालयों का विकास आधुनिकता के अनुरूप नहीं हो पाया हैः

1. अधिकांशतः पुस्तकालय मूल रूप से स्वैच्छिक प्रयासों द्वारा स्थापित किये गये थे और उनके वित्तीय आधार केवल शुल्क एवं सार्वजनिक दान ही होते थे।

2.        इन पुस्तकालयों के अभिशासन (Administration) तथा प्रबंधन (Management) के लिए कोई मानक नहीं थे।

3.        इनके द्वारा संचालित सीमित सेवाएँ केवल सदस्यों तक ही सीमित थी।

4.        कोई पुस्तकालय कब तक चलेगा इसकी कोई गारंटी नहीं थी।

5.        वे अपने संस्थापकों के सक्रिय रहने तक ही कार्यशील रहते और उसके बाद धीरे-धीरे बन्द हो जाते थे।

           आधुनिक समय में सार्वजनिक पुस्तकालयो को अपनी सेवाएँ निर्धारित मानकों (Standards) के अन्तर्गत प्रदान करने के लिए अपेक्षित निरन्तर अर्थ-स्रोत (Financial sources) की जरूरत पड़ती है, पुस्तकालय अधिनियम एक मात्र विकल्प है, जिसके द्वारा निरन्तर आय-स्रोत संभव है। डा. एस.आर. रंगनाथन, एडवर्ड एडवर्डस (Edward Edwards) आदि विद्वान के यह अनुभव है, कि सार्वजनिक पुस्तकालय प्रजा  की स्थापना तथा विकास के लिए सार्वजनिक कानून बनाना एकमात्र उपाय है। सन् 1994 में यूनेस्को द्वारा जारी किये गये संशोधित सार्वजनिक पुस्तकालय मैनिफेस्टो (Public Library Menifesto) में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि ‘‘सार्वजनिक पुस्तकालयों की स्थापना तथा विकास स्थानीय तथा राष्ट्रीय प्राधिकरणों का दायित्व है। ये पुस्तकालय विशेष अधिनियमों द्वारा समर्थित तथा राष्ट्रीय तथा स्थानीय सरकारों द्वारा वित्तपोषित होने चाहिए।’सार्वजनिक पुस्तकालय अपनी सेवाएँ निरन्तर प्रदान करते  रहैं  इसके लिए स्थायी सुदृढ़ वित्तीय स्रोत उपलब्ध होना चाहिए, जो कि पुस्तकालय अधिनियम तथा पुस्तकालय उपकर (Library cess) द्वारा ही संभव है। किसी भी प्रणाली की सपफलता, उसके लिए बनाये गये नियम एवं कानून पर निर्भर करती है।


1.3.1  पुस्तकालय अधिनियम की आवश्यकता (Need of Library Legislation)

पुस्तकालय अधिनियम की आवश्यकता के संक्षिप्त कारण निम्नलिखित हैं :

1.        इसकी विभिन्न धाराएँ पुस्तकालयों की संरचना, कार्यों, तथा वित्तीय स्रोतों को सुनिश्चित करने के साथ-साथ पुस्तकालय कार्मिकों एवं पाठक समुदाय की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखती है।

2.        राज्य पुस्तकालय अधिनियम पुस्तकालयों के एक सुदृढ़ ढाँचे के निर्माण के लिए कानूनी आधार प्रदान करती है।

3.        यह पुस्तकालयों के अभिशासन तथा प्रबंधन के लिए निर्धारित मानकों को सुनिश्चित करता है।

4.        यह सुनिश्चित करता है कि पुस्तकालयों को निरन्तर वित्तीय समर्थन मिलता रहै ।

5.        यह सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक पुस्तकालय सेवा का लाभ समाज के सभी सदस्यों को निःशुल्क एवं बिना किसी भेद-भाव के मिलता रहै ।

1.3.2  पुस्तकालय अधिनियम की विशेषताएं एवं संरचना (Essential Features and structure of Library Legislation)

           पुस्तकालय अधिनियम द्वारा पुस्तकालय संरचना के तीन आवश्यक तत्व संरचना, व्यवस्थापन, तथा वित्त सुरक्षित रहते हैं  I आदर्श सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम की  निम्नलिखित विशेषताएं अपेक्षित हैं  : -

1.      इसमें पुस्तकालय सेवा प्रणाली के मूल विचार एवं घटकों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।

2.      इसे पुस्तकालय प्रणाली के संरचनात्मक विन्यास को परिभाषित करना चाहिए।

3.      इसमें पुस्तकालय समिति, प्रबंध-परिषद आदि अभिशासनात्मक निकायों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।

4.      इसमें कर्मचारियों की चयन-प्रक्रिया, उनका संवर्ग एवं गुणवत्ता को स्पष्ट करना चाहिए।

5.      इसमें पुस्तकालयों के सर्वांगीण विकास के लिए नियमित वित्तीय स्रोतों का उल्लेख होना चाहिए।

6.      सार्वजनिक पुस्तकालयों को सभी नागरिकों को सभी प्रकार की सूचना प्रत्येक स्तर पर उपलब्ध करानी चाहिए।

7.      इसमें पुस्तकालयों द्वारा प्रदान की जाने वाली विभिन्न सेवाओं के पर्यवेक्षण के लिए एक आधुनिक परिवीक्षण प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए।

8.      इसे एक ऐसी सम्पूर्ण पुस्तकालय प्रणाली की व्यवस्था करनी चाहिए जो विभिन्न प्रकार के प्रलेखों के संरक्षण तथा उनमें निहित सूचनाओं के संप्रेषण को सुनिश्चित करें।

1.3.3.            आदर्श पुस्तकालय अधिनियम की संरचना -

1.        प्रस्तावना: इस भाग में अधिनियम की एक सटीक आख्या तथा एक संक्षिप्त आख्या के विषय में वर्णन होना चाहिए। इसे सुव्यक्त एवं सुस्पष्ट होना चाहिए।

2.        राज्य पुस्तकालय प्राधिकरण : अधिनियम का यह भाग संगठनात्मक प्रणाली एवं सेवाओं का वर्णन करता है। राज्य के सभी नागरिकों को व्यापक एवं सक्षम पुस्तकालय सेवा उपलब्ध कराने के लिए राज्य में पुस्तकालय प्रणाली की स्थापना करना, उसके लिए आवश्यक सुविधओं को उपलब्ध कराने के लिए राज्य में पुस्तकालय प्रणाली की स्थापना करना, उसके लिए आवश्यक सुविधाओं को उपलब्ध कराना तथा उसका प्रशासन करना भी राज्य पुस्तकालय प्राधिकरण के कर्तव्य है। राज्य पुस्तकालय प्राधिकरण राज्य में गठित विभिन्न स्तरों के पुस्तकालय प्राधिकरणों का पर्यवेक्षण करने के साथ-साथ उनका प्रोत्साहन भी करता है।

3.        पुस्तकालयों का नेटवर्क: इस भाग में राज्य पुस्तकालय, जनपदीय पुस्तकालय, शहरी पुस्तकालय तथा ग्रामीण पुस्तकालय संविधान, संरचना, सेवाएँ तथा वित्तीय प्रावधान का उल्लेख रहता है। 

4.        वित्तीय प्रावधान: किसी भी सेवा का विकास बिना वित्तीय प्रावधानों के संभव नहीं है, पुस्तकालयों के सर्वांगीण विकास है तु स्थायी एवं सुदृढ़ वित्तीय स्रोतों का उल्लेख होना चाहिए ताकि सारे नागरिकों को आधुनिक पुस्तकालय सेवा उपलब्ध करायी जा सके। अत: पुस्तकालयों को वितीय आधार है तु पुस्तकालय अधिनियम आवश्यक है ।

5.        कर्मचारी: अधिनियम में राज्य पुस्तकालय सेवा के एक संवर्ग की स्थापना का प्रावधान होना चाहिए तथा उनकी नियुक्ति के नियम एवं सेवा-शर्तें इस प्रकार होनी चाहिए ताकि उच्च गुणवत्ता की पुस्तकालय सेवा को सुनिश्चित किया जा सके।

6.        जवाबदेही: इस भाग में इस बात का प्रावधान रहै  कि सार्वजनिक पुस्तकालय प्रणाली के कार्यकलापों तथा आय-व्यय का सरकारी आडिट के नियमानुसार निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण किया जा सके। [S4]

7.        पुस्तक पंजीकरण: इस भाग में इस बात का प्रावधन रहै  कि सार्वजनिक पुस्तकालय प्रणाली के कार्यकलापों तथा आय-व्यय का सरकारी आडिट के नियमानुसार निरीक्षण तथा पर्यवेक्षण किया जा सके।[S5]

8. कानूनी संरक्षण है तु - सार्वजनिक पुस्तकालय को बेहतर बनाना राज्य सरकार का दायित्व है और बिना पुस्तकालय अधिनियम के सार्वजनिक पुस्तकालय के विकास की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। किसी भी सेवा की बेहतरी के लिए यह आवश्यक है कि इसके लिए कोई वैधानिक आधार हो ।

1.3.4 पुस्तकालय अधिनियम के कारक (Factors of Library Legislation)

           डॉ. एस. आर. रंगनाथन ने पुस्तकालय अधिनियम के कारकों को  निम्नलिखित दो भागों में विभाजित किया है : -

1.    अनिवार्य कारक (Essential Factors)

2.    वांछनीय कारक (Desirable Factors)

अनिवार्य कारक (Essential Factors) : इनके बिना इसके स्थानीय एवं राज्य स्तरीय पुस्तकालय प्रणाली इकाई (Authorities) की संरचना, प्रशासन, बजट, अधिकार, तथा कर्त्तव्य स्पष्ट नहीं हो सकते हैं, अनिवार्य कारकों में हैं : -

1.    उच्च स्तरीय प्रबंधन (Top Management) : इसके अंतर्गत राजकीय पुताकालय अधिकारी, स्थानीय पुस्तकालय अधिकारी की संरचना, उनके अधिकार, कार्य तथा कर्त्तव्य शामिल होते हैं  I

2.    प्रशासन (Administration) : उच्च स्तरीय सत्ता द्वारा निर्धारित नीति तथा निर्णयों के पालन की द्रष्टि से नियम/क़ानून के अंतर्गत उचित प्रशासकीय तंत्र तथा सेवा केंद्र होना अनिवार्य है I

3.    वित्त (Finance) : वित्तीय व्यवस्था के बिना पुस्तकालय गतिविधियों को निरंतर नहीं रखा जा सकता है I

4.    दायित्व (Obligation) : पुस्तकालय नियमों में यह साफ तोर से अंकित होना चाहिए की पुस्तकालय सत्ता (Library Authority) के क्या दायित्व होने चाहिए I

वांछनीय कारक (Desirable Factors) : पुस्तकालय अधिनियम के इन कारकों का होना भी ज़रूरी है पर इन्हें अनिवार्य कारक नहीं माना जा सकता है, ये निम्नलिखित हो सकते हैं  : -

1.     संरचना (Structure)

2.     लेखा तथा लेखा परिक्षण  (Account and Account Statement)

3.     पुस्तकालय कर्मचारी (Libarary Staff)

4.     पुस्तकालय संघों की स्थापना (Establishment of Library Associations)

5.     पुस्तकालय सत्ता के विधि निर्माण सम्बन्धी अधिकार

1.4      भारत में पुस्तकालय अधिनियम (Library Legislation in India)

           भारत में प्रथम पुस्तकालय अधिनियम 1948 में लागू हुआ उसके पूर्व एवं बाद के प्रयासों पर संक्षिप्त दृष्टि  :

1.    1808 में मुंबई प्रान्त की सरकार ने साहित्य के प्रसार के लिए राशि की व्यवस्था की, यह पुस्तकालय अधिनियम की दिशा में पहला प्रयास था

2.     प्रेस तथा पुस्तक पंजीकरण अधिनियम : यह अधिनियम 22 मार्च 1867 को पारित किया गया तथा 1 जुलाई 1867 को लागू किया गया I इसके अंतर्गत प्रकाशक को उसके द्वारा प्रकाशित प्रत्येक पुस्तक की एक प्रति सरकार को भेजनी पड़ती थी I

3.     इम्पीरियल पुस्तकालय अधिनियम 1902 : सरकार द्वारा इम्पीरियल पुस्तकालय को 1902 में राष्ट्रीय पुस्तकालय घोषित करते हुए यह अधिनियम स्वीकृत किया गया I

4.    सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम तथा विधेयक : भारत में अब तक पाँच सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम  बनाये गये हैं, जो निम्नलिखित हैं:

4.1 मॉडल यूनियन लाइब्रेरी एक्ट सन् 1951 में डॉ. रंगनाथन भारत सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति के सदस्य के रूप में (The Library Development Plan - Thirty Year Programme for India with Draft Library Bills for Unioin and Constituent States) का प्रारूप तैयार किये। ‘यूनियन लाइब्रेरी बिल’ (Union Library Bill) इसी प्रलेख में दिया गया है।

4.2  डॉ. रंगनाथन ने सन् 1930 में अखिल एशिया शैक्षणिक सम्मलेन (All Asia Educational Conference) बनारस में, ‘मॉडल लाइब्रेरी एक्ट (Model Library Act) के ऊपर एक लेख प्रस्तुत किया  और बाद में उन्होंने इसे “आदर्श पुस्तकालय अधिनियम का प्रारूप” (Model Public Libraries Act) के रूप में संशोधित  किया।

4.3 सन् 1958 में पुस्तकालय सलाहकार समिति की संस्तुति के आधार पर भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने डॉ. एम.डी. सेन की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की। इस समिति ने सन् 1963 में एक मॉडल पब्लिक लाइब्रेरिज बिल (Model Public Libraries Bill) बनाया।

4.4 चौथी पंचवर्षीय योजना के दौरान भारत सरकार के योजना आयोग ने पुस्तकालय विकास पर सलाह देने के लिए पुस्तकालयों पर कार्यकारी समूह (Working Group) का गठन किया। कार्यकारी समूह ने अपना प्रतिवेदन सन् 1965 में प्रस्तुत किया जिसके साथ एक मॉडल पब्लिक लाइब्रेरिज बिल (Model Public Libraries Bill) संलग्न किया गया था।

4.5 सन् 1989 में भारतीय पुस्तकालय संघ (Indian Library Association) के अनुरोध पर डॉ. वेकटापैया ने एक आदर्श सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम  का प्रारूप तैयार किया। नई दिल्ली में हुए पुस्तकालय अधिनियम के ऊपर  राष्ट्रीय संगोष्ठी (National Seminar’ on Library Legislation) पर विचार-विमर्श करके इस मॉडल अधिनियम को आदर्श पुस्तकालय एवं सूचना संस्था अधिनियम (Model Libraries and Information Societies Act) के रूप में संशोधित  किया गया।

5.    वर्तमान में राज्यों में प्रवाभी अधिनियम : भारत में 35 राज्यों में से वर्तमान में सन 2018 तक निम्नलिखित 19 राज्यों में पुस्तकालय अधिनियम लागू हो चुका  है,  जो निम्नानुसार है : -

1.    मद्रास सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 1948

2.    आन्ध्र प्रदेश सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 1960

3.    कर्नाटक सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 1965

4.     महाराष्ट्र पुस्तकालय अधिनियम, 1967

5.     पश्चिम बंगाल सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 1979

6.     मणिपुर सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम , 1988

7.     केरल सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 1989

8.     हरियाणा पुस्तकालय अधिनियम 1989

9.      मिजोरम सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 1993

10.                         गोवा सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 1994

11.                         गुजरात सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 2001/2002

12.                        उड़ीसा सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 2001/2002

13.                        उत्तराखण्ड (उत्तराँचल) सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 2005

14.                        उत्तर प्रदेश सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 2006

15.                        राजस्थान सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 2006

16.                        पोंडिचेरी सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 2007

17.                        छत्तीसगढ़ सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 2007

18.                        बिहार सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 2007

19.                        अरुणाचल प्रदेश सार्वजनिक पुस्तकालय अधिनियम, 2009

1.5      सारांश (Summary)

           उल्लेखनीय है कि पुस्तकालय अधिनियमों के प्रभावशील होने के पश्चात ही पुस्तकालयों का एवं उसकी सेवाओं का सही तौर पर विकास हुआ हैI यदि हम पुस्तकालयों के पूर्व के इतिहास पर नज़र डालें तो पता चलता है  कि बिना क़ानूनी संरक्षण के उनकी कार्यप्रणाली में एकरूपता (Uniformity) एवं वित्तीय सुधार का अभाव रहा है, साथ ही  बिना क़ानूनी संरक्षण के अपने अधिकारों से उपेक्षित रहते थे I    

    पुस्तकालय अधिनियम का उद्देश्य यह है  कि वह पुस्तकालय का संचालन करने वाली सत्ता के कार्य नियंत्रित कर अपने कार्यों के निर्वाह इस प्रकार करें  कि राष्ट्रीय पुस्तकालय सेवा मितव्ययता पूर्वक (economy), प्रभावशाली एवं व्यापक रूप से कार्य कर सके I पुस्तकालय अधिनियम पुस्तकालयों की स्थापना, विकास, तथा व्यवस्था के लिए उत्तरदायी होता है I वर्तमान समय में देश के बौद्धिक  विकास (Intellectual development) के लिए समय की मांग के अनुरूप भारत में हर राज्य में पुस्तकालयों के विकास हेतु  सरकार द्वारा पुस्तकालय अधिनियम का लागू किया जाना आवश्यक है I

1.6      स्व-जाँच अभ्यास (Answers to Self Check Exercises)

1.                पुस्तकालय अधिनियम क्या होता है ?

2.                   पुस्तकालय अधिनियम की आवश्यकता (What is the need of Library Legislation) पर विचार करें ?

3.                   पुस्तकालय अधिनियम की क्या-क्या विशेषताएं (Essential features of Library legislation) होनी चाहिए समझाएं ?

4.                   पुस्तकालय अधिनियम के उद्देश्यों (Objects of Library Legislation)को वर्णित करते हुए इसके प्रमुख कारकों को लिखें ?

5.                   पुस्तकालय अधिनियम की संरचना (Structiure of Library Legislation)को स्पष्ट करते हुए इसकी व्याख्या करें ?

6.                   भारत में पुस्तकालय अधिनियम की वर्तमान (Present situation of library legislation in India) स्थिति को देखते हुए अपनी व्याख्या दें ?

7.                   पुस्तकालय अधिनियम किस प्रकार तन्त्र को शक्ति प्रदान कर सकता है  स्पष्ट करें ?

1.8      मुख्य शब्द/परिभाषाएं (Key Words)

पुस्तकालय अधिनियम (Library Legislation/Act) : अधिनियम का तात्पर्य उस नियम/कानून से होता है जिसे सरकार द्वारा बनाया एवं लागू किया जाता हैI पुस्तकालय अधिनियम के माध्यम से सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए वित्तीय प्रबंध के साथ साथ ढांचागत सुविधा को विकसित किया जाता है ।

सार्वजनिक पुस्तकालय : पुस्तकालयों को जनता के हित में जनता द्वारा संचालित किया जाता है I

वित्तीय प्रावधान/स्रोत : अधिनियम का तात्पर्य उस नियम/कानून से होता है जिसे सरकार द्वारा बनाया एवं लागू किया जाता हैI पुस्तकालय अधिनियम के माध्यम से सार्वजनिक पुस्तकालयों के लिए वित्तिय प्रबंध के साथ साथ ढांचागत सुविधा विकसित किया जाता है ।

पुस्तकालय कर (Library Tax)  : कर सार्वजानिक आय के एक प्रमुख साधन हैं , अतः करों को पुस्तकालय आय का महत्वपूर्ण स्रोत मन जाता है I[S9]

राज्य पुस्तकालय अधिनियम : विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अपने राज्यों में लागू अधिनियमों को राज्य पुस्तकालय अधिनियम कहा जाता हैI

पुस्तकालय सेवा प्रणाली : पुस्तकालयों द्वारा अपने उपयोगकर्ताओं को प्रदान की जाने वाली सेवाएं एवं सुविधाओं से है  

पुस्तकालय समिति : समिति का अर्थ प्रायः व्यक्तियों का ऐसा समूह जिसका संगठन किसी विशेष लक्ष्य हेतु किया जाता है, जैसे  व्यवस्थापन कार्य, चयन, देखरेख इत्यादि I

प्रेस तथा पुस्तक पंजीकरण अधिनियम : यह अधिनियम 1 जुलाई 1867 को लागू किया गया I इसके अंतर्गत प्रकाशक को उसके द्वारा प्रकाशित प्रत्येक पुस्तक की एक प्रति सरकार को भेजनी पड़ती थी I

इम्पीरियल पुस्तकालय अधिनियम : इम्पीरियल पुस्तकालय को 1902 में राष्ट्रीय पुस्तकालय घोषित करते हुए यह अधिनियम स्वीकृत किया गया I

मॉडल यूनियन लाइब्रेरी एक्ट : सन् 1951 में डॉ. रंगनाथन भारत सरकार द्वारा नियुक्त एक समिति के सदस्य के रूप में (The Library Development Plan - Thirty Year Programme for India with Draft Library Bills for Unioin and Constituent States) का प्रारूप तैयार किये।

मॉडल पब्लिक लाइब्रेरिज बिल (Model Public Libraries Bill): भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने डॉ. एम.डी. सेन की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की। इस समिति ने सन् 1963 में एक मॉडल पब्लिक लाइब्रेरिज बिल (Model Public Libraries Bill) बनाया।

1.9      सन्दर्भ और संबंधित पढ़ने योग्य (Reference and Further Readings)

1.    रथ, पी. के. (1996). पब्लिक लाइब्रेरी फाइनेंस. न्यू डेल्ही. प्रतिभा प्रकाशन.

2.     दासगुप्ता, एस. (1960). “लाइब्रेरी डेवलपमेंट ऑफ़ इंडिया”. है राल्ड ऑफ़ लाइब्रेरी साइंस, खण्ड. 3. पृ. 07-08

3.    जम्भेकर, एन. (1995). नेशनल पालिसी ऑन पब्लिक लाइब्रेरीज इन इंडिया. वर्ल्ड लाइब्रेरीज, खंड 5, अंक 2.

4.    वेंकटापईयह, वेलागा (1994). इंडियन लाइब्रेरी लेजिस्लेशन. 2 खंडो में. नयी दिल्ली, दया पब्लिशिंग हाउस.

5.     वेंकटापईयह, वेलागा (1995). मॉडल लाइब्रेरी लेजिस्लेशन. न्यू डेल्ही. कांसेप्ट पब्लिशिंग हाउस.

6.     वेंकटापईयह, वेलागा (1995). मॉडल स्टेट लाइब्रेरी पालिसी एंड लेजिस्लेशन (फॉर द स्टेट्स एंड यूनियन टेरिटरीज). डेल्ही. इंडियन लाइब्रेरी एसोसिएशन.

7.     वेंकटापईयह, वेलागा एंड मधुसुदन. एम्. (2006). मॉडल पब्लिक लाइब्रेरी लेजिस्लेशन इन द न्यू मिल्लेनियम. न्यू डेल्ही, बूकवेल.

8.    विकिपीडिया (2018), अधिनियम, http://hi.wikipedia.org/wiki/अधिनियम.

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