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पारमेनिडेस

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पारमेनिडेस (संवाद)
लेखकप्लेटो
भाषाप्राचीन यूनानी
विषयदर्शनशास्त्र, सत्तामीमांसा, तर्कशास्त्र
शैलीसुकराती संवाद
स्थित स्थानलगभग 450 ईसा पूर्व (एथेंस में पैनाथेनिया उत्सव)
प्रकाशन स्थानएथेंस (प्राचीन यूनान)

पारमेनिडेस (अंग्रेज़ी: Parmenides, प्राचीन यूनानी : Παρμενίδης) प्राचीन यूनानी दार्शनिक प्लेटो द्वारा लिखित सबसे प्रसिद्ध और सबसे गूढ़ 'सुकराती संवादों' में से एक है। यह संवाद प्लेटो के मध्य या उत्तरार्ध काल (लगभग 370 ईसा पूर्व) की रचना मानी जाती है। इसमें एक युवा सुकरात और 'एलियाटिक स्कूल' के दो महान और वयोवृद्ध दार्शनिकों—पारमेनिडेस और ज़ेनो-के बीच एक काल्पनिक लेकिन गहन दार्शनिक बहस का वर्णन किया गया है। यह संवाद इसलिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है क्योंकि इसमें प्लेटो ने अपने ही सबसे प्रसिद्ध 'रूपों के सिद्धांत' की निर्मम आलोचना की है।[1][2]

पृष्ठभूमि और पात्र

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संवाद की शुरुआत एथेंस में 'पैनाथेनिया' उत्सव के दौरान होती है। ज़ेनो अपनी एक पुस्तक पढ़ रहे हैं, जिसमें वे यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि 'बहुलवाद' बेतुका है और वास्तविकता केवल एक है। एक युवा सुकरात इस पर आपत्ति जताते हैं और अपने रूपों के सिद्धांत का उपयोग करते हुए कहते हैं कि भौतिक चीजें भले ही विरोधाभासी हों, लेकिन उनके आदर्श "रूप" पूर्ण और निरपेक्ष होते हैं। इसके बाद, बुजुर्ग दार्शनिक पारमेनिडेस हस्तक्षेप करते हैं और सुकरात के इस सिद्धांत को तार्किक कसौटी पर परखना शुरू करते हैं।[3]

भाग 1: रूपों के सिद्धांत की आलोचना

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संवाद का पहला भाग पूरी तरह से सुकरात के 'रूपों के सिद्धांत' को ध्वस्त करने पर केंद्रित है। पारमेनिडेस सुकरात के सामने कई गंभीर तार्किक समस्याएँ प्रस्तुत करते हैं:

  • भागीदारी की समस्या: पारमेनिडेस पूछते हैं कि कोई भौतिक वस्तु किसी 'रूप' में कैसे भागीदार होती है? क्या रूप पूरी तरह से वस्तु के भीतर मौजूद होता है, या केवल उसका एक हिस्सा? दोनों ही स्थितियाँ रूपों की 'अविभाज्यता' और 'अखंडता' को नष्ट कर देती हैं।
  • तीसरा मनुष्य तर्क: यह दर्शनशास्त्र के सबसे प्रसिद्ध तर्कों में से एक है। पारमेनिडेस तर्क देते हैं कि यदि कई बड़े आदमियों को देखकर हम 'बड़प्पन' के एक रूप की कल्पना करते हैं, तो उन आदमियों और उस 'बड़प्पन के रूप' दोनों को मिलाकर देखने पर हमें एक और नए (तीसरे) रूप की आवश्यकता होगी। यह प्रक्रिया अनंत काल तक चलती रहेगी, जिससे रूपों का सिद्धांत निरर्थक हो जाएगा।[4]

भाग 2: 'एक' का द्वंद्व

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संवाद का दूसरा भाग और भी अधिक जटिल है। सुकरात को भ्रमित देखकर, पारमेनिडेस उन्हें 'द्वंद्वात्मक विधि' का एक कठिन मानसिक अभ्यास कराते हैं। वे "एक" की अवधारणा को लेते हैं और आठ (कुछ विद्वानों के अनुसार नौ) अलग-अलग तार्किक परिकल्पनाओं का परीक्षण करते हैं:

  1. यदि "एक" है, तो उसके क्या परिणाम होंगे?
  2. यदि "एक" नहीं है, तो उसके क्या परिणाम होंगे?

इस अभ्यास में पारमेनिडेस दिखाते हैं कि कैसे "एक" और "अनेक", "होना" और "न होना" आपस में गहरे और विरोधाभासी तरीकों से जुड़े हुए हैं। इस हिस्से की जटिलता के कारण आज भी विद्वान इस पर एकमत नहीं हैं कि प्लेटो यहाँ क्या साबित करना चाहते थे।[5]

प्लेटो के अपने जीवनकाल के बाद, इस संवाद ने बाद के दार्शनिकों पर गहरा प्रभाव डाला। विशेष रूप से तीसरी शताब्दी ईस्वी में, नव-प्लेटोवाद के संस्थापक प्लोटिनस ने इस संवाद को केवल तार्किक अभ्यास नहीं माना, बल्कि इसे एक गहरा रहस्यमय और धार्मिक पाठ माना। प्लोटिनस के अनुसार, संवाद का "एक" वास्तव में वह सर्वोच्च, अज्ञेय ईश्वरीय सत्ता है जिससे पूरे ब्रह्मांड की उत्पत्ति हुई है।[6]

सन्दर्भ

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  1. Allen, R. E. (1997). Plato's Parmenides. Yale University Press. pp. 12–18. ISBN 978-0300077292.
  2. "Plato's Parmenides"[मृत कड़ियाँ]
  3. "One, Two, Three… A Discussion on the Generation of Numbers in Plato's Parmenides"
  4. Vlastos, Gregory (1954). "The Third Man Argument in the Parmenides". The Philosophical Review. 63 (3): 319–349. डीओआई:10.2307/2182444.
  5. Meinwald, Constance C. (1991). Plato's Parmenides. Oxford University Press. pp. 45-52. ISBN 978-0195064452.
  6. Dillon, John M. (1996). The Middle Platonists: 80 B.C. to A.D. 220. Cornell University Press. pp. 120-125. ISBN 978-0801483165.

बाहरी कड़ियाँ

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