पारीकुपार लिंगो

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गुरु पारिकुपार लिंगो का जन्म उस समय हुआ था जब मानव समाज प्रकृती के न्याय और नियमो से अनभिज्ञ था और वह सिर्फ अन्धकार के ओर ही बढ रहा था ।ऐसे कठिन समय मे उन्होने मानव-समाज मे ज्ञान की ज्योती जलाकर गोंडी धर्म 'कोया पुनेम' की संस्थापना करके पूरे समाज को नयी दिशा प्रदान की ।

लिंगो पुनेम के पांच सर्वोच्च मर्ग

सुर्वेय मारेग आन्दगे मावा सगा पुनेम सुर सर्रि । । सुर्वेय नंगे आंदुने मावा सगा नंगे सुर सर्रि । । सुर्वेय ताकय आन्दुने मावा सगा ताससुर सर्रि । । सुर्वेय मोद आन्दुने मावा सगा मोद सुर सर्रि । । सुर्वेय सेवाय आन्दुने मावा सगा सेवा सू सर्रो । ।

लिंगो ने पांच सर्वोच्च मार्ग बत्तये है जो इस प्रकार है-

1 सत्य धर्म मार्ग -मानव समाज का सार्वगीन विकाश सुख व शान्ती से सामाजिक जिवन प्राप्त करानेवाला मार्ग ही सगा धर्म मार्ग है । 2 सत्य निति मार्ग - सगा सामाजिक नियमो का पालन करना 3 सत्य मार्ग - समाज को लाभदायक आचार -विचार को जानना और उनका पालन करना ही सत्य मार्ग है । 4 सत्य (सगा) ज्ञान मार्ग - जिन प्राकृतिक मूल्यो पर सामाजिक संरचना आधारित है,उन्हे समझकर उनके अनुसार व्यवहार करना ही सत्य ज्ञान मार्ग है । 5 सत्य सेवा मार्ग - समाज का अस्तीत्व बनाये रखना और समाज मे शान्ती व खुशहाली बनाये रखने के लिये समाज सेवा सर्वोच्च सेवमार्ग है अन्यथा मानव द्वारा मानव का नशा होता रहेगा ।


लिंगो का सगा निति मूल्य दर्शन

1. जीवात्मा को दुःखी नही करना चाहिये । 2. अन्याय का प्रतिकार करना चाहिये । 3. सज्जनो की संगत करनी चाहिये । 4. बुरे लोगो से दूर रहना चाहिये । 5. झुट नही बोलना चाहिये । 6. चोरि नही करना चाहिये । 7. मद्दपान नही करना चाहिये । 8. कुकर्म नही करना चाहिये । 9. लालच नही करना चाहिये । 10. मन पर नियंत्रित करना चाहिये । 11. बुरे शब्दो का प्रयोग नही करना चाहिये । 12. सदा सत्य वचन बोलना चाहिये ।

कोया पुनेम के पांच तत्व

1. सगा 2. गोटुल 3. पेनकडा 4. पुनेम 5. मुठवा

1.सगा- समानता और भाईचारे पर आधारित समाज व्यवस्था । 2.गोटुल- शिक्षा से अज्ञाणी रहने से मनुष्य की मौलिकता नष्ट हो जाति है और जिवन मे प्रकाश या विकाश नही हो पाता । अत: बचपन से ही मनुष्य को अच्छा नागरिक बनाने के उद्देश्य से गुरु लिंगो ने ग्राम गोटुल की स्थापना की है, जिनमे 5 18 वर्ष तक बच्चे तथा युवा रहकर शिक्षा प्राप्त करे और शिक्षा के द्वारा अपना मानसिक शारीरिक, सानाजिक,सासंस्कृति,चारित्रिक व धार्मिक विकास कर सके । उन्हे के द्वारा अपनी इच्छा शक्ती तथा अनुकरण शक्ती की क्षमताओ का विकास और चरित्र को उज्ज्वल बना सके । 3. पेनकाडा - साक्षात मातापिता व गुरु को शक्तीस्थल मानकर उनको पूज्यनीय माना जाता था । और उनकी प्रेरणा से ही सत्य ज्ञान और संगठन की योग्यता प्राप्त कर समाज के कमजोर लोगो की सेवा करने की प्रतिज्ञा करनी पडती ठी । 4. पुनेम - कोया पुनेम सर्वश्रेष्ट मार्ग है । सगा सामाजिक संरचना के सर्वोच्च नियम है । सर्वोच्च आचरण सगा समाज का दर्शन ज्ञान है । 5. मुठवा - गुरु गोंडी धर्म मे समाज को जाग्रत करने और उसे प्रगतिशील बनाने वाले गुरु को वंदनिय माना जाता है ।

गोंडी पंचतत्व प्रथा

गोंडी धर्म के पंचतत्व पृथानुसार जन्म से लेकर मृत्त्यू के संस्कार कर्मकांड है जो इसतरह किये जाते है -

1 जन्म 2 विवाह 3 देवपूजा 4 मरण 5 देवकारण (पेनकारण)

1.जन्म : बच्चे के जन्म के 5 अथवा 12 दिन पश्चात'शोभनी'रस्म क8 जाति है । इस अवतार पर बच्चे के बाल निकाले जाते है ('सोयरा' के हाथों) और वह कमर मे काले रेशम धागे का नाडा बांधती है । इसके बाद, बच्चे का नामकरण करके उसे झूले मे सुलाकर रखा जाताहै । उसके नामकरण के अवसर पर स्त्रिया जन्गो-लिंगो के संस्मरण मे गोंडी गीत गाती है । बच्चे का नाम पूर्वज के नाम पर रखा जाता है । जिसे -रावण,मेघनाथ,भिमाल,लिंगो,हिरासुका आदी । यदि लडकी हुई तौ जन्गो, मानको,काली,कंकाली आदी ।

2.विवाह (मर्मिंग): गोंड समाज मे 1 देव से 12 देव होते है । उसमे सम विषम सगा,सम गोत्र तथा विषय कुल मे ही वैवाहिक संबंध जोड़े जाते है जैसे की 6 और 7 देव गोत्र संबंध जोड़े जाते है । 4 और 6 मे रिश्ते इस लिये नही होते है; क्योकी यह भ्रातृ-सगा है । वर-वधु के विवाह करवाने वाले पुजारि को भुलकाल कहते है । भूमकाल गोंडी नियमानुसार वर-वधु को विवाह-बन्धन मे बांधते है ।

3. देवपूजा : देवपूजा के अंतर्गत विभिन्न देवताओ की पूजा की जाति है जैसे-परसापेन,भिमालपेन,नारायणपेन,जन्गोरायताड़,काली-कंकाली,जानको-मानको आदी । परसापेन की पूजा महूर के पेड के नीच हर वर्ष वैशाख माह मे अक्षय-तृतीया के अवसर पर की जाति है । चित्र माह मे पूर्णिमा के दिन गाव के बाहर मन्दिर मे भिमालपेन की पूजा की जाति है । छ: देववाले गोत्र के लोग कार्तिक माह मे नारायणपेन की पूजा करते है । दशहरे के दिन सातदेव गोत्र के लोग रावण्देव की पूजा करते है । पौष प्रतिपदा के दिन देवी जन्गोरायताड की पूजा की जाति है । पौष अमावस्या की रात काली,कंकाली की पूजा होती है । माघ महिने मे जानको,मानको की पूजा की जाते है ।

4.मरण : गोंडी समाज मे मृत व्यक्ति को मिट्टी देने की प्रथा है । अर्थात मृत व्यक्ति को दफन किया जाता है । अन्तिम संस्कार गोंडी रिवाज के अनुसार किया जाता है । तिन दिन तक शोकपालन के पश्चात चौथे दिन घर के सभी सदस्यो का शुध्दिकरण होता है ।

5. देवकारण: गोंड समाज मे अन्तिम संस्कार पेनकरण या देवकारण प्रथा से की जाति है,जिसमे स्त्री या पुरुष की मृत आत्मा को गोत्र के ड्यू मे समावेश किया जाता है । इसतरह हर मनुष्य के जिवन का गोंडी पंचतत्व प्रथा से इति होता है

कोया धर्म तथा हिन्दू धर्म


कोया धर्म

1. कोया धर्म निसर्गवादी धर्म है। 2. कोया धर्मी लोग प्रकृती को परम शक्ती मानते है। 3. कोया धर्मी अपने पूर्वज राजा रावण और मेघनाथ को पूजते है। 4. कोया धर्मी मातृशक्ती को मानते है। 5. कोया धर्मी उत्तम दिशा को अशुभ मानते है और दक्षिण दिशा को शुभ मानते है। 6. कोया धर्म मे समानता के आधार पर सामाजिक व्यवस्था है । 7. कोया धर्मी विवाह करने लडके घर जाते है । 8. कोया वंश मृत देह को दफनाते है।

हिन्दू धर्म

1. हिन्दू धर्म इश्वरवादी धर्म है । 2. हिन्दू धर्मी हजारो देवी देवताओ को मानते है। 3. हिन्दू धर्मी राजा रावण के शत्रु राम और हनुमान की पूजा करते है । 4. हिन्दू धर्मी पितृशक्ती को मानते है । 5. हिन्दू धमि उत्तर दिशा को शुभ मानते और दक्षिण दिशा को अशुभ मानते है । 6. हिन्दू धर्म मे चतुर वर्ण आधार पर के सामाजिक व्यवस्था है । 7. हिन्दू लडकी के घर जाते है । 8. हिन्दू मृत को जलाते है ।